पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
About this granth
Panchadashi (पञ्चदशी) is the much-loved Advaita Vedanta treatise of Vidyaranya, the fourteenth-century head of the Sringeri matha whom tradition also links with the founding of the Vijayanagara empire. Named for its fifteen chapters, it explains Vedanta through vivid everyday analogies and has long been a favourite of students and seekers.
The chapters fall into three sets of five. The five "discriminations" (vivekas) cover reality, the five elements, the five sheaths, duality and the great sayings of the Upanishads. The five "lamps" (dipas) are the Chitradipa, Triptidipa, Kutasthadipa, Dhyanadipa and Natakadipa. The five "blisses" (anandas) treat the bliss of yoga, of the self, of non-duality, of knowledge and of sense objects. Together they expound Brahman as being, consciousness and bliss.
This edition carries a Hindi translation and commentary by Pandit Ramavatar Vidyabhaskar. It was published by Pandit Krishnakumar Sharma of Ratangarh, Bijnor district, and printed at the Hindi Bhavan Press, Lahore, so it predates Partition. At about 726 pages, it is for serious readers of Vedanta.
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५५
उस शक्ति का सब से पहला विकार ['कार्य] तो आकाश
ही होता है। वह अवकाश स्वरूप है। [यह आकाश उस सत्
ब्रह्म का कार्य है। इस बात को तो हम इस हेतु से जानते हैं
कि] यह सत् तत्व आकाश में भी अनुगत हो रहा है। तभी
तो कहा जाता है कि 'आकाशोऽस्ति' अर्थात् आकाश है [यदि
आकाश सत् से बना न होता तो 'आकाशोऽस्ति' में आकाश के
साथ सत्ता का योग कैसे हो जाता ]
एकस्वभावं सत्तत्वमाकाशो द्विस्वभावकः ।
नावकाशः सति व्योम्नि स चैषोऽपि द्वयं स्थितम् ॥६१॥
सत् तत्व तो एक स्वभाव वाला है। आकाश दो स्वभाव
वाला हो गया है। [इसी को विस्तार से यों समझो कि] सद्वस्तु
में अवकाश [छेद] कहीं भी नहीं है [वह सर्वत्र ठसाठस भरी
हुई है]। उसका तो सत् ही एक स्वभाव है। परन्तु आकाश
में तो यह सत्स्वभाव तथा यह अवकाश स्वभाव दोनों ही
रहते हैं।
यद्वा प्रतिध्वनिर्व्योम्नो गुणो नासौ सतीक्ष्यते ।
व्योम्नि द्वौ सद्ध्वनी तेन सदेकं, द्विगुणं वियत् ॥६२॥
अथवा इसी विषय को यों समझना चाहिये कि—प्रतिध्वनि
आकाश का गुण है। यह प्रतिध्वनि [शब्द] सद्वस्तु में नहीं
पायी जाती। परन्तु आकाश में तो सत् तथा शब्द दोनों ही
पाये जाते हैं। इससे यही सिद्ध होता है कि सत् तो एक स्वभाव
वाला है तथा आकाश दो स्वभाव का है।
या शक्तिः कल्पयेद् व्योम सा सद्द्योम्नोरभिन्नताम्।
आपाद्य धर्मधर्मित्वं व्यत्ययेनावकल्पयेत् ॥६३॥
५६ पञ्चदशी
माया नाम की जो शक्ति, सद्वस्तु में आकाश की कल्पना
कर लेती है, वही शक्ति यह भी करती है कि पहले सत् तथा
आकाश के अभेद की कल्पना करके फिर उनके धर्मधर्मिभाव
को भी उलट-पुलट कर देती है। [यही कारण है कि 'सत् का
आकाश' ऐसी प्रतीति के स्थान पर 'आकाश की सत्ता' ऐसी
उलटी प्रतीति लोगों को होने लगी है]।
सतो व्योमत्वमापन्नं व्योम्नः सत्तां तु लौकिकाः ।
तार्किकाश्चावगच्छन्ति मायाया उचितं हि तत् ॥६४॥
सत् का ही आकाशभाव होगया है। परन्तु लौकिक और
तार्किक लोग उसको 'आकाश की सत्ता' ऐसा उलटा समझ बैठे
हैं। यह विपरीत भाव कर देना माया के लिये कोई बड़ी बात
नहीं है।
वस्तु तत्व का विचार करने पर ज्ञात होता है, कि जैसे
मिट्टी घटरूपी होगई है इसी प्रकार सत् ही आकाशभाव को
प्राप्त हो गया है। परन्तु लौकिक प्राणी तथा तर्कशास्त्री लोग
उसके कितना विरुद्ध समझ बैठे हैं कि वे सत्ता को आकाश का
धर्म ही मानने लगे हैं। ऐसा विपरीत दर्शन करा देना माया
के लिये उचित ही है। माया से और आशा ही क्या की जा
सकती थी ?
