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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

कां० १, अ० १, ब्रा० १, कं० ७-१७ शतपथब्राह्मण / ५
करते हैं (उप+वास, किसी के घर में आकर बैठना)। इसीलिये इस दिन का नाम है 'उपवसथ'
(उपवास का दिन) ॥७॥
यह तो सर्वथा अनुचित है कि आगन्तुक मनुष्यों को खिलाने से पहले घरवाला स्वयं
खा ले। और यह तो और भी अनुचित है कि देवों को खिलाने से पहले खा लेवे। इसलिए नहीं
खाना चाहिए ॥८॥
इस विषय में याज्ञवल्क्य का कहना है कि—यदि नहीं खाता है तो पितृदेवत्य होता है;
और यदि खाता है तो देवों से पहले खाने का दोषी होता है। इसलिये इतना खावे कि न खाने में
उसकी गणना हो सके ॥६॥
जो हवि में नहीं डाला जाता उसका खाना न खाने के बराबर है। यदि उसको खा लेगा
तो उसे पितृदेवत्य का दोष न लगेगा। जिस चीज की हवि नहीं दी जाती उसके खा लेने से देवों
से पहले खा लेने का दोष भी नहीं लगता।
उसे वन में उपजी हुई चीज खानी चाहिये—ओषधि या वनस्पति। बर्कु वार्ष्ण ने कहा—
'मुझे माष (उड़द) पकाकर दे दो क्योंकि माष की हवि नहीं दी जाती।' परन्तु ऐसा नहीं करना
चाहिये। जौ या चावल के साथ उड़द खाये जाते हैं। उड़द जौ या चावल की वृद्धि करते हैं।
इसलिये वन की उपजी हुई चीज ही खावे ॥१०॥
उस रात को वह आहवनीय अग्नि के घर में सोवे या गार्हपत्य अग्नि के। जो व्रत करता
करता है वह देवों के निकट होता है। अतः वह वहीं सोता है जिनके निकट होना चाहता है।
नीचे (धरती पर) सोना चाहिये, क्योंकि जो सेवा करता है वह नीचे से ही करता है ॥११॥
दूसरे दिन प्रातःकाल अध्वर्यु पहला काम यह करता है कि वह जल के पास जाता है।
जल को लाता है। जल यज्ञ है। अतः इस प्रकार वह यज्ञ के पास जाता है। जल को आगे लाने
का अर्थ यह है कि वह यज्ञ को आगे लाता है ॥१२॥
वह यह मंत्र पढ़कर जल का प्रणयन करता है— (यजु० १।६) 'कौन'१ तुझको जोड़ता
है ? या प्रजापति तुझको जोड़ता है। वह तुझको जोड़ता है। किसके लिए तुझको जोड़ता है ?
या प्रजापति के लिए तुझको जोड़ता है। उसके लिए तुझको जोड़ता है। इन अनिरुक्त
(रहस्यमय) वचनों को बोलता है। प्रजापति रहस्यमय है। प्रजापति यज्ञ है। इस प्रकार
प्रजापति अर्थात् यज्ञ की योजना करता है ॥१३॥
जलों के प्रणयन का हेतु यह है कि जल से ही यह सब सृष्टि व्याप्त है। इस प्रकार इस
पहले कर्म से ही वह जगत् की प्राप्ति करता है ॥१४॥
इसका यह भी तात्पर्य है कि होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा, अग्नीध्र या स्वयं यजमान भी जिसकी
प्राप्ति नहीं कर सकता उसकी इस प्रकार प्राप्ति हो जाती है ॥१५॥
जल के प्रणयन का एक हेतु यह भी है। जब देव यज्ञ करने लगे तो असुरों, राक्षसों ने
उनको रोका—'यज्ञ मत करो।' उन्होंने रोका (ररक्षुः) इसलिये उनका नाम 'राक्षस' २ हुआ ॥१६॥
तब देवों ने इस वज्र को खोज निकाला, जो जल है। जल वज्र है। निस्सन्देह जल
वज्र है। जल जहाँ जाता है गड्ढा कर देता है। जिस चीज पर आक्रमण करता है उसका नाश
१. 'क' व्यंजनों में पहला अक्षर है। प्रजापति भी पहला व्यक्त करनेवाला है।
२. 'रक्ष' धातु का अर्थ है 'रोकना'। उन्होंने देवों को शुभ काम से रोका, इसलिये उनका
नाम राक्षस हुआ।

अध्याय-१, ब्राह्मण-२

६ शतपथ ब्राह्मण
ऽना॒ष्ट्रे॒ निवा॒ते य॒ज्ञम॑तन्वत तथो॒ ऽए॒वैष ए॒तं वज्र॑मुद्यच्छति तस्या॑भये ऽना॒ष्ट्रे॒ नि-
वा॒ते य॒ज्ञं त॑नुते॒ तस्मा॑दपः प्रणयति ॥ १७॥ ता उत्सिच्योत्तरेण गार्हपत्यग्ं साद-
यति । योषा वा॒ऽआपो॑ वृ॒षाग्नि॑र्गृ॒हा वै गार्हप॒त्यस्तद्गृ॒हेष्वे॒वैतन्मिथु॒नं प्र॒जन॑नं
क्रियते वज्रं वा॒ऽए॒ष उद्यच्छ॑ति यो ऽपः प्रणयति यो वा॒ऽअप्रति॑ष्ठितो वज्रमुद्य-
च्छति नैनग्ं शक्नोत्युद्यन्तुग्ं सग्ं हैनग्ं शृणाति ॥ १८॥ स यद्गार्हपत्ये सादयति ।
गृहा वै गार्हपत्यो गृहा वै प्रतिष्ठा तद्गृ॒हेष्वे॒वैतत्प्रति॑ष्ठायां प्रतितिष्ठति तथो॒ है-
नमेष वज्रो न हिनस्ति तस्माद्गार्हपत्ये सादयति ॥ १९॥ ता उत्तरेणाहवनीयं प्र-
णयति । योषा वा॒ऽआपो॑ वृ॒षाग्नि॑र्मिथु॒नमे॒वैतत्प्र॒जननं॑ क्रियतऽए॒वमिव हि मि-
थुनं ल्नाम्युत्तरतो हि स्त्री पुमांसमुपशेते ॥ २०॥ ता नान्तरेण संचरेयुः । नेन्मि-
थुनं चर्य॑माणमन्तरेण संचरानिति ता नाति॑कृत्य सादयेन्नो॒ऽअन्नाप्ताः॑ सादयेत्स यद्-
तिकृत्य सादयेदस्ति वा॒ऽअग्ने॒श्चापां॑ च विभ्रातृव्यमिव स यथैव ह तदग्नेर्भवति य-
त्रास्याप उपस्पृशन्त्यग्नौ ह्यधि भ्रातृव्यं वर्धयेद्यदतिकृत्य सादयेद्यद्यन्वन्नाप्ताः सा-
दयेन्नो ह्वामिस्तं काममभ्यापयेद्यस्मै कामाय प्रणीयन्ते तस्मादु सम्प्रत्येवोत्तरेणा-
हवनीयं प्रणयति ॥ २१॥ अथ तृणैः परिस्तृणाति । द्वन्द्वं पात्राण्युदाहरति शूर्पं
चाग्निहोत्रहवणीं च स्फ्यं च कपालानिच शम्यां च कृष्णाजिनं चोलूखलमुसले
दृषदुपल॒ तद्दश॑ दशा॒क्षरा॑ वै वि॒राड्वि॒राडु॑ य॒ज्ञस्तद्वि॒राज॑मे॒वैतद्य॒ज्ञम॑भिसम्पादयत्यथ
यद्द्व॒न्द्वं द्व॒न्द्वं वै वी॒र्यं य॒दा वै द्वौ सग्ंर॑भेते॒ऽथ तद्वी॒र्यं भ॑वति द्व॒न्द्वं वै मिथु॒नं प्र-
जन॑नं मिथु॒नमे॒वैतत्प्र॒जन॑नं क्रियते ॥ २२॥ ब्राह्मणम् ॥ १॥
अथ शूर्पं चाग्निहोत्रहवणीं चादत्ते । कर्म॑णे वां वे॒षाय॑ वा॒मिति॑ य॒ज्ञो वै कर्म॑
य॒ज्ञाय॑ हि॒ तस्मा॑दाह॒ कर्म॑णे वा॒मिति॑ वे॒षाय॑ वा॒मिति॑ वेवेष्टीव हि य॒ज्ञम् ॥ १॥
अथ वाचं यच्छति । वाग्वै य॒ज्ञोऽवि॑च्छुब्धो य॒ज्ञं तनवा॒ऽइत्यथ प्रत॑पति प्रत्युष्टग्ं
रक्षः॑ प्रत्यु॑ष्टा अरा॒तयो॒ निष्ट॑प्तग्ं॒ रक्षो॒ निष्ट॑प्ता अरा॒तय॒ इति॑ वा ॥ २॥ दे॒वा ह॒ वै

कां० १, अ० १, ब्रा० २, कं० १-२ शतपथब्राह्मण / ७
कर देता है। उन्होंने इस वज्र को लिया और उसीकी छत्र-छाया में यज्ञ को ताना। वह भी जल
का प्रणयन करके इसी वज्र को लाता है और इसी की छत्र-छाया में यज्ञ को तानता है ॥१७॥
पात्र में थोड़ा-सा जल लेकर गार्हपत्य के उत्तर की ओर रख देता है। आपः (जल)
स्त्रीलिङ्ग है और अग्नि पुँल्लिङ्ग। गार्हपत्य घर है। स्त्री-पुरुष मिलकर घर में ही सन्तानोत्पत्ति
करते हैं। जो जल का प्रणयन करता है वह वज्र को लाता है। जो भूमि में सुदृढ़ता से खड़ा
नहीं होता वह वज्र को नहीं ले सकता, क्योंकि वज्र उसी को हानि पहुँचा देगा ॥१८॥
गार्हपत्य में रखने का यही प्रयोजन है। गार्हपत्य घर है। घर ही प्रतिष्ठा है (खड़े होने
की जगह—, प्रति + स्था)। घर में इसकी प्रतिष्ठा करता है। इस प्रकार वज्र उसको हानि
नहीं पहुँचाता। इसीलिये वह जल की गार्हपत्य में स्थापना करता है ॥१९॥
आहवनीय के उत्तर में क्यों ले जाता है ? आपः (जल) स्त्रीलिङ्ग हैं। अग्नि पुँल्लिङ्ग
है। स्त्री-पुरुष के मिलने से ही सन्तान होती है। स्त्री, पुरुष के बाईं ओर सोती है ('उत्तर' का
अर्थ 'बायां' भी है) ॥२०॥
जल और अग्नि के बीच में होकर न निकले, क्योंकि स्त्री-पुरुष के जोड़े के बीच में
नहीं पड़ना चाहिये (उनके सहवास में विघ्न नहीं डालना चाहिये (जल को ठीक उत्तर की
ओर रखना चाहिये) न तो सीमा से आगे बढ़ाकर और न सीमा को प्राप्त करने के पहले
(न पूर्व की ओर, न पश्चिम की ओर)। यदि सीमा से आगे बढ़ाकर रखेगा तो जल और
अग्नि में जो परस्पर-विरोध है उसको बढ़ा देगा और जब जल का स्पर्श होगा तो अग्नि का विरोध
बढ़ जायगा। यदि सीमा को प्राप्त किये बिना ही रख देगा तो कामना की पूर्ति नहीं होगी।
इसलिये जल का प्रणयन ठीक उत्तर को ही करना चाहिये ॥२१॥
अब तृणों को बिछाता है (अग्नियों को) चारों ओर। पात्रों को दो-दो करके ले
जाता है, अर्थात् सूप और अग्निहोत्र-हवणी, स्फ्या और कपाल, शमी और कृष्णमृगचर्म,
ऊखल और मूसली, और छोटे-बड़े पत्थर; ये दस हो गये। विराट् छन्द दस अक्षर का होता है।
यज्ञ भी विराट् है। इस प्रकार यज्ञ को विराट् रूप दे देता है। दो-दो करके क्यों ले जाते हैं ?
इसलिये कि दो में शक्ति होती है। जब दो मिलकर काम करते हैं तो वह काम सुदृढ़ होता है।
दो से सन्तान होती है। इस प्रकार यज्ञ को प्रजनन-शील कर देता है ॥२२॥
अध्याय १—ब्राह्मण २
अब सूप और अग्निहोत्र-हवणी को लेता है इस मंत्र से (यजु० १।६)—"कर्म के लिए
तुम दोनों को, व्यापकत्व के लिए तुम दोनों को।" यज्ञ कर्म है। कर्म के लिए अर्थात् यज्ञ के
लिए। 'व्यापकत्व के लिए तुम दोनों को' क्योंकि यजमान यज्ञ में व्यापक होता है ॥१॥
अब वाणी रोकता है। वाणी यज्ञ है। इस प्रकार यज्ञ को निर्विघ्न पूरा करूँ, यह तात्पर्य
है। अब इन दोनों (सूप और हवणी) को आग पर तपाता है यह मंत्र बोलकर (यजु० १।७)—
"झुलस गया राक्षस, झुलस गये शत्रु । जल गया राक्षस, जल गये शत्रु" ॥२॥

