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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

कां० ३, अ० ५, ब्रा० ३-४, कं० २०-२५ व १-३ शतपथब्राह्मण / ४३१
दोनों यहाँ पृथिवी की ऊँचाई पर ठहरो।" यह (उत्तर वेदी ही) ऊँचाई है। आहवनीय द्यौलोक
में है। वह उनके नाभि में खड़ी करता है, शान्ति का यही रूप है ॥२०॥
उत्तर की ओर चलकर अध्वर्यु दक्षिणी हविर्धान को ठहराता है यह मन्त्र पढ़कर—
“विष्णोर्नु॒ कं वीर्या॑णि॒ प्रवो॑चं॒ यः पार्थि॑वानि विम॒मे रजां॑१॑सि। योऽअस्क॑भाय॒दुत्त॑र॒ स॒धस्थं॑
विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायो विष्णवे त्वा” (यजु० ५।१८) - "मैं अब विष्णु के पराक्रम कहता हूँ जिसने
पृथिवी के देशों को नापा, जिसने उत्तर के (ऊपरी) स्थान को स्थापित किया, तीन बड़े पग
चलकर। विष्णु के लिए मैं तुझे स्थापित करता हूँ।" जहाँ खड़ा किया करते हैं वहाँ से हटकर
दूसरी जगह खड़ा करता है ॥२१॥
प्रतिप्रस्थाता उत्तरी हविर्धान को खड़ा करता है यह मन्त्र पढ़कर - "दिवो वा विष्णऽउत
वा पृथिव्या महो वा विष्णऽउरोरन्तरिक्षात् । उभा हि हस्ता वसुना पृणस्वा प्रयच्छ दक्षिणादोत
सव्यादा विष्णवे त्वा" (यजु० ५।१६)--"हे विष्णु, या तो द्यौलोक से या पृथिवी से या बड़े विस्तृत
अन्तरिक्ष से दोनों हाथों से धन को भर और दाईं और बाईं दोनों ओर से दे । विष्णु के लिए
तुझको।" वहाँ नियत स्थान से अन्य स्थान पर खड़ा करता है। विष्णु-सम्बन्धी यजुओं को इस-
लिए पढ़ता है कि हविर्धान विष्णु की है ॥२२॥
बीच की चटाई को छूकर (यजमान से) कहलवाता है - "प्र तद् विष्णु स्तवते वीर्येण
मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः। यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्बधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा" (यजु०
५।२०) - "उस विष्णु के पराक्रम के लिए स्तुति करो जो भयानक जन्तु के समान भयानक और
पहाड़ी जानवरों के समान भयानक है। जिसके तीन पदों पर सब संसार स्थित है।" यह चटाई
उस (छप्पर) की मुख्य शीर्ष कपाल है, क्योंकि इसी पर अन्य कपाल ठहरते हैं। इसीलिए कहा,
'अधिक्षियन्ति' ॥२३॥
अब रराट (टट्टी) को छूकर (यजमान से) कहलवाता है - "विष्णोः रराटमसि"
(यजु० ५।२१) - "तू विष्णु का ललाट है।" क्योंकि यह उसका ललाट है। अब दो टट्टियों को
छूकर कहलवाता है, "विष्णोः श्नप्त्रे स्थः” (यजु० ५।२१) - "तुम विष्णु के मुंह के किनारे हो।"
अब जो पीछे की चटाई है वह इसके पीछे का शीर्ष-कपाल है ॥२४॥
अब लकड़ी की कील से सीता है, यह कहकर - "विष्णोः स्यूरसि" (यजु० ५।२१) - "तू
विष्णु की सुई है।" अब गाँठ देता है पढ़कर - "विष्णोर्ध्रुवोऽसि” (यजु० ५।२१)- "तू विष्णु
का ध्रुव है।" यह गाँठ इसलिए देता है कि छूट न जाय। जब काम समाप्त हो जाता है तो गाँठ
खोल देता है। इस प्रकार न अध्वर्यु को रोग लगता है न यजमान को। जब छप्पर बन जाता है
तो कहता है 'वैष्णवमसि' (यजु० ५।२१) - "तू विष्णु का है।" क्योंकि हविर्धान विष्णु का
है ॥२५॥
अध्याय ५— ब्राह्मण ४
दो कारण हैं कि छिद्र बनाये जाते हैं। हविर्धान यज्ञ का सिर है। सिर में भी तो चार
छिद्र होते हैं, दो यह और दो यह (नाक और कान) । उसी प्रकार से वह भी बनाता है, इसी-
लिए छिद्र (उपरव) खोदता है ॥१॥
प्रजापति की दोनों सन्तान देव और असुर लड़ पड़े। असुरों ने इन लोकों में वलग
अर्थात् जादू-टोने को गाड़ दिया कि देवों पर विजय पा जावें ॥२॥
अब देव जीत गये । उन्होंने इन्हीं उपरवों की सहायता से टोनों को खोद डाला। जो
टोना खोद लिया जाय उसका प्रभाव नहीं रहता । यहाँ भी अगर किसी शत्रु ने टोना गाड़ दिया

वै॑षु॒ ए॒तद्य॑द्य॒स्माऽअत्र॑ क॒श्चिद्वि॒षन्भ्रातृ॑व्यः कृत्यां॑ वल॒गान्नि॒खन॑ति ताने॒वैतदु॒त्कि-
रति॒ तस्मा॑द॒पर॒त्वान्खनति॒ स द॑क्षि॒णस्य॑ ह॒विर्धान॒स्याधो॒ऽधः प्र॒ङं खनति ॥ ३ ॥
सोऽभ्रि॑माद॒त्ते । दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॒सवे॒ऽश्विनो॒र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्यामाद॒दे
नार्य॑सीति समान॒ एतस्य॒ यजु॑षो ब॒न्धुर्योषो॒ वाऽए॒षा यद॒भ्रिस्तस्मा॑दाह॒ नार्य॑सी-
ति ॥ ४॥ ता॒न्प्रादे॑शमा॒त्रं वि॑ना परि॑लिखति । इ॒दम॒हꣳ रक्ष॑सां ग्री॒वा अ॑पिकृन्ता-
मीति॒ वज्रो॒ वाऽअ॒भ्रिर्वज्रे॑णै॒वैतन्नाष्ट्राणाꣳ॒ रक्ष॑सां ग्री॒वा अ॑पिकृन्तति ॥ ५॥ तय्या-
वे॒तौ पू॒र्वौ । तयो॑र्दक्षि॒णमे॒वाग्रे॒ परि॑लिखे॒दथा॒पर॑यो॒रुत्त॑रमथा॒पर॑यो॒र्दक्षि॑ण॒मथ॒ पूर्व॑-
योरुत्त॑रम् ॥ ६॥ अथो॒ऽइत॑र॒थाङ्गः । अ॒पर॑योरे॒वाग्र॒ऽउत्तरं॒ परि॑लिखे॒दय॒ पूर्व॑यो॒र्द्द-
क्षिण॒मथा॒पर॑यो॒र्द्दक्षि॑ण॒मथ॒ पूर्व॑यो॒रुत्त॑रमित्यथो॒ऽअपि॒ समी॑च ए॒व परि॑लिखेदे॒तं त्वे-
वोत्त॑मं॒ परि॑लिखे॒द्य ए॒ष पूर्व॑यो॒रुत्त॑रो॒ भव॑ति ॥ ७॥ तान्यथा॑परि॒लिखि॑तमे॒व य-
थापू॒र्वं खनति । बृह॒न्नसि॑ बृह॒द्रवा इत्युप॒स्तौत्ये॒वैन॑ने॒तन्म॒हय॑त्येव॒ यदा॑ह बृह॒-
न्न॑सि बृह॒द्रवा॒ इति॑ बृह॒तीमिन्द्रा॑य॒ वाचं॑ वदेतीन्द्रो॒ वै य॒ज्ञस्य॑ दे॒वता॒ वैष्ण॒वं
ह॒विर्द्धा॑नं॒ तत्सेन्द्रं करोति॒ तस्मा॑दाह बृह॒तीमिन्द्रा॑य॒ वाचं॑ वदेति ॥ ८॥ रक्षोह॒-
णं वलग॒हन॒मिति॑ । रक्ष॑साꣳ ह्ये॒ते व॑लगा॒नां व॒धाय॑ खाय॒न्ते वैष्ण॒वीमिति॑ वैष्ण॒-
वी हि ह॒विर्द्धाने वाक् ॥ ८॥ तान्यथा॑खा॒तमे॒वोत्कि॑रति । इ॒दम॒हं तं व॑लगमु॒-
त्किरा॑मि॒ यं मे॒ निष्ट्यो॒ यममा॑त्यो॒ निच॑खा॒नेति॑ नि॒ष्ट्यो वा॒ वाऽअमा॒त्यो वा कृ॒-
त्यां॑ वल॒गान्नि॒खन॑ति ताने॒वैतदु॒त्किर॑ति ॥ १ ॥ इ॒दम॒हं तं व॑लगमु॒त्किरा॑मि । यं
मे॒ समा॑नो॒ यमस॑मानो॒ निच॑खा॒नेति॑ समा॒नो वा॒ वाऽअस॑मानो वा कृत्यां॑ वल-
गान्नि॒खन॑ति ताने॒वैतदु॒त्किर॑ति ॥ १०॥ इ॒दम॒हं तं व॑लगमु॒त्किरा॑मि । यं मे॒ सब-
न्धु॒र्यम॑सबन्धुर्निच॑खा॒नेति॑ सब॒न्धुर्वा वाऽअ॑सबन्धुर्वा कृत्यां॑ वल॒गान्नि॒खन॑ति ता-
ने॒वैतदु॒त्किर॑ति ॥ ११॥ इ॒दम॒हं तं व॑लगमु॒त्किरा॑मि । यं मे सजातो यमसजातो
निच॑खा॒नेति॑ सजा॒तो वा वाऽअस॑जातो वा कृत्यां॑ वल॒गान्नि॒खन॑ति ताने॒वैतदु॒-