यद् यथा वर्तते तस्य तथात्वं भाति मानतः ।
अन्यथात्वं भ्रमेणेति न्यायोऽयं सार्वलौकिकः ॥६५॥
जो [रस्सी आदि] जैसा [रस्सी आदि रूप में] है उसका
वैसापन तो प्रमाण से प्रकट हुआ करता है। परन्तु उस [रस्सी]
का अन्यथाभाव [सर्परूपता] भ्रान्ति से प्रतीत हुआ करता है।
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५७
यह एक सर्वलोकप्रसिद्ध न्याय है। [इसी से समझ लनो कि
माया से विपरीत प्रतीति हो जाती है।]
एवं श्रुतिविचारात् प्राग्यथा यद्वस्तु भासते।
विचारेण विपर्येति ततस्तच्चिन्त्यतां वियत् ॥६६॥
इस प्रकार यह निश्चय होगया कि श्रुति का विचार करने
से पहले पहले जो वस्तु जैसी प्रतीत होती है, वह विचार करने
पर वैसी नहीं रह जाती। इसी से उस आकाश का चिन्तन
करो कि वह असल में क्या है।
उस विपरीतभान की निवृत्ति का उपाय अब बताया जाता
है—इस प्रकार श्रुति के अर्थों का विचार न करने तक जो
वस्तु [जो सद्रूप ब्रह्म] भ्रान्ति के प्रताप से जैसी [आकाशादि
के रूप में] हो गई है, वही वस्तु श्रुति के अर्थ का पर्यालोचन
करने पर विपरीत हो जाती है—किंवा आकाशादि भाव को
छोड़ कर फिर वही सद्रूप ब्रह्म ही हो जाती है। श्रुति का
विचार करने पर ही वस्तु के यथार्थ रूप का परिज्ञान हो सकता
है। इसी से कहते हैं कि आकाश का चिन्तन करो। विचार के
द्वारा उसके पारमार्थिक रूप को टटोल लो। देखो कि विचार
करने पर आकाश का पारमार्थिक रूप क्या सिद्ध होता है।
भिन्ने वियत्सती शब्दभेदाद् बुद्धेश्च भेदतः ।
वाय्वादिष्वनुवृत्तं सन्नतु व्योमेति भेदधीः ॥६७॥
आकाश और सत् भिन्न-भिन्न हैं। क्योंकि इन दोनों के
वाचक शब्द भी भिन्न-भिन्न हैं, तथा इन शब्दों से उत्पन्न होने
वाली बुद्धियें भी भिन्न-भिन्न होती हैं। देख लो कि सत् वस्तु
तो वायु आदि में भी अनुवृत्त हो रही है
५८ पञ्चदशी
‘सत् वायुः’ ‘सत्तेजः’ ‘वायु है’ ‘तेज है’ इत्यादि] परन्तु व्योम
[आकाश] की अनुवृत्ति इस तरह कहीं भी नहीं होती। बस
यही बुद्धि का भेद कहा जाता है [जिस का कथन इसी श्लोक
के दूसरे चरण में किया गया है]।
सद्वस्त्वधिकवृत्तित्वाद् धर्मी, व्योम्नस्तु धर्मता ।
धिया सतः पृथक्कारे ब्रूहि व्योम किमात्मकम् ॥६८॥
अधिक में वृत्ति वाली होने से सद्वस्तु तो धर्मी है तथा
अल्पदेशवृत्ति होने से आकाश उसका धर्म माना जाता है।
अब तुम बुद्धि की सहायता से सत् को पृथक् करके बताओ कि
आकाश का आत्मा [रूप] क्या है ?
देखो रूपरसादि सभी में रहने वाला, द्रव्य कहाने वाला
पदार्थ, जैसे धर्मी होता है, इसी प्रकार आकाशादि सभी में अनु-
वृत्त हुआ सत् ही धर्मी है, तथा रसादि से व्यावृत्त रहने वाला
‘रूप’ जैसे धर्म है इसी प्रकार वायु आदि से व्यावृत्त होने वाला
आकाश भी ‘धर्म’ ही है। अब तुम अपनी बुद्धि से आकाश में
से सत्ता को तो पृथक् करलो और फिर बताओ कि वह विचारा
आकाश किस स्वरूप का रह गया है ? [सत् को बुद्धि से पृथक्
करने की बात इसलिये कही है कि वैसे तो सत् किसी वस्तु
से पृथक् हो ही नहीं सकता]।
अवकाशात्मकं तच्चेदसत्तदिति चिन्त्यताम् ।
भिन्नं सतो ऽसच्च नेति वक्षि चेद्व्याहतिस्तव ॥६९॥
यदि तुम उस आकाश को [सत्स्वरूप न बता कर] अवकाश
रूप बताओ तो [सत् से विलक्षण होने से] उसे असत् ही तो
समझना पड़ेगा [क्योंकि सत् से भिन्न असत् ही होता है।]
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५९
यदि यह कहो कि वह सत् से विलक्षण भी है और असत्
भी नहीं है तो यह तो तुम्हारी उल्टी बात है [भला इसे कौन
मान सकता है ? ]
भातीति चेद् भातु नाम भूषणं मायिकस्य तत् ।
यदसद् भासमानं तन्मिथ्या स्वप्नगजादिवत् ॥७०॥
यदि यह आकाश असत् होता तो प्रतीत भी न होता !