८ शतपथ ब्राह्मण

य॒ज्ञं तन्वा॒नाः । ते ऽसु॒ररक्ष॒सेभ्य॒ आसं॑गाद्विभयां॒चक्रुस्तद्य॒ज्ञमुखा॑दे॒वैतन्नाष्ट्रा॒ र॑क्षा॒-
स्यपो॑ ऽपह॒न्ति ॥३॥ अथ॒ प्रेति॑ । उ॒र्व॒न्तरि॑क्षम॒न्वेमीत्य॒न्तरि॑क्षं वा॒ऽअनू॒ र॑क्ष॒स्तर॒-
त्यमू॑ल॒मुभ॒यतः॒ परि॑च्छिन्नं॒ यथा॒यं पुरु॑षो॒ऽमूल॒ उभ॑यतः॒ परि॑च्छिन्नो॒ऽन्तरि॑क्षम॒नुच॒-
रति॒ तल्लक्ष्म॑णै॒वैतद॒न्तरि॑क्षम॒भयमना॒ष्ट्रं कुरुते ॥४॥ स वा॒ऽअन॑स ए॒व गृ॑ह्णीयात् ।
अनो ह॒ वा॒ऽअ॒ग्रे प॒श्चेव वा॒ऽइदं य॒ज्ञ आस॑ स॒ यदे॒वाग्रे॒ तत्क॑रवा॒णीति॒ तस्मा॑-
दन॑स ए॒व गृ॑ह्णीयात् ॥५॥ भूमा वा॒ऽअन॑ः । भूमा॒ हि वा॒ऽअन॒स्तस्मा॒द्यदा बहु॒
भव॒त्यनो॑वा॒क्यमभू॒दित्या॑हुरु॒त्तद्भू॒मान॑मे॒वैतदुपैति॒ तस्मा॑दनस ए॒व गृ॑ह्णीयात् ॥६॥
य॒ज्ञो वा॒ऽअन॑ः । य॒ज्ञो हि वा॒ऽअन॒स्तस्मा॑दनस ए॒व य॒जूंषि॒ सन्ति॒ न कौ॒ष्ठस्य॒
न कु॒म्भ्यै भस्त्रायै ह॒ स्म॒र्षयो गृ॒ह्लन्ति॒ तद्वैषीन्प्रति भस्त्रायै॒ यजूं॑ष्यास॒स्तान्ये॒तर्हि॒
प्रा॒कृता॑नि य॒ज्ञाद्य॒ज्ञं निर्मिमा॒ऽइति॒ तस्मा॑दनस ए॒वगृह्णीयात् ॥७॥ उ॒तो पात्र्यै॒
गृ॒ह्लन्ति॑ । अन॒न्तराय॒मु तर्हि॑ य॒जूंषि॒ जपे॒त्स्तू॒मु त॒र्ह्यव॑स्त॒दुपो॒क्ष्य गृ॑ह्णीयाद्य॒तो यु॒-
नक्ता॒म ततो॒ विमु॑ञ्चामिति यतो॒ ह्येव यु॒ञ्जन्ति॒ ततो॒ विमु॑ञ्चन्ति ॥८॥ तस्य॒ वा
ऽए॒तस्यान॑सः । अ॒ग्निरिव॒ धूर॒ग्नि॒र्हि वै धूर्य्य ए॒नद्द॒हत्य॒ग्नि॒रिद॒मिवैषां॒ वरूं॑ भ॑व-
त्यथ॒ यज्जघ॒नेन कस्तम्भी॑ प्र॒ऽउगं वेदि॑रे॒वास्य॒ सा नीड॑ ए॒व ह॒विर्धानम् ॥९॥
स धुरम॒भिमृ॑शति । धूर॑सि॒ धूर्व॒ धूर्वन्तं॒ धूर्व॒ तं यो॒ऽस्मान्धूर्व॑ति॒ तं धू॑र्व॒ यं व॒यं
धूर्वाम॒ इत्य॒ग्निर्वाऽए॒ष धुर्य्य॑स्तमे॒तद॒त्ये॒ष्वन्व॑वति ह॒विर्ग्रही॑ष्यं॒स्तस्मा॒ऽए॒वैतान्नि॒-
ह्नुते॒ तथो॒ हैतमेषो॒ऽतियन्नमग्निर्धुर्य्यो न॑ हिनस्ति ॥१०॥ तद्व स्मैतद्दारुणिराह ।
अर्धमासशो वा॒ऽअरु॒रु॑ सपत्नान्धूर्वामीत्येतद्व स्म स तद॒भ्याह॑ ॥११॥ अथ॒ जघ॒-
नेन कस्तम्भीमीषाम॒भिमृश्य॑ जपति । दे॒वाना॒मसि॒ वह्नितम॒ग्ं सस्नितमं॑ प॒प्रितमं॑ जु॒-
ष्टतमं॑ दे॒वहू॑तमम् । अह्रुत॒मसि ह॒विर्धानं॒ दृग्ं॒हस्व॒ मा ह्वा॒रित्यन ए॒वैतदुपस्तौ-
त्युप॑स्तुतादा॒त्मानम॒तो ह॒विर्गृह्णानीति॒ मा ते य॒ज्ञप॑तिर्ह्वार्षी॒दिति यज॑मानो॒ वै य॒ज्ञ-
पति॒स्तद्यज॑मानायै॒वैतद॑कुला॒माशा॑स्ते ॥१२॥ अथा॒क्रम॑ते । वि॒ष्णुस्त्वा क्रम॒तामिति॑

कां० १, अ० १, ब्रा० २, कं० ३-१३ शतपथब्राह्मण / ६
क्योंकि जब देव यज्ञ करने लगे तो डरे कि कहीं असुर-राक्षस यज्ञ में विघ्न न डालें।
अतः पहले से ही वह दुष्ट राक्षसों को यज्ञ से दूर कर देता है ॥३॥
अब वह (धान की गाड़ी की ओर) चलता है यह मंत्रांश बोलकर (यजु० १।७)--
“अन्तरिक्ष में चलता हूँ।” राक्षस अन्तरिक्ष में खुले-बन्द दोनों ओर चलता है। इसी प्रकार
यह पुरुष (अध्वर्यु) भी खुले-बन्द, दोनों ओर चलता है। इस प्रकार वह यह मंत्रांश पढ़कर
अन्तरिक्ष को दुष्ट राक्षसों से मुक्त कर देता है ॥४॥
(हवि के धान को) गाड़ी से ही लेना चाहिये। गाड़ी पहले है और यज्ञ-शाला पीछे।
जो पहले है उसको मैं पहले करूँ। इसलिये गाड़ी से ही लेना चाहिये ॥५॥
अनस् (गाड़ी) का अर्थ है भूमा (बहुतायत)। वस्तुतः गाड़ी बहुतायत का चिह्न है।
जो चीज बहुत होती है उसको कहते हैं 'गाड़ी भरकर है'। इस प्रकार बहुतायत का सम्पादन
करता है। इसलिये गाड़ी से ही लेना चाहिये ॥६॥
यज्ञ गाड़ी है। यज्ञ वस्तुतः गाड़ी है। इसलिये यजुः-मंत्रों का संकेत गाड़ी की ओर है;
कोष्ठ (कोठार) या घड़े की ओर नहीं। यह ठीक है कि ऋषियों ने चावलों को चमड़े के थैले
से निकाला था। इसलिये यजुः-मंत्र ऋषियों के सम्बन्ध में चमड़े के थैले की ओर संकेत करते
हैं। परन्तु यहाँ तो प्रकृत अर्थ ही है- 'यज्ञ से यज्ञ को करूँ।' इसलिये गाड़ी से ही लेना
चाहिये ॥७॥
कुछ पात्र से भी लेते हैं। फिर भी यजुः-मंत्रों को पूरा-पूरा पढ़ना चाहिये। इस दशा में
स्फ्या को पात्र में डालना चाहिये, यह सोचकर कि जहाँ जोड़ूं वहीं खोलूं। जहाँ जोड़ते हैं वहीं
खोलते हैं (गाड़ी का जुआ जहाँ जोड़ा जाता है वहीं खोला जाता है) ॥८॥
इस गाड़ी का जुआ अग्नि हो। जुआ अग्नि है, क्योंकि जुआ जब बैलों के कन्धों पर
रक्खा जाता है तो कन्धे जल जाते हैं। डण्डे का जो बीच का भाग है वह मानो वेदी है और गाड़ी
में जहाँ चावल रहता है वह मानो हविर्धान है। इस प्रकार गाड़ी की यज्ञ से उपमा दी
गई है ॥६॥
अब वह जुए को छूता है, यजु० १।८ के इस अंश को पढ़कर - "तू जुआ है। उसको सता
जो सतानेवाला है। उसको सता जो हमको सताता है या जिसको हम सताते हैं।" जुए में अग्नि
होता है। जब वह हवि लेने जायगा तो जुए के पास से गुजरेगा। इस प्रकार जुए को प्रसन्न करता
है जिससे जुआ उसको कष्ट न दे ॥१०॥
आरुणि ने जो कहा था कि मैं हर आधे मास में शत्रुओं का नाश करता हूँ वह इसी सम्बन्ध
में कहा था ॥११॥
डण्डे को छूते हुए, यजु० १।८ और १।६ के इन अंशों का जाप करता है- “तू देवों में
सबसे अच्छा ले-जानेवाला, सबसे अच्छा जुड़ा हुआं, सबसे अच्छा भरा हुआ, सबसे अच्छा,
प्यारा, सबसे अच्छा निमंत्रण देनेवाला है।" "तू सबसे दृढ़ हविर्धान है। कड़ा रह, ढीला न
पड़।" इस प्रकार वह गाड़ी की स्तुति करता है कि इस प्रकार स्तुत और प्रसन्न गाड़ी से वह
हवि ले सके। “यज्ञपति स्खलित न हो” (यजु० १।६)। यजमान ही यज्ञपति है। यजमान की
दृढ़ता के लिए ही यह प्रार्थना करता है ॥१२॥
(दाहिने पहिये पर से) गाड़ी पर चढ़ता है इस मंत्र से (यजु० १।६)--"विष्णु तुझ पर

