पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
चित्रदीपप्रकरणम् १३७
चित्रदीपप्रकरणम् १३७
आरोपितस्य दृष्टान्ते रूप्यं नाम यथा तथा।
कूटस्थाध्यस्तविक्षेपनामाहमिति निश्चयः ॥३६॥
शुक्तिरजत के दृष्टान्त में जैसे आरोपित पदार्थ का नाम
'रूप्य' होता है इसी प्रकार कूटस्थ में कल्पित जो विक्षेप
[चिदाभास] है उसका ही नाम 'अहम्' होता है।
इदमंशं स्वतः पश्यन् रूप्यमित्यभिमन्यते ।
तथा स्वं च स्वतः पश्यन्नहमित्यभिमन्यते ॥३७॥
'इदं' भाग को स्वतः [आंखों से] देखता हुआ भी जैसे
झूठ मूठ ही यह अभिमान कर लेता है कि यह तो 'रूप्य' है,
इसी प्रकार अपने आपको स्वतः देखकर भी वृथा ही 'मैं' ऐसा
अभिमान कर बैठता है। [जब हम अपने आप को देखते हों
तब हमको 'अहं' आदि कोई भी शब्द बोलने की आवश्यकता
नहीं होती है तो भी यह जीव 'मैं' कह ही बैठता है]
इदन्त्वरूप्यते भिन्ने स्वत्वाहन्ते तथेष्यताम् ।
सामान्यं च विशेषश्च ह्युभयत्रापि 'गम्यते ॥३८॥
इदन्ता तथा रूप्यता जैसे भिन्न भिन्न हैं, इसी प्रकार स्वत्व
और अहन्ता भी भिन्न भिन्न ही हैं। परन्तु इन दोनों [दृष्टान्त
तथा दार्ष्टान्तिक] में ही सामान्यविशेषभाव तो समानं ही है।
शंका यह है कि स्वयं और अहं शब्द एकार्थक हैं, फिर
दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक में समता कैसे होगी ? इसका उत्तर यह
दिया गया कि—इदं और और रूप्य शब्दार्थों में तथा स्वयं
और अहं शब्दार्थों में सामान्य विशेष भाव तो समान ही है।
उसी समता को लेकर यह दृष्टान्त दिया गया है।
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१३८ पञ्चदशी
देवदत्तः स्वयं गच्छेत् त्वं वीक्षस्व स्वयं तथा ।
अहं स्वयं न शक्नोमीत्येवं लोके प्रयुज्यते ॥३९॥
देवदत्त स्वयं जाता है तो जाय, तू स्वयं देखता है तो देख
पर मैं तो स्वयं ऐसा नहीं कर सकता हूँ, ऐसे प्रयोग लोक
होते हैं [इससे स्वयं शब्दार्थ सामान्यरूप होता है और अहं
[मैं] उसका विशेष है यह बात प्रकट होगयी] ।
इदं रूप्यमिदं वस्त्रमिति यद्वदिदं तथा ।
असौ त्वमहमित्येषु स्वयमित्यभिमन्यते ॥४०॥
'यह रूप्य है' 'यह वस्त्र है' इत्यादि उदाहरणों में जैसे इदं
शब्दार्थ सामान्य है, इसी प्रकार असौ [यह] त्वम् [तू]
अहम् [मैं] इन तीनों ही में [के साथ] स्वयं यह शब्द कहा
जाता है । [इससे स्वयं का अर्थ भी सामान्य ही समझना
चाहिये और अहं का अर्थ विशेष लेना चाहिये ] ।
अहन्त्वाद्भिद्यतां स्वत्वं कूटस्थे तेन किं तव ।
स्वयंशब्दार्थ एवैष कूटस्थ इति मे भवेत् ॥४१॥
प्रश्नकर्त्ता पूछता है कि—'स्वपन' 'अहं' से भिन्न है तो हुआ
करो, इससे कूटस्थ आत्मा के विषय में क्या सिद्ध करना
चाहते हो ? उत्तर यह है कि—'यह सामान्य रूप जो स्वयं
शब्दार्थ है वह ही तो कूटस्थ है' यह मेरी बात सिद्ध हो
जाती है ।
अन्यत्ववारकं स्वत्वमिति चेदन्यवारणम् ।
कूटस्थस्यात्मतां वक्तु रिष्टमेव हि तद्भवेत् ॥४२॥
स्वत्व तो अन्यत्व का वारण किया करता है, ऐसा यदि