शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-९, ब्राह्मण-१
१७२ शतपथ ब्राह्मण
सु॒ङ्गे स्थः सु॒ङ्गे मा धत्तमिति साध्व्यौ॒ स्थः साधौ मा धत्तमित्ये॒वैतदा॒ह ॥ २७॥
ब्राह्मणम् ॥ १ [८. ३.] ॥ ॥ अध्यायः ॥ ८ ॥ ॥
स यन्ना॒ह । इषि॒ता दैव्या॒ होत॑ारो भद्रवा॒च्या॑य॒ प्रेषि॑तो मानु॒षः सूक्तवाकाये-
ति यदृचो॒ होता॒न्वाह॑ सू॒क्तऽइव॒ तदा॒ह यज॑मानायैवैतदा॒शिष॒माशा॑स्ते॒ तद्वा॒ऽए-
तदु॑परि॒ष्टाद्य॒ज्ञस्या॒शिष॒माशा॑स्ते द्वयं तद्य॒स्मादु॑परि॒ष्टाद्य॒ज्ञस्या॒शिष॒माशा॑स्ते ॥ १॥ य॒ज्ञं
वा॒ऽए॒ष ज॑नयति । यो यज॑त॒ऽएते॑न ह्युक्त्वा ऋत्विज॑स्तन्व॒ते तं ज॑नयन्त्यथाशिष-
माशा॑स्ते॒ तामस्मै यज्ञ आशिषं संन॑मयति यामा॒शिष॒माशा॑स्ते यो माऽजीजनतेति
तस्माद्वा॒ऽउ॑परि॒ष्टाद्य॒ज्ञस्या॒शिष॒माशा॑स्ते ॥ २॥ दे॒वान्वा॒ऽए॒ष प्री॑णाति । यो यज॑त
ऽए॒तेन य॒ज्ञेन॒ऽङ्गिरि॑व वय॒ञ्जुरि॑रिव यदाहु॑तिभिरिव वत्स दे॒वान्प्री॑त्वा तेष्वपि॒त्वी
भवति ते॒ष्वपि॒त्वी भूत्वा॒याशिष॒माशा॑स्ते तामस्मै दे॒वा आशिषं संन॑मयन्ति यामा-
शिष॒माशा॑स्ते यो नो॒ऽप्रेषी॒दिति॒ तस्माद्वा॒ऽउ॑परि॒ष्टाद्य॒ज्ञस्या॒शिष॒माशा॑स्ते ॥ ३॥ अथ
प्रति॑पद्यते । इदं॒ द्यावा॑पृथिवी भ॒द्रमभू॒दिति भ॒द्रं ह्यभू॒द्यो य॒ज्ञस्य तद॒स्यामग्र॒न्नाध॑म्
सू॒क्तवा॒कमृ॑त नमोवा॒कमित्यु॒भयं वा॒ऽए॒तद्य॒ज्ञ एव यत्सूक्तवा॒कश्च नमोवा॒कश्चा॑रा-
त्स्म य॒ज्ञमवि॑दाम य॒ज्ञमित्ये॒वैतदा॒हाग्ने व॒ सूक्तवा॒गस्युपश्रुती दिवस्पृ॑थि॒व्योरित्य॒भि-
प्रेवे॒तदा॒ह व॒ सूक्तवा॒गस्युप॑शृण्व॒तयोर॒नयो॒र्द्यावा॑पृथिव्यो॒रित्ये॒मन्वती ते॒ऽस्मि-
न्य॒ज्ञे यज॑मान द्यावापृथिवी स्तामित्यन्वती ते॒ऽस्मिन्य॒ज्ञे यज॑मान द्यावापृथिवी
स्तामित्ये॒वैतदा॒ह ॥ ४॥ शंग॑वी जी॒वदा॑नू॒ऽइति । शंग॑वी ते जी॒वदा॑नू स्तामित्ये॒-
वैतदा॒ह वृ॒त्रानू॒ऽअप्र॑विदे॒ऽइति मा॒ह क॒स्माच्चन प्रत्रा॒सीन्मि तऽइ॒दं पु॒ष्टं कश्चन प्रवि॑-
दतेत्ये॒वैतदा॒ह ॥ ५॥ उ॒रुगव्यू॑ती॒ऽअभ॑यंकृता॒विति । उ॒रुगव्यू॑ती ते॒ऽभ॑ये स्तामित्ये॒-
वैतदा॒ह वृ॒ष्ट्यावा रीत्या॒पेति वृ॒ष्टिम॑त्यौ ते स्तामित्ये॒वैतदा॒ह ॥ ६॥ शम्भू॒वौ म॑-
यो॒भुवा॒विति । शम्भू॒वौ ते मयो॒भुवौ स्तामित्ये॒वैतदा॒होर्ज॑स्वती च पय॑स्वती चे-
ति रस॑वत्यौ तऽउपजी॒वनि॑ये स्तामित्ये॒वैतदा॒ह ॥ ७॥ सू॒पचर॒णा च स्वधिचरणा
कां० १, अ० ६, ब्रा० १, कूं० १-८ शतपथब्राह्मण / १७३
धत्तम् ।"—"आप घी के प्रेमी हैं, धुरियों की रक्षा करो । आप भद्र हैं, मेरे लिये भद्र कीजिये ।"
इससे तात्पर्य है कि आप साधु हैं मुझे साधुत्व दीजिये ॥२७॥
अध्याय ६–ब्राह्मण १
अब अध्वर्यु कहता है—"इषिता दैव्या होतारो भद्रवाच्याय प्रेषितो मानुषः सूक्तवाकाय।"
अर्थात् "देवों के होता लोग बुलाये गये कल्याण को कहने के लिए और होता सूक्तवाक के लिए"
और जब उस पर होता सूक्त कहता है तो वह यजमान के लिए आशीष देता है । वह यज्ञ के
पीछे ही आशीष देता है। दो कारण हैं कि वह यज्ञ के पीछे आशीष देता है ॥१॥
जो यज्ञ करता है वह यज्ञ को उत्पन्न करता है। इसी की आज्ञा से ऋत्विज यज्ञ को
तानते अर्थात् उत्पन्न करते हैं। अब (होता) आशीष देता है। यह यज्ञ उस आशीष को उसी के
लिए मानता है जो आशीष दी जाती है, क्योंकि (यज्ञ समझता है कि) मुझे इसने उत्पन्न किया ।
इसलिये यज्ञ के अनन्तर ही आशीष दी जाती है ॥२॥
जो यज्ञ करता है वह देवों को अवश्य ही प्रसन्न करता है। इस यज्ञ से देवों को ऋचाओं,
यजुओं तथा आहुतियों द्वारा प्रसन्न करके वह देवों का हिस्सेदार हो जाता है। और जब हिस्सेदार
हो गया तो होतृ उसके लिए आशीष देता है। इस-उसकी दी हुई आशीष को देवता लोग
(यजमान के लिए) मानते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि उसने हमें प्रसन्न किया है। इसलिये भी वह
यज्ञ के पश्चात् आशीष देता है ॥३॥
अब वह जपता है— "इदं द्यावा पृथिवी भद्रमभूत्"—"हे द्यौ और पृथिवि ! यह भद्र हो
गया।" जिसने यज्ञ समाप्त कर लिये उसके लिए अवश्य ही कल्याण हो गया । "आर्ध्म सूक्त-
वाकमुत नमो वाकम्"—"हमने सूक्तवाक् और नमोवाक् कह दिया", क्योंकि यह सूक्तवाक् और
नमोवाक् यज्ञ ही हैं। इसका तात्पर्य है कि हमने यज्ञ को पूरा कर लिया या हमने यज्ञ को प्राप्त
कर लिया। अब कहता है-'अग्ने त्व', सूक्तवागस्युपश्रुति दिवस्पृथिव्योः ।" इसका तात्पर्य है कि
—"अग्नि ! तू सूक्तवाक् है और द्यौ तथा पृथिवी उसको सुनते हैं।" अब कहता है— "ओ मन्वती
तेऽस्मिन् यज्ञे यजमान द्यावापृथिवी स्ताम्"—'हे यजमान ! इम यज्ञ में द्यौ और पृथिवी तेरे लिए
कल्याणकारी होवें।" इसका तात्पर्य यह है कि "हे यजमान, इस यज्ञ में द्यौ और पृथिवी तेरे लिए
अन्नवती (अन्न को देनेवाली) होवें" ॥४॥
अब कहता है—"शंगवी जीवदानू ।" इसका तात्पर्य यह है कि वे दोनों पशुओं के लिए
हितकारी और जीवन को बढ़ानेवाले हैं । अब कहा—"अत्रस्नूऽअप्रवेदेन"—"डरनेवाले और
समझ में न आनेवाले।" इसके कहने से तात्पर्य यह है कि तू किसी से न डरे और तेरे इस धन को
तुमसे कोई न ले ॥५॥
अब कहा— "उरुगव्यूतीऽअभयङ् कृतौ"—"विशाल घरवाले और अभय पानेवाले ।"
इससे तात्पर्य है कि उनके घर विशाल हों और वे भय से मुक्त हों । अब कहा-'वृष्ट्यावारी-
त्यापा' यह इसलिए कहा कि वे दोनों वर्षावाले हों ॥६॥
अब कहा--'शम्भूवो मयोभूवौ ।' यह इसलिए कहा कि वे दोनों कल्याण करनेवाले और
दान देनेवाले हों। अब कहा-'ऊर्जस्वती च पयस्वती च ।' इसके कहने से तात्पर्य यह है कि वे
दोनों रसवाले और जीविका देनेवाले हों ॥७॥
अब कहा, 'सूपचरण च स्वाधिचरण ।' 'सूपचरण।' इसलिए कहा कि द्यौ जिसको तू नीचे
चेति॒ । सूपचर॒णाहू ते॒ऽसाव॑स्तु॒ यामधस्ता॒डप॑चरसि॒ स्वधि॑र॒णो त॒ऽइय॒मस्तु॒ या-
मु॒पर॑िष्टादधि॒चर॑सीत्ये॒वैतदा॑ह तयो॒रावि॑दीति॒ तयो॑रनुमन्यमा॒नयोरित्ये॒वैतदा॑ह ॥८॥
अ॒ग्नि॒रिद॒ग्ग् ह॒विः। अजु॑षतावीवृधत म॒हो ज्यायो॑ऽकृतेति तदा॑ग्नेय॒माज्य॑भागमा॒ह
सोम॑ इ॒द॒ग्ग् ह॒विरजु॑षतावीवृधत म॒हो ज्यायो॑ऽकृतेति॒ तत्सौ॑म्य॒माज्य॑भागमाहा॒ग्नि-
रि॒द॒ग्ग् ह॒विरजु॑षतावीवृधत म॒हो ज्यायो॑ऽकृतेति तद्य॒ ऽए॒ष ऽउ॑भय॒त्राच्यु॑त॒ ऽआ॑ग्नेयः
पु॒रोडा॒शो भ॑वति॒ तमा॑ह ॥९॥ अथ यथा॑दैवतम्। देवा॒ ऽआ॑ज्यपा॒ ऽआज्य॑मजुषन्ता-
वी॑वृधन्त म॒हो ज्यायो॑ऽक्र॒तेति॒ तत्प्र॑याजानुया॒जाना॑ह प्रयाजानुया॒जा वै देवा॒ ऽआ॑-
ज्यपा अ॒ग्नि॒र्होत्रे॑ण॒वे॒द॒ग्ग् ह॒विर॑जुषतावीवृधत म॒हो ज्यायो॑ऽकृतेति॒ तद॒ग्नि॒ग्ग् होत्रे॑-
णाहाजु॑ष॒तेत्ये॒वं या ऽइ॒ष्टा दे॑व॒ता भ॑व॒न्ति ताः संप॑श्य॒त्यसौ॑ ह॒विरजु॑षता॒सौ ह॒वि-
रजु॑ष॒तेति॒ तद्य॑ज्ञ॒स्यैवैतत्स॒मृद्धि॒माशा॑स्ते॒ यदि॑ दे॒वा ह॒विर्जुष॑न्ते॒ तेन॒ हि म॒हज्ज॑यति॒
तस्मा॑दाहाजु॑ष॒तेत्यवी॑वृध॒तेति॒ यदि॑ दे॒वा ह॒विर्जो॑षयन्ते॒ तदपि॑ गरिमा॒त्रं कुर्व॑ते॒ त॑-
स्मा॑दाहावी॑वृध॒तेति॑ ॥१०॥ म॒हो ज्यायो॑ऽक्र॒तेति॑। य॒ज्ञो वै दे॒वानां॑ म॒हस्त॒ग्ग् ह्ये-
तज्ज्याया॑ग्समिव॑ कुर्वन्ति॒ तस्मा॑दाह म॒हो ज्यायो॑ऽक्र॒तेति॑ ॥११॥ अस्या॒मृधो॑त्रा॒यां