परन्तु यह तो प्रतीत हो रहा है । इसका उत्तर यह है कि यह
प्रतीत होता है तो हुआ करो । यह [असत् होने पर भी प्रतीत
होना] तो मायवादी का भूषण ही है । देखो जो वस्तु असत्
हो [स्वरूप से तो न हो] परन्तु प्रतीत होती हो, वह सुपने के
हाथी आदि पदार्थों की तरह मिथ्या होती है ।
जातिव्यक्ती, देहिदेहौ, गुणद्रव्ये यथा पृथक् ।
वियत्सतो स्तथैवास्तु पार्थक्यं कोऽत्र विस्मयः ॥७१॥
तुम्हारे [नैयायिक वैशेषिक के] मत में [नियम से सदा
साथ दीखने वाले भी] जाति और व्यक्ति, देहधारी और देह
तथा गुण और द्रव्य, जैसे पृथक् पृथक् हैं [जैसे ये भिन्न भिन्न
हैं] इसी प्रकार [नियम से सदा साथ ही दीखने वाले भी]
आकाश और सत् पृथक् पृथक् हैं। इस में विस्मय की कौन सी
बात है ।
बुद्धोपि भेदो नो चित्ते निरूढिं याति चेत्तदा ।
अनैकाग्रचात् संशयाद्वा रूढ्यभावोऽस्य ते वद ॥७२॥
यदि समझा हुआ भी यह भेद [किसी दुर्बलता के कारण]
चित्त में जमता नहीं है, तो बताओ कि उस बात के जी में न
बैठने का कारण तुम्हारी अनेकाग्रता है अथवा कोई संशय है।
६० पञ्चदशी
अप्रमत्तो भव ध्यानादाद्ये ऽन्यस्मिन् विवेचनम् ।
कुरु प्रमाणयुक्तिभ्यां, ततो रूढतमो भव ॥७३॥
यदि इस अरूढि का कारण अनेकाग्रता हो, तब तो [प्रत्यय
की एकाकारता रूपी] 'ध्यान' की सहायता से अपने मन को
सावधान कर लो। यदि कोई संशय रह गया हो तो प्रमाण
और युक्ति के द्वारा उस का विवेचन कर डालो। यों दोनों
रुकावटों को हटा कर रूढतम हो जाओ।
ध्यानान्मानाद्युक्तितोऽपि रूढे भेदे वियत्सतोः ।
न कदाचिद् वियत्सत्यं सद्वस्तु छिद्रवन्न च ॥७४॥
ध्यान [प्रत्यय की एकतानता] से मान [६७ श्लोक में कहे
गये] से तथा ६८ वें श्लोक में कही हुई युक्ति से, जब आकाश
और सत् का भेद चित्त में भले प्रकार जम जाय, तब फिर यह
आकाश कभी भी सत्य नहीं रहता [फिर तो यह सदा ही
मिथ्या भासा करता है] तब यह भी ज्ञात हो जाता है कि सद्वस्तु
में छिद्र [अर्थात् आकाश नाम की भी कोई वस्तु] है ही नहीं।
ज्ञस्य भाति सदा व्योम निस्तत्त्वोल्लेखपूर्वकम् ।
सद्वस्त्वपि विभात्यस्य निश्चिद्रत्वपुरःसरम् ॥७५॥
[जिस प्रकार किसी दुष्ट के याद आ जाने पर उसके दुर्गुण
याद आ जाते हैं इसी प्रकार] ज्ञानी पुरुष को व्यवहार में जब
आकाश की प्रतीति होती है तब उसे आकाश की निस्तत्वता
का परिज्ञान भी उस के साथ ही साथ हुआ करता है तथा
जब उस ज्ञानी को सद्वस्तु का विभान होता है तभी उसे यह
ज्ञान भी साथ ही हो जाता है कि सद्वस्तु में आकाशादि नाम
की कोई भी वस्तु नहीं होती।
वासनायां प्रवृद्धायां, वियतसत्यत्ववादिनम् ।
सन्मात्रबोधमुक्तं च दृष्ट्वा विस्मयते बुधः ॥७६॥
[जो सदा आकाश को मिथ्या भाव से तथा सत् को वस्तु
भाव से चिन्तन किया करता है तो इस चिन्तन से यह होता
है कि] इस वासना के अत्यन्त बढ़ जाने पर आकाश और सत्
के तत्व को समझ लेने वाला वह बुध, फिर जब कभी किसी
ऐसे पुरुष को देखता है, जो आकाश को तो सत्य मानता हो
और उसे आकाशरहित सद्वस्तु का बोध बिलकुल भी न हो,
तब उसे बड़ा ही आश्चर्य होने लग पड़ता है [कि ओहो इसे
सर्वभासक, सर्वाधिष्ठान, सर्वाधार, सत् का तो ज्ञान नहीं है,
किन्तु यह अपने अज्ञान के कारण, भास्य, अधिष्ठेय किंवा आधेय
पदार्थों को ही जान रहा है ।
एवमाकाशमिथ्यात्वे तत्सत्यत्वे च वासिते ।
न्यायेनानेन वाय्वादेः सद्वस्तु प्रविविच्यताम् ॥७७॥
इस प्रकार जब आकाश का मिथ्यापन तथा सत् का सत्यपन
भले प्रकार जी में बैठ जाय, तब फिर इसी न्याय से वायु
आदि शेष भूतों में से भी सद्वस्तु को पृथक् कर लेना चाहिये ।
सद्वस्तुन्येकदेशस्था माया, तत्रैकदेशगम् ।
वियत् तत्राप्येकदेशगतो वायुः प्रकल्पितः ॥७८॥
माया सद्वस्तु में उसके किसी एक देश में ही पड़ी हुई है।
उस माया के किसी एक देश में यह आकाश रह रहा है । उस
आकाश के किसी एक देश में इस वायु की कल्पना हो गयी है
[यों इस वायु का भी सत् के साथ परम्परा से सम्बन्ध है।
इससे इसका विवेचन भी कर ही डालना चाहिये ।]
६२ पंचदशी
शोषस्पर्शौ गतिर्वेगो वायुधर्मा इमे मताः ।
त्रयः स्वभावाः सन्मायाव्योम्नां ये तेऽपि वायुगाः॥७९॥
शोष तथा स्पर्श, गति तथा वेग ये चार धर्म वायु के अपने
धर्म कहाते हैं। [सत्ता, निस्तत्वरूपता तथा शब्द नाम के] जो
तीन अन्य स्वभाव वायु में पाये जाते हैं, वे सत्-माया-तथा
आकाश के हैं; वे भी वायु में आ गये हैं।
वायुरस्तीति सद्भावः सतो वायौ पृथक्कृते ।
निस्तत्वरूपता मायास्वभावो, व्योमगो ध्वनिः ॥८०॥
'वायुरस्ति' वायु है इस व्यवहार की कारण जो सद्रूपता
है वह सद्वस्तु का धर्म वायु में आ गया है। सद्वस्तु से वायु के
पृथक् कर लेने पर जो निस्तत्वरूपता [मिथ्यात्व] शेष रह
जाती है वह वायु में दूसरा माया का धर्म है तथा आकाश
से आया हुआ शब्द यह तीसरा वायु का धर्म है ।
सतोऽनुवृत्तिः सर्वत्र व्योम्नो नेति पुरेरितम् ।
व्योमानुवृत्तिरधुना कथं न व्याहतं वचः ॥८१॥
इसी प्रकरण के ६७ वें श्लोक में कहा है कि सत् की ही
सर्वत्र अनुवृत्ति है आकाश की नहीं। अव् उसके विपरीत वायु
आदि में आकाश की अनुवृत्ति कर रहे हो, फिर तुम्हारे कथन
में व्याघात [किंवा पूर्वोत्तरविरोध] क्योंकर नहीं है ?
