शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
का० १, अ० ७, ब्रा० ३, कं० १-१० शतपथब्राह्मण / १४१
है। यवा और अयवा, जिसको 'यवा' भी कहते हैं, इससे ही 'होता' सम्बन्धित होता है,
इसलिये उसको 'याविहोत्र' कहते हैं ॥२६॥
अध्याय ७—ब्राह्मण ३
यज्ञ से ही देवों ने द्यौलोक को प्राप्त किया। जो देव पशुओं का अधिष्ठाता था वह यहीं
रह गया, इसलिए उसको 'वास्तव्य' कहा, क्योंकि वह वहाँ 'वास्तु' अर्थात् वेदि में रह
गया ॥१॥
जिस यज्ञ के द्वारा देव द्यौलोक को चढ़े थे, उसी यज्ञ से वे पूजा और परिश्रम करते रहे।
अब जो पशुओं का अधिष्ठाता देव था और जो यहीं रह गया था—॥२॥
उसने देखा 'अरे ! मैं यहाँ रह गया, ये मुझे यज्ञ से निकाले दे रहे हैं !' वह उनके पीछे-
पीछे चढ़ा और अपने (शस्त्र को) उठाकर उत्तर की ओर चला। यह स्विष्टकृत् आहुति का
समय था ॥३॥
वे देव बोले—' (शस्त्र) मत मार।' (उन्होंने कहा) 'मुझे यज्ञ से बहिष्कृत न करो।
मेरे लिए आहुति दो।' देवों ने कहा—'अच्छा।' उसने शस्त्र हटा लिया; न मारा, न किसी को
सताया ॥४॥
ये देव बोले—'जितनी हवियां हमारे लिए ली गईं, वे सब दी जा चुकीं। अब सोचो
जिससे इसके लिए एक आहुति दे सकें' ॥५॥
उन्होंने अध्वर्यु से कहा—'पूर्व की भांति हवियों के ऊपर घी छोड़ो (अभिधारय)।
एक अवदान (भाग) के लिए फिर पूरा करो। और फिर एक-एक भाग अलग-अलग कर
दो' ॥६॥
अध्वर्यु ने पूर्व की भाँति हवियों पर घी छोड़ा, एक भाग के लिए फिर पूरा किया और
तैयार करके एक-एक भाग को अलग किया। इसलिये उस रुद्र को वास्तव्य कहा, क्योंकि यज्ञ में
दी हुई आहुतियों की हवि में से जो कुछ बच रहता है उसको 'वास्तु' कहते हैं। इसलिये जिस
किसी देवता के लिए 'हवि' दी जाती है, सब जगह 'स्विष्टकृत्' (अर्थात् अग्नि) को पीछे से
आहुति देते हैं, क्योंकि सर्वत्र ही देवों ने अग्नि को पीछे से भाग दिया ॥७॥
वह अग्नि के लिए ही दी जाती है। अग्नि ही वह देव है। उसके ये नाम हैं—'शर्व'
पूर्व के लोग कहते हैं, 'भव' बाहीक लोग कहते हैं, 'पशुओं का पति', 'रुद्र', 'अग्नि'। उसमें
और नाम अशान्त अर्थात् अशुभ हैं। केवल 'अग्नि' एक नाम ही शान्त या शुभ है, इसलिये यह
आहुति 'अग्नि' (स्विष्टकृत्) के लिए दी जाती है ॥८॥
उन्होंने कहा—'जो आहुति हमने तुझ दूर ठहरे हुए को दी, उसे तू हमारे लिए स्विष्ट
(हितकर) बना दे।' उसने उनके लिए उस आहुति को शुभ कर दिया, इसलिये उसका नाम
'स्विष्टकृत्' हुआ ॥९॥
वह (होता) अनुवाक्य को बोलकर देखता है कि किन्हों ने अग्नि स्विष्टकृत् को लिया।
'अग्नि, अग्नि के प्रिय धामों को दे।' इससे अग्नि के आज्य भाग का तात्पर्य है 'सोम के प्रिय धामों
प्रि॒या धामा॑नीति॒ तत्सौ॑म्य॒माज्य॑भागमा॒हाया॑ऽग्नेः प्रि॒या धामा॑नीति॒ तद्य॑ ए॒ष उ॒भ-
य॒त्राच्यु॑त॒ आग्ने॒यः पु॒रोडाशो॑ भव॒ति तमा॑ह ॥ १०॥ अथ॒ यथा॑दैवतम् । अया॒डिद॑-
वा॒नामाज्य॑पानां प्रि॒या धामा॑नीति॒ तत्प्र॑याजा॒ननु॑याजा॒नाह॑ प्रयाजा॒ननु॑याजा॒ वै देवा॑
आज्य॑पा॒ यद्यद॑ग्नेर्होतुः प्रि॒या धामा॑नीति॒ तद॒ग्नि॑ होता॑रमाह॒ तद॑स्मा॒ऽए॒तां देवा॑
आहु॑तिं कल्पयित्वा॒थैनैतद्यू॒तः स॒मशा॑म्यन्प्रि॒यऽए॒नं धाम॑न्नुपा॒ह्वयन्त॒ तस्मा॑दे॒वꣳ सं-
प॑श्यति ॥ ११॥ तद्वैके॑ । दे॒वतां॑ पू॒र्वी कु॑र्वन्त्यथा॒घा॒रम॑ग्नेरया॒ट्सोम॑स्याया॒डिति॒ तदु॑