दे॒वंग॑माया॒मिति॑। अस्या॒ग्ग् रा॑ध्नोतु॒ होत्रायां दे॒वंग॑माया॒मित्ये॒वैतदा॑हाशास्ते॒ऽयं य॑-
जमा॑नो॒ऽसावि॑ति॒ नाम॑ गृह्णाति॒ तदे॑नं प्रत्य॒क्षमा॒शिषा॒ संपा॑दयति ॥१२॥ दी॒र्घायु॒-
त्व॒माशा॑स्त॒ऽइति॑। सा यामु॒त्रोत्तरा दे॒वय॑ज्या॒ तदे॒व प्रत्य॒क्षं दी॒र्घायु॒त्वग्ग् ॥१३॥
सु॒प्र॒जास्त्व॒माशा॑स्त॒ऽइति॑। तद्य॒दमु॒त्र भूयो॑ ह॒विष्कर॑णं॒ तदे॒व प्रत्य॒क्षग्ग् सु॑प्रजा॒स्त्वं
प्रशा॑स॒नग्ग् स् कुर्या॒द्य ऽए॒वं कुर्या॑दु॒त्तरां दे॒वयज्या॒माशा॑स्त॒ऽइति॒ वेव ब्रू॑या॒त्तदि॒व जी-
वातुं॑ तत्प्र॒जां तत्प॒शून् ॥१४॥ भूयो॑ ह॒विष्कर॒णमाशा॑स्त॒ऽइति॒ तद्धे॑व तत्स॒जात-
वन॒स्या॒माशा॑स्त॒ऽइति प्राणा वै स॒जाताः प्राणैर्हि॑ स॒ह जा॑यते॒ तत्प्राणा॒नाशा॑स्ते
॥१५॥ दि॒व्यं धामा॒शा॑स्त॒ऽइति॑। दे॒वलो॒के मे॑ऽप्यस॒दिति॒ वै यज॑ते॒ यो यज॑ते॒ तद्दे॒-
वलो॒कऽए॒वैन॑मे॒तद॑पि॒धानं॑ करोति॒ यद॒नेन॑ ह॒विषाशा॑स्ते॒ तद॑श्या॒त्तदृ॑ध्या॒दिति॒ यद॑-
का० १, अ० ६, ब्रा० १, कं० ८-१६ शतपथब्राह्मण / १७५
से छूता है तुझे सुगमता से प्राप्त हो जाय। 'स्वधिचरणा' इसलिये कहा कि यह पृथिवी जिस पर
तू रहता है तुझे स्थान दे । अब कहा—"तयोराविदि"—"उन दोनों के ज्ञान से ।" इससे तात्पर्य है
कि 'उन दोनों की अनुमति से' ॥८॥
अब कहा—"अग्निरिदं हविर्जुषतावीवृधत महो ज्यायोऽकृत ।"—"अग्नि ने इस हवि को
ले लिया । वह बढ़ गया । वह बड़ा हो गया ।" इससे अग्नि के याज्य की ओर संकेत है। अब कहा
—"सोम इदं हविर्जुषतावीवृधत महो ज्यायोऽकृत ।"—"सोम ने इस हवि को ले लिया। वह बढ़
गया । वह बड़ा हो गया ।" इससे सोम के आज्य की ओर संकेत है। अब कहा—"अग्निरिदं
हविर्जुषतावीवृधत महो ज्यायोऽकृत ।"—"अग्नि ने यह हवि ले ली। वह बढ़ गया । वह बड़ा हो
गया।" इससे अग्नि के पुरोडाश से तात्पर्य है जो दर्श और पूर्णमास दोनों यज्ञों में अवश्य ही दिया
जाता है ॥६॥
इसी प्रकार अन्य देवों के लिए। "देवा आज्यपा आज्यमजुषन्तावीवृधन्त महो ज्यायो-
ऽकृत ।"—"आज्य या घी को पीनेवाले देवों ने आज्य को ले लिया । वे बढ़ गये । वे बड़े हो
गये।" यहाँ प्रयाज और अनुयाजों से तात्पर्य है क्योंकि प्रयाज और अनुयाज ही आज्य पान
करनेवाले देव हैं। अब कहा—"अग्निर्होत्रेणेदं हविर्जुषतावीवृधत महो ज्यायोऽकृत ।"—"होत्र
अग्नि ने इस हवि को लिया। वह बढ़ गया। वह बड़ा हो गया।" यहाँ 'होत्र अग्नि' के लिए
कहा। 'जुषता' अर्थात् स्वीकार कर लिया। ऐसा कहकर वह जो देवता इष्ट होते हैं उनको
गिनाता है कि इस देव ने हवि स्वीकार की। इस प्रकार यज्ञ की समृद्धि को चाहता है, क्योंकि जो
कुछ हवि देवता स्वीकार करते हैं उसी से उसको बड़ी चीजों की प्राप्ति होती है। इसलिए कहा
कि 'स्वीकार किया'। 'बढ़ गये' इसलिए कहा कि जब देव हवि स्वीकार करते हैं तो पहाड़-से
बढ़ जाते हैं। इसलिये कहता है—'बढ़ गये' ।
'बड़े हो गये' इसलिए कहा कि यज्ञ ही देवों का बड़प्पन है। इसी को वे बड़ा करते हैं।
इसलिए कहा 'बड़े हो गये' ॥११॥
अब कहा—"अस्यामृद्धेद्धोत्रायां देवङ्गमायाम् ।"—"इस देवों के पास जानेवाले होत्र में
वृद्धि को प्राप्त हो।" उसके कहने से तात्पर्य यह है कि इस देवों के पास जानेवाले होत्र में फूले-
फले। अब कहा—"आशास्तेऽयं यजमानोऽसौ ।"—"यह यजमान प्रार्थना करता है।" यहाँ ('असौ'
के स्थान में) यजमान का नाम लेता है। इस प्रकार प्रत्यक्ष रूप से उसके लिए आशीर्वाद का
सम्पादन करता है ॥१२॥
अब कहा—"दीर्घायुत्वमाशास्ते ।"—"बड़े जीवन के लिए प्रार्थना करता है।" जिसको
पहले (इडा में) 'देवयज्या' कहा उसी को यहाँ 'दीर्घायु' कहता है ॥१३॥
अब कहा—"सुप्रजास्त्वमाशास्ते ।"—"अच्छी सन्तान के लिए प्रार्थना करता है।" वहाँ
पहले 'भूयो हविष्करण' कहा, यहाँ उसी को 'सुप्रजास्त्वं' कहा। जो इस प्रकार करेगा उसे शासन
प्राप्त होगा। उसको कहना चाहिए—"देवयज्यामाशास्ते।"—"देवयज्या के लिए प्रार्थना करता
है।" इससे दीर्घायु, प्रजा और पशु की प्राप्ति होगी ॥१४॥
अब कहा—"भूयो हविष्करणमाशास्ते ।"—"बहुत हविष्करण की प्रार्थना करता है।"
इससे उसी की प्रार्थना करता है। अब कहा—"सजातवनस्यामाशास्ते ।"—"अपने साथियों के
लिए प्रार्थना करता है।" प्राण ही 'सजाता' हैं क्योंकि ये साथ उत्पन्न होते हैं। इसलिए प्राणों
के लिए प्रार्थना करता है ॥१५॥
अब कहा—"दिव्यं धामाशास्ते ।"—"दिव्य धाम की प्रार्थना करता है।" जो यज्ञ करता
है वह इसलिए करता है कि देवलोक में भी मेरे लिए धाम मिले। इस प्रकार वह देवलोक में भी
हिस्सेदार करता है। अब कहता है—"यदेनेन हविषाशास्ते तदश्यात् तदृध्यात् ।" अर्थात् "इस
१७६ शतपथ ब्राह्मण
नेन ह॒विषाशा॑स्ते॒ तद॑स्मै॒ सर्व॑ꣳ समृध्यतामित्ये॒वैतदाह॑ ॥ १६॥ ता वाऽए॒ताः ।
पञ्चाशिषः करोति तिस्र ऽइडायां ता अष्टावष्टाक्षरा वै गायत्री वीर्यं गायत्री वी-
र्य॑मे॒वैतदाशिषो॒ऽभिसं॑पादयति ॥ १७॥ नातो॒ भूयसीः कुर्यात् । अ॒तिरिक्तं॑ ह कु-
र्या॒द्यदतो॒ भूयसीः कुर्याद्यद्धै यज्ञस्यातिरिक्तं॑ द्विषन्तं॒ हास्य तद्भ्रातृ॑व्यम॒भ्यति॑रिच्यते
तस्मान्नातो॒ भूयसीः कुर्यात् ॥ १८॥ अपि॑द्वे कनीयसीः स्यात् । तदस्मै देवा रासन्ता-
मिति॒ तद॑स्मै दे॒वा अनु॑मन्यन्तामित्ये॒वैतदाह॒ तद॒ग्निर्देवो दे॒वेभ्यो॒ वनुतां॑ व॒यम॒ग्नेः
परि॒ मानु॑षा॒ इति॒ तद॒ग्निर्देवो दे॒वेभ्यो॒ वनुतां॑ व॒यम॒ग्नेरध्य॒स्माऽए॒तदनवामकाण्ड॒-
त्ये॒वैतदाह॑ ॥ १९॥ इ॒ष्टं च॑ वि॒त्तं चेति॑ । ऐ॒षिषु॒रिव॒ वाऽए॒तद्य॒ज्ञं तम॑वि॒दंस्तस्मा॒-
दाहे॒ष्टं च॑ वि॒त्तं चेत्यु॒भे चेनं॑ द्यावापृथिवी॒ऽअꣳहसस्पातामित्यु॒भे चेनं॑ द्यावापृथि॒-
वीऽअ॒र्त्तेर्गापायतामित्ये॒वैतदाह॑ ॥ २०॥ तदु॒ हैक॒ऽआहुः । उ॒भे च मेति॑ तथा
होता॑शिष॒ आत्मन॑ ना॒न्तरैती॑ति तदु॒ तथा॒ न ब्रूयाद्यजमानस्य वै य॒ज्ञऽआ॒शीः
किं नु तत्र॒र्त्विजां॒ यां वै कां च॒ यज्ञ॒ऽऋत्विज॒ आशिष॒माशा॑सते यज॒मानस्यैव सा
न ह॒ स एतां॒ का च॒नाशिषं॑ प्रतिष्ठापयति॒ य आ॒होभे च मेति॒ तस्मा॑दु ब्रूयादु॒भे
चैन॑मित्येव ॥ २१॥ इ॒ह गति॑र्वामस्येति॑ । तयो॒रेव य॒ज्ञस्य सा॒धु तद्देवास्मिन्नि॒तद्दधा॑-
ति॒ तस्मा॑दाहे॒ह गति॑र्वामस्येति॑ ॥ २२॥ इ॒दं च॒ नमो॑ दे॒वेभ्य॒ इति॒ त॒द्य॒ज्ञस्यैवैत-
त्सꣳस्थां॑ ग॒त्वा नमो॑ दे॒वेभ्यः करोति॒ तस्मा॑दाहे॒दं च॒ नमो॑ दे॒वेभ्य॒ इति॑ ॥ २३॥ अथ
शम्यो॒राह॑ । शंयुर्ह वै बा॑र्हस्प॒त्यो॒ऽञ्जसा य॒ज्ञस्य॒ सꣳस्थां॑ वि॒दां चकार॒ स दे॒व-
लोकम॒पीया॑य॒ तत्तद्द॒र्हित॑मिव मनु॒ष्येभ्य॒ आस॑ ॥ २४॥ तद्धा॒ऽऋषी॑णामनुश्रुतमा-
स । शंयुर्ह वै बा॑र्हस्प॒त्यो॒ऽञ्जसा य॒ज्ञस्य॒ सꣳस्थां॑ वि॒दां चकार स दे॒वलोकमपी-
याये॑ति ते तमिव य॒ज्ञस्य॒ सꣳस्थामुपायन्था॒ꣳ शम्युर्बा॑र्हस्प॒त्यो॒ऽवेद्यद्यच्छ॒म्यो॒रन्व॑वस्ता-
न्त्वेवैष ए॒तद्य॒ज्ञस्य॒ सꣳस्थामुपैति या॒ꣳ शम्युर्बा॑र्हस्प॒त्यो॒ऽवेद्यद्धं शम्यो॒राह॒ तस्मा॒द्धै श-