१० शतपथ ब्राह्मण

य॒ज्ञो वै विष्णुः स॑ दे॒वेभ्य॑ इ॒मां वि॒क्रान्तिं॒ विच॑क्रमे यैषा॒मियं वि॒क्रान्ति॒रिद॒मेव प्रथ॑-
मेन प॒देन पर्य्याग्रहीद॒मन्तरि॑क्षं द्वि॒तीये॑न दि॒वमुत्त॑मेनैता॒म्वेवैष ए॒तस्मै॑ वि॒ष्णुर्य॒ज्ञो
वि॒क्रान्तिं॒ विक्र॑मते ॥१३॥ अथ प्रेक्ष॑ते । उ॒रु वाता॒येति॑ प्रा॒णो वै वात॒स्तल्ल॑क्ष्णो-
वैतत्प्रा॒णाय वाता॒योरुगायं कु॑रुते ॥१४॥ अथा॒पास्य॑ति । अ॒पह॒तं रक्ष॒ इति य-
द्यत्र किञ्चिदामेध्रं भव॑ति यद्यु ना॒म्येव मृशेत्तन्ना॒ष्ट्रा ए॒वैतद्र॒क्षांस्यतो॒ऽपह॑न्ति
॥१५॥ अथा॒भिपद्य॑ते । यु॒क्तां पञ्चेति पञ्च वाऽइ॒मा अ॒ङ्गुल॑यः पा॒ङ्क्तो वै य॒ज्ञस्त-
द्य॒ज्ञमेवैतदु॑प दधाते ॥१६॥ अथ गृह्णाति । दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्रस॒वेऽश्विनो॒र्बा-
हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ताभ्या॒मग्नये॒ जुष्टं॑ गृह्णामी॒ति सवि॒ता वै दे॒वानां॑ प्रसवि॒ता तत्स-
वितृप्रसूत ए॒वैतद्गृह्णात्य॒श्विनोर्बा॒हुभ्या॒मित्य॒श्विनाव॑ध्व॒र्यू पू॒ष्णो हस्ताभ्या॒मिति पू॒षा
भागदु॒घोऽन्नं॑ पा॒णिभ्या॒मुप॑निधाता स॒त्यं देवा अ॒नृतं॑ मनु॒ष्या॒स्तत्स॒त्येनैवैतद्गृह्णा-
ति ॥१७॥ अथ दे॒वताया॒ऽआदि॑शति । सर्वा ह वै दे॒वता॑ अध्व॒र्युं ह॒विर्गृहीष्यन्त-
मुप॑तिष्ठन्ते म॒म नाम॑ ग्रहीष्यति म॒म नाम॑ ग्रहीष्यती॒ति ताभ्य ए॒वैतत्सह॑ सती-
भ्यो॒ऽसम॑दं करोति ॥१८॥ य॒द्वेव दे॒वताया॒ऽआदि॑शति । यावती॑भ्यो ह॒ वै दे॒व-
ताभ्यो ह॒वीꣳषि गृह्णन्त्य॑ऽऋणमु है॑व तास्तेन मन्यन्ते यद॒स्मै तं कामꣳ सम॒र्ध-
येयु॒र्यत्काम्या गृह्णाति॒ तस्मा॑द्देवताया॒ऽआदि॑शत्ये॒वमेव यथापूर्वं॑ ह॒वीꣳषि गृ-
हीत्वा ॥१९॥ अ॒थाभि॒मृश॑ति । भू॒ताय॑ त्वा॒ नारा॑तय॒ऽइति तद्य॑त ए॒व गृह्णाति
तद्वैवैतत्पुन॒राप्या॑ययति ॥२०॥ अथ प्राङ्प्रेक्ष॑ते । स्वर॒भिव्य॑ख्येष॒मिति परि॑वृतमिव
वाऽए॒तदनो॒ भव॑ति तद॒स्यैतच्चक्षुः पाप्म॑गृहीतमि॒व भव॑ति य॒ज्ञो वै स्व॒र्हर्देवाः
सूर्य्य॒स्तत्स्व॒रेवैतद॒तोऽभिविप॑श्यति ॥२१॥ अथा॒वरो॑हति । दृꣳहन्तां॒ दुर्याः पृथि॒-
व्यामिति गृहा वै दुर्यास्तै ह्येत ईश्वरो गृहा यज॑मानस्य यो॒ऽस्यैषोऽध्व॑र्युर्य॒ज्ञेन
च॑रति॒ तं प्रय॑न्त॒मनु प्र॒च्योतोस्तस्यैश्व॑रः कुलं वि॒क्षोब्धो॒स्तानिवैतदस्यां॑ पृथि॒व्यां दृꣳ
हति तथा नानुप्रच्यव॑न्ते॒ तथा न वि॒क्षोभ॑न्ते तस्मादाह दृꣳहन्तां दुर्याः पृथिव्या-

कां० १, अ० १, ब्रा० २, कं० १३-२२ शतपथब्राह्मण / ११
चढ़े।” यज्ञ का नाम विष्णु है। यज्ञ ने ही अपने पराक्रम से देवों को पराक्रमयुक्त किया जो
पराक्रम कि देवों में है। पहले पैर से पृथिवी को, दूसरे से अन्तरिक्ष को, तीसरे से द्यौलोक को।
इस यजमान के लिए भी यह विष्णु नामक यज्ञ इस सब पराक्रम को प्राप्त कराता है ॥१३॥
अब वह (चावलों को देखता है और) गाड़ी को सम्बोधन करके इस मन्त्रांश (यजु०
१।६) का जाप करता है— “वायु के लिए खुल।” वायु प्राण है। इस मन्त्र के जाप से वह यजमान
के प्राण को खुली वायु प्रदान करता है ॥१४॥
(अगर चावलों पर कोई तिनका या घास आ जावे तो) इस मन्त्रांश (यजु० १।६) को
पढ़कर उड़ाता है— “राक्षस भाग गया।” यदि न हो, तो भी छू ले और इस मन्त्र को पढ़ ले।
इससे राक्षस दूर भाग जाय ॥१५॥
अब वह चावलों को इस मन्त्रांश (यजु० १।६) को जपकर छूता है— “पांचों इसको ले
लेवें।” ‘पांचों’ का अर्थ है पांच अंगुलियां; यज्ञ को भी पांक्त (पांच वाला) कहते हैं। इस प्रकार
यज्ञ को धारण करता है ॥१६॥
यजु० १।१० के इस अंश को पढ़कर (चावल) लेता है— “देव सविता की प्रेरणा से,
पूषा के दोनों हाथों से अग्नि के लिए तुझको लेता हूँ।” सविता देवों का प्रेरक है। सविता की इसी
प्रेरणा से इसको लेता है, अश्विन की दोनों भुजाओं से। दोनों अध्वर्यु अश्विन हैं। “पूषा के
दोनों हाथों से”, पूषा बांटनेवाला है, जो हाथों से भागों को बांटता है। देव सत्य हैं। मनुष्य
अनृत है। इस प्रकार सत्य के द्वारा ही चावलों को ग्रहण करता है ॥१७॥
अब देवताओं का नाम निर्देश करता है। जब अध्वर्यु हवि देने को होता है तो सभी देव
घिर आते हैं, ‘वह मुझको देगा, वह मुझको देगा’ इस प्रकार सोचकर। इस प्रकार वह आये हुए
देवों में सामञ्जस्य उत्पन्न करता है ॥१८॥
देवों के नामों के निर्देश का एक प्रयोजन यह भी है कि जिन देवताओं के लिए हवि ग्रहण
की जाती है उन देवताओं का यह कर्तव्य हो जाता है कि वे यजमान की इच्छाओं की पूर्ति करें,
इसलिए भी देवताओं का निर्देश करता है। पूर्ववत् देवताओं के लिए निर्देश करके—॥१९॥
वह (बचे हुए चावलों को) यजु० १।११ के इस अंश को जपकर छूता है— “विभूति के
लिए तुझको, न कि शत्रु के लिए।” जितना वह लेता है उतनी ही उसकी पूर्ति कर देता है ॥२०॥
अब (गाड़ी पर बैठकर) पूर्व की ओर देखता है इस मन्त्रांश (यजु० १।११) को जपकर,
“मैं प्रकाश का अवलोकन करूँ।” गाड़ी ढकी होती है, मानो उसकी आंख पापयुक्त है। यज्ञ
प्रकाश है, यज्ञ दिन है, यज्ञ देव है, यज्ञ सूर्य है। इस प्रकार वह प्रकाशरूपी यज्ञ का अवलोकन
करता है ॥२१॥
इस मन्त्रांश (यजु० १।११) को पढ़कर गाड़ी से उतरता है— “दरवाजोंवाले पृथिवी पर
सुदृढ़ रहें।” दरवाजोंवाले घर हैं। जब अध्वर्यु यज्ञ के साथ चलता है तो सम्भव है कि उसके
पीछे यजमान के घर टूट जायें और उसका परिवार नष्ट हो जाय। अतः इस प्रकार यजमान के
घर को भूमि पर सुदृढ़ करता है कि वे टूटें न और परिवार नष्ट न हो। इसलिए वह कहता है,