कां० ३, अ० ५, ब्रा० ४, कं० ३-१२ शतपथब्राह्मण / ४३३
हो तो वह इन उपरवों के द्वारा उसको खोद डालता है। इसलिए उपरव बनाये जाते हैं।
दक्षिणी हविर्धान के आगे के भाग में उपरवों को बनाता है ॥३॥
वह खुरपी (अभ्रिम्) उठाता है, इस मन्त्र को पढ़कर—"देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे-
ऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्। आददे नार्यसि" (यजु० ५।२२)—"देव सविता की प्रेरणा
से अश्विन की दोनों भुजाओं और पूषा के दोनों हाथों से तुझको लेता हूँ। तू नारी है।" इस
यजु० का तात्पर्य भी वैसा ही है। खुरपी स्त्री है, इसलिए कहा 'तू नारी है' ॥४॥
वह एक प्रादेश (बालिश्त) छोड़कर रेखा खींचता है इस मन्त्र को पढ़कर—"इदमहँ,
रक्षसां ग्रीवांऽअपिकृन्तामि" (यजु० ५।२२)—"यह मैं राक्षसों की गर्दन काटता हूँ।" खुरपी वज्र
है। वज्र से ही वह राक्षसों की गर्दन काटता है ॥५॥
(इन उपरवों का चिह्न इस प्रकार बनाया जाय) पहले अगलों में से दायाँ, फिर पिछलों
में का बायाँ। फिर पिछलों का दायाँ, फिर अगलों का दायाँ ॥६॥
कुछ लोग इससे उलटा बताते हैं अर्थात् पहले पिछलों का बायाँ, फिर अगलों का बायाँ
या एक ही दिशा में ले। परन्तु अन्त में उसको लेना चाहिए जो बायाँ है ॥७॥
फिर जिस क्रम से चिह्न बनाया उसी प्रकार खोदना चाहिए, इस मन्त्रांश को पढ़कर—
"बृहन्नसि बृहद्रवा" (यजु० ५।२२)—"तू बड़ी है, बड़े शब्दवाली।" उसी की बड़ाई करता है
जब कहता है कि 'बृहन्नसि' इत्यादि। "बृहतीमिन्द्राय वाचं वद" यजु० ५।२२)—"इन्द्र के लिए
बड़ी वाणी बोल।' इन्द्र यज्ञ का देवता है। हविर्धान विष्णु का है। वह इस मन्त्र (बृहती इत्यादि)
को पढ़कर इनका इन्द्र के साथ सम्बन्ध जोड़ता है ॥८॥
"रक्षोहणं वलगहनं" (यजु० ५।२३)—"राक्षसों के मारनेवाले और जादू-टोने के मारने-
वाले।" ये राक्षसों और टोनों को नष्ट करने के लिए खोदे जाते हैं। "वैष्णवीम्" (यजु०
५।२३), क्योंकि हविर्धान की जो वाणी है वह विष्णु की है ॥९॥
जैसा-जैसा खोदता है वैसे-वैसे (उसी क्रम से) मिट्टी को फेंकता है यह मन्त्रांश पढ़कर—
"इदमहं तं वलगमुत्किरामि यं मे निष्ठ्यो यममात्यो निचखान' (यजु० ५।२३)—"मैं उस टोने
को उखाड़कर फेंकता हूँ जो मेरे पुत्र या सम्बन्धी ने मेरे लिए गाड़ दिया हो।" पुत्र या सम्बन्धी
टोने को घर में गाड़ता है। यह उसी को उखाड़कर फेंक देता है ॥१०॥
"इदमहं तं वलगमुत्किरामि यं मे समानो यमसमानो निचखान" (यजु० ५।२३)—"मैं
इस-उस टोने को खोदकर फेंकता हूँ जिसको मेरे बराबरवाले ने गाड़ा हो या बे-बराबरवाले
ने।" समान या असमान पुरुष जिस जादू-टोने को गाड़ता है उसी को उखाड़कर फेंकता
है ॥११॥
"इदमहं तं वलगमुत्किरामि यं मे सबन्धुर्यमसबन्धुर्निचखान' (यजु० ५।२३)—"मैं इस-
उस टोने को खोदकर फेंकता हूँ जिसको मेरे सम्बन्धी (सबन्धु) या (असबन्धु) ने गाड़ा हो।"

४३४ शतपथ ब्राह्मण
त्किर॒त्युत्कृत्यां॑ किरामी॒त्यक्ष॑त उद्व॑पति॒ तत्कृत्या॑मु॒त्किर॑ति ॥ १२॥ तान्बाहुमा॒त्रा-
न्खनेत् । अ॒त्तो वाऽए॒षोऽत्ते॑नै॒वैतत्कृत्यां॑ मोहयति ता॒नन्य॒था सं॑तृ॒णत्ति॒ यद्य-
न्यान्या॒ न श॑क्नुया॒दपि॑ समीच॒स्तस्मा॑दि॒मे प्रा॒णाः परः॒ संतृ॑ण्णाः ॥ १३॥ तान्यथाखा-
त॒मेवाव॑म॒र्शय॑ति । स्व॒राड॑सि सपत्न॒हा सत्र॒ाडस्य॑भिमाति॒हा जन॒राड॑सि रक्षो॒हा
सर्व॒राड॑स्यमित्र॒हेत्या॒शीरैवैषैतस्य॒ कर्म॑ण आ॒शिष॑मे॒वैतदा॒शास्ते॑ ॥ १४॥ अ॒थाध्व॒र्युश्च
यज॑मानश्च॒ संमृ॑शेते । पूर्व॒योर्दक्षि॑णोऽध्व॒र्युर्भव॑त्यप॒रयो॒रुत्त॑रो॒ यज॑मानः सोऽध्व॒र्युः पृ-
च्छति॒ यज॑मान॒ किमत्रेति॒ भद्र॒मित्या॑ह॒ तन्नौ स॒हेत्युपौ॑ऽध्व॒र्युः ॥ १५॥ अथाप॒रयो॒र्ह-
क्षिणोऽध्व॒र्युर्भव॑ति । पूर्व॒योरुत्त॑रो॒ यज॑मानः स॒ यज॑मानः पृच्छ॒त्यध्व॑र्यो॒ किमत्रेति॒ भद्र॒-
मित्या॑ह॒ तन्म॒ इति॒ यज॑मानस्तद्यदे॒वा॑ संमृ॑शेते प्रा॒णानि॑वै॒तत्संयु॑जः कुरुतस्तस्मा-
दि॒मे प्रा॒णाः परः॒ संवि॑द्धे॒ऽथ यत्पृ॑ष्टो भ॒द्रमिति॑ प्रत्या॒ह क॒ल्याणी॑मे॒वैतन्मानु॒षीं वा-
चं॒ वद॑ति तस्मात्पृ॒ष्टो भ॒द्रमिति॑ प्रत्या॒हाथ॒ प्रोक्ष॑त्ये॒को वै प्रोक्ष॑णस्य॒ बन्धु॑र्मेध्या॑-
न्ये॒वैतत्क॑रोति ॥ १७॥ स॒ प्रोक्ष॑ति । र॒क्षो॒हणो॑ वो वलग॒हन॒ इति॑ र॒क्षो॒हणो॑
ह्ये॑ते वलग॒हनो॑ ह्ये॑ते॒ प्रोक्षा॑मि वैष्ण॒वानिति॑ वैष्ण॒वा ह्ये॑ते ॥ १८॥ अथ॒ याः प्रो-
क्षण्यः॒ परिशि॑ष्य॒न्ते । ता॒ अव॑टे॒ष्ववन॑यति॒ तद्या॑ इ॒माः प्रा॒णेष्व॒पास्ता ए॒वैतद्द॑धाति॒
तस्मा॑दि॒षु प्रा॒णेष्वि॒मा आपः॑ ॥ १९॥ सोऽव॑नयति । र॒क्षो॒हणो॑ वो वलग॒हनोऽव॑-
नयामि वैष्ण॒वानित्यथ॑ ब॒र्हीषि प्राचीन॒ाग्राणि॑ चोदीची॒नाग्राणि॑ चा॒वस्तृ॑णाति
ह्यानी॒मानि॑ प्रा॒णेषु॒ लोमा॑नि ता॒न्येवैतद्द॑धाति॒ तस्मा॑दे॒षु प्रा॒णेष्वि॒मानि॒ लोमा॑-
नि ॥ २०॥ सोऽव॑स्तृणाति । र॒क्षो॒हणो॑ वो वलग॒हनोऽव॑स्तृणामि वैष्ण॒वानि-
त्यथ॑ ब॒र्हिषि॑ त॒नूनो॑वो॒परि॑ष्टा॒त्प्रच्छा॑दयति केशा ह्यैवा॒स्यैते॑ ॥ २१॥ अथा॑धिषव॒णे
फल॒केऽउ॑पदधाति । र॒क्षो॒हणौ॑ वां वलग॒हनावु॑पदधामि वैष्ण॒वीऽइति॑ क॒नू है-
वास्यैतेऽअथ॒ पर्यू॑हति र॒क्षो॒हणौ॑ वां वलग॒हनौ॒ पर्यू॑हामि॑ वैष्ण॒वीऽइति॑ दृꣳह॑-
त्ये॒वैने॑ऽए॒तद॑शिथिले करोति ॥ २२॥ अ॒थाधिषव॑णं परि॒कृत्तं॑ भवति । सर्व॑रोहितं

का० ३, अ० ५, ब्रा० ४, कं० १२-२३ शतपथब्राह्मण / ४३५
टोने को या तो अपने सम्बन्धी ने गाड़ा या किसी गैर ने, उस सबको खोदकर फेंकता है ॥१२॥
"इदमहं तं वलगमुत्किरामि यं मे सजातो यमसजातो निचखान' (यजु० ५।२३) - "मैं
इस-उस टोने को खोदकर फेंकता हूँ जो मेरे देशवाले या अन्यदेशवाले ने गाड़ा हो।" टोने को या
तो अपने देशवाले (सजात) ने या दूसरे देशवाले (असजात) ने गाड़ा होगा, उसी को उखाड़-
कर फेंकता है। "उत्कृत्यां किरामि" (यजु० ५।२३) - "कृत्या (जादू) को उखाड़कर फेंकता
हूँ।" जो सूराखों में मिट्टी बची हो उसको निकालकर फेंक देता है ॥१३॥
उन गड्ढों को हाथ-भर गहरा खोदना चाहिए। यहीं तक अन्त हैं (अर्थात् जहाँ तक
पहुँचे वहीं तक खोदे)। इस प्रकार वह जादू-टोने (कृत्या) को नष्ट करता है। इन गड्ढों को
भीतर-भीतर आड़े मार्गों से मिला दे। यदि आड़े मार्ग न बना सके तो सीधे से ही। इसीलिए
(मनुष्य के) प्राण भी एक-दूसरे से भीतरी नालियों द्वारा मिले रहते हैं ॥१४॥
जैसे खोदे गये हैं उस क्रम से यजमान को छुआता है, यह मन्त्र पढ़कर- "स्वराडसि
सपत्नहा सत्राराडस्यभिमातिहा जनराडसि रक्षोहा सर्वराडस्य मित्रहा" (यजु० ५।२४) - "तू
शत्रु का मारनेवाला स्वराट् है। अभिमानियों का मारनेवाला तू सत्रराट् (सततं राजति) अर्थात्
सदा चमकनेवाला है। राक्षसों का मारनेवाला तू मनुष्य का राजा है। शत्रु का मारनेवाला तू
सर्वराट् है।" यह उस काम का आशीर्वाद है। वह इस प्रकार आशीर्वाद प्राप्त करता है ॥१५॥
अध्वर्यु और यजमान (गड्ढों में हाथ डालकर नीचे से) एक-दूसरे को छूते हैं- सामने
के दक्षिण गड्ढे में अध्वर्यु और पिछले बायें गड्ढे में यजमान् । अब अध्वर्यु पूछता है 'यजमान,
यहाँ क्या है ?' वह उत्तर देता है, 'भद्र (कल्याण) है।' अध्वर्यु कहता है, 'यह (भद्र) हम दोनों
के लिए हो' ॥१६॥
अब पिछले दक्षिणी गड्ढे में अध्वर्यु होता है और पिछले उत्तर में यजमान। यजमान
पूछता है, 'अध्वर्यु, यह क्या है ?' अध्वर्यु कहता है 'भद्र ।' यजमान कहता है, 'मेरे लिए भी वही
हो।' वे इस प्रकार इसलिए छूते हैं कि प्राणों को जोड़ देते हैं। इसीलिए प्राण बहुत दूर भीतर
मिले होते हैं । जब पूछने पर वह 'भद्र' कहता है तो तात्पर्य है कि मनुष्य की भाषा में वह
'कल्याण' कहता है। इसीलिए पूछने पर कहता है 'भद्र।' अब उन गड्ढों को जल से सींचता
है। जल-सिंचन का एकमात्र प्रयोजन यही है कि उनको पवित्र करता है ॥१७॥
वह इस मन्त्र से जल-सिंचन करता है - "रक्षोहणो वो वलगहनः" (यजु० ५।२५)-
"तुम राक्षसों और जादू-टोने के नष्ट करनेवाले हो।" यह राक्षसों को नष्ट करनेवाले और
जादू-टोने को नष्ट करनेवाले हैं। "प्रोक्षामि वैष्णवान्" (यजु० ५।२५) - 'विष्णु के इनको
सींचता हूँ।" यह विष्णु के तो हैं ही ॥१८॥
अब जो जल बच रहता है उसे गड्ढों में ही डाल देता है। मानो प्राणों में जो जल है
उसको वह डालता है। इसलिए इन प्राणों के इन जलों को - ॥१९॥
यह मन्त्र पढ़कर बाहर फेंकता है- "रक्षोहणो वो वलगहनोऽवनयामि वैष्णवान्"
(यजु० ५।२५) - "राक्षसों और जादू के नाश करनेवाले तुम वैष्णवों को मैं बाहर फेंकता हूँ।"
अब वह कुश बिछाता है। कुछ की नोक पूर्व की ओर, कुछ की उत्तर की ओर हो। प्राणों में जो
लोम होते हैं उनको धारण करता है। इसलिए इन प्राणों में लोमों को- ॥२०॥
वह फैला देता है यह मन्त्रांश पढ़कर - "रक्षोहणो वो वलगहनोऽवस्तृणामि वैष्णवान्"
(यजु० ५।२५) - "राक्षसों और जादू-टोने के नष्ट करनेवाले तुम वैष्णवों को फैलाता हूँ।" अब
वह कुश फैलाता है, मानो शरीर को ऊपर से ढकता है। क्योंकि कुश (विष्णु के) बाल हैं ॥२१॥
अब सोम निचोड़ने के दो तख्ते रखता है, यह मन्त्रांश पढ़कर - "रक्षोहणौ वां वलगहना-
ऽउपद्धामि वैष्णवी" (यजु० ५।२५) - "राक्षसों और जादू को नष्ट करनेवाले दो को मैं रखता
हूँ। तुम विष्णु के हो।" वस्तुतः वे विष्णु के जबड़े हैं। वह उनको मिट्टी से ढकता है यह मन्त्रांश
पढ़कर - "रक्षोहणौ वां वलगहनौ पर्यूहामि वैष्णवी" (यजु० ५।२५) - "राक्षसों और जादू-टोने
को नष्ट करनेवाले तुमको ढाँपता हूँ। तुम विष्णु के हो।" इस प्रकार वह इनको दृढ़ और न
हिलनेवाला बनाता है ॥२२॥
अब सोम निचोड़ने का चमड़ा सीधा काटा जाता है और सम्पूर्ण लाल रंग से रंगा जाता