म्यो॒राह॑ ॥ २५॥ स प्रतिपद्यते । त॒च्छम्यो॒रावृ॑णीमह॒ऽइति॒ तां य॒ज्ञस्य॒ सꣳस्थामावृ॑-
कां० १, अ० ६, ब्रा० १, कं० १६-२६ शतपथब्राह्मण / १७७
हवि से जो प्रार्थना करे वह सब प्राप्त हो जाय” ॥१६॥
ये पाँच आशिषें देता है। तीन इडा में हुईं। इस प्रकार आठ हुईं। गायत्री में आठ
अक्षर होते हैं। गायत्री वीर्य है। इसलिए वीर्य का सम्पादन करता है ॥१७॥
इनसे अधिक (आशीष) न दे। यदि इनसे अधिक दे तो सीमा से बाहर जाय, और
यज्ञ में जो सीमा से बाहर जाता है वह दुष्ट शत्रु के लिए होता है। इसलिए सीमा से बाहर न
जाय ॥१८॥
इनसे कम कर सकता है जैसे सात। ‘तदस्मै देवा रासन्ताम् ।’ ऐसा कहने से अर्थ यह है
कि ‘उसके लिए देव इस पदार्थ को दें।’ ‘तदग्निर्देवो देवेभ्यो वनुतां वयमग्नेः परिमानुषा ।’
इसका अर्थ है कि ‘अग्निदेव देवों से लेवे और हम तब इस (यजमान) के लिए इसे ले लेवें’ ॥१९॥
‘इष्टं च वित्तं च ।’—‘चाहा और प्राप्त किया।’ उन्होंने यज्ञ को चाहा और प्राप्त
किया। इसलिए कहा ‘इष्टं च वित्तं च ।’ अब कहा—‘‘उभे चैनं द्यावापृथिवीऽअँहसस्पा-
ताम् ।’’ अर्थात् ‘द्यौ और पृथिवी दोनों इसको पाप से बचावें’ ॥२०॥
कुछ लोग कहते हैं ‘उभे च मा’—‘दोनों मुझको भी।’ अर्थात् होता आशीष में अपने को
भी शामिल कर लेता है। लेकिन ऐसा न कहना चाहिए, क्योंकि यज्ञ में आशीष तो यजमान के
लिए है (उसमें ऋत्विजों से क्या प्रयोजन ?)। यज्ञ में ऋत्विज लोग जो कुछ आशीष देते हैं वह
सब यजमान के लिए ही होती है। इसके अतिरिक्त जो कोई कहे ‘मुझको भी’, वह आशीर्वाद
को कहीं भी स्थापित नहीं करता, इसलिए कहना चाहिए कि ‘ये दोनों उसको बचावें’ ॥२१॥
अब कहता है—‘‘इह गतिर्वामस्य !’’—‘‘यह वाम (इष्ट पदार्थ) की गति है।’’ यज्ञ में
जो कुछ अच्छा है उसको वह इस प्रकार यजमान के लिए दे देता है। इसलिए कहा ‘यह वाम की
गति है’ ॥२२॥
अब कहा—‘‘इदं च नमो देवेभ्यः ।’’—‘‘यह देवों के लिए नमस्कार हो।’’ यज्ञ समाप्त
होने पर देवों को नमस्कार करता है, इसलिए कहता है ‘यह देवों के लिए नमस्कार हो’ ॥२३॥
अब कहता है—‘‘शंयोः’’—‘‘कल्याण हो।’’ बृहस्पति के पुत्र शंयु ने यज्ञ की संस्था को
पहले जाना। वह देवलोक को भाग लेने चला गया। उस पर वह ज्ञान मनुष्यों से लोप हो
गया ॥२४॥
अब ऋषियों को पता लगा कि बृहस्पति का पुत्र शंयु यज्ञ की संस्था को जानकर देवलोक
में भाग लेने चला। ‘शंयोः’ का उच्चारण करके उन (ऋषियों) ने भी यज्ञ की उस संस्था को
जान लिया जिसे बृहस्पति के पुत्र शंयु ने जाना था। यह (होता) भी शंयोः के उच्चारण से यज्ञ
की उस संस्था को समझ लेता है जिसे बृहस्पति के पुत्र शंयु ने जाना था। इसलिए वह कहता है
‘शंयोः’ ॥२५॥
अब कहता है—‘‘तच्छंयोरावृणीमहे ।’’—‘‘उस शंयोः को हम धारण करें।’’ अर्थात् हम
अध्याय-९, ब्राह्मण-२
१७८ शतपथ ब्राह्मण
षामहे॒ शंयुर्बार्हस्प॒त्योऽवे॒दित्ये॒वैत॒दाह॑ ॥ २६॥ गा॒तुं य॒ज्ञाय॑ गा॒तुं य॒ज्ञप॑तय
ऽइति॑ । गा॒तुꣳ ह्येष य॒ज्ञाये॒कृति गा॒तुं य॒ज्ञपत॑ये यो य॒ज्ञस्य॒ सꣳस्थां दैवी॑ स्व॒स्ति-
र॑स्तु नः स्व॒स्तिर्मानु॑षेभ्य॒ इति॑ स्व॒स्ति नो॑ दे॒वत्रा॑स्तु स्व॒स्ति म॑नु॒ष्ये॒त्रेत्ये॒वैत॒दा-
होर्ध्वं जिगातु भेष॒जमित्यूर्ध्वं नोऽय॑ य॒ज्ञो दे॑वलो॒कं ज॑यत्वित्ये॒वैत॒दाह॑ ॥ २७॥ शं
नो॒ऽअस्तु द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पद॒ऽइति॑ । ए॒ताव॒द्धाऽइ॒दꣳ सर्वं याव॒द्द्द्विपा॒च्चैव चतु॑ष्पा-
च्च॒ तस्मा॒द्द्वैवैत॒द्यज्ञ॑स्य सꣳस्थां ग॒त्वा शं क॑रोति॒ तस्मा॑दाह॒ शं नो॒ऽअस्तु॑ द्वि॒पदे॒
शं चतु॑ष्पद॒ऽइति॑ ॥ २८॥ अथानवेत्युप॑स्पृशति । अ॒मानुष॒ऽइव॒ वाऽए॒तद्भवति य-
द्बर्हिष्ये॑ प्रवृ॒त इ॒यं वै पृ॑थि॒वी प्र॑ति॒ष्ठा तद॒स्यामे॒वैतत्प्रति॑ष्ठायां प्रति॑तिष्ठति तड्
खलु॒ पुन॑र्मानु॒षो भ॑वति॒ तस्मा॑दनवे॒त्युप॑स्पृशति ॥ २९॥ ब्राह्मणम् ॥ २ [१.१.] ॥ ॥
ते वै पत्नीः संयाजयिष्यन्तः प्रतिपरायन्ति । जुहूं च स्रुवं चाध्वर्युरादत्ते वेदꣳ
होताज्यविलापनीमग्नीत् ॥ १॥ तद्धैकेषामध्वर्युः । पूर्वेणाहवनीयं पर्येति तड् त-
था न कुर्याद्बर्हिर्द्धा ह यज्ञात्स्याद्यत्तेनेयात् ॥ २॥ जघनेनो हेव पत्नीम् । एकेषाम-
ध्वर्यु॒रेति॒ नोऽए॒व तथा॑ कुर्यात्पूर्वार्द्धो वै य॒ज्ञस्या॑ध्व॒र्युर्जघनार्द्धः पत्नी॒ यथा॒ भसत्त॑ः
शिरः प्रतिदध्यादेवं तद्बर्हिर्द्धा हेव यज्ञात्स्याद्यत्तेनेयात् ॥ ३॥ अन्तरेणो हेव प-
त्नीम् । एकेषामध्वर्यु॒रेति॒ नोऽए॒व तथा॑ कुर्यादुत्तरार्द्धो य॒ज्ञात्पत्नी॒ यत्तेनेयात्तस्मा-
ड् पूर्वेणैव गार्हपत्यमन्तरेणाहवनीयं चेति तथा ह न बर्हिर्द्धा यज्ञाद्भवति यथो
ऽह॒वाऽदः प्रचरन्नन्तरेण संचरति स ऽउऽए॒वास्यैष सं॑चरो भवति ॥ ४॥ अथ पत्नीः
सं॒याजय॑न्ति । य॒ज्ञाद्वै प्रजाः प्र॒जाय॑न्ते य॒ज्ञात्प्र॒जाय॑माना मि॒थुनात्प्र॒जाय॑न्ते मि॒थुनात्प्र॒-
जाय॑माना ऋ॒ततो॑ य॒ज्ञस्य॑ प्र॒जाय॑न्ते तद्येना ए॒तदृत॑तो य॒ज्ञस्य॑ मि॒थुनात्प्र॒जन॑नात्प्र॒-
जनय॑ति॒ तस्मान्मिथुनात्प्रजननादृततो॑ य॒ज्ञस्ये॒माः प्र॒जाः प्र॒जाय॑न्ते॒ तस्मा॒त्पत्नीः सं-
या॒जय॑न्ति ॥ ५॥ चतस्रो दे॒वता॑ यजति । च॒तस्रो॒ वै मिथु॒नं द्वन्द्वं॒ वै मिथु॒नं द्वे-द्वे॒
हि खलु॑ भवतो मिथु॒नमे॒वैतत्प्र॒जन॑नं क्रियते॒ तस्मा॑च्चतस्रो दे॒वता॑ यजति ॥ ६॥
कां० १, अ० ६, ब्रा० १-२, क० २६-२९ व १-६ शतपथब्राह्मण / १७६
उस संस्था को धारण करें जो बृहस्पति के पुत्र शंयु ने धारण की थी ॥२६॥
अब कहता है—"गातुं यज्ञाय गातुं यज्ञपतये।"—"यज्ञ के लिए जय, यज्ञपति के लिए
जय।" जो यज्ञ की संस्था को चाहता है वह यज्ञ के लिए और यज्ञपति के लिए जय चाहता है।
"स्वस्तिरस्तु नः स्वस्तिर्मानुषेभ्यः।"—"स्वस्ति हमारे लिए, स्वस्ति मनुष्यों के लिए।" इसका
तात्पर्य है कि देवों में हमको स्वस्ति हो और मनुष्यों में स्वस्ति हो। "ऊर्ध्वं जिगातु भेषजम्।"
—"भेषज या मुक्ति का साधन ऊपर जावे।" इससे तात्पर्य है कि हमारा यज्ञ देवलोक को
जीते ॥२७॥
अब कहता है—"शं नोऽस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे।" अर्थात् "हमारे दुपायों और चौपायों के
लिए कल्याण हो।" ये दुपाये और चौपाये ही सब संसार हैं। यज्ञ को समाप्त करके वह यजमान
के लिए कल्याण माँगता है, इसलिए कहता है कि 'हमारे दुपायों और चौपायों के लिए कल्याण
हो' ॥२८॥
अब उस (अँगुली) से (पृथिवी को) छूता है। जब उसका ऋत्विज के कर्म के लिए
वरण होता है तो वह अमानुष (मनुष्यों से ऊपर) हो जाता है। यह पृथिवी ही प्रतिष्ठा (सुरक्षित
स्थान) है, इसलिए यहीं अच्छी तरह खड़ा होता है। और वह फिर (यज्ञ करने के बाद) मनुष्य
हो जाता है। इसीलिए इस अँगुली से पृथिवी को छूता है ॥२६॥
अध्याय ६--ब्राह्मण २
वे पत्नी-संयाज करने के लिए (गार्हपत्य अग्नि के पास) लौटते हैं। अध्वर्यु जुहू और
स्रुवा को लेता है, होता वेद (कुशों का गुच्छ) और आग्नीध्र आज्य-विलापनी (घी पिघलाने
की कटोरी) को ॥१॥
यहाँ कुछ लोगों के मतानुसार अध्वर्यु आहवनीय के पूर्व की ओर जाता है। परन्तु ऐसा
नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि वह वहाँ जायगा तो यज्ञ के बाहर हो जायगा ॥२॥
कुछ के मत में अध्वर्यु (यजमान की) पत्नी के पीछे-पीछे चलता है। उसको ऐसा भी न
करना चाहिए, क्योंकि अध्वर्यु यज्ञ का पूर्वार्द्ध है और पत्नी यज्ञ का पिछला आधा। यदि ऐसा
करेगा तो मानो वह अपने शिर को पीछे फेर ले और (अध्वर्यु) यज्ञ से बहिष्कृत हो जायगा ॥३।
कुछ के मत में अध्वर्यु पत्नी और गार्हपत्य के बीच में चलता है। परन्तु उसको ऐसा भी
न करना चाहिए, क्योंकि यदि वह ऐसा करेगा तो यज्ञ से पत्नी को अलग कर देगा। इसलिए
गार्हपत्य के पूर्व को और आहवनीय के भीतर को जाता है। इस प्रकार वह यज्ञ के बाहर नहीं
होता, और चूंकि पहले (आहवनीय तक जाते हुए) वह भीतर की ओर होकर गया था, वैसा ही
अब भी करना चाहिए ॥४॥
अब पत्नी-संयाज करते हैं। यज्ञ से निश्चय ही सन्तान उत्पन्न होती है और यज्ञ से जो
होती है, जोड़े से उत्पन्न होती है। जोड़े से जो उत्पन्न होती है वह यज्ञ के अन्त में उत्पन्न होती
है। इसलिए यज्ञ की समाप्ति पर जोड़े से प्रजा उत्पन्न की जाती है। इसलिए पत्नी-संयाज किया
जाता है ॥५॥
चार देवताओं के लिए यज्ञ करता है। चार जोड़ा है। दो का जोड़ा होता है। दो-दो
मिलकर चार होते हैं। इससे उत्पन्न करनेवाला जोड़ा हो गया। इसलिए चार देवताओं के लिए
यज्ञ करता है ॥६॥
१८० शतपथ ब्राह्मण
ता वाऽआ॒ज्यह॑विषो भवन्ति । रेतो वाऽआ॒ज्य॑ꣳ रेत॑ ए॒वैतत्सि॑ञ्चति॒ तस्मा॑दा॒ज्य-
ह॑विषो भवन्ति ॥ ७॥ तेनो॒पाꣳशु चरन्ति । तिर॒ऽइव॒ वै मिथु॒नेन॒ चर्य॑ते तिर॒ऽइ-
वैतद्य॒दुपा॒ꣳशु तस्मा॑दुपा॒ꣳशु चरन्ति ॥ ८॥ अथ सोमं॒ यज॑ति । रेतो॒ वै सोमो॒ रेत॑
ए॒वैतत्सि॑ञ्चति॒ तस्मा॒त्सोमं॒ यज॑ति ॥ ९॥ अथ त्वष्टा॑रं॒ यज॑ति । त्वष्टा॒ वै सि॒क्तꣳ
रेतो॒ विक॑रोति॒ तस्मा॒त्त्वष्टा॑रं॒ यज॑ति ॥ १०॥ अथ दे॒वानां॒ पत्नी॒र्यज॑ति । पत्नी॑षु॒ वै
योनौ॑ रेतः प्रति॑ष्ठितं॒ तत्ततः प्र॒जाय॑ते॒ तत्प॒त्नीष्वे॒वैतद्योनौ॑ रेतः॑ सि॒क्तं प्र॑ति॒ष्ठाप॑य-
ति॒ तत्ततः प्र॒जाय॑ते॒ तस्मा॑द्देवा॒नां पत्नी॒र्यज॑ति ॥ ११॥ स यत्र॑ दे॒वानां॒ पत्नी॒र्यज॑ति ।
तत्पुरस्ता॑त्ति॒रः करोत्यप ह वै तावद्देवता आसते यावन्न समिष्टयजुर्जुह्व॑ती॒दं नु
नो जुह्व॒त्विति॒ ताभ्य॑ ए॒वैतत्त्ति॒रः करो॑ति॒ तस्मा॑दि॒मा मानु॑ष्य॒ स्त्रिय॑स्ति॒र॒ऽइवै॒व पुꣳ-
सो नि॒धत्सं॑सि॒ याऽइव तु ताऽइवेति॑ ह स्माह॒ याज्ञ॑वल्क्यः ॥ १२॥ अथा॒ग्निं गृ॒ह-
प॑तिं॒ यज॑ति । अ॒यं वाऽअ॒ग्निर्गृहप॑ति॒रिम॑मे॒वैतल्लो॒कम॒भिमाः प्र॒जा अ॒भिप्र॑जनयति॒ ता
इमं लो॒कम॒भिप्र॑जायन्ते॒ तस्मा॑द॒ग्निं गृ॒हप॑तिं॒ यज॑ति ॥ १३॥ तदिडा॒न्तं
भव॑ति । न ह्यत्र॑ परि॒धयो॒ भव॑न्ति॒ न प्र॑स्त॒रो यत्र॒ वाऽअ॒दः प्र॑स्त॒रेण यज॑मानꣳ
स्व॒गाक॒रोति॒ पतिं॑ वाऽअनु॑ जा॒या तद्दे॒वास्या॑पि॒ पत्नी॑ स्व॒गाकृ॑ता भवतीत्यसि॒ तत्त॒-
द्ध कुर्याद्यत्प्र॑स्तरस्य रू॒पं कु॒र्यात्तस्मा॑दिडा॒न्तमे॒व स्याद॑तो प्रस्तर॒स्येव॑ रू॒पं क्रि॑यते
॥ १४॥ स यदि॒ प्रस्त॑रस्य रू॒पं कु॒र्यात् । यथै॒वा॒दः प्र॑स्त॒रेण॒ यज॑मानꣳ स्व॒गाक॒रो-
त्ये॒वमे॒वैतत्पत्नीꣳ स्व॒गाक॒रोति॑ ॥ १५॥ स यदि॒ प्रस्त॑रस्य रू॒पं कु॒र्यात् । वे॒दस्यै॒कं
तृण॒माच्छि॒द्यैवं जु॒ह्वामन॑क्ति॒ मध्य॑ꣳ स्रुवे बु॒ध्नꣳ स्थाल्याम् ॥ १६॥ अथादा॑हा॒नुप्र॒-
हर॑ति । तूष्णीमे॒वानु॒प्रहृत्य॒ चक्षु॑ष्या॒ अग्ने॒ऽसि॒ चक्षु॑र्मे पाहीत्या॒त्मान॑मुप॒स्पृश॑ते
ततो॒ऽव्य॑त्या॒त्मानं॑ मानुष्वृणक्ति ॥ १७॥ अथा॒ह संवदस्वेति॑ । अगानग्नीदंग्नीद्रावय
श्रौषट् स्वगा दे॒व्या होतृ॑भ्यः स्व॒स्तिर्मानु॑षेभ्यः शम्योर्ब्रूहीति॑ ॥ १८॥ अथ जु॒हूं च
स्रुवं॑ च॒ संप्र॑गृह्णाति । अ॒दो वैवा॒ङ्गतिं॑ करोति॒ यदन॑तया॒ङ्गतिर्भूत्वा॑ दे॒वलो॒कं गहा-
का० १, अ० ६, ब्रा० २, कं० ७-१८ शतपथब्राह्मण / १८१
वे हवियाँ घी की होती हैं। घी ही वीर्य है। इस प्रकार वीर्य सींचता है, इसलिए घी
की आहुति देता है ॥७॥
इसको ये धीमी आवाज से करते हैं। समागम छिपकर किया जाता है। और जो धीमी
आवाज से किया जाय वह भी छिपकर करने के बराबर है, इसलिए इसको धीरे-धीरे करते
हैं ॥८॥
पहले सोम को आहुति देता है। सोम वीर्य है। वीर्य को सींचता है। इस कारण ही सोम
को आहुति देता है ॥९॥
अब त्वष्टा को आहुति देता है। त्वष्टा ही सींचे हुए वीर्य को विकृत करता है। इसलिए
त्वष्टा के लिए आहुति देता है ॥१०॥
अब देवों की पत्नियों को आहुति देता है। पत्नियों की योनियों में वीर्य स्थापित होता
है। उसी से सन्तान होती है। इस कृत्य द्वारा वह पत्नियों की योनि में वीर्य स्थापित करता है
और वहाँ से उत्पत्ति होती है। इसलिए वह देव-पत्नियों के लिए आहुति देता है ॥११॥
जब वह देव-पत्नियों के लिए आहुति देता है तो (अग्नि को) पूर्व की ओर छिपा लेता
है, क्योंकि देव उस समय तक ठहरे रहते हैं जब तक समिष्टयजु की आहुतियां पूरी न हो जायें,
क्योंकि वे समझते हैं कि हमारे लिए आहुतियां दी जाएँगी। उन्हीं से इसको छिपा लेता है।
इसीलिए याज्ञवल्क्य की सम्मति है कि स्त्रियाँ जब खाती हैं तो पुरुषों से अलग खाती हैं ॥१२॥
अब अग्नि के लिए जो गृहपति है, आहुति देता है। अग्नि ही यह लोक है। इसी लोक के
लिए सन्तान उत्पन्न होती है। इसलिए गृहपति-रूपी अग्नि के लिए आहुति देता है ॥१३॥
अन्त में इडा होती है। न तो यहाँ परिधियां रहती हैं न प्रस्तर। जैसे पहले प्रस्तर की
आहुति से यजमान को विदा किया था, इसी के साथ उसकी पत्नी भी विदा हुई क्योंकि पत्नी
पति के पीछे चलती है। यदि प्रस्तर का रूप (स्थानापन्न) कुछ और करे तो पत्नी के लिए
आलस्य का दोष लगे। इसलिए अन्त में इडा होती है। परन्तु प्रस्तर का स्थानापन्न भी होता
है ॥१४॥
यदि वह प्रस्तर का रूप या स्थानापन्न करे तो जैसे पहले प्रस्तर द्वारा यजमान को विदाई
दी, इसी प्रकार उसकी पत्नी को विदाई देता है ॥१५॥
यदि वह प्रस्तर का स्थानापन्न चुने तो वेद (कुशों का गुच्छा) का एक तृण लेकर अगला
भाग जुहू में डुबोता है, बीच का स्रुवा में, अन्त का थाली में ॥१६॥
अब आग्नीध्र कहता है 'अनुप्रहर'—'इसे पीछे फेंक दो।' (अध्वर्यु) उसे चुपके से फेंक-
कर नीचे का मन्त्र पढ़कर अपने को छूता है—"चक्षुष्पा अग्नेऽसि चक्षुर्मे पाहि" (यजु० २।१६)।
"हे अग्ने, तू आँखों की रक्षा करनेवाला है। मेरी आँखों की रक्षा कर।" इस प्रकार वह अपने को
आग में फेंकने से बचाता है ॥१७॥
अब (आग्नीध्र अध्वर्यु से) कहता है—'संवदस्व'—'संवाद कर।' अध्वर्यु—'हे अग्नीध,
वह गया ?' अग्नीध —'हाँ गया।' अध्वर्यु— 'श्रावय' (देवों को सुना)। अग्नीध—'श्रौषट्'
(वे सुनें)। अध्वर्यु—'देवताओं के होताओं के लिए विदाई हो।' मनुष्य—'होताओं के लिए
स्वस्ति।' अग्नीध —'शंयो कहो।' [टिप्पणी— यह संवाद है] ॥१८॥
अब जुहू और स्रुवा को साथ उठाता है। पहले (प्रस्तर को) सिंचन करके यजमान के
लिए आहुति दी थी कि वह आहुति बनकर देवलोक को जावे। इसलिए वह जुहू और स्रुवा को