छिद्रानुवृत्तिर्नेतीति पूर्वोक्तिरधुनात्वियम् ।
शब्दानुवृत्तिरेवोक्ता वचसो व्याहतिः कुतः ॥८२॥
इसका उत्तर यह है कि पहले [६७ श्लोक में] यह कहा
गया था कि छिद्र अर्थात् आकाश की अनुवृत्ति नहीं होती। अब
तो केवल शब्द की अनुवृत्ति की बात कही जा रही है । अर्थात्
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६३
अब केवल धर्म की अनुवृत्ति की जा रही है । फिर हमारे
वचन में पूर्वोत्तरविरोध कैसे हो ?
ननु सद्वस्तुपार्थक्यादसत्वं चेत्तदा कथम् ।
अव्यक्तमायावैषम्यादमायामयतापि नो ॥८३॥
हे सिद्धान्ती, यह बताओ कि वायु को सद्ब्रह्म से विल-
क्षण होने के कारण यदि तुम असत् [किंवा मायामय] मानते
हो तो यह वायु तो अव्यक्तरूप माया से भी विलक्षण ही है
[क्योंकि यह तो व्यक्त है] फिर इसे अमायाममय [सत्य] भी
क्यों नहीं मान लेते हो ?
निस्तत्वरूपतैवात्र मायातत्वस्य प्रयोजिका ।
सा शक्तिकार्ययोस्तुल्या व्यक्ताव्यक्तत्वभेदिनोः ॥८४॥
सिद्धान्ती का उत्तर यह है कि—अव्यक्तता तो मायामय
होने का कारण ही नहीं है । किन्तु निस्तत्वता के कारण इस
वायु को मायामय किंवा असत् कहा गया है । वह निस्तत्व-
रूपता अव्यक्त माया में भी है और माया के कार्य व्यक्त वायु
आदि में भी पाई जाती है [माया और माया के कार्यों में,
केवल अव्यक्तता और व्यक्तता का ही भेद है । इस कारण
इस की मायामयता किसी युक्त्याभास से टलने वाली वस्तु
नहीं है ।]
सदसत्वविवेकस्य प्रस्तुतत्वात् स चिन्त्यताम् ।
असतोऽवान्तरो भेद आस्तां तच्चिन्तयात्र किम् ॥८५॥
इस समय सत् और असत् का विवेक ही प्रस्तुत हो रहा
है । उसी का विचार हमें करना चाहिये । माया और माया
के कार्यरूपी असत् पदार्थों के, जो कि व्यक्तता और अव्य-
६४ पञ्चदशी
क्ततारूपी अवान्तर भेद है, उसका प्रकृत में कुछ भी उपयोग
नहीं है इसलिये उसका विचार भी कर के क्या करें ? [हम
यह इस जगह क्यों बतायें कि यह माया अव्यक्त क्यों है ?
तथा उसके कार्य व्यक्त क्यों कर हो गये हैं ?]