तथा॒ न कु॑र्याद्विलोम ह॒ ते य॒ज्ञे कु॑र्वन्ति॒ ये दे॒वतां॑ पू॒र्वी कु॑र्वन्त्यथा॒घा॒रादि॒द्ध ह्य॑
प्र॒थम॒मभिव्या॑हरन्नथा॒घा॒रमे॒वाभि॑व्याहरति॒ तस्मा॑दघा॒रमे॒व पू॒र्वं कु॑र्यात् ॥ १२॥
यक्ष॒त्त्वं म॑हि॒मान॒मिति॑ । यत्र॒ वाऽअ॒दो दे॒वता॒ आवा॑हयति॒ तदपि॒ स्वं म॑हि॒मा-
न॒मावा॑हयति॒ तद॑तः प्रा॒ङ्ङिव॒ किं चन स्वाय॑ महि॒म्नऽइ॑ति क्रियते॒ तद॑त्र॒ तं प्रीणा॑-
ति तथो॒ हास्यैषो॒ऽमोघा॒यावा॑हितो भवति॒ तस्मा॑दाह यक्ष॒त्त्वं म॑हि॒मान॒मिति॑
॥ १३॥ आ यज॑ता॒मेड्या॒ इष॒ इति॑ । प्र॒जा वाऽइष॒स्ता ए॒वैतद्याज॑युकाः करोति॒ ता
इ॒माः प्र॒जा यज॑माना॒ अर्च॑न्त्यः श्रा॒म्यन्त्यश्चर॑न्ति ॥ १४॥ सोऽअ॑ध्व॒रा जा॒तवे॑दा जुष॒-
ताꣳ ह॒विरिति॑ । तय्य॒द्वैवैतत्समृ॑द्धिमा॒शास्ते॒ यदि॒ देवा॑ ह॒विर्जुष॑न्ते॒ तेन॒ हि म-
ङ्क्ष्यति॒ तस्मा॑दाह जुष॒ताꣳ ह॒विरिति॑ ॥ १५॥ तय्य॒देते॒ऽअत्र॑ । याज्यानुवाक्ये॑
ऽअ॑वकॢप्ततमे भवतस्तृतीयसवनं वै स्विष्टकृद्वैश्वदेवं वै तृतीयसवनं पिप्रीहि॑ दे॒-
वांशा॒ऽउश॑तो यविष्ठेति तदनुवाक्यायै वैश्वदेवमग्ने॒ यद॒द्य विशो॒ऽअ॑ध्व॒रस्य॑ होत॒-
रिति तय्याज्यायै वैश्वदेवं तय्य॒देते॒ऽए॒वꣳरू॑पे भवतस्तेनो॒ऽए॒ते तृतीयसवनस्य रूपं
तस्मा॒द्वाऽए॒ते॒ऽअत्र॑ याज्यानुवाक्ये॒ऽअ॑वकॢप्ततमे भवतः ॥ १६॥ ते वै त्रि॒ष्टुभौ भ॑-
वतः । वास्तु॒ वाऽए॒तद्य॒ज्ञस्य॒ यत्स्वि॑ष्ट॒कृद्वीर्यं॑ वै वा॒स्त्विन्द्रि॒यं वीर्यं॑ त्रि॒ष्टुबिन्द्रि॒-
य॑मे॒वैतद्वीर्यं॑ वा॒स्तौ स्वि॑ष्ट॒कृति॑ दधाति॒ तस्मात्ति॒ष्टुभौ भ॑वतः ॥ १७॥ उ॒तोऽअनु॑-
ष्टुभावे॒व भ॑वतः । वा॒स्त्वनु॑ष्टुब्वा॒स्तु स्वि॑ष्ट॒कृदास्तावे॒वैतदा॑स्तु दधाति॒ पेसुकं॑ वै
का० १, अ० ७, ब्रा० ३, कं० १०-१८ शतपथब्राह्मण / १४३
को दे।' इससे सोम आज्य का तात्पर्य है। 'अग्नि के प्रिय धामों को दे'—इससे जो अग्नि का
पुरोडाश है उससे तात्पर्य है ॥१०॥
अब देवताओं के लिए—'वह आज्य पीनेवाले देवों के लिए प्रिय धामों को देवे।' इससे
प्रयाज और अनुयाज से तात्पर्य है, क्योंकि प्रयाज और अनुयाज ही आज्य पान करनेवाले देव
हैं। 'वह होता अग्नि के प्रिय धामों का यज्ञ करे।' यहाँ अग्नि का होता के रूप में तात्पर्य है।
क्योंकि जब देवों ने उसके लिए अलग आहुति विचार कर ली, उन्होंने उसको इसके द्वारा शान्त
किया, और उसको उसके प्रिय धाम (पदार्थ) के लिए बुलाया। इसी प्रयोजन से वह इस प्रकार
सोचता है ॥११॥
कुछ लोग अयाट्कार से पहले देवताओं का नाम लेते हैं। इस प्रकार—'अग्नेः अयाट्'
(अग्नि का [भाग] देवें)। 'सोमस्य अयाट्' (सोम का [भाग] देवें)। परन्तु ऐसा नहीं करना
चाहिए, क्योंकि जो 'अयाट्' से पहले देवता का नाम लेते हैं, वे यज्ञ का क्रम बिगाड़ देते हैं।
क्योंकि 'अयाट्' पहले कहकर ही यज्ञ में जो पहले कहना चाहिए वह कहा जाता है, इसलिये
पहले अयाट्कार ही कहना चाहिए॥१२॥
अब होता अग्नि को सम्बोधन करके कहता है- "यज्ञत् स्वं महिमानम्"- 'अपनी महिमा
के लिए यज्ञ करे।" जहाँ इस प्रकार अग्नि के द्वारा देवताओं का आवाहन करता है वह (अग्नि
की) निज महिमा का भी आवाहन करता है। इससे पहले उसकी निज महिमा के लिए कुछ नहीं
किया गया, इसलिये इस प्रकार उसको प्रसन्न करता है। इसलिये (अग्नि की स्थापना) विद्या
निवारण के लिए होती है। इसलिये कहा- 'अपनी महिमा के लिए यज्ञ करे' ॥१३॥
अब कहता है- "आ यजतामेज्या इषः"- "यज्ञ के योग्य अन्न का यज्ञ किया जाय।"