१८२ शतपथ ब्राह्मण
दिति॒ तस्मा॑ज्जु॒हू॑ च स्रु॒वं च॒ संप्र॑गृह्णाति ॥ १९॥ स वाऽअ॒ग्नये॒ संप्र॑गृह्णाति । अ॒ग्ने
ऽद॑ब्धायोऽशीत॒मेत्य॒मृ॒तो॒ ह्य॒ग्निर॒स्तस्मा॑दाहादब्धायो॒वित्य॑शीत॒मेत्य॒शिश्रो॒ ह्य॒ग्निर॒स्त-
स्मा॑दाहाशीत॒मेति॒ पाहि॑ मा दि॒द्योः पाहि॒ प्रसि॑त्यै पाहि॑ दु॒रि॒ष्ट्यै पाहि॒ दु॒रद्मन्या
ऽइति॒ सर्वा॑भ्यो मार्त्तिभ्यो गोपाये॒त्येवैतदा॑हावि॒षं नः॑ पि॒तुं कृ॑ण्वित्यन्नं॒ वै पि॒तुर-
नमी॒वं न इ॒दमकि॑ल्विषमन्नं॑ कुर्वित्ये॒वैतदा॑ह सुषद॒ा योना॒वित्य॒ात्मन्ये॒तदा॑ह स्वा-
हा वाडि॒ति तद्यथा वषट्कृतꣳ हुतमेवम॑स्यैतद्भवति ॥ २०॥ अथ वेदं॒ पत्नी॑ वि-
स्रꣳसयति । योषा॒ वै वेदि॑र्वृषा॒ वेदो॑ मिथु॒नाय॒ वै वेदः॑ क्रियते॒ऽथ प॒देनैनं य॒ज्ञ
ऽउपा॑लभते मिथु॒नमे॒वैतत्प्र॒जननं॑ क्रियते ॥ २१॥ अथ यत्पत्नी विस्रꣳसयति । यो-
षा वै पत्नी वृषा वेदो मिथु॒नमे॒वैतत्प्र॒जननं॑ क्रियते तस्मा॑दि॒दं पत्नी॑ विस्रꣳसयति
॥ २२॥ सा विस्रꣳसयति । वेदो॑ऽसि॒ येन॒ त्वं दे॑व वेद दे॒वेभ्यो॒ वेदो॒ऽभव॒स्तेन॒ म-
ह्यं वेदो॑ भूया॒ इति॒ यदि॑ यजु॑षा चिकी॒र्षेदे॒तेनैव कुर्या॑त् ॥ २३॥ तमा वेदेः स्तृ-
स्तृणाति । योषा॒ वै वेदि॑र्वृषा॒ वेदः॑ पश्चा॑द्वै परी॑त्य वृषा॒ योषामधिद्र॑वति पश्चा॒द्वे-
वैनामेतत्परीत्य वृषा वेदे॒नाधि॒द्रावयति तस्माहा वेदेः स्तृ॒स्तृणा॑ति ॥ २४॥ अथ
समिष्टयजुर्जुहोति । प्राचे॒ यज्ञोऽनु॒संति॑ष्ठाता॒ऽइत्यथ यद्धुन्तः॒ समिष्टयजुः पत्नी॑ सं-
याज॑येत्प्रत्यङ्ङु हैवास्यैष य॒ज्ञः संति॑ष्ठेत॒ तस्मा॒द्वाऽए॒तर्हि॑ समिष्टयजुर्जुहोति प्राचे॒
यज्ञोऽनु॒संति॑ष्ठाता॒ऽइति॑ ॥ २५॥ अथ यस्मात्समिष्टयजुर्नाम । या वाऽए॒तेन य॒ज्ञेन
दे॒वता॑ हु॒यति॒ याभ्य॑ ए॒ष य॒ज्ञस्ताय॑ते सर्वा॒ वै ता॒स्ताः॒ समि॑ष्टा भवन्ति तथा॑तासु
सर्वा॑सु समि॑ष्टास्विहैतज्जु॑होति तस्मात्समिष्टयजुर्नाम ॥ २६॥ अथ यस्मात्समिष्टयजु-
र्जुहोति । या वाऽए॒तेन य॒ज्ञेन दे॒वता॑ हु॒यति॒ याभ्य॑ ए॒ष य॒ज्ञस्तायत॒ऽऽउ॒प क्व वै
ता आ॑सते यावन्न॒ समिष्टयजुर्जुहु॑तीदं नु नो जुहुवि॒ति ता ए॒वैतद्य॑थाय॒थं व्य॑व-
सृजति यत्र-यत्रासां चर॑णं तदनु यज्ञं वाऽए॒तदजी॑जनत॒ यदि॑दम॒तत॒ तं जनयित्वा य-
त्रास्य प्रतिष्ठा तत्प्रति॑ष्ठापयति॒ तस्मात्समिष्टयजुर्जुहोति ॥ २७॥ स जुहोति । दे॒वा
कां० १, अ० ६, ब्रा० २, कं० १६-२८ शतपथब्राह्मण / १८३
लेता है ॥१६॥
वह उनको अग्नि के लिए उठाता है (यह मन्त्र पढ़कर) “अग्नेऽदब्धायोऽशीतम” (यजु०
२।२०) – “हे शक्तिवाले और दूर जानेवाले अग्नि ।” चूंकि अग्नि ‘अमर’ है इसलिए कहा-
‘अदब्धायो ।’ अग्नि बहुत दूर पहुँचता है, (अशिष्ट है) इसलिए ‘अशीतम’ कहा। अब कहता है-
“पाहि मा दिद्योः पाहि प्रसित्यै पाहि दुरिष्ट्यै पाहि दुरद्मन्या ।” – “बचा मुझको वज्र से, बचा
मुझको बन्धनों से, बचा मुझे दूषित यज्ञ से और बचा मुझे बुरे अन्न से ।” इसका तात्पर्य यह है
कि हर प्रकार की बुराइयों से बचा । अब कहता है- “अविषन् नः पितुं कृणु” (यजु० २।२०)–
“हमारे अन्न को विषरहित कर” (पितु नाम है अन्न का) । इससे तात्पर्य है कि हमारे अन्न को
सर्वथा विषरहित कर । अब कहता है-“सुषदा योनौ”(यजु०२।२०)-“सुख देनेवाली गोद में ।”
इसका तात्पर्य है तुझमें । (फिर कहा) ‘स्वाहावाट्’ (यजु० २।२०) । चूंकि वषट्कार किया,
इसलिए यह ऐसा ही हो गया ॥२०॥
अब पत्नी वेद (कुशों के गुच्छों को) खोलती है । वेदि स्त्री है, वेद पुरुष है । वेद जोड़े के
के लिए बनाया जाता है और इसलिए जब यज्ञ में वह वेदि को (वेद से) छूता है तो सन्तान
उत्पन्न करनेवाली सन्धि हो जाती है ॥२१॥
पत्नी वेद को इसलिए खोलती है कि - पत्नी स्त्री है, वेद पुरुष है । इस प्रकार सन्तान
उत्पन्न करनेवाली सन्धि हो जाती है । इसलिए पत्नी वेद को खोलती है ॥२२॥
यदि वह यजु० का मन्त्र पढ़कर खोलना चाहे तो इस यजु०को पढ़कर खोले – “वेदोऽसि
येन त्वं देव वेद देवेभ्यो वेदोऽभवस्तेन मह्यं वेदो भूयाः” (यजु २।२१) – “तू वेद है हे देव, वेद तू
देवों के लिए वेद हो गया । मेरे लिए वेद हो” ॥२३॥
(होता) उसको वेदि तक फैलाता है, क्योंकि वेदि स्त्री है और वेद पुरुष है, पुरुष स्त्री
के पास पीछे से जाता है । इसलिए यह पीछे से अर्थात् पश्चिम से पुरुष-वेद को स्त्री-वेदि तक ले
जाता है । इसलिए वह वेदि तक फैलाता है ॥२४॥
अब समिष्ट-यजु की आहुति देता है जिससे ‘मेरा यज्ञ पूर्व में समाप्त हो जाय ।’ यदि वह
समिष्ट-यजु पहले करता और पत्नी-संयाज पीछे, तो उसका यज्ञ पश्चिम में समाप्त होता ।
इसलिए वह समिष्ट-यजु की आहुतियां इस समय देता है कि मेरा यज्ञ पूर्व में समाप्त हो ॥२५॥
अब इसका समिष्ट-यजुः नाम क्यों पड़ा ? जो देवता यज्ञ में बुलाये जाते हैं और जिन
देवों के लिए यह यज्ञ किया जाता है, वे सब समिष्ट होते हैं (सम् + इष्टा) चाहे हुए या
बुलाये हुए । उन सब समिष्टों में जो आहुति दी जाती है उसका नाम है समिष्ट-यजुः । (यजुः का
अर्थ है आहुति) ॥२६॥
अब समिष्ट-यजुः क्यों किया जाता है ? जिन देवताओं को वह इस यज्ञ द्वारा बुलाता है
और जिन देवताओं के लिए यह यज्ञ किया जाता है, वे देवता ठहरे रहते हैं, जब तक कि समिष्ट-
यजुः न हो, यह सोचते हुए कि हमारे लिए यह आहुतियां देगा । उन्हीं देवताओं का वह यथाविधि
विसर्जन कर देता है; और जिस विधि के अनुसार उसने यज्ञ को उत्पन्न किया और फैलाया, उसी
को उत्पन्न करके उसको प्रतिष्ठा में स्थापित करता है । इसलिए वह समिष्ट-यजुः की आहुति
देता है ॥२७॥
वह यह मन्त्रांश पढ़कर आहुति देता है - “देवा गातुविदः” (यजु० २।२१) – “मार्ग
१८४ शतपथ ब्राह्मण
गा॒तु॒विद् इ॒ति गा॒तु॒विदो॒ हि दे॒वा गा॒तुं वि॒त्त्वेति य॒ज्ञं वि॒त्त्वेत्ये॒वैतदा॒ह गा॒तुमि॒ते-
ति॒ तदे॒तेन यथा॒यथं व्यवसृजति मनसस्पतऽइ॒मं देव य॒ज्ञꣳ स्वाहा॒ वाते॒ धाऽइ॒त्य-
यं वै य॒ज्ञो योऽयं पव॑ते॒ तदि॒मं य॒ज्ञꣳ सम्भृत्यै॒तस्मि॒न्य॒ज्ञे प्रतिष्ठापयति य॒ज्ञेन य॒ज्ञꣳ
संदधाति तस्मादाह॒ स्वाहा॒ वाते धा॒ इति ॥ २८॥ अथ बर्हिर्जुहोति । अयं वै
लो॒को ब॒र्हिरोषधयो बर्हि॒रस्मिन्नेवैतल्लो॒कऽओषधीर्दधाति ता इमा अस्मिंल्लोक
ऽओषधयः प्रतिष्ठितास्तस्माद्ब॒र्हिर्जुहो॑ति ॥ २९॥ तां वाऽअ॒तिरिक्तां जुहोति । स-
मिष्टयजुर्वैवान्तो यज्ञस्य यद्व्यूढꣳ समिष्टयजुषोऽतिरिक्तं तद्यदा हि समिष्टयजुर्जु-
होत्यथैताभ्यो जुहोति तस्मादिमा अतिरिक्ता अस॑मिता ओषधयः प्र॒जायन्ते ॥ ३०॥
स॒ जुहोति । सं बर्हि॒रङ्क्तां ह॒विषा घृ॒तेन॒ समादि॒त्यैर्वसु॑भिः॒ सं म॒रुद्भिः समिन्द्रो
विश्वे॑दे॒वेभिरङ्क्तां दि॒व्यं नभो॑ गच्छतु यत्स्वाहेति ॥ ३१॥ अथ प्रणीता दक्षिणतः प-
रीत्य निनयति । युङ्क्ते वाऽएतद्य॒ज्ञं यदेनं तनुते स यन्न निनयेत्पराङ् ह्यविमुक्त
एव य॒ज्ञो यज॑मानं प्रक्षिणीयात्तद्यो ह य॒ज्ञो यज॑मानं न प्रक्षिणाति तस्मात्प्रणी-
ता दक्षिणतः परीत्य निनय॑ति ॥ ३२॥ स निनयति । क॒स्त्वा विमुञ्चति स॒ त्वा