अध्याय-६, ब्राह्मण-१

४३६ शतपथ ब्राह्मण

जिह्वा॒ ह्यैवाष्यैषा तद्य॒त्सर्व॒रोहितं भवति लोहिनीव॒ हीयं जिह्वा तन्नि॒दधाति
वैष्ण॒वमसी॑ति वैष्ण॒वꣳ ह्ये॒तत् ॥२३॥ अथ ग्राव्णा उपाव॒हरति । दन्ता॒ ह्यैवास्य ग्रा-
वाणस्तद्यद्ग्रावभिरभिषु॒ण्वन्ति यथा॒ दद्भिः प्स्यादेवं तत्तान्नि॒दधाति वैष्ण॒वा स्थेति
वैष्ण॒वा ह्ये॒त ऽएत॒द्यज्ञस्य॒ शिरः॒ सꣳस्कृ॒तम् ॥२४॥ ब्राह्मणम् ॥४ [५.४] ॥ ॥ पञ्च-
मोऽध्यायः [२०] ॥ ॥
उद॒रमेवास्य सदः॑ । तस्मात्स॒दसि भक्षयन्ति यद्धीदं किं चाश्न॒त्युद॒रऽए॒वैदꣳ सर्वं॒
प्रति॒तिष्ठत्यथ॒ यदस्मिन्विश्वे॑ दे॒वा अ॒सीदंस्तस्मात्स॒दो नाम तऽउ॒ऽए॒वास्मिन्नेते ब्रा-
ह्मणा वि॒श्वगो॑त्राः सीदन्त्यैन्द्रं देवतया ॥१॥ तन्मध्य॒ऽऔदुम्बरीं मिनोति । अन्नं॒
वाऽऊर्गौदुम्बर उद॒रमेवास्य॒ सद॒स्तन्मध्य॒तोऽन्नाद्यं दधाति तस्मान्मध्य॒ऽऔदु॒म्बरीं
मिनोति ॥२॥ अथ य ऽएष मध्यमः शङ्कुर्भव॑ति । वेदे॒रर्धनार्थे तस्मात्प्राङु प्रक्राम-
ति षट्प्रक्रमान्दक्षिणा सप्तममपक्रामति सम्यदः कामाय तदव॒टं प॑रिलि॒खति ॥३॥
सोऽभिमाद॑त्ते । दे॒वस्य त्वा सवितुः प्र॒सवे॒ऽश्विनो॒र्बाहुभ्यां पू॒ष्णो हस्ता॑भ्यामाद॒दे
नार्य॑सीति समा॒न ऽए॒तस्य यजुषो बन्धु॒र्योषो वाऽए॒षा यद॒भ्रिस्तस्मादाह॒ नार्य॑सी-
ति ॥४॥ अथाव॒टं प॑रिलि॒खति । इ॒दम॒हꣳ रक्ष॑सां ग्रीवा अपिकृन्ता॒मीति॒ वज्रो
वाऽअभ्रिर्व॑ज्रेणैवैतन्नाष्ट्राणाꣳ रक्ष॑सां ग्रीवा अपिकृन्तति ॥५॥ अथ खनति । प्रा-
ञ्चमुत्कर॒मुत्कि॑रति यज॑मानेन संमायौदु॒म्बरीं परिवासयति तामग्रेण प्राचीं निद॒-
धात्येतावन्मात्राणि बर्हीꣳष्युपरिष्टादधिनि॒दधाति ॥६॥ अथ प्लवमत्या॒ प्रोक्ष॑ण्यो
भवन्ति । आपो॒ ह वाऽअ॒ोषधीनाꣳ र॒सस्तस्मादोषधयः केवल्यः खादिता न॒ धि-
न्वन्त्योषधय उ ह्यापाꣳ र॒सस्तस्मादापः पीताः केव॑ल्यो न धिन्वन्ति य॒द्वैवोभय्यः॒
सꣳसृष्टा भवन्त्येव धिन्वन्ति तर्हि हि स॒रसा भवन्ति सर॒साभिः प्रोक्षा॒णीति ॥७॥
देवाश्च वाऽअसु॑राश्च । उ॒भये प्राजापत्याः प॒स्पृधिरे ततो दे॒वेभ्यः॒ सर्वा॒ ऽओष॑धय
ईयुर्यथा ह्वे॒वेभ्यो॒ नेयुः ॥८॥ तद्धे देवा अशृण्वत । तऽए॒तैः सर्वाः सपत्नानामो-

कां० ३, अ० ५-६, ब्रा० ४-१, कं० २३-२४ व १-६ शतपथब्राह्मण / ४३७
है, क्योंकि यह विष्णु की जिह्वा है। वह बिल्कुल लाल इसलिए रंगा जाता है कि जीभ का रंग
लाल होता है। यह पढ़कर नीचे रख देता है—'वैष्णवमसि' (यजु० ५।२५)। 'तू विष्णु की है।'
यह विष्णु का तो है ही ॥२३॥
अब सोम निचोड़ने के पत्थर लाता है (पाँच पत्थर)। ये पत्थर विष्णु के दाँतों के तुल्य
हैं। इसलिए जब सोम को पीसते हैं तो मानो दाँतों से पीसते हैं। यह कहकर रख देता है—'वैष्णवा
स्थ' (यजु० ५।२५) —"विष्णु के होकर रहो।" क्योंकि विष्णु के तो हैं ही। अब यज्ञ का सिर पूरा
हो गया ॥२४॥
अध्याय ६—ब्राह्मण १
सदस् इस यज्ञ का पेट है। इसलिए सदस् में ही खाते हैं। क्योंकि इस संसार में जो कुछ
ख या जाता है वह पेट में ही रक्खा जाता है। इसको सदस् इसलिए कहते हैं कि इसमें सब देव
बैठे (असीदन्)। इसी प्रकार सब गोत्रों के ब्राह्मण इसी में बैठते हैं। इसका देवता इन्द्र है ॥१॥
इसके मध्य में वह उदुम्बर की लकड़ी रखता है। उदुम्बर अन्न या शक्ति है। सदस् इस
यज्ञ का पेट है। इसलिए उस पेट के बीच में वह उदुम्बर की लकड़ी रखता है ॥२॥
वेदी के पिछले आधे भाग के बीच में जो खूंटी होती है उससे पूर्व की ओर छः पग चलता
है। इससे हटकर दाहिनी ओर सातवाँ पग भरता है, कामना की पूर्ति के लिए। वहाँ एक गड्ढे
का चिह्न बना देता है ॥३॥
इस मन्त्र को पढ़कर खुरपी (अभ्रि) लेता है— "देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां
पूष्णो हस्ताभ्यामाददे नार्यसि" (यजु० ५।२२)—"सविता देव की प्रेरणा पर अश्विनी की भुजाओं
और पूषा के हाथों से मैं तुझको लेता हूँ। तू नारी है।" इस यजुः का भी यही तात्पर्य है जो पहले
बता दिया गया। खुरपी (अभ्रि) तो स्त्रीलिङ्ग है ही। इसलिए वह उसको कहता है कि 'तू
नारी है' ॥४॥
अब वह इस मन्त्रांश से गड्ढे का चिह्न बनाता है— "इदमहँ रक्षसां ग्रीवाऽअपि-
कृन्तामि" (यजु० ५।२२)—"मैं इससे राक्षसों की गर्दन काटता हूँ।" यह खुरपी वज्र है। वज्र से
ही दुष्ट राक्षसों की गर्दन काटता है ॥५॥
अब खोदता है। मिट्टी पूर्व को डालता है। यजमान के कद के बराबर नापकर उदुम्बर
की लकड़ी को चारों ओर से चिकनाता है और गड्ढे के आगे इस प्रकार रखता है कि उसका
अग्रभाग पूर्व की ओर रहे। उतने ही बड़े कुशों को उसके ऊपर रखता है ॥६॥
अब प्रोक्षणी के जलों में जौ (यव) होते हैं। ओषधियों का रस जल है। इसलिए यदि
ओषधियाँ ही खाई जायें तो तृप्ति नहीं करतीं। जलों का रस ओषधियाँ हैं, इसलिए केवल जल
ही पिया जाय तो तृप्ति नहीं होती। जब दोनों मिल जाते हैं तो तृप्ति करते हैं, क्योंकि तब वे
रसवाले हो जाते हैं। वह सोचता है कि सरस जल का सिंचन करूँ ॥७॥
प्रजापति की सन्तान देव और असुरों में झगड़ा हुआ। देवों से सब ओषधियां चली गईं।
केवल जौ (यव) नहीं गये ॥८॥
अब देव जीत गये। जौ ने शत्रुओं की सब ओषधियों को खींच लिया (अयुवत्) ।

