पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
About this granth
Panchadashi (पञ्चदशी) is the much-loved Advaita Vedanta treatise of Vidyaranya, the fourteenth-century head of the Sringeri matha whom tradition also links with the founding of the Vijayanagara empire. Named for its fifteen chapters, it explains Vedanta through vivid everyday analogies and has long been a favourite of students and seekers.
The chapters fall into three sets of five. The five "discriminations" (vivekas) cover reality, the five elements, the five sheaths, duality and the great sayings of the Upanishads. The five "lamps" (dipas) are the Chitradipa, Triptidipa, Kutasthadipa, Dhyanadipa and Natakadipa. The five "blisses" (anandas) treat the bliss of yoga, of the self, of non-duality, of knowledge and of sense objects. Together they expound Brahman as being, consciousness and bliss.
This edition carries a Hindi translation and commentary by Pandit Ramavatar Vidyabhaskar. It was published by Pandit Krishnakumar Sharma of Ratangarh, Bijnor district, and printed at the Hindi Bhavan Press, Lahore, so it predates Partition. At about 726 pages, it is for serious readers of Vedanta.
ब्रह्मानन्दान्तर्गत विषयानन्द का संक्षेप १३७
माया का राज्य विस्तृत हो रहा है । बुद्धि की जो शान्त वृत्तियां हैं
उनके साथ एकता को प्राप्त हुआ हो जाने से उसको 'मिश्रब्रह्म'
कहा है ।
ब्रह्म की स्थिति तो हमने साफ़ साफ़ समझा दी है । अब जो
कोई पुरुष ब्रह्म का ध्यान करना चाहे, वह नृशृंग आदि जैसे पदार्थों
की तो उपेक्षा करता जाय और फिर जो तत्व शेष रह गया हो, उसी
का यथायोग्य रीति से ध्यान करे । वह यों कि—शिला आदियों में
नाम और रूपों [आकारों] को छोड़कर केवल सन्मात्र की ही चिन्ता
किया करे । घोर और मूढ बुद्धियों के दुःख-भाग को छोड़कर उनमें
के सत् और चित् के चिन्तन में लग जाय । शान्त वृत्तियों में तो
सच्चिदानन्द नामक तीनों की ही चिन्ता करने लगे । ये उक्त तीन
प्रकार की चिन्तायें क्रम से 'कनिष्ठ' 'मध्यम' और 'उत्कृष्ट' चिन्ता
कहाती हैं ।
जिन मन्दलोगों को निर्गुण ब्रह्म का ध्यान करने का अधिकार
ही नहीं है, वे लोग व्यवहार काल में भी मिश्र ब्रह्म का चिन्तन करें,
तो उनके लिये यही उत्कृष्ट बात है। ऐसा मिश्रब्रह्मचिन्तन बताने के
लिये ही विषयानन्द नाम का यह प्रकरण लिखा गया है ।
उदासीन अवस्था में जब बुद्धिवृत्ति ढीली पड़ जाती हैं, तब तो
विना वृत्ति का ध्यान होने लगता है। वह ध्यान सब ध्यानों से ऊँचे
दर्जे का है। इस विषयानन्द नाम के प्रकरण में यहां तक चार प्रकार
का ध्यान बताया जा चुका । तीन तरह का तो सवृत्तिक ध्यान तथा
एक विना वृत्ति का ध्यान, यों चार प्रकार का ध्यान हो गया । जड
पदार्थों में सत्ता, मूढ़वृत्ति में सत्ता तथा चैतन्य, सात्विकवृत्ति में सत्ता
चैतन्य तथा आनन्द, यों तीन तरह का सवृत्तिक ध्यान हो जाता है।
१३८ पञ्चदशी
इस ब्रह्मानन्द नाम के पांच अध्याय वाले ग्रन्थ में 'ज्ञान' और
'योग'के द्वारा जिस ध्यान का वर्णन किया है, वह ध्यान तो ब्रह्मविद्या
ही है। उसका वर्णन तो हमने यों किया है कि ध्यान से जब चित्त
एकाग्र हो जाता है तब उस चित्त में ब्रह्मविद्या स्थिर हो जाती है।
ब्रह्मविद्या के स्थिर हो जाने पर ये 'सत्' 'चित्' 'आनन्द' पहले की
तरह अलग अलग नहीं दीखते। तब तो ये अखण्ड एकरस होकर
दीखने लगते हैं। क्योंकि उस समय भेद करने वाली उपाधियां नहीं
रहतीं। भेद करने वाली उपाधियें तो ये शान्त घोर वृत्तियां और
शिलादि पदार्थ ही हैं। इन उपाधियों को यदि कोई हटाना चाहे तो
'योग' या 'विवेक' से ही ऐसा कर सकता है। जब उपाधिरहित
स्वयं प्रकाश अद्वैत ब्रह्मतत्त्व भासने लगता है तब यह प्रत्यक्ष दीख
पड़ने वाली त्रिपुटी नहीं रह जाती। यही कारण है कि तब उसे
'भूमानन्द' भी कह देते हैं।
ब्रह्मानन्दान्तर्गत विषयानन्द का वर्णन समाप्त हुआ। मन्दाधि-
कारी लोग इसी को द्वार बनाकर आत्मधाम में घुस जांय।