विमुञ्चति कस्मै त्वा विमुञ्चति तस्मै त्वा विमुञ्चति पोषायैति तत्पुष्टिमृत्तमां यज-
मानाय निराह स येनैव प्रणयति तेन निनयति येन ह्येव योग्यं युञ्जन्ति तेन
विमुञ्चन्ति योक्त्रेण हि योग्यं युञ्जन्ति योक्त्रेण विमुञ्चन्त्यथ फलीकरणांन्कपालेना-
धोऽधः कृष्णाजिनमुपास्यति रक्ष॑सां भा॒गोऽसीति ॥ ३३॥ दे॒वाश्च ह वाऽअसु॑राश्च ।
उ॒भये प्राजाप॑त्याः प॒स्पृधिरेऽए॒तस्मिन्यज्ञे प्र॒जापतौ पितरि॒ संवत्स॒रेऽस्माक॒मयं भ-
विष्यत्यस्माकमयं भविष्यतीति ॥ ३४॥ ततो देवाः । सर्वं य॒ज्ञꣳ संवृ॒ज्याथ यत्पा-
पिष्ठं यज्ञस्य भागधेयमासीत्तेनैनानन्विर्भजन्न्सता पशोः फलीकरणैर्हविषात्सुनिर्भ-
क्ता असन्नित्येष वै सुनिर्भक्तो यं भागिनं निर्भजन्त्यथ यमभागं निर्भजन्त्येव स ता-
वहुक्षात्तऽउत हि वशे लब्ध्वाह् किं मा भक्ष्येति स यमेवैभ्यो दे॒वा भागमक-
कां० १, अ० ६, ब्रा० २, क० २८-३५ शतपथब्राह्मण / १८५
को पानेवाले देव ।” वस्तुतः देव मार्ग को पानेवाले हैं। “गातुं वित्त्वा” (यजु० २।२१)-“मार्ग को
पाकर ।” इसका तात्पर्य है 'यज्ञ को पाकर' । “गातुवित्” (यजु० २।२१)— “मार्ग पर चलो ।”
इससे वह यथाविधि (देवों का) विसर्जन करता है । अब कहता है- “मनसस्पतऽइमं देव यज्ञं
स्वाहा वाते धाः” (यजु० २।२१) — “हे मन के पति ! इस देवयज्ञ को वायु में रख । स्वाहा ।”
यह यज्ञ ही है जो बहता है अर्थात् पवन । इस प्रकार इस यज्ञ को तैयार करके उस यज्ञ (दर्श-
पूर्णमास) में स्थापित करता है । यज्ञ को यज्ञ से मिलाता है, इसलिए कहा 'स्वाहा वाते
धाः' ।।२८।।
अब बर्हि-यज्ञ करता है । यह लोक ही बर्हि है। ओषधियाँ बर्हि हैं। इस विधि से वह इस
लोक में ओषधियाँ धारण करता है, और ये ओषधियां इस लोक में प्रतिष्ठित हैं। इसलिए
बर्हि-यज्ञ करता है ।।२९।।
यह एक अतिरिक्त आहुति है । समिष्ट-यजुः यज्ञ का अन्त है । जो समिष्ट-यजुः से ऊपर
है वह अतिरिक्त आहुति है । जब समिष्ट-यजुः करता है तो इन देवताओं के लिए करता है, इसी
से ये अनन्त और असीमित ओषधियां होती हैं ।।३०।।
यह आहुति इस मन्त्र से दी जाती है-“सं बर्हिरङ्क्तां हविषा घृतेन समादित्यैर्वसुभिः
सम्मरुद्भिः । समिन्द्रो विश्वेदेवेभिरङ्क्तां दिव्यं नभो गच्छतु यत् स्वाहा” (यजु० २।२२)—
“बर्हि हवि और घी से युक्त हों । इन्द्र आदित्यों, वसुओं, रुद्रों और विश्वेदेवों से संयुक्त हो । जो
स्वाहा अर्थात् आहुति दी गई है यह दिव्य आकाश को जाये” ।।३१।।
अब दक्षिण की ओर जाकर प्रणीता पात्र के जल को डालता है, अथवा जब यज्ञ को
करता है तो उसको जोतता है । यदि प्रणीता के जल को न डालेगा तो न छोड़ा हुआ (न खोला
हुआ) यज्ञ पीछे को हटकर यजमान को हानि पहुँचावेगा । इस प्रकार यज्ञ यजमान को हानि नहीं
पहुंचाता । इसलिए प्रणीता का जल दक्षिण की ओर जाकर डालता है ।।३२।।
वह इस मन्त्र को पढ़कर डालता है- “कस्त्वा विमुञ्चति, स त्वा विमुञ्चति । कस्मै त्वा
विमुञ्चति, तस्मै त्वा विमुञ्चति । पोषाय” (यजु० २।२३) - “कौन तुझे खोलता है ? वह तुझे
खोलता है । किसके लिए तुझको खोलता है ? उसके लिए तुझको खोलता है । पुष्टि के लिए ।”
इससे वह उत्तम पुष्टि को यजमान के लिए मांगता है। जिस पात्र के द्वारा जल लिया था उसी के
द्वारा डालता है । क्योंकि जिससे वे (घोड़ों को या बैलों को) जोतते हैं उसीसे खोलते हैं । योक्त्र
अर्थात् जुए की रस्सी से जोतते हैं और उसी से खोलते हैं । फलीकरण अर्थात् चावलों का
कूड़ा कपाल के द्वारा कृष्णाजिन (हिरन के चमड़े) के नीचे फेंक देता है, यह कहकर - "रक्षसां
भागोऽसि” (यजु० २।२३) — “राक्षसों का भाग है तू” ।।३३।।
देव और असुर दोनों प्रजापति की सन्तान इस यज्ञ, प्रजापति, पिता अर्थात् संवत्सर के
लिए झगड़ा करते थे कि 'यह हमारा होगा, यह हमारा होगा' ।।३४।।
अब देवों ने सब यज्ञ पर स्वत्व कर लिया। जो यज्ञ का बुरा भाग था वह उन असुरों क
दे दिया, जैसे (यज्ञ के) पशु का रक्त और हविर्यज्ञ के चावल की भूसी । उन्होंने कहा- 'इनको
यज्ञ का कोई भाग न मिले ।” क्योंकि जिसको यज्ञ का बुरा भाग मिलता है वह न मिलने के ही
बराबर है, और जिसको कुछ भी नहीं मिलता उसे कुछ आशा होती है और कहता है - 'तूने
मुझको कौन-सा भाग दिया है ?' इसलिए जो भाग देवों ने असुरों के लिए रक्खा था, वही भाग
अध्याय-९, ब्राह्मण-३
१८६ शतपथ ब्राह्मण
ल्पय॑ꣳस्तमे॒वैष ए॒तद्भागं॑ करोत्यथ॒ यद॒धोऽधः॑ कृ॒ष्णाजि॑नम॒पास्य॑त्यन॒ग्नावे॒वैष॒
ए॒तद॒न्धे तम॑सि प्र॒वेश॑यति तथोऽए॒वामृ॑क्पशो॒ रक्ष॑सां भा॒गोऽसी॒त्यन॒ग्नाव॒न्धे त॒-
म॑सि प्र॒वेश॑यति त॒स्मात्प॒शोस्ते॑दनीं न कुर्वन्ति॒ रक्ष॑साꣳ हि॒ स भागः॑ ॥ ३५॥ ब्रा-
ह्मणम् ॥ ३ [१.२.]॥ ॥
सꣳस्थि॑ते य॒ज्ञे । द॒क्षि॒णतः॒ परी॑त्य पू॒र्णपा॒त्रं निन॑यति तथा॒ ह्युद॑ग्भवति तस्मा-
द्द॒क्षि॒णतः॒ परी॑त्य पू॒र्णपा॒त्रं निन॑यति दे॒वलो॒के मे॒ऽप्यस॒दिति॒ वै य॑ज॑ते॒ यो यज॑ते
सो॒ऽस्यै॑ष य॒ज्ञो दे॑वलो॒कमे॒वाभि॒प्रेति॒ तदनू॑ची॒ दक्षि॑णा यां ददा॑ति॒ सेति॒ दक्षि॑णा-
मन्वा॒रभ्य॒ यज॑मानः ॥ १॥ स ए॒ष दे॑वया॒नो वा॑ पितृया॒णो वा॒ पन्थाः॑ । तदु॑भय-
तो॒ऽग्निशि॑खे समोष॑न्त्यौ तिष्ठतः॒ प्रति॑ त॒मोष॑तो यः॒ प्रत्युष्यो॒ऽन्यु तꣳ सृज॑तो॒ यो
ऽतिसृ॑ज्यः॒ शान्ति॒राप॒स्तदे॑तमे॒वैतत्प॒न्थानꣳ॑ शमयति ॥ २॥ पूर्णं निन॑यति । स॒र्वं
वै पू॒र्णꣳ सर्वै॑णे॒वैन॑मेत॒च्छम॑यति संत॒तम॒व्यव॑च्छिन्नं॒ निन॑यति सं॒तते॑नै॒वैन॑मेत॒दव्यव॑च्छि-
न्नेन शमयति ॥ ३॥ यद्वे॑व पू॒र्णपा॒त्रं निन॑यति । यद्वै॒ य॒ज्ञस्य॑ मिथ्या क्रि॒यते॒ व्यस्य
तदृच्छ॑ति॒ यद्व॑र्त्ति शान्ति॒राप॒स्तद॒द्भिः शान्त्या॑ शमयति॒ तद॒द्भिः संद॑धाति ॥ ४॥ पूर्णं॑
निन॑यति । स॒र्वं वै पू॒र्णꣳ सर्वै॑णे॒वैत॒त्संद॑धाति संत॒तम॒व्यव॑च्छिन्नं॒ निन॑यति सं॒तते॑-
नै॒वैत॒दव्यव॑च्छिन्नेन॒ संद॑धाति ॥ ५॥ तद॒ञ्जलि॑ना प्रति॒गृह्णा॑ति । सं वर्च॑सा॒ पय॑सा॒ सं
तनू॒भिरगन्म॑हि॒ मन॑सा॒ सꣳ शि॒वेन॑ । त्वष्टा॑ सु॒दत्रो॒ विद॑धातु रा॒योऽनु॑मार्ष्टुं त॒न्वो
यद्विलि॑ष्ट॒मिति॒ यद्वि॒वृढं॒ तत्संद॑धाति ॥ ६॥ अथ॒ मुख॑मुपस्पृशते । द्वयं तद्य॒स्मान्मु-
खमुपस्पृश॑ते॒ऽमृतं॒ वाऽआपो॒ऽमृते॑नै॒वैतत्संस्पृ॑शत॒ऽएत॒द्वै चैवैतत्कर्मात्मन्कु॑रुते त॒-
स्मान्मु॒खमुप॑स्पृशते ॥ ७॥ अथ वि॒ष्णुक्रमा॒न्क्रम॑ते । दे॒वान्वाऽए॒ष प्री॑णाति॒ यो य-
जत॒ऽए॒तेन॑ य॒ज्ञेना॒ऽग्निर्हि वस्व॒ग्नि॑र्हि य॒दाहु॑तिभिरेव य॒त्स दे॒वान्प्री॒त्वा तेष्व-
पि॒त्वी भव॑ति॒ तेष्व॑पि॒त्वी भूत्वा ताने॒वाभिप्रक्राम॑ति ॥ ८॥ यद्वे॑व वि॒ष्णुक्रमा॒न्क्रम॑ते ।
य॒ज्ञो वै विष्णुः॑ स दे॒वेभ्य॑ इ॒मां वि॒क्रान्तिं॒ विच॑क्रमे॒ येषा॑मि॒यं वि॒क्रान्ति॒रिद॑मे॒व प्र-
का० १, अ० ६, ब्रा० ३, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / १८७
वह उन असुरों को देता है, अर्थात् (इस भूसी को) हिरन के लिए चमड़े के नीचे फेंक देता है।
इस प्रकार वह इसे अन्धकार में डालता है, जहाँ आग नहीं है। इसी प्रकार पशु का रक्त भी