४३८ शतपथ ब्राह्मण

ष्षीरयुवन् यद्यु॑वन् तस्मा॒द्यवा॒ नाम॑ ॥९॥ ते॒ होचुः । क्व॒ तद्यः सर्वा॑सामोष॑-
धीनाꣳ रस॒स्तं यवे॑षु दधा॒नेति॒ स यः सर्वा॑सामोषधीनाꣳ रस॒ आसी॒तं यवे॑ष्वदधुस्त-
स्माद्य॒त्रान्या॒ ओष॑धयो म्लाय॑न्ति॒ तदेते मोद॑माना वर्धन्त॒ऽएवꣳ ह्ये॑षु रस॒मद॑धुस्त-
थो॒ऽएवैष॒ एतैः सर्वैः स॒प्ताना॒मोष॑धीर्युङ्क्त॒ तस्माद्यवमय्यः प्रोक्ष॑ण्यो भवन्ति ॥१०॥
स य॒वाना॒वप॑ति । यवो॑ऽसि यव॒यास्मद्द्वेषो॑ यव॒याराती॒रिति॒ नात्र॑ तिरो॒हितमि॑-
वास्त्यथ प्रोक्षत्येको वै प्रोक्षणस्य बन्धुर्मेध्यायैवैतत्करोति ॥११॥ स प्रोक्ष॑ति ।
दि॒वे त्वान्तरि॑क्षाय वा पृथिव्यै॒ वेती॑माने॒वैतल्लो॒कानूर्जा॒ रसेन॒ भाजय॒त्येषु॑ लो॒के-
ष्वू॒र्द्धꣳ रसं॑ दधाति ॥१२॥ अथ याः प्रो॒क्षण्यः प॑रिशि॒ष्यन्ते॑ । ता अ॒वटे॒ऽवन॑यति
शुन्ध॑न्तां लोकाः पितृ॒षद॑ना॒ इति पितृ॑देव॒त्यो वै कूपः॑ खा॒तस्तन्मै॒वैतन्मे॒ध्यं करो-
ति ॥१३॥ अथ ब॒र्हिषि॑ । प्राची॒नाग्रा॑णि चोदीची॒नाग्रा॑णि चावस्तृ॒णाति॑ पितृ-
षद॑नमसी॒ति पितृ॑देव॒त्य वा॒ऽअस्याऽऽहु॒तद्वति॒ यन्नि॑खातं॒ सा यथानिखातौषधिषु
मिता स्या॑दे॒वमे॒तास्वोष॑धिषु मिता भ॑वति ॥१४॥ तामुद्धू॒यति॑ । उद्दिवꣳ स्तभाना-
न्तरि॑क्षं पृण दृꣳहस्व पृथिव्यामिती॑माने॒वैतल्लो॒कानूर्जा॒ रसेन॒ भाजय॒त्येषु॑ लो॒केषू-
र्द्धꣳ रसं॑ दधाति ॥१५॥ अथ मिनोति । द्युतानस्त्वा मारुतो मिनोत्विति यो वा
ऽअ॒यं पव॑त॒ऽएष॒ द्युता॒नो मारु॒तस्तेनै॑नैतेन मिनोति मित्रावरुणौ ध्रुवेण धर्म-
णेति प्रा॑णोदानौ वै मित्रावरुणौ तेनैनां प्रा॑णोदानाभ्यां मिनोति ॥१६॥ अथ
पर्यू॑हति । ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि रायस्पोषवनि पर्यूहामीति बह्वी वै यजुःप्रा-
शीस्तद्ब्रह्म च क्षत्रं चाशास्तऽउभे वीर्ये रायस्पोषवनीति भूमा वै रायस्पोषस्तद्भू-
मानमाशास्ते ॥१७॥ अथ पर्यु॑षति । ब्रह्म॑ दृꣳह क्ष॒त्रं दृꣳहायु॑र्दृꣳह प्र॒जां दृꣳहे-
त्याशीरेवैषैतस्य कर्मण आशिषमेवैतदाशास्ते समम्भूमि पर्यूषणं करोति गर्तस्य
वाऽउपरिभूम्यथैवं देवत्रा तथा ह्यगर्तमिद्भवति ॥१८॥ अथाप उपनिनयति । यत्र
वा॒ऽअस्यै॑ खनन्तः॑ क्रू॒रीकु॒र्वन्त्यप॑घ्नन्ति शान्ति॒राप॒स्तद॒द्भिः शान्त्या॑ शमयति॒ तद॒द्भिः

कां० २, अ० ६, ब्रा० १, कं० ६-१६ शतपथब्राह्मण / ४३६
इसीलिए उनका 'यव' (जौ) नाम पड़ा ॥६॥
उन्होंने कहा कि सब ओषधियों में जो रस है उस सब को हम जौ में रख दें। इसलिए
जो रस सब ओषधियों में था उसको उन्होंने जौ में रख दिया। इसलिए जब ओषधियाँ सूख जाती
हैं तो जौ हरे-भरे रहते हैं क्योंकि देवों ने इनमें इस प्रकार रस भर दिया है। इसी प्रकार यजमान
भी इन्हीं जौ के द्वारा शत्रु के सब अन्नों को खींच लेता है। इसीलिए प्रोक्षणी पात्र के जलों में
जौ रहते हैं ॥१०॥
वह इस (गड्ढे) में जौ को डाल देता है इस मंत्रांश को पढ़कर-“यवोऽसि यवयास्मद्-
द्वेषो यवयारातीः" (यजु० ५।२६)-"तू जौ है तो हमसे शत्रु को हटा दे (यवय) और बुरी
बातों को हटा दे (यवय) ।" यह सब स्पष्ट है। अब जल-सिंचन करता है। जल-सिंचन का एक
ही प्रयोजन है अर्थात् यज्ञ की पवित्रता ॥११॥
वह इस मन्त्र से जल-सिंचन करता है - "दिवे त्वान्तरिक्षाय त्वा पृथिव्यै त्वा" (यजु०
५।२६)-"तुझको द्यौलोक के लिए, अन्तरिक्ष के लिए और पृथिवी के लिए।" इस प्रकार वह इन
लोकों को शक्ति और रस से पूर्ण करता है। शक्ति और रस को इन लोकों में स्थापित करता
है ॥१२॥
अब जो जल प्रोक्षणी में बच रहता है उसको सूराख में डाल देता है यह कहकर, "शुन्धन्तां-
ल्लोकाः पितृषदनाः" (यजु० ५।२६)-"जहाँ पितृ रहते हैं वे लोक शुद्ध हों।" यह जो गड्ढा
खोदा जाता है वह पितरों का है। इसको वह यज्ञ के लिए शुद्ध करता है ॥१३॥
अब वह उनमें कुश बिछा देता है। इस प्रकार कि उनके अग्रभाग पूर्व की ओर रहें और
उत्तर की ओर, यह कहकर- "पितृषदनमसि" (यजु० ५।२६)-"तू पितरों की बैठक है।" क्योंकि
इसका जितना भाग खोदा जाता है वह पितरों का होता है। मानो वह खोदा नहीं गया, वृक्षों
के साथ मिल गया। इस प्रकार वह वृक्षों के समान हो जाता है ॥१४॥
अब वह इसको इस मन्त्र से उठाता है- "उद्दिव ँस्तभानान्तरिक्षं पृण दृ ँहस्व पृथिव्याम्"
(यजु० ५।२७)-"द्यौलोक को उठा, अन्तरिक्ष को भर और पृथिवी को दृढ़ कर ।" इस प्रकार
वह इन लोकों को शक्ति और रस से युक्त करता है और इन लोकों में शक्ति और रस स्थापित
करता है ॥१५॥
अब वह उसको (गड्ढे में) गाड़ देता है, यह मन्त्र पढ़कर- "द्युतानस्त्वा मारुतो मिनोतु"
(यजु० ५।२७)-"मरुत् का पुत्र द्युतान तुझको गाड़े।" यह जो हवा चलती है उसी को 'मारुत
द्युतान' कहते हैं। उसी से वह गाड़ता है- "मित्रावरुणौ ध्रुवेण धर्मणा" (यजु० ५।२७)-"मित्र
और वरुण के दृढ़ धर्म के द्वारा।" प्राण और उदान का नाम मित्र-वरुण है। प्राण और उदान से
इसको गाड़ता है ॥१६॥
अब वह चारों ओर मिट्टी इकट्ठी करता है इस मन्त्रांश से- "ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि
रायस्पोषवनि पर्यूहामि" (यजु० ५।२७)-"मैं तुझको घेरता हूँ, हे ब्रह्मत्व के प्राप्त करनेवाले,
क्षत्रियत्व के प्राप्त करनेवाले, धन के प्राप्त करनेवाले !" यजुओं में आशीर्वाद बहुत हैं। इससे
वह ब्रह्मत्व और क्षत्रियत्व के लिए आशीर्वाद देता है। 'रायस्पोषवनि' से पुष्कलता से प्रयोजन
है। उसी पुष्कलता के लिए आशीर्वाद देता है ॥१७॥
अब वह इस मन्त्रांश को पढ़कर मिट्टी को दबा-दबाकर मजबूत करता है- "ब्रह्म दृ ँह
क्षत्रं दृ ँह्यायुर्दृ ँह प्रजां दृ ँह" (यजु० ५।२७)- "ब्रह्मत्व को दृढ़ कर, क्षत्रियत्व को दृढ़ कर
आयु को दृढ़ कर, प्रजा को दृढ़ कर ।" यही इस कर्म का आशीर्वाद है। वह इससे यही आशीर्वाद
देता है। वह इतना दबाता है कि मिट्टी भूमि के बराबर हो जाती है। या गड्ढे की भूमि कुछ
ऊँची होती है। यह ऊँचाई देवतापन हो जाती है; इसका तात्पर्य यह है कि यह गड्ढा असाधारण
हो जाता है ॥१८॥
अब वह उस पर पानी छिड़कता है। जहाँ कहीं भूमि में गड्ढा खोदते हैं तो उसमें धान
उत्पन्न कर देते हैं। जल शान्तिदायक है। जल से शान्ति देता है। इसलिए जल से सींचता