इष (अन्न) का अर्थ है यहाँ 'प्रजा' से। इस प्रकार प्रजाओं को यज्ञ करने के प्रति उत्साही बनाता
है। ये प्रजा के लोग यज्ञ, पूजा और श्रम करते रहते हैं। ('प्रजा' का अर्थ उत्पन्न हुए प्राणी
आदि) ॥१४॥
अब कहता है- "अध्वरा जातवेदा जुषताꣳ हविः"- "हानि न पहुँचानेवाले और सब
उत्पन्न हुए पदार्थों को जाननेवाले (देव) पवित्र हवि को करें।" इस प्रकार वह यज्ञ की समृद्धि
को चाहता है। क्योंकि यदि देवों ने हवि ले ली तो मानो उसकी बड़ी सफलता हो गई, इसलिये
कहता है- 'हवि को ले' ॥१५॥
यहाँ 'याज्य' और 'अनुवाक्य' बहुत-कुछ एक-से हो जाते हैं। स्विष्टकृत् तृतीय सवन
(सायंकाल का यज्ञ) है। तृतीय सवन विश्वे देवों का होता है। "पिप्रीहि देवाँ उशतो यविष्ठ।"—
"हे सबसे युवा ! तुम इच्छुक देवों को प्रसन्न करो।" यह अंश अनुवाक्य का वैश्वदेव के लिए है।
"अग्ने यदद्य विशोऽध्वरस्य होतः"- "हे यज्ञ के होता अग्नि ! जो तुम आज लोगों के पास
(आओ)।" याज्य का यह भाग वैश्व देवों के लिए है। चूंकि इन दोनों का ऐसा रूप है इसलिये
यह तृतीय सवन का रूप है। इसीलिये इस स्थान पर याज्य और अनुवाक्य बहुत-कुछ एक-से हो
जाते हैं ॥१६॥
ये दोनों त्रिष्टुभ् के होते हैं। यज्ञ में जो स्विष्टकृत् है वह वास्तु के समान है। वास्तु
वीर्यहीन अर्थात् निर्बल होती है। त्रिष्टुभ् वीर्यवान् है। इस प्रकार स्विष्टकृत् में वीर्य (बल)
धारण कराता है। इसीलिये ये दोनों त्रिष्टुभ् हैं ॥१७॥
या वे दोनों अनुष्टुभ् होते हैं। अनुष्टुभ् वास्तु है। स्विष्टकृत् वास्तु है। इस प्रकार वास्तु
तिभिः स॒म॑सृजे॒तैत॑स्य गृ॒हाः प॒शव॒
उ॒पमूर्य॑माणा ई॑यु॒स्तस्मा॑द॒भ्यर्ध॒ऽइवे॑तराभ्य॒ आहु॑तिभ्यो जुहोति ॥ २१ ॥ ए॒ष वै य॒-
ज्ञः । येन॒ तद्दे॑वा दि॒वमुपोद॑क्राम॒न्नेष आ॑हवनी॒योऽथ॒ य इ॒हाही॑यत॒ स गार्हप-
त्य॒स्तस्मा॑दे॒तं गार्हपत्यात्प्राञ्च॒मुद्ध॑रन्ति ॥ २२ ॥ तं वाऽअ॒ष्टासु॒ विक्र॑मेष्वाद॒धीत॑ ।
अ॒ष्टाक्ष॑रा॒ वै गा॑य॒त्री गा॑य॒त्र्यैवैतद्दि॒वमुपोत्क्रा॑मति ॥ २३ ॥ एका॑दशस्वाद॒धीत॑ । ए॒-
काद॑शाक्षरा॒ वै त्रि॒ष्टुप्त्रिष्टुभैवैतद्दि॒वमुपोत्क्रा॑मति ॥ २४ ॥ द्वाद॑शस्वाद॒धीत॑ । द्वाद॑-
शाक्षरा वै जग॑ती॒ जग॑त्यैवैत
कां० १, अ० ७, ब्रा० ३, कं० १८-२८ शतपथब्राह्मण / १४५
में वास्तु रखता है। उसका घर फूलता-फलता है, उसकी सन्तान और पशु फूलते-फलते हैं, जो
इस रहस्य को समझता है और जिसके (अनुवाक्य तथा याज्य) अनुष्टुभ् होते हैं ॥१८॥
भाल्लबेय ने अनुवाक्य को अनुष्टुभ् छन्द में किया और याज्य को त्रिष्टुभ् में, जिससे
दोनों का फल मिल जाय । वह रथ से गिर गया और बाहु टूट गये। उसने सोचा--'कोई काम
मुझसे ऐसा हुआ है जिसके कारण यह गति हुई ।' इसपर उसने समझा कि 'मैंने यज्ञ के क्रम को
विलोम (उलटा) कर दिया।' इसलिये यज्ञ के क्रम को विलोम नहीं करना चाहिए । (याज्य
और अनुवाक्य) एक ही छन्द में होना चाहिए चाहे अनुष्टुभ् में या त्रिष्टुभ् में ॥१९॥
वह (स्विष्टकृत् के लिए हवियों को) उत्तरी भाग में से काटता है और (कुण्ड के)
उत्तरी भाग में आहुति देता है। इस देव की यही दिशा है। इसलिये वह उत्तरी भाग में से काटता
है और उत्तरी भाग में आहुति देता है। इसी दिशा में वह उत्पन्न हुआ और इसी दिशा में शान्त
किया गया। इसलिये उत्तरी भाग से काटकर उत्तरी भाग में आहुति देता है ॥२०॥