सद्वस्तु ब्रह्म, शिष्टोंऽशो वायुर्मिथ्या यथा वियत् ।
वासयित्वा चिरं वायोर्मिथ्यात्वं मरुतं त्यजेत् ॥८६॥
• वायु में जो सदंश [सद्भाग] है वह तो ब्रह्मरूप है । शेष
रहा हुआ जो [निस्तत्व आदि] अंश है वही वायु का अपना
स्वरूप है । निस्तत्वरूप होने के कारण, यह वायु भी आकाश
के समान ही मिथ्या है । इस प्रकार वायु के मिथ्याभाव की
वासना चिरकाल तक कर करके, वायु को छोड़ दे [अर्थात्
वायु के सत्य होने की बुद्धि का परित्याग कर डाले] उस में से
अपनी आस्था को हटा ले ।
चिन्तयेद् वह्निमप्येवं मरुतो न्यूनवर्तिनम् ।
ब्रह्माण्डावरणेष्वेषा न्यूनाधिकविचारणा ॥८७॥
वायु से न्यून देश में रहने वाली वह्नि को भी इसी प्रकार
से चिन्तन करे और अन्त में उस की भी सत्य बुद्धि का इसी
प्रकार परित्याग कर दे । यह न्यूनाधिक का विचार ब्रह्माण्ड
के सभी आवरणों में किया जाता है । [लोक में ऐसा विचार
नहीं होता । पृथिवी,जल,अग्नि,वायु आदि ब्रह्माण्ड के आवरण
कहाते हैं ।]
वायोर्दशांशतो न्यूनो वह्निर्वायौ प्रकल्पितः ।
पुराणोक्तं तारतम्यं दशांशैर्भूतपञ्चके ॥८८॥
अग्नि वायु के दसवें भाग के बराबर है
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६५
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६५
वायु है तो एक भाग अग्नि है] वह वह्नि भी वास्तव पदार्थ
नहीं है, वह भी वायु में कल्पित है। पुराणों के कथनानुसार
इन पांचों भूतों में १/१० भाग के अनुसार क्रम से न्यूनाधिक
भाव है।
वह्निरुष्णः प्रकाशात्मा पूर्वानुगतिरत्र च ।
अस्ति वह्निः स निस्तत्वः शब्दवान् स्पर्शवानपि॥८९॥
वह्नि उष्ण है और प्रकाशस्वरूप है। इस में भी वायु
की तरह पूर्वानुगति अर्थात् कारण के धर्मों की अनुगति हो ही
रही है। जभी तो कहा जाता है कि वह्नि है। वह निस्तत्व
[मिथ्या] है शब्द और स्पर्श भी उस में रहते हैं।
सन्मायाव्योमवाय्वंशैर्युक्तस्याग्नेर्निजो गुणः ।
रूपं, तत्र सतः सर्वमन्यद् बुद्ध्या विविच्यताम्॥९०॥
सत् माया आकाश तथा वायु के अंशों से युक्त जो अग्नि
है, उस का अपना गुण तो 'रूप' ही है। उन में से सद्वस्तु को
छोड़ कर और जितने भी धर्म हैं वे सब मिथ्या हैं। इस बात
का विवेचन [पृथक्करण] बुद्धि के अवष्टम्भ से कर लेना चाहिये।
सतो विविक्ते वह्नौ मिथ्यात्वे सति वासिते ।
आपो दशांशतो न्यूनाः कल्पिता इति चिन्तयेत् ॥९१॥
सत् से वह्नि के विविक्त कर लेने पर और वह्नि के
मिथ्यात्व के वासित हो जाने पर फिर यह चिन्तन करना
चाहिये कि जल भी वह्नि से दशांश कम है और वह भी
कल्पित किंवा मिथ्या ही है ।
सन्त्यपोऽमूः शून्यतत्त्वाः सशब्दस्पर्शसंयुताः ।
रूपवत्योऽन्यधर्मानुवृत्त्या स्वीयो रसो गुणः ॥९२॥
६६ पञ्चदशी
दूसरों के धर्मों की अनुवृत्ति के कारण कहा जाता है कि 'यह
जल है' 'यह शून्यतत्व है' यह शब्द, स्पर्श तथा रूप वाला है।
इसका अपना गुण तो केवल 'रस' ही है ।
सतो विवेचितास्वप्सु तन्मिथ्यात्वे च वासिते ।
भूमिं दशांशतो न्यूना कल्पिताप्स्विति चिन्तयेत् ॥९३
विवेक और ध्यान से जल के मिथ्यात्व का निश्चय करके
फिर यह निश्चय करे कि भूमि भी जल से दस भाग कम है
और वह भी जल में कल्पित किंवा मिथ्या ही है ।
अस्ति भूस्तत्त्वशून्यास्यां शब्दस्पर्शी सरूपकौ ।
रसश्च परतो गन्धो नैजः, सत्ता विविच्यताम् ॥९४॥
भूमि है, वह निस्तत्व है, इस में शब्द, स्पर्श, रूप तथा
रस ये गुण दूसरों से आये हैं [क्योंकि कारणों के धर्म कार्य में
आया करते हैं] । गन्ध इसका निज गुण है । उन सब में से
सत्ता का विवेक अथवा पृथक्करण कर डालना चाहिये ।
पृथक्कृतायां सत्तायां भूमिर्मिथ्याऽवशिष्यते ।
भूमे दशांशतो न्यूनं ब्रह्माण्डं भूमिमध्यगम् ॥९५॥
सत्ता के पृथक् कर लेने पर भूमि नाम का पदार्थ मिथ्या