४४० शतपथ ब्राह्मण
सं॒दधा॑ति॒ तस्मा॑दप॒ उप॑निनयति ॥१९॥ अथै॑वम॒भिपद्य॑ वाचयति । ध्रु॒वासि॑ ध्रु॒वो
ऽयं यज॑मानो॒ऽस्मिन्ना॒यत॑ने प्र॒जया॑ भूया॒दिति॑ प॒शुभि॒रिति॒ वैवं यं कामं॒ काम॑यते॒
सो॒ऽस्मै॒ कामः॒ समृ॑ध्यते ॥२०॥ अथ स्रु॒वेणोप॑हत्या॒ज्यम् । विष्ट॒पम॒भि जु॑होति
घृ॒तेन॒ द्यावा॑पृथि॒वी पूर्ये॑थामि॒ति तदि॒मे द्यावा॑पृथि॒वी ऽऊ॒र्जा रसे॑न॒ भ्राञ्जय॑त्यनयो-
र्ऋ॒र्द्धं रसं॑ दधाति ते र॒सव॑त्या॒ऽउप॑जीवनीये इ॒माः प्र॒जा उ॑प॒जीव॑न्ति ॥२१॥ अथ
ह॒दि॒र्धिनि॒दधा॑ति । इन्द्र॑स्य ह॒दिरसीत्येन्द्र॑ हि॒ सदो॒ विश्व॑जनस्य छा॒येति॒ विश्व॑-
गोत्रा ह्य॒स्मिन्ब्राह्मणा आ॒सते॒ तदु॑भयतश्छ॒दिषो॒ऽउप॑दधात्युत्त॑रत॒स्त्रीणि॑ प॒रस्त्रीणि॑
ता॒नि न॒व भव॑न्ति त्रि॒वृद्धै य॒ज्ञो नव॑ वै त्रिवृत्स॒मान्नव भव॑न्ति ॥२२॥ तदु॑दीची-
न॒वश॑ सदो॑ भवति । प्राचीनव॒श हविर्धान॑मेत॒द्धै दे॒वानां॑ निष्केव॒ल्यं॒ यद्ध-
वि॒र्धानं॒ तस्मा॒त्तत्र॒ नाश्ना॑ति॒ न भ॒क्षय॑ति निष्केव॒ल्यꣳ ह्ये॒तद्दे॒वानाꣳ स यो ह॒ त-
त्राश्नी॒याद्वा॑ भ॒क्षये॑द्वा मू॒र्द्धा ह्वास्य॒ विप॑ते॒द्यैते मिथो घ॒द्यामी॒ध्रं च॒ सद॑श्च॒ तस्मा॒त्तयो-
र॒श्नन्ति॒ तस्मा॑द्भवयन्ति मिथ्ये॒ ह्येते॒ऽउदी॑ची वै मनु॒ष्याणां॒ दिक्कस्मा॒दुदी॑चीनव॒शꣳ
सदो॑ भवति ॥२३॥ तत्प॑रिश्रयति । परि॑ त्वा गिर्वणो॒ गिर॑ इ॒मा भ॑वन्तु वि॒श्वतः॑ ।
वृ॒द्धा॒युमनु॒ वृद्ध॑यो जु॒ष्टा भ॑वन्तु जु॒ष्टय॒ऽइतीन्द्रो॑ वै गिर्वा विशो॒ गिरो॒ विशैवैत-
त्क्षत्रं॒ परि॑बृꣳहति॒ तदि॒दं क्ष॒त्रमु॑भयतो वि॒शा परि॑बृꣳहम् ॥२४॥ अथ लस्यू॒जन्या॒
स्यन्द्यया॑ प्र॒सीव्य॑ति । इन्द्र॑स्य स्यूरसीत्यथ॒ ग्रन्थिं क॑रोतीन्द्र॑स्य ध्रु॒वोऽसीति॒ नेद्य-
वपद्याता॒ऽइति॒ प्रकृ॑ते॒ कर्म॑न्विष्याति॒ तथो॒ ह्वाय॑र्गुर्वा यज॑मानं वा ग्राहो॒ न वि॑-
न्दति तन्नि॒ष्ठित॑म॒भिमृशत्यैन्द्रमसीत्येन्द्र॑ हि॒ सदः॑ ॥२५॥ अथ हवि॒र्धानयोः । ज-
घनार्धꣳ सम॒न्वीक्ष्योत्त॑रेणाग्नी॒ध्रं मि॑नोति तस्या॒र्धम॒न्तर्वे॑दि स्याद॒र्धं ब॒हिर्वे॒द्यथो॒ऽअ-
पि भूयो॒ऽर्द्धाद॒न्तर्वे॑दि स्यात्कनीयो ब॒हिर्वे॒द्यथो॒ऽअपि॒ सर्व॑मेवा॒न्तर्वे॑दि स्यात्तन्नि-
ष्ठितमभिमृशति वै॒श्व॒देवमसीति द्वये॑नै॒तद्वैश्वदे॒वं यद॒स्मिन्पूर्वेद्युर्विश्वे॑ दे॒वा व॑सती-
वरी॒षूप॒वस॑न्ति॒ तेन॑ वैश्वदे॒वम् ॥२६॥ दे॒वा ह॒ वै य॒ज्ञं त॑न्वानाः । ते॒ऽसुररक्षसे-

कां० ३, अ० ६, ब्रा० १, कं० १६-२७ शतपथब्राह्मण / ४४१
है ॥१६॥
इसको छुआकर (यजमान से) कहलवाता है- "ध्रुवोऽसि ध्रुवोऽयं यजमानोऽस्मिन्नायतने
प्रजया भूयात्' (यजु० ५।२८) - "तू दृढ़ है। यह यजमान इस घर में प्रजा के साथ दृढ़ हो।"
“पशुभिः" (यजु० ५।२८) - "पशुओं के साथ।" अर्थात् जैसी-जैसी कामना हो उसी की पूर्ति
होती है ॥२०॥
अब स्रुवा में घी लेकर विष्ट (अर्थात् त्रिशूल के समान सिरे) पर डालता है, इस
मन्त्रांश से- "घृतेन द्यावापृथिवी पूर्यथाम्” (यजु० ५।२८) - "द्यौ और पृथिवी घी से भर जायें।"
इस प्रकार द्यौ और पृथिवी को ऊर्ज और रस से भर देता है। उनमें ऊर्ज और रस स्थापित
कर देता है। यह सब प्रजा ऊर्ज और रसयुक्त द्यावा-पृथिवी पर ही निवास करती हैं ॥२१॥
अब चटाई (छदि) बिछाता है, यह पढ़कर- "इन्द्रस्य छदिरसि" (यजु० ५।२८) - "तू
इन्द्र की चटाई है।" क्योंकि सदस् इन्द्र का है। "विश्वजनस्य छाया" (यजु० ५।२८) - "सब मनुष्यों
के लिए आश्रय है।" क्योंकि इसमें सब गोत्रों के ब्राह्मण बैठते हैं। इसमें दो चटाइयाँ और जोड़ता
है। फिर उनके उत्तर में तीन चटाइयाँ और उनके उत्तर में तीन और चटाइयाँ। इस प्रकार नौ
हो जाती हैं। यह त्रिवृत् (तीन भागों वाला) होता है। नौ भी त्रिवृत् होता है। इसलिए नौ
चटाइयाँ होती हैं ॥२२॥
सदस् का बांस (दक्षिण से) उत्तर को होता है, हविर्धान का पूर्व से पश्चिम को। हविर्धान
पूरा-पूरा देवताओं का होता है, इसलिए वहाँ न खाते हैं न पीते हैं। अगर कोई उसमें खाय या
पिये तो उसका सिर गिर जायगा। आग्नीध्र और सदस् दोनों में मिश्रित हैं (अर्थात् देव और
मनुष्य दोनों में उनकी गिनती है)। इसलिए इनके साथ खाना-पीना होता है, क्योंकि इन दोनों
की दोनों में गिनती है। मनुष्यों की दिशा उत्तर है, इसलिए सदस् का बांस उत्तर की ओर होता
है ॥२३॥
इस मन्त्र को पढ़कर उसको घेरते हैं- "परि त्वा गिर्वणो गिरऽइमा भवन्तु विश्वतः।
वृद्धायुमनु वृद्धयो जुष्टा भवन्तु जुष्टयः" (यजु० ५।२६, ऋ० १।१०।१२) -- "हे स्तुतियों को
पसन्द करनेवाले ! स्तुतियां चारों ओर से तुझको घेर लें। वृद्धियाँ (उन्नतियाँ) बहुत आयुवाली
हों। शक्तियां शक्तिवाली हों।" 'गिर्वा' का अर्थ है इन्द्र और 'गिरः' का जनसाधारण (विश)।
इस प्रकार वह क्षत्रिय को जन-साधारण (विश) से घेरता है। इसलिए जन-साधारण से दोनों
ओर क्षत्रिय घिरा रहता है ॥२४॥
अब वह सुई-डोरे से सीता है, यह मन्त्रांश पढ़कर - "इन्द्रस्य स्यूरसि" (यजु० ५।३०) -
“तू इन्द्र की सुई है।" फिर गाँठ देता है इस मन्त्रांश को पढ़कर - "इन्द्रस्य ध्रुवोऽसि" (यजु०
५।३०) - "तू इन्द्र का ध्रुव है।" कहीं खुल न जाय। कार्य समाप्त होने पर खोल देता है। इस
प्रकार अध्वर्यु या यजमान रोग-ग्रसित नहीं होते। कार्य की समाप्ति पर वह सदस् को छूता
है, इस मन्त्रांश को पढ़कर - "ऐन्द्रमसि" (यजु० ५।३०) - "तू इन्द्र का है।" क्योंकि सदस् इन्द्र
का ही होता है ॥२५॥
हविर्धानों में से पिछले को देखकर उत्तर की ओर आग्नीध्र शाला बनाता है। इसका
आधा वेदी के भीतर होना चाहिए और आधा बाहर, या आधे से अधिक भीतर हो और आधे
से कम बाहर, या सब भीतर ही हो। जब पूरा हो जाय तो इस मन्त्रांश से उसको छुए - "वैश्व-
देवमसि" (यजु० ५।३०) - "तू सब देवों का है।" यह सब देवों का है ही, क्योंकि इससे पूर्व के
दिन 'विश्वेदेवा' 'वसतीवरी' जलों के पास इसी में बैठते हैं (उप+वास करते हैं) ॥२६॥
एक बार यज्ञ करते हुए देवों को भय हुआ कि असुर राक्षस आक्रमण न करें। असुर

अध्याय-६, ब्राह्मण-२

४४२ शतपथ ब्राह्मण
भ्य॒ आस॑ङ्गा॒दिभ्यां॑ चक्रुस्तान्द॑क्षिण॒तोऽसु॑रर॒क्षसान्या॑सेदु॒स्तान्स॒दसॊ ऽनि॑गु॒स्तेषां॑मे-
तान्धि॒ष्ण्यानु॑द्वाप॒यां च॑क्रु॒र्द्धऽए॒तेऽन्तः॑सद॒सं ॥२७॥ सर्वे॑ ह॒ स्म वा॒ऽए॒ते पु॒रा ज्वल॑-
न्ति । य॒थायमा॑हव॒नीयो॑ य॒था गा॑र्हप॒त्यो य॒थाग्नी॑ध्रीयस्तद्यत्त॒ ए॒नानु॑द्वाप॒यंस्तत॑
ऎवैतन्न॒ ज्वल॑न्ति ताना॒ग्नीध्र॑म॒भि स॑ꣳरुरुधुस्ता॒नप्य॑र्धमा॒ग्नीध्र॑स्य नि॒गुस्ततो॒ विश्वे॑ दे॒-
वा॒ अमृत॑त्वमपा॒जयँ॒स्तस्मा॑द्धि॒ष्ण्यदे॒वम् ॥ २८॥ तान्दे॒वाः प्रति॒समै॑न्धत । यथा॒ प्रत्यव॒-
स्येत्तस्मा॑दिनात्स॒वने॑-सवनऽए॒व प्रति॒समि॑न्धते॒ तस्मा॒द्यः स॑मृ॒द्धः स आ॑ग्नी॒ध्रं कुर्या॒-
द्यो वै ज्ञातो॒ऽनूचा॑नः स स॑मृ॒द्धस्तस्मा॑दग्नी॒धे प्र॑थमाय॒ दक्षि॑णां नयन्त्य॒तो हि वि॑-
श्वे दे॒वा अ॒मृत॑त्वमपा॒जयँ॒स्तस्मा॒द्यं दी॒क्षिता॑नामब॒ल्यं वि॒न्देदा॑ग्नी॒ध्रमेनं॑ नयतेति ब्रू-
यात्तद॒नार्तं॒ तन्ना॑रिष्यतीति॒ तद्यदतो॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॒मृत॑त्वमपा॒जयँ॒स्तस्मा॑द्धि॒ष्ण्यदे॒वम्
॥२१॥ ब्राह्मणम् ॥५ [६.१]॥ चतुर्थः प्रपाठकः ॥ कण्डिकासंख्या १३२ ॥ ॥
वि॒ज्ञाता॑नो॒ हैवास्य॑ धिष्ण्या॑: । इ॒मे सम॒ङ्गा ये वै सम॒ङ्गास्ते वि॒ज्ञातान एत॒ऽउ
है॒वास्यै॒तऽआ॒त्मनः॑ ॥ १॥ दिवि॒ वै सोम॑ आसीत् । अथेदू॒ देवा॑स्ते दे॒वा अ॑काम-
यन्ता नः सोमो गच्छेत्तेनागतेन यजेमहीति त॒ऽएते॑ मा॒येऽअ॑सृजन्त सुप॒र्णीं च॑ क॒द्रूं
च वागे॒व सु॑प॒र्णीयं क॒द्रूस्ताभ्याँ॑ सम॒दं चक्रुः॑ ॥२॥ ते ह॒न्ती॒यमाने॑ऽऊचतुः ।
यत॑रा नौ द्वयोः॑ परा॒पश्या॒दात्मा॑नं नौ सा जया॒दिति॒ तथे॑ति सा ह क॒द्रूरु॑वाच
परे॑क्ष॒स्वेति॑ ॥३॥ सा ह सुप॒र्ण्यु॑वाच । अस्य सलिलस्य पा॒रेऽश्वः॑ श्वे॒त स्थाणौ॑
सेव॑ते तम॒हं प॑श्या॒मीति॒ तमे॑व त्वं प॑श्यसीति तꣳ हीत्यथ ह क॒द्रूरु॑वाच तस्य॑
वालो॒ न्य॑ष॒ञ्जि तम॒मुं वातो॑ धूनोति तम॒हं प॑श्या॒मीति॑ ॥४॥ सा यत्सु॑प॒र्ण्यु॑वाच ।
अस्य सलिलस्य पा॒रेऽश्व॒इति॑ वे॒दिर्वै स॑लिलं वे॒दिमे॑व सा तदु॑वाचाश्वः श्वे॒त स्थाणौ॑
सेवत॒ऽइत्य॒ग्निर्वाऽअ॑श्वः श्वे॒तो यूप॑ स्था॒णुरथ॒ यत्क॒द्रूरु॑वाच तस्य॒ वालो॒ न्य॑ष॒ञ्जि
तम॒मुं वातो॑ धूनोति तम॒हं प॑श्या॒मीति॑ रश॒ना हैव सा ॥५॥ सा ह सुप॒र्ण्य॑वा-
च । एही॒दं प॑ताव वे॒दितुं॒ यत॑रा नौ जय॑तीति॒ सा ह क॒द्रूरु॑वाच त्वमे॒व पत॒ त्वं