अध्याय-१, ब्राह्मण-३

१२ शतपथ ब्राह्मण
मित्यथ॑ प्रै॒त्यूर्ध्व॒न्तरि॑क्षमन्वेमी॑ति सो॒ऽसावे॒व बन्धु॑: ॥ २२ ॥ स यस्य॑ गार्हप॒त्ये ह॒-
वीꣳ॑षि॒ श्रप॑यन्ति । गा॒र्ह॒प॒त्ये तस्य॒ पात्रा॑णि सꣳसा॒दय॑न्ति जघ॒नेनो॒ तर्हि॑ गा॒र्ह॒प॒त्यꣳ॑
सा॒दये॒द्यस्या॑हव॒नीये॑ ह॒वीꣳ॑षि॒ श्रप॑यन्त्याहव॒नीये॑ तस्य॒ पात्रा॑णि सꣳसा॒दय॑न्ति जघ॒-
नेनो॒ तर्ह्या॑हव॒नीयꣳ॑ सादयेत्पृथि॒व्यास्त्वा॑ ना॒भौ सा॒दया॒मीति॒ मध्यं॑ वै ना॒भिर्मध्य॑-
म॒भयं॒ तस्मा॑दाह पृथि॒व्यास्त्वा॑ ना॒भौ सा॒दया॒मीत्य॑दि॒त्या ऽ उ॑प॒स्थ ऽ इ॒त्युप॒स्थ ऽ इ॑वे-
न॒द॒माभु॑रि॒ति वा॒ऽआहु॑र्य॒त्सुगु॑प्तं गो॒पाय॑न्ति॒ तस्मा॑दाहादि॒त्या ऽ उ॑प॒स्थ ऽ इ॒त्यग्ने॑ ह॒व्यꣳ
र॒क्ष्वेति॒ तद॒ग्नये॑ चै॒वैत॒द्धवि॑: परि॒ददा॑ति गु॒प्त्या ऽ अ॒ग्नये॑ च पृथि॒व्यै तस्मा॑दाहा॒ग्ने ह॒व्यꣳ
र॒क्ष्वेति॑ ॥ २३ ॥ ब्रा॒ह्म॒णम् ॥ २ ॥
प॒वित्रे॑ करोति । प॒वित्रे॑ स्थो वै॒ष्ण॒व्यावि॑ति य॒ज्ञो वै वि॑ष्णुर्य॒ज्ञिये॑ स्थ इ॒त्येवै॒-
तदा॑ह ॥ १ ॥ ते वै द्वे भ॑वतः । अ॒यं वै प॒वित्रं॒ योऽयं॒ पव॑ते॒ सोऽयमेक॑ ऽ इ॒वैव॒
पव॑ते॒ सोऽयं॒ पुरु॑षे॒ऽन्तः प्रवि॑ष्टः प्राङ् प्रत्यङ् तावि॒मौ प्रा॑णोदा॒नौ तदे॑त॒स्यैवा॒नु
मा॒त्रां तस्मा॒द्द्वे भ॑वतः ॥ २ ॥ अथो॒ऽअपि॒ त्रीणि॑ स्युः । व्या॒नो हि तृती॑यो द्वे त्वे॒व
भ॑वतस्ता॒भ्यामे॒ताः प्रोक्ष॑णीरु॒त्पूय॒ ताभि॑: प्रोक्ष॑ति॒ तद्य॑दे॒ताभ्या॒मुत्पु॒नाति॑ ॥ ३ ॥ वृ॒-
त्रो ह॒ वाऽइ॒दꣳ सर्वं॑ वृ॒त्वा शिश्ये॑ । यदि॒दम॒न्तरे॑ण द्यावापृथि॒वी स यदि॒दꣳ सर्वं॑
वृ॒त्वा शिश्ये॒ तस्मा॑द्वृ॒त्रो नाम॑ ॥ ४ ॥ तमिन्द्रो॑ जघान । स ह॒तः पूति॑: सर्व॑त ए॒वा-
पो ऽभिप्र॑ सुस्राव॒ सर्व॑तऽइव॒ ह्ययꣳ॑ समु॒द्रस्तस्मा॒द्धैका॒ आपो॑ बीभत्साञ्चक्रिरे॒ ता
उ॒पर्य्य॑प॒र्यु॑त्पुपु॒वि॑रे ऽत इ॒मे दर्भा॑स्ता॒ ह्येता॒ अना॑पूयिता॒ आपो॒ऽस्ति वा॒ऽइत॑-
रासु॑ सꣳसृ॒ष्टमि॑व॒ यदे॑ना वृ॒त्रः पूति॑र॒भिप्रास्र॑व॒त्तद्देवा॑समे॒ताभ्यां॑ प॒वित्रा॑भ्यामप॒हृत्या॑थ
मे॒ध्याभि॑र॒द्भिः प्रोक्ष॑न्ति॒ तस्मा॑दाह॒ऽएताभ्या॑मुत्पु॒नाति॑ ॥ ५ ॥ स उत्पु॑नाति । स॒-
वि॒तुर्व॑: प्रस॒व ऽउ॑त्पुनाम्य॒च्छिद्रे॑ण प॒वित्रे॑ण॒ सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॒रिति॑ सवि॒ता वै दे॒वा-
नां प्र॑सवि॒ता तत्स॑वितृप्रसूत॒ एवै॑तदु॑त्पुनात्य॒च्छिद्रे॑ण प॒वित्रे॒णेति॑ यो वा॒ऽअयं॑ प॒-
वत॒ ऽएषो॒ऽच्छि॑द्रं प॒वित्र॑मे॒तेनै॒तदा॑ह॒ सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॒रित्ये॑ति वा॒ऽउत्प॑वितारो

का० १, अ० १, ब्रा० ३, क० १-६ शतपथब्राह्मण / १३
“दरवाजोंवाले पृथिवी पर सुदृढ़ होवें।” अब वह (गार्हपत्य के उत्तर की ओर) चलता है यह
मंत्रांश (यजु० १।१०) पढ़कर--“मैं अन्तरिक्ष में चलता हूँ।” इसका वही अर्थ है ॥२२॥
जिस यजमान की गार्हपत्य अग्नि में अध्वर्यु आदि हवि पकाते हैं, उसी गार्हपत्य में पात्र
भी रखते हैं। वे पात्र गार्हपत्य के पिछले भाग में रखने चाहिएं। परन्तु जिसकी आहवनीय में
हवि पकाते हैं उस आहवनीय में पात्र रखते हैं। इन पात्रों को आहवनीय के पीछे रखना चाहिए।
यजु० १।११ के इस अंश को जपकर ऐसा कहे, “मैं तुझको पृथिवी की नाभि में रखता हूँ।” नाभि
का अर्थ है—मध्य में भय नहीं होता। इसलिए कहता है कि “मैं तुझे पृथ्वी की नाभि में रखता
हूँ।”—“अदिति की गोद में।” जब किसी चीज़ को सुरक्षित रखते हैं तो कहावत है कि 'गोद में
रख ली है'। इसलिए कहा “अदिति की गोद में।” 'अग्नि ! हवि की रक्षा कर', इस प्रकार वह
हविः को पृथिवी और अग्नि के संरक्षण में देता है। इसलिए कहता है, “हे अग्नि, तू इस हवि की
रक्षा कर” ॥२३॥
अध्याय १—ब्राह्मण ३
अब दो पवित्रे बनाता है यजु० १।१२ का यह अंश पढ़कर-“तुम पवित्रे हो विष्णु के।”
यज्ञ का नाम विष्णु है। इसलिए कहता है कि तुम यज्ञ के हो ॥१॥
वे दो होते हैं। यह जो वायु बहता है वह पवित्र है। वह एक ही होता है। परन्तु जब
वह पुरुष के भीतर जाता है तो उसके दो भाग हो जाते हैं—एक अगला और दूसरा पिछला। ये
हैं प्राण और उदान। यह पवित्रीकरण भी उसी भाँति का है। इसलिए पवित्रे दो होते हैं ॥२॥
पवित्रे तीन भी हो सकते हैं, क्योंकि व्यान भी तो है। परन्तु दो ही होने चाहिएँ। इन
दोनों पवित्रों से प्रोक्षणी जल को छिड़कता है। इसका कारण यह है—॥३॥
वृत्र इस सब पृथिवी को घेरकर सो रहा। द्यौ और पृथिवी के बीच में जो कुछ है उस
सब को ढककर सो रहा। इसलिए उसका नाम वृत्र पड़ा ॥४॥
उस वृत्र को इन्द्र ने मारा। वह मरकर बदबू करता हुआ चारों ओर जलों की ओर बह
निकला। समुद्र तो चारों ओर ही हैं। इससे कुछ जल भयभीत हुए और ऊपर-ऊपर बहे। वहीं से
ये दर्भ उत्पन्न हुए (जिनके पवित्रे बनते हैं)। ये उस जल के भाग हैं जो सड़ा नहीं था। परन्तु
दूसरे जलों में वह बदबूदार भाग मिल गया, क्योंकि वृत्र उनमें बहकर जा मिला। इन पवित्रों
से वह उस भाग को शुद्ध करता है। इसलिए पवित्र जल से छिड़कता है। इसलिए उससे शुद्ध
करता है ॥५॥
वह इस मन्त्रांश (यजु० १।१२) को पढ़कर पवित्र करता है—“सविता की प्रेरणा से,
छिद्ररहित पवित्रे से, सूर्य की किरणों से।” सविता देवों का प्रेरक है। 'छिद्ररहित पवित्रे से'

अध्याय-१, ब्राह्मण-४

यत्सूर्य॑स्य र॒श्मयस्त॒स्मादाह॒ सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॒रिति॑ ॥ ६॥ ताः स॒व्ये पा॒णौ कृ॒त्वा ।
दक्षि॑णेनोदि॒ङ्ग्यत्युप॒स्तौत्ये॒वैना ए॒तन्म॒हय॑त्येव दे॒वीरापो॒ऽअग्रे॑गुवो॒ऽअग्रे॑पुव॒ इति॑
दे॒व्यो ह्यप॒स्तस्मा॑दाह दे॒वीराप इत्य॑ग्रेगुव॒ इति॑ ता यत्समु॒द्रं गच्छ॑न्ति तेना॑ग्रेगुवो
ऽग्रे॑पुव॒ इति॑ ता यत्प्र॑थमाः सो॒मस्य॒ राज्ञो भ॒क्षय॑न्ति तेना॑ग्रेपुवो॒ऽग्रऽइ॒मम॒द्य य॒ज्ञं
न॑यताग्रे य॒ज्ञप॑तिं सु॒धातुं य॒ज्ञप॑तिं देव॒युव॒मिति॑ साधु य॒ज्ञꣳ साधु यज॑मानमित्ये॒वैत-
दाह॒ ॥ ७॥ यु॒ष्मा इन्द्रो॒ऽवृणीत वृ॒त्रतूर्य॒ऽइति॑ । ए॒ता उ हीन्द्रो॒ऽवृणीत वृ॒-
त्रेण॒ स्पर्ध॑मान ए॒ताभि॒र्ह्येन॑महंस्त॒स्मादाह यु॒ष्मा इन्द्रो॒ऽवृणीत वृ॒त्रतूर्य॒ऽइति॑
॥ ८॥ यू॒यमिन्द्र॑मवृणीध्वं वृ॒त्रतूर्य॒ऽइति॑ । ए॒ता उ हीन्द्र॑मवृणत वृ॒त्रेण॒ स्पर्ध॑मान-
मे॒ताभि॒र्ह्येन॑महंस्त॒स्मादाह यू॒यमिन्द्र॑मवृणीध्वं वृ॒त्रतूर्य॒ऽइति॑ ॥ ९॥ प्रोक्षिता स्थेति॑ ।
तदे॒ताभ्यो॒ निह्नु॑ते ऽथ ह॒विः प्रोक्ष॑त्येको वै प्रोक्षण॑स्य बन्धुर्मेध्य॑मे॒वैतत्क॑रोति ॥ १०॥
स प्रोक्ष॑ति अ॒ग्नये॑ त्वा जुष्टं॒ प्रोक्षा॒मीति॑ तद्य॒स्यै दे॒वता॑यै ह॒विर्भव॑ति॒ तस्यै॑ मे॒ध्यं क-
रोत्ये॒वमे॒व यथा॒पूर्व॑ꣳ ह॒वीꣳषि प्रोक्ष्य॑ ॥ ११॥ अथ यज्ञपात्रा॑णि प्रोक्ष॑ति । दैव्या॑य
कर्म॑णे शुन्धध्वं देव॒यज्या॑या॒ऽइति॑ दैव्या॑य हि कर्म॑णे शुन्ध्य॑ति देव॒यज्या॑यै यद्वो
ऽशुद्धाः परा॑जघ्नुरि॒दं वस्तच्छुन्धामीति॑ तद्य॒द्वैषा॑मत्रा॒शुद्ध॑स्त॒क्षा वा॒न्यो वामेध्यः क-
श्चित्परा॑ह॒न्ति तदे॒वैषा॑मे॒तद॒द्भिर्मेध्यं॑ करोति॒ तस्मा॑दाह॒ यद्वो॒ऽशुद्धाः परा॑जघ्नुरि॒दं
व॒स्तच्छुन्धामीति॑ ॥ १२॥ ब्राह्मणम् ॥३॥
अथ कृष्णाजिनमादत्ते । य॒ज्ञस्यै॒व सर्व॑त्वाय य॒ज्ञो ह दे॒वेभ्यो॒ऽपच॑क्राम स कृ॒ष्णो
भू॒त्वा च॑चार॒ तस्य॑ दे॒वा अनु॑विद्य॒ त्वच॑मे॒वाव॑च्छायाञ्चक्रुः ॥ १॥ तस्य॒ यानि॑ शु॒क्लानि॑
च कृ॒ष्णानि॑ च लोमा॑नि । ता॒न्यृचां च साम्नां च रू॒पं यानि॑ शु॒क्लानि॒ तानि॒ साम्नाꣳ
रू॒पं यानि॑ कृ॒ष्णानि॒ तान्यु॒चां यदि॑ वेत॒रथा॒ यान्ये॑व कृ॒ष्णानि॒ तानि॒ साम्नाꣳ रू॒पं
या॑नि शु॒क्लानि॒ तान्यु॒चां यान्ये॑व ब॒भ्रूणी॑व ह॒रीणि॒ तानि॒ यजु॑षाꣳ रू॒पम् ॥ २॥
सैषा त्रयी वि॒द्या य॒ज्ञः । तस्या ए॒तत्छिल्प॑मे॒ष व॒र्णिस्तद्यत्कृ॑ष्णाजि॒नं भव॑ति य॒ज्ञस्यै॒व

