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सर्वकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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का० १, अ० ६, ब्रा० २, कं० ७-१८ शतपथब्राह्मण / १८१
वे हवियाँ घी की होती हैं। घी ही वीर्य है। इस प्रकार वीर्य सींचता है, इसलिए घी
की आहुति देता है ॥७॥
इसको ये धीमी आवाज से करते हैं। समागम छिपकर किया जाता है। और जो धीमी
आवाज से किया जाय वह भी छिपकर करने के बराबर है, इसलिए इसको धीरे-धीरे करते
हैं ॥८॥
पहले सोम को आहुति देता है। सोम वीर्य है। वीर्य को सींचता है। इस कारण ही सोम
को आहुति देता है ॥९॥
अब त्वष्टा को आहुति देता है। त्वष्टा ही सींचे हुए वीर्य को विकृत करता है। इसलिए
त्वष्टा के लिए आहुति देता है ॥१०॥
अब देवों की पत्नियों को आहुति देता है। पत्नियों की योनियों में वीर्य स्थापित होता
है। उसी से सन्तान होती है। इस कृत्य द्वारा वह पत्नियों की योनि में वीर्य स्थापित करता है
और वहाँ से उत्पत्ति होती है। इसलिए वह देव-पत्नियों के लिए आहुति देता है ॥११॥
जब वह देव-पत्नियों के लिए आहुति देता है तो (अग्नि को) पूर्व की ओर छिपा लेता
है, क्योंकि देव उस समय तक ठहरे रहते हैं जब तक समिष्टयजु की आहुतियां पूरी न हो जायें,
क्योंकि वे समझते हैं कि हमारे लिए आहुतियां दी जाएँगी। उन्हीं से इसको छिपा लेता है।
इसीलिए याज्ञवल्क्य की सम्मति है कि स्त्रियाँ जब खाती हैं तो पुरुषों से अलग खाती हैं ॥१२॥
अब अग्नि के लिए जो गृहपति है, आहुति देता है। अग्नि ही यह लोक है। इसी लोक के
लिए सन्तान उत्पन्न होती है। इसलिए गृहपति-रूपी अग्नि के लिए आहुति देता है ॥१३॥
अन्त में इडा होती है। न तो यहाँ परिधियां रहती हैं न प्रस्तर। जैसे पहले प्रस्तर की
आहुति से यजमान को विदा किया था, इसी के साथ उसकी पत्नी भी विदा हुई क्योंकि पत्नी
पति के पीछे चलती है। यदि प्रस्तर का रूप (स्थानापन्न) कुछ और करे तो पत्नी के लिए
आलस्य का दोष लगे। इसलिए अन्त में इडा होती है। परन्तु प्रस्तर का स्थानापन्न भी होता
है ॥१४॥
यदि वह प्रस्तर का रूप या स्थानापन्न करे तो जैसे पहले प्रस्तर द्वारा यजमान को विदाई
दी, इसी प्रकार उसकी पत्नी को विदाई देता है ॥१५॥
यदि वह प्रस्तर का स्थानापन्न चुने तो वेद (कुशों का गुच्छा) का एक तृण लेकर अगला
भाग जुहू में डुबोता है, बीच का स्रुवा में, अन्त का थाली में ॥१६॥
अब आग्नीध्र कहता है 'अनुप्रहर'—'इसे पीछे फेंक दो।' (अध्वर्यु) उसे चुपके से फेंक-
कर नीचे का मन्त्र पढ़कर अपने को छूता है—"चक्षुष्पा अग्नेऽसि चक्षुर्मे पाहि" (यजु० २।१६)।
"हे अग्ने, तू आँखों की रक्षा करनेवाला है। मेरी आँखों की रक्षा कर।" इस प्रकार वह अपने को
आग में फेंकने से बचाता है ॥१७॥
अब (आग्नीध्र अध्वर्यु से) कहता है—'संवदस्व'—'संवाद कर।' अध्वर्यु—'हे अग्नीध,
वह गया ?' अग्नीध —'हाँ गया।' अध्वर्यु— 'श्रावय' (देवों को सुना)। अग्नीध—'श्रौषट्'
(वे सुनें)। अध्वर्यु—'देवताओं के होताओं के लिए विदाई हो।' मनुष्य—'होताओं के लिए
स्वस्ति।' अग्नीध —'शंयो कहो।' [टिप्पणी— यह संवाद है] ॥१८॥
अब जुहू और स्रुवा को साथ उठाता है। पहले (प्रस्तर को) सिंचन करके यजमान के
लिए आहुति दी थी कि वह आहुति बनकर देवलोक को जावे। इसलिए वह जुहू और स्रुवा को