का० ३, अ० ६, ब्रा० १-२, कं० २७-२६ व १-६ शतपथब्राह्मण / ४४३
राक्षसों ने दक्षिण से आक्रमण किया और सदस् से निकाल दिया, और सदस् के भीतर जो
'धिष्ण्यः' (कुण्ड) थे उनको उलट दिया ॥२७॥
पहले ये सब कुण्ड ऐसे ही जलते थे जैसे यह आहवनीय या गार्हपत्य या आग्नीध्रीय ।
जब से उन्होंने इनको उलट दिया तब से ये नहीं जलते । उन (राक्षसों) ने (देवों को) आग्नी-
ध्रीय अग्नि तक रोक दिया । उनसे आग्नीध्रीय अग्नि का आधा भाग जीत भी लिया। वहीं से
देवों ने अमरपन को प्राप्त किया। इसलिए 'आग्नीध्रीय अग्नि' सब देवों की हो गई ॥२८॥
देवों ने उनको फिर जला लिया, क्योंकि उनका वहाँ रहना था। इसलिए प्रत्येक सोम-
याग में इनको जलाया जाता है। इसलिए जो समृद्ध (पूर्ण योग्य) हो वही आग्नीध्र का काम
करे । समृद्ध वह होता है जो ज्ञानी और वेदपाठी हो। पहले आग्नीध्र के पास दक्षिणा ले जाते
हैं। सब देवों ने यहीं अमरत्व की प्राप्ति की थी। अगर दीक्षित लोगों में किसी प्रकार की निर्बलता
(अबल्य) आ जाय तो अध्वर्यु कहे— 'इसको आग्नीध्र के पास ले जाओ।' चूंकि वह अनार्त या
दुःखरहित है इसलिए उसको भी वहाँ दुःख न होगा। चूंकि यहाँ सब देवों को अमरत्व प्राप्त हुआ
इसलिए यह 'सब देवों का' है ॥२६॥
अध्याय ६—ब्राह्मण २
धिष्ण्याँ (कुण्ड) यजमान के विजामान होते हैं, क्योंकि ये समङ्क होते हैं। जो समङ्क
हों उनको विजामान कहते हैं । (समङ्क या विजामान वे वस्तुएं होती हैं जिनके अङ्ग एक-दूसरे
के अनुकूल होते हैं, जैसे यदि मनुष्य के सिर है तो धिष्णी का भी सिर है। यदि मनुष्य के आँख है
तो धिष्णी की भी आँख है। अर्थात् एक-एक अङ्ग के स्थान में दूसरा अङ्ग होना)। उसके धड़
के अङ्ग ये हैं—॥१॥
सोम द्यौलोक में था और देव इस लोक में। देवों ने कामना की कि सोम हमारे पास आ
जावे और उस आये हुए सोम के साथ हम यज्ञ करें। उन्होंने दो माया बनाईं-सुपर्णी और कद्रू।
सुपर्णी वाणी थी और कद्रू यह भूमि । उन्होंने उनके बीच में झगड़ा करा दिया ॥२॥
तब वे झगड़ने लगीं, 'जो हममें से सबसे दूर की चीज देख लेगी वही दूसरी पर विजय
पायेगी।' कद्रू ने कहा, 'अच्छा, देख' ॥३॥
सुपर्णी ने कहा—'इस सलिल के उस पार एक श्वेत घोड़ा एक खम्भे के पास खड़ा है।
मैं उसे देख रही हूँ। क्या तू भी उसको देखती है ?' कद्रू ने कहा—'मैं देखती हूँ । उसकी पूंछ
अभी लटक रही थी। मैं देखती हूँ कि वायु इस समय उसको हिला रही है' ॥४॥
अब जब सुपर्णी ने कहा—'उस सलिल के उस पार' तो सलिल का अर्थ था वेदी ।
उससे उसका तात्पर्य वेदी से था। 'खम्भे के पास एक सफेद घोड़ा खड़ा है।' श्वेत घोड़े से तात्पर्य
यज्ञ का है और खम्भे से यज्ञ-यूप का। कद्रू ने जो कहा था कि 'इसकी पूंछ अभी लटक रही थी,
अब उसको वायु हिला रहा है। मैं उसे देख रही हूँ' यह केवल रस्सी थी ॥५॥
तब सुपर्णी ने कहा— 'चलो वहाँ तक उड़ चलें और देखें कि हममें से किसकी जीत हुई ।'

४४४ शतपथ ब्राह्मण
वै॒ न ग्राख्यास्यसि॒ यतरा॑ नौ॒ जयतीति॑ ॥ ६॥ सा॒ ह॒ सुपर्णी॒ पपात॒ । तद्ध॒ तथै॒-
वास॒ यथा॒ कद्रूरु॒वाच ता॒मागता॒मभ्युवा॑द॒ त्वमजैषी॒३रह३मिति॒ त्वमिति॒ होवा॒चै-
तदाख्यानं७ सौपर्णिकाद्रव॒मिति॑ ॥ ७॥ ॥ श॒तम् १६०० ॥ ॥ सा॒ ह॒ कद्रूरु॑वाच ।
आत्मानं॒ वै॒ व्यैतिष्ठं॑ दि॒व्यसौ॒ सोम॒स्तं दे॒वेभ्य॒ आहर॒ तेन॑ दे॒वेभ्य॑ आ॒त्मानं॒ नि-
ष्कीणीष्वेति॒ तथेति॒ सा॒ छन्दाꣳसि॑ ससृजे॒ सा॒ गायत्री॑ दि॒वः सोम॑माह॒रत् ॥ ८॥
हिरण्मयो॑र्ह कु॒श्योर॒न्तरव॑हित॒ आस॑ । ते॒ ह॒ स्म॒ नुरपवी॒ निमे॒षं-नि॑मे॒षम॑भि॒सं-
धत्तो दीक्षात्तपसौ॒ हैव॒ तेऽआ॑सतु॒स्तमे॒ते ग॑न्ध॒र्वाः सो॑म॒रक्षा जु॑गुपु॒रिमे॑ धि॒ष्ण्या इ-
मा होत्राः॑ ॥ ९॥ तयो॒रन्य॑तरां कु॒शीमा॑चिखेद । तां दे॒वेभ्यः॒ प्रद॑दौ॒ सा दीक्षा॒ त-
या देवा॒ अदी॑क्षन्त ॥ १०॥ अथ द्वितीयां कुशीमाचिखेद । तां देवेभ्यः प्रददौ तत्त्-
पस्तया देवास्तप उपायन्नुपसदस्तपो॒ ह्युपसदः ॥ ११॥ खदिरेण ह सोममाचखा-
द । तस्मात्खादिरो यदेनेनाखिदत्तस्मात्खादिरो यूषो भवति खादिरु स्फ्योऽहावा-
कस्य॒ हैन॑ गोपायतां॒ जहा॑त् सो॒ऽहावा॑को॒ऽही॑यत ॥ १२॥ त॒मिन्द्रा॒ग्नीऽअ॑नु॒समत॑-
नुताम् । प्रजा॑नां॒ प्रता॑त्यै॒ तस्मा॑दिन्द्रा॒ग्नीऽअ॑हावा॒कः ॥ १३॥ तस्मा॑द्दीक्षि॒ता रा॒जानं॑
गोपायन्ति । नेन्नो॒ऽपह्रा॒निति॒ तस्मा॒त्तत्र॑ सु॒गुप्तं॑ चिकी॒र्षेद्यस्य॑ ह गोप॒नाया॑मप॒-
हरन्ति॒ हीय॑ते ह ॥ १४॥ तस्मा॑द्ब्रह्मचा॒रिण॒ आचा॒र्य्यं गो॑पायन्ति । गृ॒हान्पश्य॑न्नेन्नो
ऽपह्रानिति तस्मात्तत्र सुगुप्तं चिकीर्षेद्यस्य ह गोपनायामपहरन्ति हीयते ह
तैनैतेन सुपर्णी देवेभ्य आत्मानं निष्क्रीणीत तस्मादाहुः पुण्यलोक ईज्ञान इ-
ति ॥ १५॥ अथाठ् ह वै पुरुषो जायमान एव । मृत्योरात्मना जायते स यद्यजते
यथैव तत्सुपर्णी देवेभ्य आत्मानं निष्क्रीणीतैवमेवैष एतन्मृत्योरात्मानं निष्क्री-
णीते ॥ १६॥ तेन देवा अयजन्त । तमेते गन्धर्वाः सोमरक्षा अन्वाजग्मुस्तेऽन्वा-
गत्याब्रुवन्नु नो यज्ञोऽयामन्नत मा नो यज्ञादन्तर्गातास्त्वेव नोऽपि यज्ञे भाग इति
॥ १७॥ ते होचुः । किं नस्ततः स्यादिति यथैवास्यामूत्र गोप्तारोऽभूमैवमेवास्या-