का० १, अ० १, ब्रा० ४, कं० १-३ शतपथब्राह्मण / १५
वायु जो बहता है छिद्ररहित पवित्रा है। "सूर्य की किरणों से" क्योंकि सूर्य की किरणें पवित्र करने
वाली हैं ॥६॥
बायें हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से उछालता है, स्तुति करते हुए और महत्ता दर्शाते
हुए (यजु० १।१२)—"देवी जलो ! आगे चलनेवाले, आगे पवित्र करनेवाले।" जल दिव्य हैं।
इसलिए कहा 'देवी रायः'। आगे चलकर समुद्र में जाते हैं इसलिए कहा 'अग्रे गुवः'। 'अग्रे पुवः',
क्योंकि पहले वे सोम का पान करते हैं। अब 'इस यज्ञ को आगे बढ़ाओ, यज्ञपति को, जो सुधातु
और देवों का प्रिय है।' इसके कहने का तात्पर्य है कि यज्ञ और पति ठीक हों ॥७॥
अब जपता है (यजु० १।३)—"हे जलो ! तुमको इन्द्र ने वृत्र की लड़ाई में साथी चुना।"
जब इन्द्र ने वृत्र को मारना चाहा तो जलों को चुना कि इन्हीं की सहायता से मैं वृत्र को मारूँगा।
इसलिए कहता है कि "हे जलो, वृत्र की लड़ाई में तुम इन्द्र के साथी हो" ॥८॥
"तुमने भी इन्द्र को वृत्र की लड़ाई में चुना"—(यजु० १।१३)। जब इन्द्र वृत्र से लड़ाई
कर रहा था तो जलों ने भी इन्द्र को चुना और उनकी सहायता से इन्द्र ने वृत्र को मारा। इसलिए
कहता है कि 'तुमने भी इन्द्र को वृत्र की लड़ाई में चुना' ॥९॥
यजु० १।१३ का यह अंश पढ़ता है—"तुम पवित्र हो गये।" हवि के ऊपर जल
छिड़ककर उसको पवित्र करता है। इस पवित्रीकरण का भी वही तात्पर्य है। इसीलिए ऐसा करता
है ॥१०॥
वह पवित्र करते समय इस मन्त्रांश को पढ़ता है—"अग्नि के लिए तुझको पवित्र करता
हूँ।" जिस देवता के लिए हवि होती है उसी के लिए पवित्र की जाती है। यथापूर्व सब हवियों को
पवित्र करके ॥११॥
यज्ञ-पात्रों को पवित्र करता है इस मन्त्रांश (यजु० १।१३) को पढ़कर—"दिव्य कर्म के
लिए, देव-यज्ञ के लिए पवित्र होओ।" दिव्य कर्म के लिए शुद्ध करता है। देव-यज्ञ के लिए
तुम्हारा जो भाग छूने से अपवित्र हो गया, उसको मैं इस मन्त्र के द्वारा शुद्ध करता हूँ। बढ़ई ने
या किसी और ने छूकर इनको अशुद्ध कर दिया हो। इस अशुद्धि को वह इस प्रकार दूर करता
है। इसीलिए कहा कि 'अपवित्रों ने जो तुम्हारा अंश पवित्र किया हो उसको मैं पवित्र करता
हूँ' ॥१२॥
अध्याय १—ब्राह्मण ४
अब यज्ञ की पूर्णता के लिए काले मृग का चमड़ा लेता है। एक बार यज्ञ देवताओं से
भाग गया और काले मृग के रूप में विचरता रहा। देवताओं ने उसको खोज लिया और उसका
चमड़ा ले आये ॥१॥
उसके जो सफेद और काले लोम हैं वे ऋक् और साम का रूप हैं—सफेद साम का और
काले ऋक् का, या इससे उलटा अर्थात् काले साम का और सफेद ऋक् का। जो भूरे या खाकी
हैं वे यजुः का रूप हैं ॥२॥
यह त्रयी विद्या यज्ञ है। उसका जो शिल्प है वह काले मृग-चर्म के रूप में है। वह इस

१६ शतपथ ब्राह्मण
स॒र्व॒त्वाय॒ तस्मा॑त्कृष्णाजिनमधि॒ दीक्ष॑न्ते यज्ञस्यै॒व स॒र्व॒त्वाय॒ तस्मा॒द्यदव॑रुननमधि॒पे-
षणां भवत्यस्कन्नꣳ ह॒विरा॒सदिति॒ तय्द्ये॑वात्र॒ तण्डु॑लो वा पि॒ष्टं वा स्कन्दा॒त्तद्य॒ज्ञे
यज्ञः प्रति॑तिष्ठा॒दिति॒ तस्मा॒द्यदव॑रुननमधि॒पेष॑णं भवति ॥ ३॥ • अथ कृष्णाजिनमा-
द॒त्ते । शर्मा॒सीति॒ चर्म॒ वाऽए॒तत्कृ॒ष्णस्य॒ तद॑स्य तन्मानुषꣳ॒ शर्म॑ दे॒वत्रा तस्मा॑दाह
शर्मा॒सीति॒ तद॑वधूनोत्यवधूतꣳ॒ रक्षो॒ऽवधू॑ता॒ अरातय॒ इति॒ तन्ना॒ष्ट्रा ꣱ए॒वैत॒दप्ता॒-
स्यतो॒ऽपह॑न्त्यनिन्येव पात्राण्यवधूनोति य॒ज्ञास्यामेध्यमभूत्त॒द्द्वास्यै॒तदव॑धूनोति
॥ ४॥ तत्प्र॒तीची॒नग्रीव॒मुप॑स्तृणाति । अ॒दित्या॒स्त्वग॑सि॒ प्रति॒ त्वादि॑तिर्वे॒त्त्विति॒ वै
पृथि॒व्यदि॑तिस्तस्या अस्ये॒ लग्यदि॒दमस्या॒मधि॒ किंच॒ तस्मा॑दाहा॒दित्यास्त्वग॒सीति॒ प्रति॑
त्वादि॑तिर्वे॒त्त्विति॒ प्रति॒ हि स्वः सं॑ जानी॒ते तत्सं॑जाना॒मेवैतत्कृ॑ष्णाजिनाय च वदति
नेद॒न्यो॒ऽन्यꣳ॑ हि॒ꣳसा॒त॒ऽइत्य॒भिनि॑हितमेव॒ सव्ये॑न पाणिना भवति ॥ ५॥ अथ
दक्षि॑णेनो॒लूख॑ल॒माह्व॑रति । नेद्दि॒क्षु पु॒रा नाष्ट्रा॒ रक्षा॒ꣳस्यावि॑शानिति ब्राह्म॒णो
हि रक्ष॑सामपह॒न्ता तस्मा॑द॒भिनि॑हितमेव॒ सव्ये॑न पाणिना भवति ॥ ६॥ अथो-
लूख॑लं निद॑धाति । अद्रि॑रसि वानस्पत्यो॒ ग्रावा॑सि पृथुबु॒ध्न इति॒ वा तय्द्यै॒वादः
सोमꣳ॒ राजा॑नं॒ ग्राव॑भिरभिषु॒ण्वन्त्ये॒वमे॒वैत॒दुलूखलमुसलाभ्यां॒ दृषदुपलाभ्याꣳ॑ ह॒-
वि॒र्यज्ञ॑मभिषु॒णोत्य॒द्रय॒ इति॒ वै तेषा॒मेकं॒ नाम॒ तस्मा॑दाहा॒द्रिर॑सीति वानस्प॒त्य इति॑
वानस्प॒त्यो ह्येष॒ ग्रावा॑सि पृथुबु॒ध्न इति॒ ग्रावा॒ ह्येष॒ पृथु॑बु॒ध्नो ह्येष॒ प्रति॒ वादि॑-
त्यास्त्वग्वेद्वीति॒ तत्सं॑जाना॒मेवैतत्कृ॑ष्णाजिनाय च वदति ने॒दन्यो॒ऽन्यꣳ॑ हिꣳसात॒
ऽइति ॥ ७॥ अथ ह॒विराव॑पति । अ॒ग्नेस्त॒नूर॑सि वाचो विस॒र्जन॒मिति॑ यज्ञो॒ हि
तैनाग्नेस्त॒नूर्वाचो॑ विस॒र्जन॒मिति॒ यां वाऽअ॒मृतꣳ॑ ह॒विर्गृही॒ष्वन्वाचं॑ य॒त्यत्र॒ वै तां॑
विसृ॑जते॒ तय्द्ये॑ताम॒त्र वाचं॑ विसृ॒जत॒ऽएष हि यज्ञ उलूखले प्रत्यष्ठा॑दिष हि॒ प्रा-
सारि॒ तस्मा॑दाह वाचो विस॒र्जन॒मिति॑ ॥ ८॥ स यदि॒दं पु॒रा मानु॑षीं वाचं॒ व्याहृ॒-
त्तेत् । तत्रो॑ वैष्ण॒वीमृचं॑ वा॒ यजु॑र्वा जपेद्य॒ज्ञो वै वि॒ष्णुस्तद्य॒ज्ञं पुन॒रार॑भते तस्यो

का० १, अ० १, ब्रा० ४, कं० ३-६ शतपथब्राह्मण / १७
चमड़े को यज्ञ की पूर्णता के लिए लेता है, इसलिए काले मृग-चर्म पर ही दीक्षा ली जाती है। यज्ञ
की पूर्णता के लिए चर्म को लेते हैं, इसलिए चावलों के कूटने-फटकने का काम भी इसी पर किया
जाता है, जिससे हवि न फैले। यदि कुछ भाग गिरेगा भी, तो इसी पर गिरेगा और यज्ञ की पूर्णता
नष्ट न होगी। इसीलिए कूटने-फटकने का काम चर्म पर किया जाता है ॥३॥
कृष्ण मृग-चर्म लेते समय यजु० १।१४ के इस अंश का जाप करता है—"तू शर्म या
कल्याणकारक है।" इसका मानुषी नाम है चर्म और दैवी नाम है शर्म। इसीलिए कहा 'तू शर्म¹
हैं'। अब इसी मन्त्र के अगले टुकड़े को बोलकर उसे झाड़ता है—'राक्षस झाड़ दिये गये, शत्रु
झाड़ दिये गये।' ऐसा करके वह राक्षस या शत्रुओं को दूर करता है। पात्रों से हटकर झाड़ता है,
जो कुछ उसमें अपवित्र हो उसको झाड़ता है ॥४॥
अब उसकी गर्दन का भाग पश्चिम की ओर करके इस प्रकार बिछाता है कि बाल ऊपर
को रहें, यजु० १।१४ का अगला भाग पढ़कर—'तू अदिति का चमड़ा है। अदिति तुझको स्वीकार
करें।' पृथिवी अदिति है। उसके ऊपर जो कुछ हो वह उसका चमड़ा है। इसीलिए कहता है, 'तू
अदिति का चर्म है, अदिति तुझे स्वीकार करे।' अपना अपने को स्वीकार करता है। कृष्ण मृग-
चर्म को इसलिए ऐसा करता है कि चर्म और पृथिवी में सम्बन्ध स्थापित किया जाय और एक-
दूसरे को न सतावें। जब वह बायें हाथ में पकड़ा होता है उसी समय—॥५॥
दाहिने हाथ से उखली पकड़ता है कि कहीं इस बीच में राक्षस वहाँ न आ जायें। ब्राह्मण
राक्षसों का घातक होता है, अतः जबकि बायें हाथ में चमड़ा पकड़ा होता है, तभी—॥६॥
उखली को रख देता है, यह कहकर—"तू पत्थर है वनस्पति का—चौड़ा पत्थर" (यजु०
१।१४)। जैसे सोमयज्ञ में सोमलता को पत्थरों पर पीसते हैं, उसी प्रकार यहाँ भी हवि को उखली
और मूसल से कूटते हैं; इनका सामान्य नाम 'अद्रि' है। इसलिए कहा 'तू अद्रि (पत्थर) है'।
'वनस्पति का' इसलिए कहा कि वह सिल लकड़ी की होती है। 'चौड़ा पत्थर है' इसलिए 'चौड़ा
पत्थर' कहा। 'अदिति का चमड़ा तुझे स्वीकार करे'—यह इसलिए कहा कि चमड़े और उखली में
सम्बन्ध हो जाय और एक-दूसरे को हानि न पहुँचायें ॥७॥
अब यजु० १।१५ के एक टुकड़े को पढ़कर हवि डालता है—"तू अग्नि का शरीर है, वाणी
को मुक्त करनेवाला।" चावल यज्ञ के लिए हैं, इसलिए उसको 'अग्नि का शरीर' कहा। 'वाणी
को मुक्त करनेवाला' इसलिए कहा कि जब गाड़ी से चावल लेने गया था, उस समय मौन धारण
किया था। अब उस मौन को तोड़ता है। मौन तोड़ने का हेतु यह है कि अब यज्ञ उखली में
स्थापित हो गया उसका प्रसार हो गया। इसीलिए कहा कि 'तू वाणी को मुक्त करनेवाला
हैं' ॥८॥
यदि इस बीच में (मौन के समय) कुछ लौकिक शब्द मुँह से निकल जायें तो ऋक् या
यजुः से कोई विष्णु का मन्त्र बोलना चाहिए। यज्ञ विष्णु है। इस प्रकार यज्ञ का आरम्भ हो जाता
१. शर्म का अर्थ है कल्याणकारक। चर्म और शर्म में थोड़ा ही भेद है। चर्म भी शरीर के लिए
कल्याणकारक होता है।