हो जाता है [अब आगे भौतिक ब्रह्माण्डादियों से सत् का
विवेक कैसे करें ? वह दिखाया जाता है कि] भूमिमध्यग
अर्थात् आकाश में घूमते रहने वाले भूमि के खण्डों [परमा-
णुओं] से बना हुआ यह ब्रह्माण्ड भूमि से दस भाग
कम है ।
ब्रह्माण्डमध्ये तिष्ठन्ति भुवनानि चतुर्दश ।
भुवनेषु वसन्त्येषु प्राणिदेहा यथायथम् ॥९६॥
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६७
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६७
उस ब्रह्माण्ड में चौदह भुवन निवास करते हैं। इन भुवनों
में ही प्राणियों के देह अपनी अपनी व्यवस्था के अनुकूल
निवास कर रहे हैं।
ब्रह्माण्डलोकदेहेषु सद्वस्तुनि पृथक्कृते ।
असन्तोऽण्डादयो भान्तु तद्भानेऽपीह का क्षतिः ॥९७॥
ब्रह्माण्ड लोक तथा देहों में से सद्वस्तु के पृथक् कर लेने
पर भी यदि असत् अण्डादियों का भान होता रहे, तो होता
रहो। उन का वैसा [ असद्रूप से ] भान होते रहने पर भी
फिर कुछ हानि नहीं होती।
भूतभौतिकमायानामसत्त्वेऽत्यन्तवासिते ।
सद्वस्त्वद्वैतमित्येषा धीर्विपर्येति न क्वचित् ॥९८॥
भूत [आकाशादि] भौतिक [ब्रह्मांड आदि] तथा माया
[जिस ने इन भूत भौतिकों को बनाया है] के मिथ्यात्व की
वासना [विवेक और ध्यान के द्वारा] जब चित्त में दृढ रीति
से वासित हो जाय तब फिर 'सद्वस्तु अद्वैत ही है' [वह कभी
द्विधाभाव को प्राप्त नहीं होती है, वह वैसी की वैसी ही रहती है]
यह बुद्धि कभी भी विपरीत नहीं हो सकती [फिर इस बुद्धि
का विघात कभी भी नहीं होता है ।]
सदद्वैतात् पृथग्भूते द्वैते भूम्यादिरूपिणि ।
तत्तदर्थक्रिया लोके यथा दृष्टा तथैव सा ॥९९॥
भूमि आदि रूपधारी यह द्वैत, जब सत् अद्वैत से पृथक्
कर लिया जाता है, तब फिर लोक में विशेष विशेष प्रयोजन
के लिये जो जो काम जैसे जैसे देखे जाते हैं [जैसे जल से
प्यास की शान्ति, भोजन से भूख की निवृत्ति] वे वैसे के वैसे .
ही [स्वप्न की तरह] बने रह सकते हैं [तात्पर्य यह है कि विवेक
६८ पञ्चदशी
ही [स्वप्न की तरह] बने रह सकते हैं [तात्पर्य यह है कि विवेक
के द्वारा मिथ्यात्व का निश्चय हो जाने पर भी वह विवेक
भूमि आदि के स्वरूप का उपमर्दन नहीं कर देता है । इस से
व्यवहार के सहसा लुप्त हो जाने का प्रसंग नहीं आता है ।
विवेक व्यवहार को रोकता नहीं है, विवेक तो केवल सर्वात्म्य
को जगाता है । जो काम क्षुद्र देहाभिमान की प्रेरणा से होते
थे वे अब सर्वात्म्य की दृष्टि से होने लग पड़ेंगे । यही विवेक
हो जाने की पहचान है ।]
सांख्यकाणादबौद्धाद्यैर्जगद्भेदो यथा यथा ।
उत्प्रेक्ष्यते ऽनेकयुक्त्या भवत्वेष तथा तथा ॥१००॥
सांख्य, काणाद तथा बौद्धादि दार्शनिक लोग जिस जिस
रीति से जगद्भेद की उत्प्रेक्षा अनेकानेक युक्तियों से करते हैं,
यह जगत् वैसा ही रहो [ वैसा वैसा व्यावहारिक भेद तो हम
भी मानते ही हैं। इस कारण उन के खण्डन करने का प्रयत्न
हम नहीं करते । ]
अवज्ञातं सदद्वैतं निःशङ्कैरन्यवादिभिः ।
एवं का क्षतिरस्माकं तद्द्वैत मवजानताम् ॥१०१॥
प्रमाणसिद्ध सत् अद्वैत की अवज्ञा, अन्य सांख्यादि
वादियों ने निःशङ्क होकर की ही है । फिर [ श्रुति युक्ति और
अनुभव के बल से चलने वाले ] हम लोग यदि उन के द्वैत
की अवज्ञा करते हैं तो इस से हमारी क्या हानि है ?
द्वैतावज्ञा सुस्थिता चेदद्वैते धीः स्थिरा भवेत् ।
स्थैर्ये तस्याः पुमानेष जीवन्मुक्त इतीर्यते ॥१०२॥
[ प्रत्युत उस अवज्ञा से एक महालाभ यह होता है कि ]
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६९
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६९
द्वैत की अवज्ञा जब पूर्ण रूप से स्थित हो जाती है, तब साधक
की बुद्धि अद्वैत में स्थिर हो जाती है । इस बुद्धि के स्थिर हो
जाने पर फिर यह [ स्थिर बुद्धि वाला ] पुरुष 'जीवन्मुक्त'
