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सर्वकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 699 में से

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पृष्ठ 41

का० १, अ० २, ब्रा० १, कं० ३-१२ शतपथब्राह्मण / २३
(धृष्टि का अर्थ है साहस के साथ काम करनेवाला) । इसका नाम उपवेश इसलिए है कि इसी
से आग के अंगारों का स्पर्श करेगा ॥३॥
इससे वह अंगारों को आगे को निकालता है यह मन्त्र पढ़कर (यजु० १।१७)-"हे
अग्नि ! कच्चा खानेवाली अग्नि को छोड़ । शव खानेवाली अग्नि को दूर कर।" कच्चा खाने
वाली (आमाद) अग्नि वह है जिस पर मनुष्य खाना पकाते हैं। क्रव्याद अग्नि वह है, जिस पर
मरे हुए पुरुष के शव को जलाते हैं। इन दोनों अग्नियों को गार्हपत्य अग्नि से अलग करता है ॥४॥
अब एक अंगारे को अपनी ओर खींचता है यह मन्त्रांश (यजु० १।१७) पढ़कर- "उस
अग्नि को लाओ जिसमें देवताओं के लिए यज्ञ किया जाता है (देवयाज) ।" मैं देवयाज अग्नि में
हवि पकाऊँ। उसी में यज्ञ करूँ। इसीलिये वह उस अंगारे को निकालता है ॥५॥
उस अंगारे पर बीच का कपाल रखता है। जब देव यज्ञ करने लगे तो उनको भय हुआ
कि कहीं असुर राक्षस यज्ञ को विध्वंस न करें। उनको भय हुआ कि कहीं हमारे नीचे से असुर
राक्षस न उठ खड़े होवें। अग्नि राक्षसों का घातक है, इसलिये कपाल को आग पर रखता है।
इसी अंगारे पर क्यों रखता है, दूसरों पर क्यों नहीं ? इसका कारण यह है कि यह अंगारा
यजुष्कृत है (यजु०-मन्त्रों के पाठ से पवित्र किया हुआ है) । इसलिये इसके ऊपर मध्य में कपाल
को रखता है ॥६॥
इस समय वह यह मन्त्रांश पढ़ता है(यजु० १।१७)-"तू ध्रुव है, पृथिवी को दृढ़ कर ।"
पृथिवी के रूप में ही वह यज्ञ को दृढ़ करता है। इसी से वह शत्रु का नाश करता है। अब कहता
है-'ब्राह्मण की रक्षा करनेवाले, क्षत्रिय की रक्षा करनेवाले, सजातीय की रक्षा करनेवाले ! तुझको
मैं शत्रु के नाश के लिए रखता हूँ।" आशीर्वाद के बहुत-से यजुष् मन्त्र हैं। इस मन्त्र से ब्राह्मण और
क्षत्रिय को आशीर्वाद देता है जो दो वीर्यवान् शक्तियां हैं; सजातीय की रक्षा करनेवाले। ऐसा
कहने से धन को आशीर्वाद देता है, क्योंकि सजातीय धन है। 'शत्रु के वध के लिए', ऐसा कहते
हुए चाहे किसी को मारना चाहे या न चाहे, उसको कहना चाहिए 'अमुक-अमुक के वध के लिए'।
अभी बायें हाथ की अँगुली से कपाल रक्खा ही था कि - ॥७॥
दूसरे अंगारे को लेता है कि कहीं इस बीच में असुर राक्षस घुस न आवें । ब्राह्मण राक्षसों
का दूर करनेवाला है। इसलिये ज्योंही बायें हाथ की अँगुली से कपाल रक्खा, त्यों ही झट-॥८॥
उसे अंगारे पर रख देता है यह मन्त्रांश पढ़कर- "हे अग्नि, ब्रह्म, इसको ग्रहण कर।"
वह ऐसा कहता है जिससे असुर राक्षस पहले से ही घुसने न पावें। वह इसीलिये कपाल को अंगारे
पर रख देता है क्योंकि अग्नि राक्षसों का दूर करनेवाला है ॥६॥
अब बीचवाले कपाल के पश्चिम की ओर के कपाल को यह मन्त्रांश पढ़कर अंगारे पर
रखता है(यजु० १।१८)- "तू सहारा है। अन्तरिक्ष को दृढ़ कर।" अन्तरिक्ष के रूप में वह यज्ञ को
सुदृढ़ करता है। इससे वह दुष्ट शत्रु को दूर करता है। 'तुझे, ब्राह्मण की रक्षा करनेवाले, क्षत्रिय की
रक्षा करनेवाले, सजातीय की रक्षा करनेवाले तुझको मैं शत्रु के वध के लिए रखता हूँ' ॥१०॥
अब पूर्व की ओर के कपाल को इस मन्त्रांश को (यजु० १।१८) पढ़कर रखता है- "तू
धर्ता है। द्यौ लोक को सुदृढ़ कर।" द्यौ के रूप में वह इस यज्ञ को सुदृढ़ करता है। इससे वह शत्रु
को दूर भगाता है। 'ब्राह्मण की रक्षा करनेवाले, क्षत्रिय की रक्षा करनेवाले, सजातीय की रक्षा
करनेवाले तुझको मैं शत्रु के वध के लिए रखता हूँ' ॥११॥
अब दक्षिणवाले कपाल को रखता है यह मन्त्रांश(यजु० १।१८)पढ़कर- "सबके लिए
मैं तुझको रखता हूँ।" इन तीनों लोकों के आगे कोई चौथा लोक है या नहीं, वहाँ से भी वह शत्रु
को दूर करता है। चौथा लोक है या नहीं, यह अनिश्चित है; और 'सब दिशाओं' का भी निश्चय