वह इन आहुतियों के इसी ओर (सामने ही) आहुति देता है और आहुतियों के पश्चात्
ही प्रजाएं होती हैं। स्विष्टकृत् रुद्र की शक्ति (रुद्रियः) है। यदि वह (स्विष्टकृत् आहुति को)
अन्य आहुतियों से मिला दे तो मानो वह पशु पर रुद्र की शक्ति को लाये और उसके घर और पशु
नष्ट हो जायें। इसलिए स्विष्टकृत् (आहुति) को अन्य आहुतियों के इधर ही देता है ॥२१॥
यह वही यज्ञ था जिससे देव द्यौलोक को चढ़ गये, अर्थात् यह आहवनीय अग्नि। जो
पीछे वहां रह गई वह गार्हपत्य अग्नि है। इसलिये वे इस (आहवनीय अग्नि) को गार्हपत्य अग्नि
से लेते हैं जिससे वह उसकी पूर्व की ओर रहे (उसका प्राथम्य हो) ॥२२॥
उस (आहवनीय अग्नि) को (गार्हपत्य अग्नि से) आठ पग की दूरी पर रक्खे। आठ
अक्षर की गायत्री होती है। इस प्रकार वह गायत्री के द्वारा द्यौ को चढ़ता है ॥२३॥
या वह ग्यारह पग पर रक्खे। ग्यारह अक्षर का त्रिष्टुभ् होता है। इस प्रकार वह
त्रिष्टुभ् के द्वारा द्यौ लोक को चढ़ता है ॥२४॥
या बारह पगों की दूरी पर रक्खे। बारह अक्षर की जगती होती है। जगती के द्वारा ही
वह द्यौलोक को चढ़ता है। यहाँ कोई मात्रा निश्चित नहीं है। जहाँ मन चाहे वहीं रख दे। थोड़ा
ही पूर्व की ओर भी रक्खे तो उससे भी द्यौलोक को चढ़ सकता है ॥२५॥
कुछ लोग कहते हैं कि आहवनीय पर ही हवियों को पकावे, क्योंकि इसी से देव द्यौलोक
को चढ़े थे और इसी से ये पूजा और श्रम करते रहे। उसी में हम हवियों को पकावें, उसी में
यज्ञ करें। यदि गार्हपत्य पर पकावेंगे तो अपस्खल होगा (अनुचित होगा)। यह आहवनीय यज्ञ है।
इस प्रकार यज्ञ में यज्ञ को करते हैं ॥२६॥
परन्तु गार्हपत्य पर भी पकाते हैं। (उनकी युक्ति यह है कि) यह तो आहवनीय है। यह
इस काम के लिए तो है नहीं कि उस पर बिना पकाया हुआ पकाया जाय। यह तो इसलिए है कि
उस पर पकाये हुए की आहुति दी जाय। इसलिए (हमारी सम्मति में) जहाँ इच्छा हो वहाँ
पकावे ॥२७॥
यज्ञ ने कहा 'मुझे नंगेपन से डर लगता है।' (उससे पूछा गया कि) 'तेरे लिए अ-नंगापन
अध्याय-७, ब्राह्मण-४
१४६ शतपथ ब्राह्मण
का॒ तेऽन॒मति॒त्यभि॑त ए॒व मा॒ परि॑स्तृणी॒युरि॑ति॒ तस्मा॑दे॒तद॒ग्निम॑भि॒तः परि॑स्तृणन्ति
तृ॒ष्णायै॒ वै बि॑भेमीति॒ का ते॑ तृप्ति॒रिति॑ ब्राह्म॒णस्ये॑व तृप्ति॒मनु॑तृप्येय॒मिति॒ तस्मा॑-
त्सं॑स्थिते य॒ज्ञे ब्रा॑ह्म॒णं त॑र्पयित॒वै ब्रू॑याद्य॒ज्ञमे॒वैतत्त॑र्पयति ॥ २८ ॥ ॥ ब्राह्मणम् ॥
१ [७. ३.] ॥ ॥
प्र॒जाप॑तिर्ह॒ वै स्वां दु॑हि॒तर॑मभिद॒ध्यौ । दि॒वं वो॒षसं॑ वा मिथु॒न्येना॑या स्यामि॒-
ति ताꣳ सं॑बभूव ॥ १ ॥ तद्धै दे॒वाना॒माग॑ आस । य इ॒त्थꣳ स्वां दु॑हि॒तर॑मस्माकं॒
स्वसा॑रं करो॒तीति॑ ॥ २ ॥ ते ह॒ देवा॑ ऊचुः । योऽयं दे॒वः प॑शूना॒मीष्टे॑ऽति॒संधं॑ वा
ऽअय॑ चरति॒ य इ॒त्थꣳ स्वां दु॑हि॒तर॑मस्माकं॒ स्वसा॑रं करो॒ति वि॒ध्येम॒मिति॒ तꣳ
रु॒द्रोऽभ्या॒यत्य॑ विव्याध॒ तस्य॑ सा॒मि रेत॑: प्रचस्कन्द॒ तथै॒तन्नू॒नं त॒दास॑ ॥ ३ ॥ तस्मा॑दे-
तदृषि॒णाभ्य॑नूक्तम् । पि॒ता यत्स्वां दु॑हि॒तर॒मधि॒ष्कन् क्ष्म॒या रेत॑: संजग्मा॒नो निषि॑-
ञ्च॒दिति॑ तदाग्निमारु॒तमित्यु॒क्त्यं॒ तस्मिं॒स्तद्व्या॒ख्याय॑ते॒ यथा॒ तद्दे॒वा रेत॑: प्राज॑नयं॒स्तेषां॑
य॒दा दे॒वानां॑ क्रो॒धो व्यै॒दथ॑ प्रजा॒पति॑मभिषज्यं॒स्तस्य॒ तꣳ श॒ल्यं निर॑कृन्त॒न्त्स वै य॒ज्ञ
ए॒व प्र॒जाप॑तिः ॥ ४ ॥ ते हो॑चुः । उप॑जानीत॒ यथे॒दं नामु॒यासत्क॒नीयो॒ ह्यङ्गैत॑र्य॒थे-