कहाने लगता है । [अर्थात् जीवन्मुक्ति रूपी प्रयोजन के विद्य-
मान होने के कारण यह द्वैतापमान कोई निष्प्रयोजन बात
नहीं है । हां, उन लोगों का अद्वैतापमान उन के कल्याण मार्ग
का घातक अवश्य ही है ] ।
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्म निर्वाणमृच्छति ॥१०३॥
['जीवन्मुक्ति ही नहीं विदेहमुक्ति भी इसी द्वैतावज्ञा का फल
है' यह बात भगवद्गीता (२-७२) में कही गई है ] हे पार्थ, यहां
तक ब्रह्मनिष्ठा का वर्णन किया गया। [परमेश्वर की आराधना
से शुद्ध अन्तःकरण का] मनुष्य जब इस स्थिति को पा लेता है,
तब फिर वह कभी संसारमोह को प्राप्त नहीं होता है । यदि
अन्तकाल में भी इस स्थिति में ठहर सके तो वह ब्रह्म में
निर्वाण किंवा लय को पा लेता है । [अथवा मरते समय क्षण
भर के लिये भी इस स्थिति में ठहर सके तो वह ब्रह्म में निर्वाण
किंवा विदेहमुक्ति को पा लेता है, फिर जो पुरुष बचपन से ही इस
स्थिति में रहने लगा हो तो उस का कहना ही क्या है ? ]
सदद्वैतेऽनृतद्वैते यदन्योन्यैकवीक्षणम् ।
तस्यान्तकालस्तद्भेदबुद्धिरेव न चेतरः ॥१०४॥
[भगवद्गीता के उपर्युक्त श्लोक में अन्तकाल शब्द से क्या
अभिप्राय है सो अब बताया जाता है] 'सद्रूप अद्वैत' तथा
'अनृतरूप द्वैत' में जो अब तक अन्योन्यैकवीक्षण
अन्योन्याध्यासरूपी ऐक्यज्ञान ] हो रहा था उस भ्रमज्ञान का
अन्तकाल तो यही है कि उनकी भेदबुद्धि उत्पन्न हो जाय
[अर्थात् उन अद्वैत और द्वैत को क्रम से सत्य और अनृत
समझ लिया जाय]। इस श्लोक में अन्तकाल शब्द का अभि-
प्राय वर्तमान देहपात से नहीं है ।
यद्वान्तकालः प्राणस्य वियोगोऽस्तु प्रसिद्धितः।
तस्मिन् कालेऽपि न भ्रान्तेर्गतायाः पुनरागमः॥१०५॥
अथवा लोकप्रसिद्धि के अनुसार प्राणों के वियोग को ही
अन्तकाल मान लो । उस में भी कोई दोष नहीं है । क्योंकि
जो भ्रान्ति उस समय नष्ट हो जायगी वह भ्रान्ति फिर कभी
भी लौट कर आने वाली नहीं है ।
इस लोक तथा परलोक की सन्धि 'मृत्यु' होती है । मृत्यु
समय में जिसकी भ्रान्ति नष्ट हो जायगी दूसरे शब्दों में उस
की परलोकसामग्री जल कर भस्म बन जायगी। फिर उसे
विदेह मुक्ति मिल जानी अत्यन्त सुकर होगी ।
नीरोग उपविष्टो वा रुग्णो वा विलुठन् भुवि ।
मूर्च्छितो वा त्यजत्वेष प्राणान् भ्रान्तिर्न सर्वथा ॥१०६॥
[जिस पुरुष की द्वैतावज्ञा स्थित हो गयी हो अथवा जिसे
ब्राह्मी स्थिति की प्राप्ति हो चुकी हो फिर] वह चाहे तो नीरोग
होकर, चाहे बैठे बैठे, चाहे रोगी रहकर, या भूमि पर पड़े
पड़े, अथवा मूर्च्छा अवस्था में प्राणों का त्याग करदे, उसे फिर
कभी भी भ्रान्ति नहीं हो सकती [मूर्च्छा आदि में ब्रह्म-विषयक
बुद्धिवृत्ति न भी हो तो भी ब्रह्मज्ञान के संस्कार तो रहते ही हैं,
उन्हीं से मुक्ति मिलकर रहेगी।]
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ७१
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ७१
दिने दिने स्वप्नसुप्त्योरधीते विस्मृतेऽप्ययम् ।
परेद्युर्नानधीतः स्यात्तद्वद्विद्या न नश्यति ॥१०७॥
स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था के आने पर प्रतिदिन पढ़े हुए
पाठ के भूल जाने पर भी, अगले दिन जब वह पाठक उठता
है तब अनधीत [अनपढ़] नहीं हो जाता है । इसी प्रकार मरते
समय मूर्च्छादि के कारण तत्व का विचार न कर सकने पर भी,
ज्ञानी का ज्ञान नष्ट नहीं होता है । [वह संस्कार रूप से तो
रहता ही है ।]
प्रमाणोत्पादिता विद्या प्रमाणं प्रवलं विना ।
न नश्यति न वेदान्तात् प्रवलं मानमीक्ष्यते ॥१०८॥
जिस विद्या को प्रमाणों ने उत्पन्न किया है, वह किसी
प्रबल प्रमाण के बिना नष्ट नहीं हो सकेगी । वेदान्तों से प्रबल
प्रमाण तो कोई देखा ही नहीं जाता । [फिर यह ज्ञान मूर्च्छा
आदि में कैसे नष्ट हो सकेगा ?]