१८ शतपथ ब्राह्मण
द्वेषा प्राय॑श्चित्तिर्देव॒वीत॑ये त्वा गृ॒ह्णा॒मीति॑ दे॒वानव॑दित्य॒ हि ह॒विर्गृह्णाति॑ ॥ ९ ॥ अथ॑
मु॒सल॒माद॑त्ते । बृह॒द्ग्रावा॑सि वानस्प॒त्य इति॑ बृह॒द्ग्रावा॒ ह्येष॑ वानस्प॒त्यो ह्येष॑ त-
द्वद॑धाति॒ स इदं दे॒वेभ्यो॑ ह॒विः शमी॑ष्व सु॒शमि॑ शमी॒ष्वेति॑ स॒ इदं दे॒वेभ्यो॑ ह॒विः
सꣳस्कु॑रु साधुसꣳस्कृतꣳ॑ सꣳस्कु॒र्वित्ये॒वैतदा॑ह ॥ १० ॥ अथ॑ हवि॒ष्कृत॒मुद्वा॑दयति । ह-
वि॒ष्कृदेहि॑ हवि॒ष्कृदेहीति॒ वाग्वै ह॑वि॒ष्कृद्वाच॑मे॒वैतद्विसृ॑जते॒ वागु॒ वै य॒ज्ञस्तद्य॒ज्ञ-
मे॒वैतत्पुन॒रुप॑ह्वयते ॥ ११ ॥ तानि वाऽए॒तानि॑ । च॒त्वारि॑ वाच ए॒हीति॑ ब्राह्म॒ण-
स्याग॒ह्याद्र॑वेति वैश्य॑स्य च राज॒न्यब॑न्धोश्चाधा॒वेति॑ शू॒द्रस्य॒ स यदे॒व ब्राह्म॑णस्य॒ त-
द्धैतद्धि य॒ज्ञिय॑तममे॒तदु॑ ह॒ वै वाचः॒ शान्त॑तमं यदे॒हीति॒ तस्मा॑दे॒हीत्ये॒व ब्रू॑यात्
॥ १२ ॥ तद्ध॒ स्मैतत्पु॒रा । जा॒यैव ह॑वि॒ष्कृदुपोत्ति॑ष्ठति॒ तदि॒दमप्ये॒तर्हि॒ य ए॒व कश्चो-
पोत्ति॑ष्ठति॒ स यत्रै॒ष ह॑वि॒ष्कृत॒मुद्वा॑दयति॒ तदे॒को दृष॑दुप॒ले समा॒हन्ति॒ तद्यदे॒तामत्र॑
वाचं॑ प्रत्यु॒द्वाद॑यन्ति ॥ १३ ॥ मनो॒र्ह वाऽऋ॒षभ आ॑स । तस्मि॑न्नसुर॒घ्नी स॑पत्न॒घ्नी वा-
क्यप्र॑विष्टास॒ तस्य॑ ह स्म श्वस॒थाद॑वथादसुररक्ष॒सानि॑ मृ॒द्यमा॑नानि यन्ति॒ ते हासु॑-
राः समू॑दिरे पा॒पं वत नो॒ऽयमृ॑ष॒भः सच॑ते क॒थं न्वि॒मं द॑भ्नुया॒मेति॑ किलाताकुली
ऽइति॑ हासुरब्रह्म॒सावा॑सतुः ॥ १४ ॥ तौ हो॑चतुः । श्रद्धादे॒वो वै म॒नुरावं॒ नु वे॑दावे-
ति॒ तौ हा॑गत्योचतुर्मनो याजयाव वेति॒ केने॒त्यने॒नर्ष॑भेणेति॒ तथेति॒ तस्यालब्ध॑स्य
सा वाग॑पचक्राम ॥ १५ ॥ सा मनो॒रेव जा॒यां म॑ना॒वीं प्र॑विवेश । तस्यै॑ ह॒ स्म यत्र॑
वद॑न्त्यै शृ॒ण्वन्ति॒ ततो॑ ह॒ स्मैवा॑सुररक्ष॒सानि॑ मृ॒द्यमा॑नानि यन्ति॒ ते हासु॑राः समू॑दिरे
ऽइ॒तो वै नः पापी॑यः सचते॒ भूयो॒ हि मानु॑षी॒ वाग्वद॒तीति॑ किलाताकुली॒ हैवो॑चतुः
श्रद्धादे॒वो वै म॒नुरावं॒ न्वेव॑ वेदावेति॒ तौ हा॑गत्योचतुर्मनो याजयाव वेति॒ केने॑-
त्य॒नयै॑व जा॒ययेति॒ तथेति॒ तस्याऽआल॑ब्धायै॒ सा वाग॑पचक्राम ॥ १६ ॥ सा य॒ज्ञमेव॑
य॒ज्ञपात्रा॑णि प्र॒विवेश॑ । ततो॒ हैनां॒ न शे॑कतुर्नि॒र्हर्तुꣳ सैषा॑सुर॒घ्नी वागुद्व॑दति॒ स
यस्य॒ हैवं॑ वि॒दुष ए॒तामत्र॒ वाचं॑ प्रत्यु॒द्वाद॑यन्ति पा॒पीयाꣳ॑सो है॒वास्य स॒पत्न॑ा भव-

कां० १, अ० १, ब्रा० ४, कं० ६-१७ शतपथब्राह्मण / १६
है, और यह मौन तोड़ने का प्रायश्चित्त भी है। अब जपता है—"देवों की प्रसन्नता के लिए मैं
तुझको लेता हूँ।" वस्तुतः देवों की प्रसन्नता के लिए ही यज्ञ किया जाता है ॥६॥
अब यजु० १।१४ के इस अंश को पढ़कर मूसली पकड़ता है—"तू लकड़ी का बड़ा पत्थर
हैं।" क्योंकि यह लकड़ी का भी है और बड़ा भी। अब इस मन्त्रांश (यजु० १।१४) को पढ़कर
मूसली ऊखली में डालता है—"देवों के लिए हवि तैयार कर। अच्छी तरह तैयार कर।" तात्पर्य
यह है कि इस हवि को देवों के लिए तैयार कर, जल्दी से तैयार कर ॥१०॥
अब वह हविष्कृत् (हवि तैयार करनेवाले) को बुलाता है—"हविष्कृत् आ, हविष्कृत्
आ।" वाणी ही हविष्कृत् है, इस प्रकार वाणी को मुक्त करता है। वाणी यज्ञ है, इस प्रकार वह
यज्ञ को फिर बुलाता है ॥११॥
बुलाने के चार प्रकार हैं—ब्राह्मण को बुलाना हो तो कहेंगे 'एहि', वैश्य के लिए
'आगहि', क्षत्रिय के लिए 'आद्रव', शूद्र के लिए 'आधाव'। इस स्थल पर ब्राह्मणवाला निमंत्रण
देना चाहिए, क्योंकि यही यज्ञ के उपयुक्त है और शान्ततम है। अतः कहता है, 'एहि' (यहाँ
आइये) ॥१२॥
पहली प्रथा यह थी कि इस निमन्त्रण पर यजमान की पत्नी ही उठकर हविष्कृत् बनती
थी। इसलिए यहाँ भी वह (पत्नी) या कोई ऋत्विज उठता है। जब अध्वर्यु हविष्कृत् को बुलाता
है तो एक ऋत्विज दोनों सिलों को पीटता है। ऐसा शोर क्यों करते हैं ? इसलिए कि—॥१३॥
मनु के पास एक बैल था। उसमें असुर को मारनेवाली और शत्रु को मारनेवाली
वाणी घुस गई। जब वह हुङ्कारता और चिल्लाता तो असुर राक्षस मर जाते थे। तब असुरों ने
कहा—"यह बैल तो हमारा बड़ा अनर्थ करता है, इसको कैसे मारें ?" 'असुरों के ऋत्विज थे
'किलात' और 'आकुली' ॥१४॥
ये दोनों बोले—"कहते हैं कि मनु श्रद्धालु है, इसको जांचें।" तब वे मनु के पास गये
और कहा—"हे मनु, हम तुम्हारे लिए यज्ञ करना चाहते हैं।" मनु ने पूछा—'किससे ?' उन्होंने
कहा—"इस बैल से।" उसने कहा-"अच्छा।" बैल के मरने पर वाणी वहाँ से चली गई ॥१५॥
वह मनु की पत्नी मनावी में घुस गई। जब वह उसको बोलते हुए सुनते तो राक्षस
और असुर मर जाते। तब असुरों ने कहा—"यह तो और भी बुरा हुआ, क्योंकि (बैल की अपेक्षा)
मनुष्य अधिक बोलता है।" तब किलात और आकुली ने कहा—"मनु को श्रद्धालु कहते हैं, चलो
इसकी जाँच करें।" वे उसके पास गये और कहा—"हम तुम्हारे लिए यज्ञ करना चाहते हैं।"
मनु ने पूछा—"किससे ?" उन्होंने कहा—"इस तेरी पत्नी से।" उसने कहा—"अस्तु !" उसके
मर जाने पर वाणी उसमें से निकल गई ॥१६॥
अब यह यज्ञ और यज्ञ-पात्रों में घुस गई और वे दोनों (किलात और आकुली) उसको
न निकाल सके। यही असुर और शत्रु को मारनेवाली वाणी इन पत्थरों से निकलती है। जो
इस रहस्य को समझता है, उसके लिए जब यह शोर किया जाता है तो उसके शत्रुओं को बहुत