दꣳ स्या॒दिति॑ ॥ ५ ॥ ते हो॑चुः । भगा॑यैनद्दक्षिण॒त आसी॑नाय॒ परि॑हरत॒ तद्भग॑: प्रा-
शि॒ष्यति॒ तथ्याथा॑ऽङ्गतमे॒वं भ॑वि॒ष्यती॑ति॒ तद्भगा॑य दक्षिण॒त आसी॑नाय॒ पर्या॑जह्रु॒स्तद्-
गोऽवेक्षां॑ चक्रे तस्या॒क्षिणी॑ निर्ददाह॒ तथै॒तन्नू॒नं त॒दास॒ तस्मा॑दाहुरद॒न्तो भग॒ इति॑
॥ ६ ॥ ते हो॑चुः । नो न्वे॒वात्रा॑शमत्पू॒ष्ण ऽएनत्परि॑हर॒तेति॒ तत्पू॒ष्णे पर्या॑जह्रु॒स्तत्पूषा॒
प्राश॒ तस्य॒ दतो॒ निर्ज॑घान॒ तथै॒तन्नू॒नं त॒दास॒ तस्मा॑दाहुरद॒न्तः पू॒षेति॒ तस्मा॒द्यं पू॒ष्णे
च॒रुं कुर्व॑न्ति प्रपि॒ष्टाना॑मे॒व कुर्व॑न्ति यथाद॒न्तक॑यै॒वम् ॥ ७ ॥ ते हो॑चुः । नो न्वे॒वा-
त्राश॑मद्बृह॒स्पतय॑ ऽएनत्परि॑हर॒तेति॒ तद्बृह॒स्पत॑ये॒ पर्या॑जह्रुः स॒ बृह॒स्पति॑: सवि॒तार॑-
मे॒व प्रस॒वायोपा॑धावत्सवि॒ता वै दे॒वानां॑ प्रसवि॒तेदं मे॑ प्रसु॒वीति॒ तद॑स्मै सवि॒ता
प्र॒सवि॒ता प्रासु॑वत्त॒देनꣳ॑ सवि॒तृप्र॑सूतं॒ नाहि॑न॒त्ततो॒ऽर्वाची॑नꣳ शा॒न्तं तदे॒तन्निदा॑नेन
कां० १, अ० ७, ब्रा० ४, कं० १-८ शतपथब्राह्मण / १४७
क्या है ?' (उसने उत्तर दिया) 'मेरे चारों ओर कुशा दो।' इसलिए यज्ञ के चारों ओर कुश बिछाते
हैं। (यज्ञ ने कहा), 'मुझे प्यास से डर लगता है।' (उन्होंने पूछा) 'तेरी तृप्ति कैसे होती है?'
(उसने उत्तर दिया) 'ब्राह्मण की तृप्ति से मेरी तृप्ति होती है।' इसलिए यज्ञ की समाप्ति के
पश्चात् ब्राह्मण की तृप्ति करने के लिए बोलना चाहिए, क्योंकि इससे यज्ञ की तृप्ति होती
है ॥२८॥
अध्याय ७—ब्राह्मण ४
प्रजापति अपनी लड़की अर्थात् द्यौ या उषा पर मोहित हो गये और प्रसंग की इच्छा हुई;
उससे प्रसंग किया ॥१॥
देवों के लिए यह पाप था कि यह अपनी ही लड़की, हमारी बहिन के साथ ऐसा करता
है ॥२॥
उन देवों ने उस देव से जो पशुओं का अधिष्ठाता (रुद्र) है कहा कि यह जो पाप करता
है कि अपनी ही लड़की, हमारी बहिन के साथ ऐसा करता है, उसको बांध दो। रुद्र ने निशाना
ताककर उसे बींध दिया। उसका आधां वीर्य गिर पड़ा। यह ऐसे हुआ ॥३॥
इसीलिए ऋषि ने ऐसा कहा, 'जब पिता ने अपनी ही लड़की से प्रसंग किया तो उसका
वीर्य भूमि पर गिर पड़ा' (ऋग्वेद १०।६१।७)। यह अग्नि-मारुत् उक्थ (गीत) हो गया। इसी
सम्बन्ध में आख्यायिका है कि किस प्रकारदेवों ने इस वीर्य को उपजाया। जब देवों का क्रोध कम
हुआ तो प्रजापति का इलाज किया और उस (रुद्र) का तीर निकाला, क्योंकि यज्ञ ही प्रजापति
है ॥४॥
उन्होंने कहा, 'कोई ऐसा उपाय सोचना चाहिए कि यह (यज्ञ अर्थात् प्रजापति के शरीर
का वह भाग जो तीर से छिद गया था) नष्ट न हो जाय। छोटी-सी आहुति से यह काम कैसे
हो ? ॥५॥
उन्होंने कहा, 'दक्षिण की ओर बैठे हुए 'भग' के पास इसे ले जाओ। भग इसको खा
लेगा। यह आहुति दिये हुए के समान हो जायगा।' बस वे उसको दक्षिण की ओर बैठे हुए भग
के पास ले गये। भग ने उसकी ओर देखा। उसने (भग की) आँखें जला दीं। ऐसा ही हुआ।
इसीलिए कहते हैं कि भग अन्धा है ॥६॥
उन्होंने कहा, 'यह अभी शान्त नहीं हुआ। इसको पूषा के पास ले जायेंगे।' वे पूषा के
पास ले गये। पूषा ने उसे चखा। उसने (पूषा का) दाँत तोड़ दिया। यह ऐसा ही हुआ।
इसीलिए कहते हैं कि पूषा (अदन्तक) बिना दाँतवाला है। इसीलिए पूषा के लिए जो चरु बनाते
हैं वह पिसे हुए अन्न की बनाते हैं जैसे बिना दाँतवालों के लिए बनाया जाता है ॥७॥
उन्होंने कहा, 'वह अभी शान्त नहीं हुआ। बृहस्पति के पास इसे ले जाओ।' ये बृहस्पति
