पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३२५
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३२५
जो बोधहीन है, उसका प्रवृत्ति में आग्रह करना उचित
ही है। क्योकि मनुष्यों को स्वर्ग या मुक्ति इनमें से एक के
लिये प्रयत्न तो करना ही होगा [ सांसारिक मज़ा और मुक्ति-
सुख इन दोनों म से किसी एक के बिना तो इस जीवन में कुछ
सार ही नहीं रहता। या तो मुक्तिसुख मिलना चाहिये। नहीं
तो फिर दुनियादारी का मज़ा ही सही। सांसारिक मज़ों को
भोग कर जब उनके फलस्वरूप दुःख के पहाड़ भोक्ता के ऊपर
टूट पड़ते हैं तब साधक बनकर मोक्ष मार्ग में को दौड़ जाना
पड़ता है। संसार की सारी विपत्तियां इसी मोक्षमार्ग के गूंगे
बुलावे हैं]।
विद्वांश्चेत् तादृशां मध्ये तिष्ठेत् तदनुरोधतः ।
कायेन मनसा वाचा करोत्येवाखिलाः क्रियाः ॥२८५॥
वैसे लोगों के बीच में यदि ज्ञानी को रहना पड़ जाय तो
वह उन्हीं के अनुसार शरीर, वाणी और मन से [लोक संग्रह
के लिये] सब विहित कामों को किया ही करे [उसको उन कामों
से उन्हें हटाना नहीं चाहिये। ऐसे लोगों को उनकी बिना इच्छा
के परमार्थ वार्ता नहीं बतानी चाहिये। अधिकार से ऊँची बात
बताना ऐसा ही होता है जैसा कि ऊसर में बीज बोना]।
एष मध्ये बुभुत्सूनां यदा तिष्ठेत् तदा पुनः ।
बोधायैषां क्रियाः सर्वा दूषयंस्त्यजतु स्वयम् ॥२८६॥
यही विद्वान् जब जिज्ञासुओं में पहुँचे तब उनको बोध करा
देने के लिये सब क्रियाओं को दूषित करते हुए स्वयं भी उन
सब क्रियाओं का त्याग करदे। [उनसे भी त्याग करादे। क्रियाओं
में जो गुप्त अनन्त दोष भरे पड़े हैं, उनका मर्म उन्हें समझा
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कर, इस कर्म और भोग के दुःखदायी अनन्त चक्र में से उन
का भी उद्धार करले] ।
अविद्वदनुसारेण वृत्ति र्बुद्धस्य युज्यते ।
स्तनन्धयानुसारेण वर्तते तत्पिता यतः ॥२८७॥
ज्ञानी लोगों का बर्ताव तो अज्ञानियों के अनुसार ही होना
चाहिये। देखते हैं कि छोटे-छोटे बच्चों के माता पिता उन्हीं के
अनुकूल बर्ताव किया करते हैं ।
अधिक्षिप्तस्ताडितो वा बालेन स्वपिता तदा ।
न क्लिश्नाति न कुप्येत बालं प्रत्युत लालयेत् ॥२८८॥
देखा जाता है कि जब बच्चा पिता को भला बुरा कहता या
मार बैठता है तब भी उसके पिता को क्रोध कुछ भी नहीं
होता। प्रत्युत वह इसके बदले में भी उसे प्यार ही किया
करता है ।
निन्दितः स्तूयमानो वा विद्वानज्ञैर्न निन्दति ।
न स्तौति किन्तु तेषां स्याद् यथा बोधस्तथा चरेत् ॥२८९॥
अज्ञानी लोग जब विद्वान् पुरुष की निन्दा या स्तुति करें
तब इसके बदले में वह स्वयं उनकी निन्दा या स्तुति न करने
लगे । किन्तु इन लोगों को जैसे भी बोध हो सके वैसा वैसा
प्रयत्न करता रहे ।
येनायं नटनेनात्र बुध्यते कार्यमेव तत् ।
अज्ञप्रबोधान्नैवान्यत् कार्यमस्त्यत्र तद्विदः ॥२९०॥
विद्वान् के जिस जिस तरह के आचरण करने से, इस
अज्ञानी को ज्ञान हो जाय, ज्ञानी को वही वही आचरण करते
जाना चाहिये । ज्ञानी का तो इसके अतिरिक्त और कुछ भी