कां० ३, अ० ६, ब्रा० २, कं० ६-१८ शतपथब्राह्मण / ४४५
कद्रू ने कहा-'तुम्हीं जाओ और बता देना कि हममें से किसकी विजय हुई' ॥६॥
सुपर्णी वहाँ तक उड़ी और कद्रू ने जो कहा था वही ठीक निकला । जब वह वापस आई
तो कद्रू ने उससे पूछा- 'तुम जीतीं या मैं ?' उसने कहा 'तुम ।' इसको 'सौपर्णी-काद्रव
व्याख्यान कहते हैं ॥७॥ [शतम् १६००]
तब कद्रू ने कहा- 'सचमुच मैंने तुमको जीत लिया । द्यौलोक में सोम है, उसको देवों के
लिए ले आओ। और देवों के ऋण से मुक्त हो ।' यथास्तु । वह छन्दों को लाई । वह गायत्री
द्यौलोक से सोम को ले आई ॥८॥
वह (सोम) दो सोने के प्यालों के बीच में था। आँख मारते में ही वे प्याले तेज किनारो
द्वारा बन्द हो जाते थे। ये थे दीक्षा और तप । उन पर सोमरक्षक गन्धर्व देखभाल रखते थे। यही
धिष्ण्यां हैं, यही होता ॥९॥
उसने इनमें से एक प्याले को खोला और देवों को दे दिया। यह दीक्षा थी। इसी से देवों
ने अपने को दीक्षित किया ॥१०॥
अब उसने दूसरे प्याले को खोला और देवों को दिया। यही 'तप' था। इससे देवों ने
तप किया अर्थात् उपसद, क्योंकि उपसद ही तप है ॥११॥
उसने खदिर की लकड़ी से सोम को लिया (आच्छखाद), इसलिए उनका खदिर नाम
पड़ा । और चूँकि उसी के द्वारा उसने सोम को लिया, इसलिए यूप और स्फ्या खदिर की लकड़ी
के होते हैं। जब वह अच्छावाक के सुपुर्द था तब वह उसे ले गई । इसीलिए 'अच्छावाक' को सोम-
पान का अधिकार नहीं ॥१२॥
इन्द्र और अग्नि ने प्रजाओं की उत्पत्ति के लिए उसको स्थित रक्खा, इसलिए अच्छावाक्
इन्द्र और अग्नि का होता है ॥१३॥
इसीलिए दीक्षित पुरुष ही सोम राजा की रक्षा करते हैं कि गन्धर्व कहीं इसको ले न
जायें। इसलिए उचित है कि उसकी भलीभांति रक्षा की जाय। क्योंकि जिस किसी की सुपुर्दगी
में से वे सोम को ले-जायेंगे, वही (सोमपान से) बहिष्कृत कर दिया जायगा ॥१४॥
इसीलिए ब्रह्मचारी लोग अपने आचार्य, उसके घर तथा पशुओं की रक्षा करते हैं कि
कहीं वे उसको ले न जायें। इसलिए उस (सोम) की बड़ी रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि जिस
किसी की सुपुर्दगी में से वे ले जायेंगे उसी को (सोमपान से) बहिष्कृत कर दिया जायगा ।
इसी के द्वारा सुपर्णी ने देवों के ऋण से छुटकारा पाया, इसलिए कहते हैं कि यज्ञ करनेवाले पुण्य-
लोक को प्राप्त होते हैं ॥१५॥
पुरुष जब पैदा होता है तभी मृत्यु का ऋणी होता है। और जब वह यज्ञ करता है तो
मृत्यु के ऋण से छूटता है, जैसे सुपर्णी देवताओं के ऋण से छूट गई ॥१६॥
देवों ने (सोम के साथ) यज्ञ किया । सोमरक्षक गन्धर्वों ने उसका अनुसरण किया और
आकर कहने लगे- 'हमको यज्ञ में भाग दो। हमको यज्ञ से बाहर मत करो। यज्ञ में हमारा भी
भाग होना चाहिए' ॥१७॥
उन्होंने कहा-'हमको इससे क्या लाभ होगा ?' उन्होंने उत्तर दिया कि 'जैसे उस लोक

४४६ शतपथ ब्राह्मण

पी॒थु गो॒प्तारो॑ भविष्याम॒ इति॑ ॥ १८॥ तथेति॑ दे॒वा अ॑ब्रुवन् । सो॒म॒क्रय॑णा व॒ इ-
ति॒ ताने॑भ्य ए॒तत्सोमक्रय॒णान॒नुदि॑शत्यथैनान॒ब्रुवंस्तृ॒तीयसवने वो घृ॒त्याहु॑तिः प्रा-
प्त्स्यति॒ न सौम्याप॑हतो॒ हि यु॒ष्मत्सोम॑पीथ॒स्तेन॒ सोमाहु॑तिं॒ नार्ह॒थेति॒ सैनाने॑षा
तृ॒तीयसवन॒ऽएव घृ॒त्याहु॑तिः प्राप्नोति॒ न सौम्या य॒द्धालाकैर्र्धिष्ण्यानव्याघा॒रय॑ति
॥ १९॥ अ॒थ यद॒ग्नौ जुहो॑ति । तद्गो॒ऽविष्यतीति॒ स यद॒ग्नौ जुहो॑ति॒ तदे॒नानव॑तय॒-
यद॒दः सोमं॒ बिभ्र॑त उप॒र्युप॑रि चरि॒ष्यन्ति॒ तद्गो॒ऽविष्यती॑ति॒ स य॒देना॒न्त्सोमं॒ बिभ्र॑त
उप॒र्युप॑रि चर॑न्ति॒ तदे॒नानव॑ति तस्माद॒ध्व॒र्युः सम॑या धिष्ण्या॑ना॒तीया॒दध्व॒र्युर्हि॒ सोमं॒
बिभ॑र्ति॒ तन्मैते॒ व्या॑त्सि॒न प्रत्या॑सते॒ स ह्ये॑षां॒ व्यात्त॒माप॑द्येत तम॒ग्निर॒भिद॑हेद्यो वा-
ऽयं दे॒वः प॒शूनामी॒ष्टे स वा॒ ह्येनम॒भिमन्येत॒ तस्माद्य॒द्यध्व॑र्युः शाला॒या॒मर्धः स्यादु-
त्तरे॑णैवाग्नीध्री॒य॒ꣳ संच॑रेत् ॥ २०॥ ते वाऽए॒ते । सोम॑स्यैव गु॒प्त्यै न्यु॒प्ताऽआ॑हव-
नीयः पु॒रस्तान्मार्जालीयो दक्षि॑णत आग्नीध्री॒य उत्त॑रतो॒ऽथ ये सद॑सि॒ ते प॒श्चात्
॥ २१॥ तेषां वाऽअर्धानुपकिर॑न्ति । अर्धान॒नुदि॑शन्त्ये॒तऽउ॒ ह्ये॑वैतद्दधि॒रेऽर्धान् उप॑-
किरन्त्वर्धान॒नुदि॑शन्तु॒ तया॒ यस्मा॑ल्लो॒कादाग॑ताः स्मो दि॒वस्तथा॒ तं लो॒कं प्रति॒प्र
ज्ञास्याम॒स्तथा॒ न क्षिक्षा॑ ऋष्याम॒ इति॑ ॥ २२॥ स या॒नुप॑किरन्ति । तेना॒स्मिंल्लोके
प्रत्यञ्चो॑ भवन्त्यथ यान॒नुदि॑शन्ति॒ तेना॒मुष्मिँल्लो॒के प्रत्यञ्चो॑ भवन्ति ॥ २३॥ ते॑ वै द्वि-
नामानो भवन्ति । ए॒तऽउ॒ ह्ये॑वैतद्द॑धिरे न वाऽए॒भिर्नामा॑भि॒रात्स॒ येषां नः सो-
म॒मपाहु॒र्हन्त॑ द्वितीया॑नि॒ नामा॑नि कर॒वामहा॒ऽइति॒ ते द्वितीया॑नि॒ नामा॒न्यकु॑-
र्वत तैर॒राध्नुव॒न्यानप॑हृतसोमपीथा॒त्सन्तो॒ऽथ य॒ज्ञऽआ॒भवं॒स्तस्माद्विना॑मानस्तस्मा॒द्वा-
क्ष्ण्यो॒ऽनूच्य॑माने द्विती॑यं ना॑म कुर्वन्ति॒ राध्नो॑ति ह्यैव॒ य ए॒वं वि॒द्वान्द्विती॑यं॒ नाम॑
कुरु॒ते ॥ २४॥ स यद॒ग्नौ जुहो॑ति । तद्दे॒वेषु॑ जुहोति॒ तस्माद्देवाः स॒न्त्यथ॒ यत्स॒दसि॑
भ॒क्षय॑न्ति॒ तन्मनु॑ष्येषु जुहोति॒ तस्मान्मनु॑ष्याः सन्त्यथ॒ यद्धविर्धानयोर्ना॒राश॒ꣳसाः
सीद॑न्ति॒ तत्पि॒तृषु॑ जुहोति॒ तस्मात्पि॒तरः॑ सन्ति ॥ २५॥ या वै प्र॒जा य॒ज्ञेऽनन्वाभ-

का० ३, अ० ६, ब्रा० २, क० १८-२६ शतपथब्राह्मण / ४४७
में हम उसके रक्षक रहे उसी प्रकार इस भूमि पर भी रक्षक रहेंगे' ॥१८॥
देवों ने कहा—'अच्छा।' जब वह कहता है—'यह है सोम की मजदूरी।' तो इससे सोम
के मोल से तात्पर्य है। फिर उन्होंने कहा—'तीसरे सवन में जो घी की आहुति दी जायगी वह
तुम्हारी होगी। सोम का पान तुमसे छीन लिया गया है। इसलिए तुम सोम की आहुति के
अधिकारी नहीं रहे। इसलिए सायंकाल के तीसरे सवन में कुण्ड में लकड़ियों पर जो घी की
आहुति दी जाती है वही इनकी होती है, सोम की आहुति नहीं ॥१९॥
'और जो आहुति घी में दी जायगी वह तुमको तृप्त कर देगी।' इसलिए जो घी में
आहुति दी जाती है वह उनको तृप्त कर देती है। 'और वह जो सोम को चमचों के लिए ऊपर-
ऊपर फिरायेंगे उनसे इसकी तृप्ति होगी।' इसलिए यह जो सोम को चमचे में भरकर ऊपर-ऊपर
फिराते हैं उनसे इसकी तृप्ति होती है। इसलिए अध्वर्यु को चाहिए कि कुण्डों के बीच से न गुजरे
क्योंकि वह सोम के लिए होता है और वे (कुण्ड) सोम के लिए मुँह खोले बैठे होते हैं, और
वह उनके मुँह में घुस जायेगा। इसलिये या तो उसको अग्नि जला देगा या जो देव पशुओं का
अधिष्ठाता है (पशुपति, रुद्र) वह उसको पकड़ लेगा। इसलिये जब कभी अध्वर्यु का शाला में
कुछ काम हो तो वह आग्नीध्रीय अग्नि के उत्तर की ओर होकर जावे ॥२०॥
ये कुण्ड सोम की रक्षा के लिए बनाये जाते हैं—आगे आहवनीय, दाईं ओर मार्जालीय,
बाईं ओर आग्नीध्रीय और पीछे की ओर सदस् ॥२१॥
इनमें से आधे को मिट्टी डालकर ऊँचा करते हैं और आधे की ओर केवल संकेत करते
हैं। उन्हीं का यह आग्रह था कि हममें से आधों को ऊँचा करो, आधों की ओर संकेत करो।
(यहाँ 'अनुदिशन्तु' का अर्थ समझ में नहीं आया) इस प्रकार हम उस द्युलोक को जान लेंगे
जहाँ से हम आये हैं, और हम बहक न सकेंगे ॥२२॥
जो ऊँचे किये गये वे इस लोक में प्रत्यक्ष होते हैं, और जिनकी ओर संकेत करते हैं वे
उस लोक में प्रत्यक्ष होते हैं ॥२३॥
उनके दो नाम होते हैं। वस्तुतः यह उन्हीं का आग्रह था कि 'हम इन नामों से फलीभूत
नहीं हुए क्योंकि हमसे सोम ले लिया गया। अब हम दूसरे नाम रख लें।' उन्होंने दूसरा नाम
रख लिया। इससे वे सफल हो गये, क्योंकि जो सोम से वंचित हो चुके थे उनको यज्ञ में भाग
मिल गया। इसलिये दो नाम होते हैं। इसलिए यदि कोई ब्राह्मण सफल न होता हो तो दूसरा
नाम रख ले। जो इस रहस्य को समझकर दूसरा नाम रख लेता है वह फलीभूत हो जाता
है ॥२४॥
वह अग्नि में जो आहुतियां देता है वह देवों के प्रति देता है। इसी से देव स्थित रहते
हैं। और जो सदस् में खाते हैं वे मनुष्यों के प्रति देते हैं। उससे मनुष्यों की स्थिति है। हविर्धानों
में जो नाराशंस बैठते हैं वे पितरों के प्रति होते हैं। उनसे पितरों की स्थिति है ॥२५॥
अब जो ऐसी प्रजा बच रही जिसका यज्ञ में कोई भाग ही नहीं है, वह तो कहीं की नहीं