के पास ले गये। बृहस्पति ने सविता के पास प्रसव (प्रेरणा) के लिए भेज दिया। सविता ही देवों
का प्रेरक (प्रसविता) है। उसने कहा, 'इसकी मुझे प्रेरणा करो।' प्रेरक सविता ने उसकी उसके
लिए प्रेरणा की। चूंकि वह सविता से प्रसूत अर्थात् प्रेरित हुआ था, इसीलिए उसने सविता को
हानि नहीं पहुँचाई। इसीलिए अब वह शान्त हो गया। निदान में यह वही है जो प्राशित्र (पहला
यत्प्राशित्रग्ं ॥८॥ स यत्प्राशित्रमवद्यति । य॒दे॒वात्रावि॑द्धं य॒ज्ञस्य॒ यद्रुद्रियं॒ तद्दे॒वैत-
न्निर्मिमी॒तेऽथाप॑ उप॒स्पृश॑ति॒ शान्ति॒राप॒स्तद॒द्भिः श॑मयत्यथे॒डां प॒शून्त्स॒मव॑द्यति ॥९॥
स वै यावन्मा॒त्रमि॑वै॒वाव॑द्येत् । तथा शल्यः प्र॒च्यव॑ते॒ तस्मा॒द्यावन्मा॒त्रमि॑वै॒वाव॑-
द्ये॒दन्यत॑र॒तऽआ॒ज्यं कुर्यादध॒स्ताद्बोपरि॑ष्टाद्वा तथा खदु॒न्निःस॑रणवद्भवति॒ तथा॒ नि-
स्रव॑ति॒ तस्मा॑दन्यत॒रत॒ आज्यं॑ कुर्यादध॒स्ताद्बोपरि॑ष्टाद्वा ॥१०॥ स आ॒ज्यस्योप॒स्तीर्य॑ ।
द्वि॒र्हविषो॒ऽवदा॒याथोपरि॑ष्टादा॒ज्यस्या॑भि॒घारय॑ति॒ तद्यथै॒व य॒ज्ञस्यावदा॒नमे॒वमे॒तत्त् ॥११॥
तन्न पूर्वे॑ण परि॒हरे॑त् । पूर्वे॑ण ह्यैके॑ परि॒हर॑न्ति पुर॒स्ताद्धि प्रत्यञ्चो॒ यज॑मानं प॒शव॑
उपति॑ष्ठन्ते रु॒द्रिये॑ण ह प॒शून्प्र॒सञ्ज॒येत्पूर्वे॑ण परि॒हरे॒त्तेऽस्य गृ॒हाः प॒शव॑ उपमूर्च्छ-
माणा इ॑यु॒स्तस्मा॑दित्ये॒व तिर्य॑क्प्रजि॒ही॑त॒ तथा॑ ह रु॒द्रिये॑ण प॒शून्न प्रस॑ञ्जति तिर्य॑गे-
वैने॑ निर्मि॒मीते॑ ॥१२॥ तत्प्रति॑गृह्णाति । दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वे॒ऽश्विनो॑र्बा॒हु-
भ्यां पू॒ष्णो हस्ता॑भ्यां॒ प्रति॑गृह्णामीति॑ ॥१३॥ तद्य॒थैवा॒दो बृह॒स्पति॑ः । सवि॒तारं॑
प्र॑सवा॒योपा॑धावत्सवि॒ता वै दे॒वानां॑ प्रसवि॒तेदं मे॑ प्रसु॒वेति॒ तद॑स्मै सवि॒ता प्रस॑-
विता प्रासु॑वत्त॒देनग्ं॑ सवितृप्रसूतं॒ ना॒हिन॑दे॒वमे॒वैष ए॒तत्सवता॑रमे॒व प्रसवा॒योप॑-
धावति सवि॒ता वै दे॒वानां॑ प्रसवि॒तेदं मे॑ प्रसु॒वेति॒ तद॑स्मै सवि॒ता प्रस॑विता प्र-
सौति॒ तदे॑नग्ं सवितृप्रसूतं॒ न हि॑नस्ति ॥१४॥ तत्प्राश्नाति । अ॒ग्नेस्त्वा॒स्येन॒ प्राश्ना-
मीति॒ न वाऽअ॒ग्निं किं च॒न हि॑न॒स्ति तथो॑ हैनमेत॒न्न हि॑नस्ति ॥१५॥ तन्न द॒द्भिः
खादेत् । नेन्म॒ऽइदग्ं॑ रु॒द्रियं॑ द॒तो हि॒नस॒दिति॒ तस्मान्न द॒द्भिः खादेत् ॥१६॥ अ-
थाप॒ आचा॑मति । शान्ति॒राप॒स्तद॒द्भिः शान्त्या श॑मय॒तेऽथ परि॑क्षाल्य पा॒त्रम् ॥१७॥
अथास्मै ब्रह्मभागं पर्याहरन्ति । ब्रह्मा वै यज्ञस्य दक्षिणत आस्तेऽभिगोप्ता स एतं
भागं प्रतिविदान आस्ते यत्प्राशित्रं तदस्मै पर्याहार्षुस्तत्प्राशीदथ यमस्मै ब्रह्मभागं
पर्याहरन्ति तेन भागी स यदुत ऊर्ध्वम॒संस्थितं य॒ज्ञस्य त॒दभिगोपायति तस्माद्वा॒
ऽअ॒स्मै ब्रह्मभागं पर्या॒हर॑न्ति ॥१८॥ स वै वाच॑यंम ए॒व स्यात् । ब्र॒ह्मन्व्रस्त्या॒स्या-
कां० १, अ० ७, ब्रा० ४, क० ८-१६ शतपथब्राह्मण / १४६
भाग) है ॥८॥
जब वह प्राशित्र को काटता है तो मानो यज्ञ का वह भाग काटता है जो (तीर से)
बिंधा हुआ था जो रुद्र का भाग था । अब वह जलों को छूता है। जल शान्ति है। इस प्रकार जलों
के द्वारा शान्त करता है। अब इडा को जो पशु (का प्रतिनिधि) है, काटता है ॥९॥
उसको बहुत थोड़ा भाग काटना चाहिए । इससे तीर निकल आता है। इसलिए थोड़ा-
सा ही काटना चाहिए। अब एक ओर घी रखे, चाहे नीचे, चाहे ऊपर । इस प्रकार जो कठोर