अन्धकार में डालता है, यह कहकर कि तू राक्षसों का भाग है। इसलिए (यज्ञ में) प्रयुक्त नहीं
करते क्योंकि यह राक्षसों का भाग है ॥३५॥
अध्याय ६—ब्राह्मण ३
यज्ञ की समाप्ति पर (अध्वर्यु) दक्षिण की ओर घूमकर पूर्णपात्र के जल को गिरा देता
है। इस प्रकार (संकेत से बताता है) उत्तर की ओर गिराया जाता है। इसलिए दक्षिण की
ओर घूमकर पूर्णपात्र को गिराता है। जो यज्ञ करता है वह इस कामना से करता है कि देवलोक
में स्थान मिले। उसका यह यज्ञ भी देवलोक को चला जाता है। इसके पीछे दक्षिणा चलती है,
जिसे वह (पुरोहित को) देता है। दक्षिणा को लेकर यजमान पीछे-पीछे आता है ॥१॥
मार्ग या तो देवयान होता है या पितृयान। दोनों ओर दो अग्नि-शिखाएँ जलती रहती
हैं। जो मुरसाने के योग्य होता है उसे मुरसाती हैं और जो निकल जाने के योग्य होता है उसे
निकल जाने देती हैं। जल शान्ति है इसलिए इसके द्वारा वह मार्ग को शान्त करता है ॥२॥
पूर्णपात्र को वह उँडेलता है। पूर्ण का अर्थ है सब। इस प्रकार ‘सब’ से वह मार्ग को
शान्त करता है। वह निरन्तर बिना धार को तोड़े हुए उँडेलता है। इस प्रकार वह मार्ग को
निरन्तर लगातार शान्त करता है ॥३॥
वह पूर्णपात्र को इसीलिए उँडेलता है। यज्ञ में जो भूल हो जाती है वहाँ काट या फाड़
देते हैं। जल शान्ति हैं इसलिए जलरूपी शान्ति से शान्त करता है अर्थात् जलों से चंगा करता
है ॥४॥
पूर्ण (पात्र) को उँडेलता है। पूर्ण का अर्थ है सब। ‘सब’ के द्वारा इसको चंगा करता है।
वह लगातार बिना धार तोड़े हुए उँडेलता है, इस प्रकार निरन्तर चंगा करता है ॥५॥
उसको अञ्जलि से लेता है यह मन्त्र पढ़कर—'सं वर्चसा पयसा सं तनूभिरगन्महि
मनसा सं ॓ शिवेन । त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायोऽनुमार्ष्टु तन्तो (तन्वो ?) यद् विलिष्टम्
(विलीष्टम् ?)”(यजु० २।२४)—“तेज, शक्ति, शरीरों और कल्याणकारी मन से हम मिल
गये। दानी त्वष्टा हमको धन दे; और जो कुछ हमारे शरीर में घाव था उसे चंगा कर दे।”
ऐसा कहकर जो व्रण था उसको चंगा कर देता है ॥६॥
अब मुख का स्पर्श करता है। मुख स्पर्श करने के दो कारण हैं—पहला, जल अमृत
है। अमृत से ही इसको स्पर्श करता है। दूसरे यह कि इस प्रकार वह इस कर्म को अपना (निजी)
कर लेता है। इसलिए मुख का स्पर्श करता है ॥७॥
अब वह विष्णु के पगों को चलता है। जो यज्ञ करता है वह देवों को प्रसन्न करता है।
इस यज्ञ द्वारा ऋचाओं से, यजुषों से या आहुतियों से देवों को प्रसन्न करके वह उनका हिस्सेदार
होकर उन तक पहुँच जाता है ॥८॥
विष्णु के पगों को इसलिए चलता है—विष्णु यज्ञ है। उस (यज्ञ) ने देवों के लिए इस
विक्रान्ति (शक्ति) को प्राप्त कर लिया जो इस समय उनके पास है। पहले पद से इस (पृथिवी)
१८८ शतपथ ब्राह्मण
थमेन॑ प॒देन॑ प॒श्या॒ऽथेद॒मन्तरि॑क्षं द्वि॒तीये॑न दि॒वमुत्त॑मेनैतान्त्वे॒वैष ए॒तस्मै॒ वि॒ष्णुर्व्य॑क्रस्तो
विक्रान्तिं॒ विक्र॑मते॒ तस्मा॑द्वि॒ष्णुक्र॒मान्क्रम॑ते॒ तदा॑ऽङ्गत् ए॒व परा॑चीनं॒ भूयि॑ष्ठा-इव
क्रम॑न्ते ॥ ९॥ तडु॒ तत्पृ॑थि॒व्यां वि॒ष्णुर्व्य॑क्रम॑स्त । गा॒य॒त्रेण॒ छन्द॑सा॒ ततो॒ निर्भ॑क्तो
योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मोऽन्तरि॑क्षे वि॒ष्णुर्व्य॑क्रम॑स्त त्रै॒ष्टुभे॑न॒ छन्द॑सा॒ ततो॒ निर्भ॑-
क्तो योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मो दि॒वि वि॒ष्णुर्व्य॑क्रम॑स्त॒ जाग॑तेन॒ छन्द॑सा॒ ततो॒
निर्भ॑क्तो योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्म इ॒त्येव॒मिमांल्लो॒कान्त्स॒मारु॒ह्याथैषा॒ गति॑रे-
षा प्रतिष्ठा॒ य ए॒ष तप॑ति॒ तस्य॒ ये र॒श्मय॒स्ते॑ सु॒कृतो॒ऽथ यत्प॑रं॒ भाः प्र॒जाप॑तिर्वा
स॒ स्वर्गी॑ वा लो॒कस्त॑दि॒वमिमांल्लो॒कान्त्स॒मारु॒ह्याथैतां गति॑मेतां प्रति॑ष्ठां गच्छति प-
र॒स्ता॒द्रे॒वार्वाङ् क्रमे॑त॒ य इतो॒ऽनु॒शासनं॑ चिकीर्षेद्वयं तद्य॒स्मात्पर॒स्ता॒दर्वाङ् क्र॑मति
॥ १०॥ अप॒सरणा॒तो ह॒ वाऽग्रे॑ दे॒वा जयन्तो॒ऽजय॑न् । दि॒वमे॒वाग्रे॒ऽथेद॒मन्तरि॑क्षम-
थेतो॒ऽनप॑सरणात्स॒पत्नाननु॑दत॒ तथो॒ऽए॒वैष ए॒तदप॑सरणात ए॒वाग्रे॒ जय॒न्जय॑ति दि॒-
व॑मे॒वाग्रे॒ऽथेद॒मन्तरि॑क्षम॒थेतो॒ऽनप॑सरणात्स॒पत्नान्नु॑दत॒ऽइयं वै पृ॑थि॒वी प्रति॑ष्ठा तद्-
स्याने॒वैतत्प्रति॑ष्ठायां॒ प्रति॑तिष्ठति ॥ ११॥ तडु॒ तद्दि॒वि वि॒ष्णुर्व्य॑क्रम॑स्त । जाग॑तेन
छन्द॑सा॒ ततो॒ निर्भ॑क्तो योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मोऽन्तरि॑क्षे वि॒ष्णुर्व्य॑क्रम॑स्त त्रै-
ष्टुभे॑न॒ छन्द॑सा॒ ततो॒ निर्भ॑क्तो योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मः पृ॑थि॒व्यां वि॒ष्णुर्व्य॑क्र-
स्त गा॒यत्रे॑ण॒ छन्द॑सा॒ ततो॒ निर्भ॑क्तो योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मोऽस्माद॒न्नाद॒स्यै
प्रति॑ष्ठायाऽहु॒त्यस्या॑ऽ कीदृ॒ सर्व॒मन्ना॑द्यं प्रति॑ष्ठित॒ तस्मा॑दाका॒स्माद॒न्नाद॒स्यै प्रति॑ष्ठा-
याऽहुति ॥ १२॥ अथ॒ प्राङ् प्रेक्ष॑ते । प्राची॒ हि दे॒वानां॒ दि॒क्तस्मा॒त्प्राङ् प्रेक्ष॑ते ॥१३॥
न प्रेक्ष॑ते । अगन्म॒ स्व॒रिति॑ दे॒वा वै स्व॒रग॑न्म दे॒वानित्ये॒वैतदा॑ह॒ सं ज्योति॑षा-
भू॒मति॒ सं दे॒वैर॒भूमेत्ये॒वैतदा॑ह ॥ १४॥ अथ॒ सूर्य्यमुदीक्ष॑ते । सैषा ग॒तिरे॒षाप्र॑तिष्ठा
तदे॑तां ग॒तिमे॒तां प्रति॑ष्ठां गछति॒ तस्मात्सूर्य्यमुदीक्ष॑ते ॥ १५॥ स उ॒दीक्ष॑ते । स्वय-
म्भूर॑सि॒ श्रेष्ठो॑ र॒श्मिरित्येष वै श्रेष्ठो॑ र॒श्मिर्यत्सूर्य्यस्तस्मा॑दाह॒ स्वय॒म्भूर॑सि॒ श्रेष्ठो॑ र-
कां० १, अ० ६, ब्रा० ३, क० ६-१६ शतपथब्राह्मण / १८६
को, दूसरे से अन्तरिक्ष को, तीसरे से द्यौ को। यह विष्णु-यज्ञ यजमान के लिए इस शक्ति को
प्राप्त करा देता है। इसीलिए विष्णु के पगों को चलता है। अब इसी (पृथिवी) से बहुत-से (ऊपर
को) चलते हैं ॥६॥
वह इस मन्त्र से-“पृथिव्यां विष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त गायत्रेण च्छन्दसा ततो निर्भक्तो योऽस्मान् द्वेष्टि
यं च वयं द्विष्मः” (यजु० २।२५), “अन्तरिक्षे विष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त त्रैष्टुभेन च्छन्दसा ततो निर्भक्तो
योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः”(यजु० २।२५), “दिवि विष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त जागतेन च्छन्दसा ततो
निर्भक्तो योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः” (यजु० २।२५) – “पृथिवी में विष्णु गायत्री छन्द से
चला। जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं, वह यहाँ से बहिष्कृत है”, “अन्तरिक्ष
में विष्णु त्रिष्टुभ् छन्द से चला। जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं, वह यहाँ से
बहिष्कृत है”, “द्यौ लोक में विष्णु जगती छन्द से चला। जो हमसे द्वेष करते हैं या जिससे हम द्वेष
करते हैं, वह यहाँ से बहिष्कृत है।” जब इन लोगों को प्राप्त हो गया तो यही गति है, यही