अध्याय-२, ब्राह्मण-१

२० शतपथ ब्राह्मण
त्ति ॥ १७॥ स॒ समा॑ङ्क्ति । कु॒क्कुटो॑ऽसि॒ मधु॑जिह्व॒ इति॒ मधु॑जिह्वो वै स दे॒वेभ्य
आ॑सीद्विष॑जिह्वोऽसु॑रेभ्यः स यो दे॒वेभ्य॒ आसी॑त् स न ए॒धीत्ये॒वैतदा॑हा॒क्षिमू॑र्द्धमाव॒द
त्वया॑ व॒यं स॑ङ्घा॒तं॑संघातं॑ जेष्मेति॒ नात्र॑ तिरो॒हित॑मिवास्ति ॥ १८॥ अथ॒ शूर्प॒मा-
द॑त्ते । व॒र्ष॒वृद्ध॑मसीति व॒र्ष॒वृद्धं॒ ह्ये॑तद्यदि नडानां यदि वेणूनां यदीषीकाणां वर्ष-
मु॒क्त्यैवैतद्व॑र्धयति ॥ १९॥ अथ ह॒विर्निर्व॑पति । प्रति॑ त्वा व॒र्ष॒वृद्धं॒ वेत्त्विति॑ वर्ष-
वृद्धा उ॒ ह्ये॑वैते॒ यदि॑ व्रीहयो॒ यदि॒ यवा॑ वर्षमु॒क्त्यैवैतान्व॑र्धयति॒ तत्संज्ञा॑मे॒वैतच्छूर्पा॑य
च वदति॒ नेद॒न्योऽन्यं॑ हि॒नसा॒त॒ऽइति॑ ॥ २०॥ अथ निष्पुनाति । परा॑पूत॒ꣳ रक्षः॒
परा॑पूता॒ अरा॑तय॒ इत्यथ॑ तुषान॒पह॒न्त्यपह॑तं॒ रक्ष॒ इति॒ तन्मा॒ष्ट्र्य॑ ए॒वैतद्रक्षाꣳस्यतो॒
ऽपह॑न्ति ॥ २१॥ अथापविनक्ति । वा॒युर्वो विवि॑नक्त्वित्ययं वै वायुर्योऽयं पवत
ऽएष वा॒ऽइदꣳ सर्वं॒ विवि॑नक्ति॒ यदि॒दं किंच॒ विविच्य॑ते॒ तदे॒नान्त्वेष॒ ए॒वैतद्विवि॑नक्ति
स॒ यदि॒तऽए॒तत्प्राप्नुवन्ति॒ यन्निनानद्यपविनक्ति ॥ २२॥ अथानुमन्त्रयते । दे॒वो वः॑ स-
वि॒ता हिर॑ण्यपाणिः॒ प्रति॑गृभ्णात्वच्छिद्रेण पा॒णिना सुप्र॑तिगृहीता अस॒न्नित्यथ त्रिः
फली॑करोति त्रि॒वृद्धि य॒ज्ञः ॥ २३॥ तद्धैके दे॒वेभ्यः॒ शुन्ध॑ध्वं दे॒वेभ्यः॒ शुन्ध॑ध्व॒मिति॑ फ-
ली॑कुर्वन्ति तदु॑ तथा॒ न कुर्याद॒दिष्टं॒ वाऽए॒तद्देव॑तायै ह॒विर्भवत्यथे॑तद्दे॒वदे॒वं करो॑-
ति यदाह दे॒वेभ्यः॒ शुन्ध॑ध्व॒मिति॒ तत्सम॑दं करोति तस्माद् तूष्णी॑मेव॒ फली॑कुर्यात्
॥ २४॥ ब्राह्मणम् ॥४॥ अध्यायः ॥१॥
स वै क॒पालान्ये॒वान्यत॑र् उपदधाति । दृषदुपलेऽअन्यतरस्तद्द्वाऽएतदुभयंꣳ सह
क्रियते तद्यदेतदुभयंꣳ सह॒ क्रिय॑ते ॥ १॥ शिरो ह॒ वाऽए॒तद्य॒ज्ञस्य॒ यत्पुरोडाशः स
यान्या॑स्थीनि॒ शीर्षः॑ क॒पालान्ये॑तान्ये॒वास्य क॒पालानि मस्तिष्क॒ऽए॒व पिष्टानि॑ त-
द्वाऽए॒तद्द्विकाम्प्र॑मिकꣳ सह॒ करवाव समा॒नं कर॒वावेति॒ तस्माद्द्वाऽएतदुभयंꣳ सह॒ क्रि-
य॑ते ॥ २॥ स यः क॒पालान्यु॑पद॒धाति॑ । स उ॑पवेषमा॒दत्ते धृष्टिर॑सीति॒ स य॒दैनेना-
ग्निं धृ॒ष्णुर्वाप॑चरति॒ तेन धृष्टिरथ॒ यदेनेन य॒ज्ञ उपा॑लभत॒ उपेव वाऽए॒नेनैतद्देवेष्टि॑

कां० १, अ० २, ब्रा० १, कं० १-३ \qquad शतपथब्राह्मण / २१
हानि पहुंचती है ॥१७॥
वह यह मंत्रांश पढ़कर पत्थरों को पीटता है—"तू मीठी वाणी वाला कुक्कुट या मुर्गा है।"
वस्तुतः (वह बैल) देवों के लिए मीठी वाणी वाला और असुरों के लिए विषयुक्त वाणी वाला
था। इसलिये वह कहता है, 'जैसा तू देवों के लिए था वैसा ही हमारे लिए भी हो।' फिर वह
कहता है, 'रस और शक्ति हमारे लिए ला। तेरी इस सहायता से हम हर एक युद्ध को जीतें।'
आगे सब स्पष्ट है ॥१८॥
अब अध्वर्यु इस मन्त्रांश (यजु० १।१४) को पढ़कर सूप को लेता है—"तू वर्षा में बढ़ा
हुआ है।" वस्तुतः यह वर्षा में बढ़ा हुआ होता है, चाहे वह नरकुल का हो, चाहे सिरकी का।
ये सब वर्षा में बढ़ते हैं ॥१९॥
अब वह कुटे हुए चावलों को सूप में डालता है इस मन्त्रांश (यजु० १।१६) को पढ़कर-
"वर्षा में बढ़ा हुआ तुझे स्वीकार करे।" क्योंकि यह हवि भी वर्षा में बढ़ी हुई होती है, चाहे यव
या जो हों, चाहे तण्डुल। ऐसा कहकर वह हवि और सूप के बीच में सम्बन्ध स्थापित कर देता
है, जिससे एक-दूसरे को सताने न पावें ॥२०॥
अब वह फटकता है इस मंत्रांश (यजु० १।१६) को पढ़कर—"राक्षस दूर हो गये, शत्रु
दूर हो गये।" 'राक्षस दूर हों।' ऐसा कहकर भूसी फेंक देता है। ऐसा करने से राक्षस शत्रु दूर हो
जाते हैं ॥२१॥
अब वह कुटे चावलों को बेकुटे चावलों से अलग करता है इस मन्त्रांश को पढ़कर—"वायु
तुमको अलग-अलग करे" (यजु० १।१६), क्योंकि सूप की वायु ही चावलों को अलग करती
है। संसार में जिस चीज को अलग करना होता है वायु द्वारा ही अलग करते हैं। जब यह कृत्य
जारी होता है और वह फटकते हैं, तभी—॥२२॥
वह पात्र में डाले हुए चावलों को सम्बोधन करके यह मन्त्रांश (यजु० १।१६) पढ़ता
है—"सोने के हाथोंवाला सविता देव छिद्ररहित हाथ से तुमको ग्रहण करे" अर्थात् वे उस हवि
को आदर के साथ लेवें। वह तीन बार फटकता है, क्योंकि यज्ञ त्रिवृत् (तिहरा) है ॥२३॥
कुछ लोग ऐसा पढ़कर फटकते हैं 'देवों के लिए शुद्ध हो।' परन्तु ऐसा न करना चाहिए,
क्योंकि यह हवि तो एक विशेष देवता की होती है। 'देवों के लिए शुद्ध हो' ऐसा कहनेवाला
उसको सब देवों की घोषित कर देता है। इसलिये चुपचाप ही फटकना चाहिए ॥२४॥
अध्याय २-ब्राह्मण १
(अग्नीध्र) कपालों को (गार्हपत्य अग्नि पर) रखता है और (अध्वर्यु) दोनों (दृषदुप-
पलों) सिलों को (मृग-चर्म पर)। ये दोनों काम एकसाथ होते हैं। ये दोनों काम एकसाथ क्यों
होते हैं? इसलिए कि—॥१॥
पुरोडाश यज्ञ का सिर है। ये जो कपाल हैं वे सिर की खोपड़ी की हड्डियां हैं। पिसी हुई
चावल की पीठी मस्तिष्क का भेजा है। ये सब मिलकर एक अंग होते हैं। वे सोचते हैं कि इन
सबको एक कर देवें। इसलिए इन दोनों कामों को एकसाथ करते हैं ॥२॥
वह जो कपालों को आग पर रखता है उपवेश (चिमटे) को हाथ में लेकर कहता है—"तू
धृष्टि है" (यजु० १।१७)। इसको 'धृष्टि' इसलिए कहा कि इसी से अग्नि को ठीक करेगा

त॒स्मादुपवेषो नाम ॥३॥ तेन प्राचोऽङ्गारा॒नुद्ध॑रति । अ॒पा॒ग्निम॒ग्नि॑मा॒मादं॑ ज॒हि
निष्क्रव्यादं॑ सेध॒त्ययं वाऽआ॒माद्येने॒दं मनुष्याः प॒क्वमश्न॒न्त्यथ॒ येन॒ पु॒रुषं द॒हन्ति॒ स
क्रव्या॑दि॒तदु॒भय॒मेवैत॑दु॒भयतोऽप॑हन्ति ॥४॥ अथा॒ङ्गार॒मास्कौति । आ दे॑वयजं॑ व॒हेति॑
यो दे॑वया॒ट् तस्मि॑न् ह॒वीꣳषि श्रप॒याम॒ तस्मि॒न्यज्ञं॑ तनवामहा॒ऽइति॒ तस्मादाहा॒ऽऽस्कौ-
तीति॑ ॥५॥ तं मध्य॒मेन कपाले॒नाभ्यु॑पदधाति । दे॒वा ह वै य॒ज्ञं त॒न्वाना॒स्तेभ्यो॒ऽसुरर-
क्षसेभ्य आसङ्गाद्बि॒भयां॑चक्रुर्नॆन्नो॒ऽधस्ता॒न्नाष्ट्रा रक्षा॑ꣳस्युपोत्ति॒ष्ठान्नित्यग्नि॒र्हि रक्षसाम-
पह॒न्ता तस्मा॑देवमु॒पद॑धाति तथो॒ ह्येष ए॒व भव॑ति ना॒न्य ए॒ष हि य॒ज्ञियो॒ मेध्य॒स्त-
स्मान्मध्य॒मेन कपाले॒नाभ्यु॑पदधाति ॥६॥ स उ॑पदधाति । ध्रु॒वम॑सि पृथि॒वीं दृꣳहेति॑
पृथि॒व्या ए॒व रू॒पेणैतद् दृꣳहत्येतयै॒व द्विषन्तं॑ भ्रातृ॑व्यमवबाधते ब्रह्म॒वनि त्वा
क्षत्र॒वनि सजातवन्यु॑पदधामि भ्रातृ॑व्यस्य वधा॒येति ब॒ह्वी वै य॒ज्ञस्या॒शीस्तद्यद्ब्रह्म॑ च
क्षत्रं॑ चाशास्त॒ऽउभे वी॒र्ये सजातवनीति भूमा वै सजातास्तद्भूमान॒माशास्त॒ऽउपद॑धा-
मि भ्रातृ॑व्यस्य वधा॒येति यद्यु॑ऽभिचरे॒द्यद्यु॑ नाभिश्चरेद॒मुष्य॑ वधा॒येति ब्रूयाद॒भिनि॒-
ष्टितमि॑व स॒व्यस्य पा॒णेरङ्गु॑ल्या भवति ॥७॥ अथा॒ङ्गार॒मास्कौति॑ । नेदि॒ह पुरा
नाष्ट्रा रक्षा॑ꣳस्याविशा॒न्निति॒ ब्राह्मणो॒ हि रक्ष॑सामपहन्ता तस्मादभिनि॒ष्टित॑मे॒व स-
व्यस्य पा॒णेरङ्गु॑ल्या भवति ॥८॥ अथा॒ङ्गारमभ्यू॑हति । अग्ने॒ ब्रह्म॑ गृभा॒णीति॒ ने-
दि॒ह पु॒रा नाष्ट्रा रक्षा॑ꣳस्याविशा॒न्नित्य॒ग्निर्हि रक्ष॑सामपहन्ता तस्मादेनम॒भ्यू॑ह॒ति
॥९॥ अथ यत्पश्चात्तदुप॑दधाति । धरु॒णम॑स्यन्तरि॑क्षं दृꣳहेत्य॒न्तरि॑क्षस्यै॒व रू॒पेणैत