है वह नरम हो जाता है और बहने लगता है। इसलिए एक ओर घी रखे, चाहे नीचे, चाहे
ऊपर ॥१०॥
घी से चुपड़कर हवि से दो टुकड़े काटकर ऊपर घी लगाता है, क्योंकि ऐसा करने से ही
वह यज्ञ का भाग होता है ॥११॥
उसको (आहवनीय अग्नि के) पूर्व में न ले जाये । कुछ लोग पूर्व में ले जाते हैं, क्योंकि
पूर्व में पशु यजमान की ओर मुंह करके खड़े होते हैं। यदि पूर्व को ले जायगा तो पशुओं में रुद्र
की शक्ति दे देगा, और उसके घरवाले पशु नष्ट हो जायेंगे। इसलिए उसको इस प्रकार मुड़कर
ले जाना चाहिए। इससे वह पशुओं में रुद्र की शक्ति न देगा और इस (तीर) को मुड़कर निकाल
देगा ॥१२॥
उसको वह इस मंत्र से ग्रहण करता है, "देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्याम्पूष्णो
हस्ताभ्यां प्रतिगृह्णामि" (यजु० २।११)- "तुझको सविता देव की प्रेरणा से, अश्विनों की
भुजाओं से, पूषा के हाथों से ग्रहण करता हूँ" ॥१३॥
अब जैसे बृहस्पति पहले प्रेरणा के लिए सविता के पास गया, क्योंकि देवताओं का प्रेरक
सविता है और उससे कहा, 'प्रेरणा कर', उसने प्रेरणा की और सविता से प्रेरित होकर उसने हानि
नहीं पहुँचाई, इसी प्रकार यह पुरोहित भी सविता के पास प्रेरणा के लिए जाता है, और कहता
है, 'मुझे प्रेरणा कर ।' क्योंकि सविता देवों का प्रेरक है, सविता उसको प्रेरणा करता है और प्रेरित
होकर वह उसको हानि नहीं पहुँचाता ॥१४॥
उस प्राशित्र को इस मन्त्र से खाता है, "अग्नेष्ट्वास्येन प्राश्नामि" (यजु० २।११)-"मैं
तुझे अग्नि के मुँह से खाता हूँ।" अग्नि को कोई हानि नहीं पहुँचाता । इसी प्रकार इस पुरोहित
को भी यह हानि नहीं पहुँचाता ॥१५॥
इसको दाँतों से न चबावे । 'कहीं यह रुद्र का भाग मेरे दाँतों को हानि न पहुँचावे !'
इसलिए वह इसको दाँतों से न चबावे ॥१६॥
अब जल से आचमन करता है। जल शान्ति है, इसलिए जलरूपी शान्ति से शान्त
करता है। अब पात्रों को धोकर- ॥१७॥
वे उसके पास ब्रह्म-भाग को लाते हैं। वस्तुतः ब्रह्मा यज्ञ के दक्षिण भाग में संरक्षक
होकर बैठता है। वह इस भाग के सामने बैठता है। जो प्राशित्र था वे उसके पास ले आये और
उसने खा लिया। अब जो ब्रह्म-भाग वे उसके पास लाते हैं वह उसको अपने भाग के रूप में लेता
है। अब यज्ञ का जो भाग अधूरा रहता है वह उसकी रक्षा करता है। इसलिए वे उसके लिए ब्रह्म-
भाग को लाते हैं ॥१८॥
अब वह चुपचाप रहे जब तक (अध्वर्यु) न कहे कि, 'हे ब्रह्म ! मैं आगे चलूँ?' जो
अध्याय-८, ब्राह्मण-१
पारयितास्मी॒ति क॒थं ते॑ भृति॒रिति॑ ॥२॥ स॒ होवा॑च । याव॒द्वै क्षुल्ल॑का भ-
वामो ब॒ह्वी वै न॒स्ताव॑न्ना॒ष्ट्रा भव॑त्युत॒ मत्स्य॑ ए॒व मत्स्यं॑ गिलति कु॒म्भ्यां मा॑ग्रे
बिभ॑रासि॒ स य॒दा तामति॒वर्धा॒ऽअथ कर्षू॑ खा॒त्वा तस्यां॑ मा बिभ॑रासि॒ स य॒दा ता-
मति॒वर्धा॒ऽअथ मा समु॒द्रम॒भ्यव॑हरासि॒ तर्हि॒ वा॒ऽअति॑ना॒ष्ट्रो भवि॒तास्मीति॑ ॥३॥
शश्व॑द्ध झ॒ष आस॑ । स हि ज्येष्ठं॑ वर्ध॑ते॒ऽथैतिती ँ समां तदौ॑घ आ॒गन्ता तन्मा ना-
वमुप॑कल्प्यो॒पासा॑सै॒ स औघ॒ऽउत्थि॑ते॒ नाव॒माप॑द्यासै॒ तत॑स्त्वा पारयितास्मीति॑ ॥४॥
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कां० १, अं० ८, ब्रा० १, कं० १-४ शतपथब्राह्मण / १५१
(ऋत्विज्) यज्ञ के बीच में पाकयज्ञिया इडा करते हैं, वे यज्ञ को नष्ट कर देते हैं। ब्रह्मा ही
