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सर्वकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 451, कुल 699 में से

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पृष्ठ 451

कां० ३, अ० ५, ब्रा० ४, कं० ३-१२ शतपथब्राह्मण / ४३३
हो तो वह इन उपरवों के द्वारा उसको खोद डालता है। इसलिए उपरव बनाये जाते हैं।
दक्षिणी हविर्धान के आगे के भाग में उपरवों को बनाता है ॥३॥
वह खुरपी (अभ्रिम्) उठाता है, इस मन्त्र को पढ़कर—"देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे-
ऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्। आददे नार्यसि" (यजु० ५।२२)—"देव सविता की प्रेरणा
से अश्विन की दोनों भुजाओं और पूषा के दोनों हाथों से तुझको लेता हूँ। तू नारी है।" इस
यजु० का तात्पर्य भी वैसा ही है। खुरपी स्त्री है, इसलिए कहा 'तू नारी है' ॥४॥
वह एक प्रादेश (बालिश्त) छोड़कर रेखा खींचता है इस मन्त्र को पढ़कर—"इदमहँ,
रक्षसां ग्रीवांऽअपिकृन्तामि" (यजु० ५।२२)—"यह मैं राक्षसों की गर्दन काटता हूँ।" खुरपी वज्र
है। वज्र से ही वह राक्षसों की गर्दन काटता है ॥५॥
(इन उपरवों का चिह्न इस प्रकार बनाया जाय) पहले अगलों में से दायाँ, फिर पिछलों
में का बायाँ। फिर पिछलों का दायाँ, फिर अगलों का दायाँ ॥६॥
कुछ लोग इससे उलटा बताते हैं अर्थात् पहले पिछलों का बायाँ, फिर अगलों का बायाँ
या एक ही दिशा में ले। परन्तु अन्त में उसको लेना चाहिए जो बायाँ है ॥७॥
फिर जिस क्रम से चिह्न बनाया उसी प्रकार खोदना चाहिए, इस मन्त्रांश को पढ़कर—
"बृहन्नसि बृहद्रवा" (यजु० ५।२२)—"तू बड़ी है, बड़े शब्दवाली।" उसी की बड़ाई करता है
जब कहता है कि 'बृहन्नसि' इत्यादि। "बृहतीमिन्द्राय वाचं वद" यजु० ५।२२)—"इन्द्र के लिए
बड़ी वाणी बोल।' इन्द्र यज्ञ का देवता है। हविर्धान विष्णु का है। वह इस मन्त्र (बृहती इत्यादि)
को पढ़कर इनका इन्द्र के साथ सम्बन्ध जोड़ता है ॥८॥
"रक्षोहणं वलगहनं" (यजु० ५।२३)—"राक्षसों के मारनेवाले और जादू-टोने के मारने-
वाले।" ये राक्षसों और टोनों को नष्ट करने के लिए खोदे जाते हैं। "वैष्णवीम्" (यजु०
५।२३), क्योंकि हविर्धान की जो वाणी है वह विष्णु की है ॥९॥
जैसा-जैसा खोदता है वैसे-वैसे (उसी क्रम से) मिट्टी को फेंकता है यह मन्त्रांश पढ़कर—
"इदमहं तं वलगमुत्किरामि यं मे निष्ठ्यो यममात्यो निचखान' (यजु० ५।२३)—"मैं उस टोने
को उखाड़कर फेंकता हूँ जो मेरे पुत्र या सम्बन्धी ने मेरे लिए गाड़ दिया हो।" पुत्र या सम्बन्धी
टोने को घर में गाड़ता है। यह उसी को उखाड़कर फेंक देता है ॥१०॥
"इदमहं तं वलगमुत्किरामि यं मे समानो यमसमानो निचखान" (यजु० ५।२३)—"मैं
इस-उस टोने को खोदकर फेंकता हूँ जिसको मेरे बराबरवाले ने गाड़ा हो या बे-बराबरवाले
ने।" समान या असमान पुरुष जिस जादू-टोने को गाड़ता है उसी को उखाड़कर फेंकता
है ॥११॥
"इदमहं तं वलगमुत्किरामि यं मे सबन्धुर्यमसबन्धुर्निचखान' (यजु० ५।२३)—"मैं इस-
उस टोने को खोदकर फेंकता हूँ जिसको मेरे सम्बन्धी (सबन्धु) या (असबन्धु) ने गाड़ा हो।"