का० १, अ० २, ब्रा० १, कं० ३-१२ शतपथब्राह्मण / २३
(धृष्टि का अर्थ है साहस के साथ काम करनेवाला) । इसका नाम उपवेश इसलिए है कि इसी
से आग के अंगारों का स्पर्श करेगा ॥३॥
इससे वह अंगारों को आगे को निकालता है यह मन्त्र पढ़कर (यजु० १।१७)-"हे
अग्नि ! कच्चा खानेवाली अग्नि को छोड़ । शव खानेवाली अग्नि को दूर कर।" कच्चा खाने
वाली (आमाद) अग्नि वह है जिस पर मनुष्य खाना पकाते हैं। क्रव्याद अग्नि वह है, जिस पर
मरे हुए पुरुष के शव को जलाते हैं। इन दोनों अग्नियों को गार्हपत्य अग्नि से अलग करता है ॥४॥
अब एक अंगारे को अपनी ओर खींचता है यह मन्त्रांश (यजु० १।१७) पढ़कर- "उस
अग्नि को लाओ जिसमें देवताओं के लिए यज्ञ किया जाता है (देवयाज) ।" मैं देवयाज अग्नि में
हवि पकाऊँ। उसी में यज्ञ करूँ। इसीलिये वह उस अंगारे को निकालता है ॥५॥
उस अंगारे पर बीच का कपाल रखता है। जब देव यज्ञ करने लगे तो उनको भय हुआ
कि कहीं असुर राक्षस यज्ञ को विध्वंस न करें। उनको भय हुआ कि कहीं हमारे नीचे से असुर
राक्षस न उठ खड़े होवें। अग्नि राक्षसों का घातक है, इसलिये कपाल को आग पर रखता है।
इसी अंगारे पर क्यों रखता है, दूसरों पर क्यों नहीं ? इसका कारण यह है कि यह अंगारा
यजुष्कृत है (यजु०-मन्त्रों के पाठ से पवित्र किया हुआ है) । इसलिये इसके ऊपर मध्य में कपाल
को रखता है ॥६॥
इस समय वह यह मन्त्रांश पढ़ता है(यजु० १।१७)-"तू ध्रुव है, पृथिवी को दृढ़ कर ।"
पृथिवी के रूप में ही वह यज्ञ को दृढ़ करता है। इसी से वह शत्रु का नाश करता है। अब कहता
है-'ब्राह्मण की रक्षा करनेवाले, क्षत्रिय की रक्षा करनेवाले, सजातीय की रक्षा करनेवाले ! तुझको
मैं शत्रु के नाश के लिए रखता हूँ।" आशीर्वाद के बहुत-से यजुष् मन्त्र हैं। इस मन्त्र से ब्राह्मण और
क्षत्रिय को आशीर्वाद देता है जो दो वीर्यवान् शक्तियां हैं; सजातीय की रक्षा करनेवाले। ऐसा
कहने से धन को आशीर्वाद देता है, क्योंकि सजातीय धन है। 'शत्रु के वध के लिए', ऐसा कहते
हुए चाहे किसी को मारना चाहे या न चाहे, उसको कहना चाहिए 'अमुक-अमुक के वध के लिए'।
अभी बायें हाथ की अँगुली से कपाल रक्खा ही था कि - ॥७॥
दूसरे अंगारे को लेता है कि कहीं इस बीच में असुर राक्षस घुस न आवें । ब्राह्मण राक्षसों
का दूर करनेवाला है। इसलिये ज्योंही बायें हाथ की अँगुली से कपाल रक्खा, त्यों ही झट-॥८॥
उसे अंगारे पर रख देता है यह मन्त्रांश पढ़कर- "हे अग्नि, ब्रह्म, इसको ग्रहण कर।"
वह ऐसा कहता है जिससे असुर राक्षस पहले से ही घुसने न पावें। वह इसीलिये कपाल को अंगारे
पर रख देता है क्योंकि अग्नि राक्षसों का दूर करनेवाला है ॥६॥
अब बीचवाले कपाल के पश्चिम की ओर के कपाल को यह मन्त्रांश पढ़कर अंगारे पर
रखता है(यजु० १।१८)- "तू सहारा है। अन्तरिक्ष को दृढ़ कर।" अन्तरिक्ष के रूप में वह यज्ञ को
सुदृढ़ करता है। इससे वह दुष्ट शत्रु को दूर करता है। 'तुझे, ब्राह्मण की रक्षा करनेवाले, क्षत्रिय की
रक्षा करनेवाले, सजातीय की रक्षा करनेवाले तुझको मैं शत्रु के वध के लिए रखता हूँ' ॥१०॥
अब पूर्व की ओर के कपाल को इस मन्त्रांश को (यजु० १।१८) पढ़कर रखता है- "तू
धर्ता है। द्यौ लोक को सुदृढ़ कर।" द्यौ के रूप में वह इस यज्ञ को सुदृढ़ करता है। इससे वह शत्रु
को दूर भगाता है। 'ब्राह्मण की रक्षा करनेवाले, क्षत्रिय की रक्षा करनेवाले, सजातीय की रक्षा
करनेवाले तुझको मैं शत्रु के वध के लिए रखता हूँ' ॥११॥
अब दक्षिणवाले कपाल को रखता है यह मन्त्रांश(यजु० १।१८)पढ़कर- "सबके लिए
मैं तुझको रखता हूँ।" इन तीनों लोकों के आगे कोई चौथा लोक है या नहीं, वहाँ से भी वह शत्रु
को दूर करता है। चौथा लोक है या नहीं, यह अनिश्चित है; और 'सब दिशाओं' का भी निश्चय

२४ शतपथ ब्राह्मण
न॒ वान॒ङ्गो तय॑द्दि॒श्या आ॑शा॒स्तस्मा॑दाह॒ विश्वा॑भ्यस्त्वा॒शाभ्य॒ उप॑दधामीति तूष्णी॑मे॒-
वेत॒राणि कपालान्युप॑दधाति चि॒त स्थो॒र्ध्वचि॑त॒ इति॑ वा ॥ १२॥ अथा॒ङ्गिरि॒रभ्यू॑ह-
ति । भृगूणामङ्गिर॑सां तप॑सा तप्यध्व॒मित्ये॒तद्वै तेजि॑ष्ठं तेजो॒ यद्भूगवोऽङ्गिर॑स॒स्ते उत्त॒प्ता-
न्यस॒न्निति॒ तस्मा॑देनन॒मभ्यू॑हति ॥ १३॥ अथ यो दृषदुपले उप॑दधाति । स कृ॒ष्णाजि॒-
नमा॒दत्ते॒ शर्मा॑सीति॒ तदव॑धूनोत्यव॑धूत॒ रक्षो॒ऽव॑धूता अरा॑तय॒ इति॒ सो॑ऽसावेव
बन्धु॒स्तत्प्रतीचीनग्रीवमुप॑स्तृणात्यादि॒त्यास्त्वग॑सि॒ प्रति॒ त्वादि॑तिर्वेत्त्विति॒ सो॑ऽसावेव
बन्धुः ॥ १४॥ अथ दृषद॒मुप॑दधाति । धिष॑णासि पर्वती॒ प्रति॑ त्वादि॒त्यास्त्वग्वे॑त्त्विति
धिष॑णा॒ हि पर्व॑ती॒ हि प्रति॑ त्वादि॒त्यास्त्वग्वे॑त्त्विति तत्संज्ञा॒मेवैतत्कृ॒ष्णाजि॒नाय॑ च
वदति॒ नेद्यो॑ऽन्य॑ᳵ हिंस॒ाव॒ इतीय॑मे॒वैषा पृ॑थि॒वी रू॑पेण ॥ १५॥ अथ शम्यामु-
दीचीनाग्रामुप॑दधाति । दि॒वः स्क॑म्भनीरसीत्यन्तरिक्ष॑मेव रू॒पेणान्तरिक्षेण॒ हीमे द्या-
वा॑पृथि॒वी विष्ट॑ब्धे॒ तस्मा॑दाह दिव स्कम्भनी॒रसी॑ति ॥ १६॥ अथोपलामुप॑दधाति ।
धिष॑णासि पार्वते॒यी प्रति॑ त्वा पर्वती वेत्त्विति॒ कनीयसी॒ ह्येषा दुहि॒तेव॑ भवति
तस्मा॑दाह पार्वते॒यीति॒ प्रति॑ त्वा पर्व॑ती वेत्त्विति॒ प्रति॒ हि स्वः संज्ञा॑नी॒ते तत्संज्ञा-
मे॒वैतदृषदुप॑लाभ्यां वदति॒ नेद्यो॑ऽन्य॑ᳵ हिंस॒ाता॒ऽइति॒ द्यौरे॒वैषा रू॑पेण॒ पुन्
ऽए॒व दृषदुप॑ले॒ स्त्रित्वे॒व शम्या॒ तस्मा॒च्छम्या समा॑हन्ति स्त्रिया हि वद॑ति ॥ १७॥
अथ ह॒विरधिव॑पति । धा॒न्यम॑सि धिनु॒हि दे॒वानिति धा॒न्यꣳ हि दे॒वान्धिनो॒त्ये॒-
तद्धि ह॒विर्गृह्णा॑ति ॥ १८॥ अथ पिनष्टि । प्रा॒णाय॑ त्वोदा॒नाय॑ त्वा व्या॒नाय॑ त्वा दी॒र्घा-
मनु॒ प्रसिति॒मायु॑षे धानिति॒ प्रोह॑ति दे॒वो वः॑ सवि॒ता हिर॑ण्यपाणिः॒ प्रति॑गृह्णात्व-
च्छिद्रेण पाणिना चक्षु॑षे त्वेति ॥ १९॥ ॥ शतम् १०० ॥ ॥ तद्य॒देवं॑ पिन॒ष्टि । जी॒वं
वै दे॒वानाꣳ ह॒विरमृ॑तममृताना॒मथैतदुलूखलमुसलाभ्यां दृषदुपलाभ्याꣳ ह॒विर्य॒ज्ञं
घ्नन्ति ॥ २०॥ स यदाह । प्रा॒णाय॑ त्वोदानाय॑ त्वेति तत्प्राणोदानौ दधाति व्या॒नाय॑
त्वेति तद्व्यानं॑ दधाति दी॒र्घामनु॑ प्रसिति॒मायु॑षे धानिति॒ तदायु॑र्दधाति दे॒वो वः॑ स-