तस्माद् वेदान्तसंसिद्धं सदद्वैतं न वाध्यते ।
अन्तकालेऽप्यतो भूतविवेकान्निर्वृतिः स्थिता ॥१०९॥
इससे यही सिद्ध हुआ कि वेदान्तसिद्ध सत् अद्वैत की
बाधा अन्तकाल में भी नहीं होगी । इसी से यह कहना सर्वथा
ठीक है कि भूतविवेक कर लेने पर ही निर्वृत्ति [किंवा मुक्ति]
की स्थिरता हो जाती है ।
इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितं पंचभूतविवेकप्रकरणं समाप्तम्
3. Pancha Kosha Viveka
ओम्
पञ्चकोशविवेकप्रकरणम्
गुहाहितं ब्रह्म यत्तत् पञ्चकोशविवेकतः ।
बोद्धुं शक्यं ततः कोशपंचकं प्रविविच्यते ॥१॥
गुहा में छिपा हुआ जो ब्रह्मतत्व है वह पंचकोशविवेक के
करने पर भी जाना जा सकता है । इसलिये पांचों कोशों का
विवेक किया जाता है ।
यह प्रकरण तैत्तरीय उपनिषत् के तात्पर्य का व्याख्यान रूप
है—'यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् सोश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा
विपश्चिता' जो गुहा में छिपे हुए ब्रह्म को पहचानता है, इस
श्रुति में जिस गुहाहित ब्रह्म का प्रतिपादन किया गया है उस
ब्रह्म का ज्ञान पांचकोश नामक गुहाओं के विवेक से ही हो
सकता है । इसी कारण उन पांचों कोशों को आत्मा से पृथक्
करके अब दिखाया जाता है ।
देहादभ्यन्तरः प्राणः प्राणादभ्यन्तरं मनः ।
ततः कर्ता ततो भोक्ता गुहा सेयं परम्परा ॥२॥
देह से अन्दर प्राण, प्राण से अन्दर मन, मन से अन्दर
बुद्धि, तथा बुद्धि से अन्दर आनन्द, बस यह परम्परा ही तो
'गुहा' कहाती है ।
देह [अन्नमय कोष] से प्राण [प्राणमय कोश] अन्दर है ।
प्राण से मन अर्थात् मनोमय अन्दर है । मनोमय से 'कर्ता'
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७३
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७३
जिसको 'विज्ञानमय' भी कहते हैं अन्दर है । उस विज्ञानमय
से 'भोक्ता' अर्थात् 'आनन्दमय' अन्दर का है । सो यह 'अन्न-
मय' से लेकर 'आनन्दमय' तक की परम्परा ही 'गुहा'
कहाती है । इसी में ब्रह्म लुक छिप गया है । इन पांचों
कोशों का विवेक कर लेने पर फिर भी उस के शुद्ध रूप के
दर्शन मिल ही सकते हैं ।
पितृभुक्तान्नजाद् वीर्याज्जातोऽन्नेनैव वर्धते ।
देहः सोऽन्नमयो नात्मा प्राक् चोर्ध्वं तदभावतः ॥३॥
माता और पिता जिस अन्न को खाते हैं, उस से जो वीर्य
बनता है, उस से यह देह उत्पन्न होता है । उत्पन्न होने के
पश्चात् यह फिर अन्न से ही वृद्धि को पाने लगता है । सो यह
तो स्पष्ट ही अन्न का विकार है । इस कारण यह अन्नमय
देह आत्मा नहीं है । देखते हैं कि जन्म होने से पहले भी यह
देह नहीं था, तथा मरने के पश्चात् भी यह देह नहीं रहेगा ।
[तात्पर्य यह है कि घटपदादि के समान उत्पत्ति वाला होने से
यह देह आत्मा नहीं है]
पूर्वजन्मन्यसन्नेतज्जन्म संपादयेत् कथम् ।
भाविजन्मन्यसत् कर्म न भुञ्जीतेह संचितम् ॥४॥
यदि वह पूर्व जन्म में नहीं था तो इसने इस जन्म को
पाया ही कैसे ? यदि इसका भावि जन्म नहीं होगा तो यहाँ
संचित किये पुण्य पापों को नहीं भोग सकेगा । [ इस कारण
आत्मा को देह से पृथक् और नित्य मानना चाहिये । ]
जब आत्मा को देहरूप ही माना जाता है तब यह स्पष्ट
ही है कि यह पूर्वजन्म में नहीं था और इस जन्म को उत्पन्न
७४ पंचदशी
करने वाला अदृष्ट भी नहीं था । फिर इस जन्म की उत्पत्ति
इस देहरूप आत्मा ने स्वयं कैसे करली ? इस पक्ष में
तो 'अकृताभ्यागम' दोष आता है अर्थात् जो इस शरीरात्मा ने
किया नहीं था उसे अब यह विचारा भोग रहा है । यह देह-
रूप आत्मा तो भाविजन्मों में भी नहीं रहेगा । यह तो यहाँ
ही गाड़ डाला या जला दिया जायगा । तब इस जन्म में
किये भले-बुरे कामों के फल को भोगने वाला कोई न रहेगा ।
सो यह 'कृतविनाश' नाम का महादोष आजायगा । इन दोनों
दोषों के कारण आत्मा को कार्य किंवा उत्पत्ति वाला मानना
ठीक नहीं है ।
पूर्णो देहे बल यच्छन्नक्षाणां यः प्रवर्तकः ।
वायुः प्राणमयो नासावात्मा चैतन्यवर्जनात् ॥५॥
पैर से लेकर मस्तकपर्यन्त देह में पूर्ण होकर [ व्यानरूप से ]
बल किंवा सामर्थ्य को देता हुआ जो वायु, चक्षु आदि इन्द्रियों का
प्रेरक होता है, वह वायु ही 'प्राणमय' कोश कहाता है। चैतन्य
रहित किंवा जड होने के कारण वह भी तो आत्मा नहीं है ।
अहन्तां ममतां देहे गेहादौ च करोति यः ।
कामाद्यवस्थया भ्रान्तो नासावात्मा मनोमयः ॥६॥
देह में 'मैं' भाव और गृहादि में 'मेरेपन का अभिमान'
जो किया करता है वह मनोमय भी आत्मा नहीं है । क्योंकि
वह तो कामादि अवस्थाओं से भ्रान्त हुआ रहता है । [ काम
क्रोध आदि विकारों के कारण उस मनोमय का स्वभाव नियत
नहीं रहता है। वह तो विकारी हुआ रहता है। फिर वह आत्मा
कैसे हो । क्योंकि आत्मा तो निर्विकार तत्व है ।]