अध्याय-६, ब्राह्मण-३

-> underप॒`

  • गृह्णाति
  • पञ्च॑गृही॒तं -> under ही॒
  • `पृष॑-

दाज्यं॒ ज्योति॑रसि वि॒श्वरू॑पं॒ विश्वे॑षां दे॒वानाꣳ॑ समि॒दिति॑ वैश्वदे॒वꣳ हि पृष॑दाज्यं॒
Bars in :

  • दाज्यं॒ -> under ज्यं॒
  • ज्योति॑रसि
  • वि॒श्वरू॑पं॒ -> under वि॒, under पं॒
  • विश्वे॑षां
  • दे॒वानाꣳ॑ -> under दे॒
  • समि॒दिति॑ -> under दि॒
  • वैश्वदे॒वꣳ -> under दे॒
  • हि
  • पृष॑दाज्यं॒ -> under ज्यं॒

धार॑यन्ति स्रुचो॒ यदा॒ प्रदी॑प्त इ॒ध्मो भ॑वति ॥ ६॥ अथ॑ जु॒होति॑ । त्वꣳ सो॑म तनू॒कृ-
Bars in :

  • धार॑यन्ति
  • स्रुचो॒ -> under चो॒
  • `

कां० ३, अ० ६, ब्रा० २-३, कं० २६ व १-७ शतपथब्राह्मण / ४४६
रही। इसलिए वह इनको यहाँ यज्ञ में भाग देता है जिससे वे फलीभूत हो जायें। पशु मनुष्यों के
पीछे हैं; चिड़ियाँ, ओषधियाँ और वनस्पतियाँ देवों के पीछे हैं। इस प्रकार यहाँ जो कुछ है, सभी
को यज्ञ में भाग मिलता है। देव और मनुष्य दोनों पितरों के साथ पीते हैं। पहले यह प्रत्यक्ष रूप
से पीते थे, अब परोक्ष रूप से पीते हैं ।।२६।।
अध्याय ६—ब्राह्मण ३
जो दीक्षा लेता है वह सबको दीक्षित करता है। क्योंकि वह यज्ञ को दीक्षित करता है।
यह यज्ञ ही सब-कुछ है। जिस यज्ञ के लिए उसने दीक्षा ली थी उसको समाप्त करके मानो वह
सबको युक्त कर देता है ॥१॥
वैसर्जन आहुति इसलिये दी जाती है। चूंकि वह इस सब का विसर्जन करता है इसलिये
इसका नाम वैसर्जन है। इसलिये जिस किसी ने व्रत लिया हो वह पीछे से (यजमान को) छुए।
यदि कहीं जाना हो तो न सही। जब वह आहुति देता है तो सबका विसर्जन करता है ॥२॥
वैसर्जन आहुतियां क्यों दी जाती हैं ? यज्ञ विष्णु है। उस (विष्णु) ने देवों के लिए इस
विक्रान्ति (शक्ति) को विचक्रमे अर्थात् प्राप्त किया, जो इस समय उनको प्राप्त है—पहले पद
से इस (भूलोक) को, दूसरे से अन्तरिक्ष को, अन्तिम से द्युलोक को। इसी विक्रान्ति को यज्ञ
यजमान के लिए प्राप्त कराता है जब यजमान यज्ञ करता है। इसीलिये वैसर्जन आहुतियां दी
जाती हैं ॥३॥
तीसरे पहर वेदी में कुश रखकर, व्रत के दूध का आधा भाग यजमान और उसकी स्त्री
को देकर शाला में आते हैं, समिधा को रखते हैं और उपयमनी को बनाते हैं। (अध्वर्यु) घी को
(गार्हपत्य की) अग्नि पर रखता है। स्रुच् को मांजता है। यजमान सोम राजा को अपनी गोद
में लेता है। अध्वर्यु सोम-गौ के पद की रेणु को गार्हपत्य के पीछे फेंकता है जिससे उसकी प्रतिष्ठा
हो, क्योंकि पैरों से ही तो प्रतिष्ठा होती है (आदमी पैरों के बल ही खड़ा होता है) ॥४॥
कुछ लोग (इस रेणु के) चार भाग करते हैं। चौथाई भाग को उस उपयमनी में रखते
हैं जहाँ से आहवनीय लेते हैं। चौथाई भाग अक्ष में लगाते हैं। चौथाई भाग को (अग्नीध्रीय
अग्नि की) उपयमनी पर रखते हैं और एक-चौथाई को गार्हपत्य के पीछे फेंकते हैं ॥५॥
परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए। उसको बिल्कुल गार्हपत्य के पीछे ही फेंकना चाहिए।
घी को साफ करके जुहू और उपभृत में चार चमचे लेता है—पृषदाज्य (जमे हुए घी) के पांच
चमचे इस मन्त्र से—"ज्योतिरस विश्वरूपं विश्वेषां देवानाँ समित्" (यजु० ५।३५)—"तू
विश्वरूप ज्योति है, सब देवताओं की समिधा या ज्वाला।" क्योंकि पृषदाज्य सब देवों का है।
जब ईंधन प्रदीप्त हो जाता है तो स्रुचों को रखते हैं ॥६॥
अब वह आहुति देता है— "त्वं सोम तनूकृद्भ्यो द्वेषेभ्योऽन्यकृतेभ्यऽउरु यन्तासि वरूथँ
स्वाहा" (यजु० ५।३५)—"हे सोम, तू शरीरों को कष्ट देनेवाले, दूसरों द्वारा किये हुए द्वेषों से
बचानेवाला है। बहुत प्रकार से नियन्ता है। तू हमारे यज्ञरूपी घर की रक्षा कर।" इस प्रकार

४५० शतपथ ब्राह्मण
तिष्ठायां॑ प्रतितिष्ठत्ये॒तेने॒मं लो॒कꣳ स्पृ॑णुते ॥ ७॥ अथाग्नवे द्वितीयामाहु॑तिं जुहो-
ति । जुषाणोऽअङ्गिर॒ाऽज्यस्य॑ वेतु स्वाहेत्येष उ ह्वैत॒दुवाच रक्षोभ्यो वै बिभेमि
यथा॒ मान्त॑रा नाष्ट्रा रक्षाꣳसि॒ न हिꣳस॒न्नेवं॑ मा कनीयाꣳसमेव॒ बधात्कृत्वातिनय-
त स्तो॒कमेव॒ स्तोको॒ द्यप्तुरिति॑ त॒मेतत्कनीयाꣳसमेव॒ बधात्कृत्यात्यनयत्स्तो॒कमेव॒
स्तोको॒ द्यप्तू रक्षोभ्यो भीषा तस्मादग्नवे द्वितीयामाहुतिं जुहोति ॥ ८॥ उ॒द्यच्छ-
न्तीध्मम् । उ॒पयच्छन्त्युपयम॒नीरथाहाग्नये॒ प्रह्रिय॒माणायानु॑ब्रूहि सोमाय प्रणीयमा-
नायेति वाग्नये प्रह्रियमाणाय॒ानुब्रूहीति॑ त्वे॒व ब्रूयात् ॥ ९॥ आददते ग्राव्णः । द्रो-
णकलशं वायव्यानीध्मं कार्ष्मर्यमयान्परिधीनाश्ववालं प्रस्तर॑मे॒तद्द्वौ विधृती त्-
र्बर्हिरुपसंनद्धं भवति वपाश्रपणी रशनेऽअरणीऽअधिमन्थनः शकलो वृषणौ
तत्समादा॒य प्राञ्च॒ आयन्ति स एष॒ ऊर्ध्वो य॒ज्ञ एति॑ ॥ १०॥ तद॒ग्न्यत्सु वाचयति ।
अग्ने॒ नय॑ सुप॒था रा॒येऽअ॒स्मान्विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि वि॒द्वान् । यु॒यो॒ध्यस्मज्जु॑हुरा-
णमेनो॒ भूयि॑ष्ठां ते नम॑उक्तिं विधेमेत्यग्निमेवैतत्पुरस्तात्करोत्यग्निः पुरस्तान्नाष्ट्रा
रक्षाꣳस्यपघ्नन्नेत्यथाभयेनानाष्ट्रेण हरन्ति तऽआयन्त्यागच्छन्त्याग्नीध्रं तमाग्नीध्रे निद-
धाति ॥ ११॥ स निहि॑ते जुहोति । अ॒यं नोऽअ॒ग्निर॑वरिवस्कृणोत्वयं मृधः पुर॑ एतु
प्रभि॒न्दन् । अ॒यं वाजा॑ञ्जयतु वाज॑साताव॒यं शत्रू॑ञ्जयतु जूर्ष॑माणः स्वाहेति॒ तदे-
तेनैवैतस्मिन्नन्तरिक्षे प्रतिष्ठायां प्रतितिष्ठत्येतेनै॒तं लो॒कꣳ स्पृ॑णुते ॥ १२॥ तदेव नि-
दध॑ति ग्रावा॑णः । द्रोणकलशं वायव्यान्येतरमादावायन्ति तदुत्तरेणाहवनीयमुप-
सादयन्ति ॥ १३॥ प्रोक्ष॑णीर॒ध्वर्यु॒राद॑त्ते । स॒ इध्ममेवाग्रे प्रोक्षत्यथ वेदिम॒थास्मि॑ ब-
र्हिः प्रयच्छ॑न्ति तत्पुरस्तादन्वञ्च॒ासादय॑ति तत्प्रोक्ष्योपनिनीय विस्रꣳस्य ग्रन्थिमाश्र्व-
वालः प्रस्तर् उपसंनद्धो भव॑ति तं गृह्णाति गृहीत्वा प्रस्तर॑मेकवृद्बर्हि स्तृणाति
स्तीर्त्वा॑ बर्हिः कार्ष्मर्यमयान्परिधीन्परि॑दधाति परिधाय परिधीत्समिधावभ्यादधा-
त्यभ्याधाय॑ समिधौ ॥ १४॥ अथ जुहोति । उ॒रु विष्णो वि॒क्रमस्वोरु क्षया॑य न॒-