पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३५
तृप्तिदीपप्रकरणम् २३५
जिसके साथ आत्मतत्व के विचार का प्रागभाव नियम
से रहता हो, तथा जो ‘हम नहीं जानते आत्मतत्व क्या चीज़
है’ ऐसा उदासीन व्यवहार कराता हो, उसी को ‘अज्ञान’
कहते हैं।
अमार्गेण विचार्याथ नास्ति नो भाति चेत्यसौ ।
विपरीतव्यवहृति रावृतेः कार्यमिष्यते ॥३६॥
[शास्त्रोक्त पद्धति को छोड़ कर] जब अमार्ग (केवल तर्क)
से विचार करके, यह विपरीत व्यवहार किया जाने लगता है
कि ‘कूटस्थ न तो है ही और न प्रतीत ही होता है’ तब इसी
को ‘आवरण का कार्य’ कहते हैं।
देहद्वयचिदाभासरूपो विक्षेप ईरितः ।
कर्तृत्वाद्यखिलः शोकः संसाराख्योऽस्य बन्धकः॥३७॥
स्थूल और सूक्ष्म दोनों देहों के सहित जो चिदाभास है
वही ‘विक्षेप’ कहाता है। बन्धक अर्थात् बन्धन कराने वाला
कर्तृत्व प्रमातृत्व रूपी जो संसार नाम का सम्पूर्ण शोक है वह
सब इसी चिदाभास का उत्पन्न किया हुआ है।
अज्ञानमावृतिश्चैते विक्षेपात् प्राक् प्रसिद्धयतः ।
यद्यप्यथाप्यवस्थे ते विक्षेपस्यैव नात्मनः ॥३८॥
यद्यपि ‘अज्ञान’ और ‘आवरण’ ये दोनों अवस्थाएं विक्षेप
से पहली हैं, तौ भी ये दोनों अवस्थाएं आत्मा की नहीं हैं
[क्योंकि असङ्ग होने के कारण आत्मा की तो कोई अवस्था
[ही नहीं होती] और कोई गति न होने से इनको चिदाभास की
ही अवस्था मानना पड़ता है।