प्रतिष्ठा है। जो यह तपता है अर्थात् सूर्य, उसकी ये किरणें हैं वे सुकृत हैं। यह जो परम-प्रकाश
है वह प्रजापति या स्वर्ग-लोक है। इस प्रकार इन लोकों को प्राप्त होता है। वह इस गति और
प्रतिष्ठा को पाता है। जो अनुशासन या उपदेश देना चाहे वह ऊपर से नीचे आता है। दो कारण
हैं कि वह ऊपर से नीचे आता है—॥१०॥
(शत्रु के) भागने पर विजयी देवों ने पहले द्यौ को जीता, फिर अन्तरिक्ष को, फिर उन
शत्रुओं को इस (पृथिवी) से भी निकाला जहाँ से भाग जाना कठिन था। उसी प्रकार यह (होता)
भी (शत्रुओं के) भागने पर पहले द्यौ लोक को जीतता है, फिर अन्तरिक्ष को, फिर उनको इस
(पृथिवी) से निकालता है जहाँ से भाग जाना नहीं बन सकता। यह पृथिवी की प्रतिष्ठा है इसलिए
वह इस प्रतिष्ठा में ही प्रतिष्ठित होता है ॥११॥
और इस प्रकार भी-“दिविविष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त । जागतेन च्छन्दसा ततो निर्भक्तो योऽस्मान्
द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मोऽन्तरिक्षे विष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त त्रैष्टुभेन च्छन्दसा ततो निर्भक्तो योऽस्मान् द्वेष्टि
यं च वयं द्विष्मः पृथिव्यां विष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त गायत्रेण च्छन्दसा ततो निर्भक्तो योऽस्मान् द्वेष्टि यं च
वयं द्विष्मोऽस्मादन्नादान्द्यं प्रतिष्ठाया” (यजु० २।२५) – “द्यौ लोक में विष्णु जगती छन्द से
चला। वहाँ से वह निकाल दिया गया जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं।
अन्तरिक्ष में विष्णु त्रिष्टुभ छन्द से चला। वहाँ से वह निकाल दिया गया जो हमसे द्वेष करता है
या जिससे हम द्वेष करते हैं। पृथिवी में विष्णु गायत्री छन्द से चला। वहाँ से वह निकाल दिया
गया जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं। इस अन्न से और प्रतिष्ठा से (निकाल
दिया गया)।” इस पृथिवी में ही सब अन्न आदि प्रतिष्ठित हैं इसीलिए कहा, 'इस अन्न से और
इस प्रतिष्ठा से' ॥१२॥
अब वह पूर्व की ओर देखता है। पूर्व देवों का दिशा है। इसलिए पूर्व की ओर देखता
है ॥१३॥
वह यह मन्त्र पढ़कर देखता है-“अग्न्म॒ स्वः”(यजु० २।२५) - “हम स्वर्ग को पहुँच
गये।” देव ही स्वर्ग हैं इसलिए तात्पर्य है 'देवों को प्राप्त हो गये।' अब कहता है-“सं ज्योतिषा-
भूम” (यजु० २।२५) -- “प्रकाश से हम मिल गये।” इससे तात्पर्य है कि हम देवों से मिल
गये ॥१४॥
अब वह सूर्य की ओर देखता है, क्योंकि वही गति है, वही प्रतिष्ठा है। इस गति को
और प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है, इसलिए सूर्य की ओर देखता है ॥१५॥
वह इस मन्त्र को पढ़कर देखता है- “स्वयम्भूरसि श्रेष्ठो रश्मिः”(यजु०२।२६) – “हे
श्रेष्ठ किरण ! तू स्वयम्भू है।” सूर्य श्रेष्ठ किरण है इसलिए कहा, 'हे श्रेष्ठ किरण, तू स्वयम्भू है।'
ेभ्यः" - "शतादर्धेभ्यः" (from शतात् + अर्धेभ्यः / शतादर्धेभ्यः).
In line 12: शता-
In line 13: र्द्धेभ्यः (with anudatta underneath).
Wait, look at line 13: र्द्धे॒भ्यः or र्द्धेभ्यः?
There is an anudatta under the first consonant cluster: र्द्धे॒भ्यः.
Line 14:
मन्वावर्त्तऽइति॒ तदेतां गतिमेतां प्रतिष्ठां गतेतस्यैवावृतमन्वावर्तते ॥ २०॥ अथ
मन्वावर्त्तऽइति॒: anudatta under ति. ग॒ते-: anudatta under ग. त॒स्यैवावृतमन्वावर्तते: anudatta under त. अ॒थ: anudatta under अ.
Line 15:
पुत्रस्य नाम गृह्णाति । इदं मे॒ऽङ्गं वी॒र्यं पुत्रो॒ऽनुसंतनवदिति यदि पुत्रो न स्याद्-
इदं: इ॒दं or इदं? Under दं or इ: इ॒दं.
मे॒ऽङ्गं: anudatta under मे.
वी॒र्यं: anudatta under वी.
कां० १, अ० ९, ब्रा० ३, कं० १६-२३ शतपथब्राह्मणम् / १६१
अब कहता है—‘‘वर्चोदाऽसि वर्चो मे देहि’’ (यजु० २।२६)—‘‘तू तेज देनेवाला है, तू
तेज दे।’’ याज्ञवल्क्य ने कहा, ‘मैं यही कहता हूँ कि ब्राह्मण यह चाहे कि मैं ब्रह्मवर्चसी होऊँ।’
औपदितेय ने कहा, ‘वह मुझे गायें देगा। इसलिए मैं कहता हूँ, तू गाय देनेवाला है मुझे गाय
दे।’ इस प्रकार (यजमान) जो चाहता है वही उसको मिल जाता है ॥१६॥
अब वह (बाईं ओर से दाहिनी ओर को) मुड़ता है यह पढ़कर—‘‘सूर्यस्यावृतमन्वावर्ते’’
(यजु०२।२६)—‘‘मैं सूर्य के मार्ग को लौटता हूँ।’’ इस गति और प्रतिष्ठा को प्राप्त होकर वह
लौटता है ॥१७॥
अब वह गार्हपत्य अग्नि के पास जाता है। गार्हपत्य घर है। घर ही प्रतिष्ठा है इसलिए
वह घर में अर्थात् प्रतिष्ठा में ठहरता है और दूसरे, जो मनुष्य की पूरी आयु हो सकती है उसको
प्राप्त करता है। इसलिए गार्हपत्य अग्नि के पास ठहरता है ॥१८॥
वह यह मन्त्र पढ़कर जाता है—‘‘अग्ने गृहपते सुगृहपतिस्त्वयाऽग्नेऽहं गृहपतिना भूयासँ॒
सुगृहपतिस्त्वम् मयाऽग्ने गृहपतिना भूयाः’’(यजु०२।२७)—‘‘हे गृहपति अग्नि ! मैं तुझ गृहपति
की सहायता से अच्छा गृहपति हो जाऊँ। हे अग्नि ! मुझ गृहपति की सहायता से तू अच्छा
गृहपति हो जा।’’ यह स्पष्ट ही है। अब कहता है —‘‘अस्थूरि णौ गार्हपत्यानि सन्तु’’ (यजु०
२।२७) —‘‘हमारे घर के मामले एक बैल की गाड़ी जैसे न हों।’’ इस कहने का तात्पर्य है कि
हमारे घर के मामले दुःख-रहित हों। अब कहता है—‘‘शतं॒ हिमाः’’ (यजु० २।२७)—‘‘सौ वर्ष
तक।’’ इसका तात्पर्य है ‘मैं सौ वर्ष तक जीऊँ।’ परन्तु उसको ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि
मनुष्य सौ वर्ष से अधिक जीता है। इसलिए उसको ऐसा नहीं कहना चाहिए ॥१९॥
अब वह (बाईं ओर से दाईं ओर) मुड़ता है यह पढ़कर —‘‘सूर्यस्यावृतमन्वावर्ते’’ (यजु०
२।२७)—‘‘सूर्य के मार्ग से लौटता हूँ।’’ वह इस गति और प्रतिष्ठा को प्राप्त करके इस (सूर्य के)
मार्ग से लौटता है ॥२०॥
अब (यह मन्त्र पढ़ता हुआ) अपने पुत्र का नाम लेता है—‘‘इदं मेऽयं वीर्यं पुत्रोऽनुसन्तन्-
वत्’’—‘‘मेरा पुत्र मेरे इस वीर्य को जारी रखे।’’ यदि पुत्र न हो तो अपना ही नाम ले ॥२१॥
अब आहवनीय के पास खड़ा होता है। वह चुपके से खड़ा होता है यह जानकर कि पूर्व
में मेरा यज्ञ समाप्त होगा ॥२२॥
अब व्रत का विसर्जन करता है (यह मन्त्र पढ़कर)—‘‘इदमहं यऽएवाऽस्मि सोऽस्मि’’
(यजु०२।२८)—‘‘यह मैं वहीं हूँ जो हूँ।’’ जब व्रत को किया था तो मनुष्य से ऊपर (देव) हो
गया था। अब यह कहना तो उचित नहीं है कि मैं सच से झूठ को प्राप्त होऊँ; और वह मनुष्य
हो ही जाता है, इसलिए उसको इस मन्त्र को पढ़कर ही व्रत का विसर्जन करना चाहिए-‘मैं वही
हूँ जो हूँ।’ (यजु० २।२८) ॥२३॥
माध्यन्दिनीय शतपथब्राह्मण की श्रीमत् पण्डित गंगाप्रसाद उपाध्याय कृत ‘रत्नकुमारी-दीपिका’
भाषा व्याख्या का हविर्यज्ञनाम प्रथम काण्ड समाप्त हुआ।
प्रथम काण्ड
प्रपाठक कण्डिका-संख्या
प्रथम [ १.२.२ ] १२१
द्वितीय [ १.३.३ ] १२२
तृतीय [ १.४.४ ] १२८
चतुर्थ [ १.६.१ ] १२१
पंचम [ १.७.२ ] १२१
षष्ठ [ १.८.२ ] १११
सप्तम [ १.६.३ ] ११४
योग ८३८