ऋत्विजों में इलाज करनेवाला (भिषक्) है। इस प्रकार ब्रह्मा को चंगा कर देता है। परन्तु यदि
वह बात करता हुआ बैठा रहे तो चंगा न कर पायेगा। इसलिए वह चुपचाप रहे ॥१९॥
यदि वह पहले मानुषी भाषा को बोल दे तो उसको विष्णु-सम्बन्धी ऋग्वेद की ऋचा
या यजुः जपना चाहिए। यज्ञ ही विष्णु है। इस प्रकार वह यज्ञ को फिर आरम्भ करता है।
(बात करने का) यह प्रायश्चित्त है ॥२०॥
जब (अध्वर्यु) कहे "ब्रह्मन् प्रस्थास्यामि"—"हे ब्रह्मा, मैं आगे बढ़ूँ।" तब ब्रह्मा कहे,
"एते देव सवितर्यज्ञं प्राहुः" (यजु० २।१२)—"हे देव सविता ! इन्होंने तेरे इस यज्ञ की घोषणा
की।" इस प्रकार वह सविता के पास प्रेरणा के लिए जाता है, क्योंकि वह देवों का प्रेरक है। अब
कहता है—"बृहस्पतये ब्रह्मणे" (यजु० २।१२)—"बृहस्पति ब्रह्मा के लिए।" बृहस्पति ही देवों
का ब्रह्मा है। इसलिए वह इस यज्ञ की उसके लिए घोषणा करता है, जो देवों का ब्रह्मा है।
इसलिए कहा, 'बृहस्पति ब्रह्मा के लिए।' अब कहता है—"तेन यज्ञमव तेन यज्ञपतिन्तेन मामव"
(यजु० २।१२)—"इससे यज्ञ की रक्षा कर। इससे यज्ञपति की, इससे मेरी रक्षा कर।" यह स्पष्ट
है ॥२१॥
अब कहता है—"मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य" (यजु० २।१३)—"मन-घी की धार में प्रसन्न
हो।" मन से ही यह सब व्याप्त है, इसलिए मन से ही इस सबको प्राप्त होता है। अब कहता
है—"बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञँ समिमं दधातु" (यजु० २।१३)—"बृहस्पति इस यज्ञ
को करे। वह इस यज्ञ को पूर्ण विघ्न-रहित करे।" इस प्रकार जो घायल हो गया था उसे चंगा
कर देता है। अब कहता है—"विश्वे देवासऽइह मादयन्ताम्" (यजु० २।१३)—"सब देव यहाँ
प्रसन्न हों।" 'विश्वे देवा' का अर्थ है सब। सबसे ही वह इसे चंगा करता है। यदि वह चाहे तो
कहे 'प्रतिष्ठ (चल)', न चाहे तो न कहे ॥२२॥
अध्याय ८—ब्राह्मण १
मनु के लिए प्रातःकाल धोने के लिए पानी लाये, जैसे हाथ धोने के लिए लाया करते हैं।
जब वह धो रहा था तो उसके हाथ में मछली (मत्स्य) आ गई ॥१॥
वह उससे बोली, 'मुझे पाल ! मैं तेरी रक्षा करुँगी।' उसने पूछा, 'तू मेरी किससे रक्षा
करेगी ?' उसने उत्तर दिया, 'तूफान में यह सब प्रजा बह जायेगी। मैं उससे तेरी रक्षा करुँगी।'
मनु ने पूछा, 'मैं तुझे कैसे पालूँ ?' ॥२॥
यह बोली, 'जब तक हम छोटे हैं हमारी बड़ी आफत है, क्योंकि मछली को मछली खाती
हैं। मुझे पहले घड़े में पाल। जब मैं उससे बढ़ जाऊँ तो गड्ढे को खोदकर मुझे उसमें रखना।
जब मैं उससे भी बढ़ जाऊँ तो मुझे समुद्र में ले जाना। तब मैं बड़ी हो जाऊँगी और कोई आपत्ति
न रहेगी' ॥३॥
वह तुरन्त ही झष मछली हो गई क्योंकि झष (सब मछलियों से अधिक) बढ़ती है।
(अब उसने कहा) 'अमुक वर्ष में तूफान आयेगा, तब तू मेरे कहने के अनुसार नाव बनाना।
और जब तूफान उठे तो तू नाव में बैठ जाना। मैं तुझे उससे बचाऊँगी' ॥४॥
त॒मेवं॑ भृ॒त्वा स॑मुद्र॒मभ्य॒वह॑ञ्चकार । स॒ यति॑थीं तत्समां॑ प॒रिदि॑देश॒ तति॑थीꣳ समां॑
नाव॑मुपकल्प्यो॒पासां॑ चक्रे स॒ औघऽउ॒त्थिते नावं॑मपे॒दे तꣳ स मत्स्य॒ उप॑न्यापुप्लुवे
तस्य॒ शृङ्गे॒ नावः॒ पाशं॑ प्र॒तिमु॑मोच॒ तेनै॑तमुत्त॒रं गि॒रिमति॑दुद्राव ॥५॥ स॒ हो॑वाच ।
अ॒पीप॑रं वै त्वा वृ॒क्षे नावं॒ प्रति॑बध्नीष्व॒ तं तु त्वा॒ मा गि॒रौ सन्त॑मुद॒कमन्तश्छे॒त्सी-
द्य्याव॑दुद॒कꣳ सम॑वायात्ताव॑त्ताव॒दन्व॑वस॒र्पासी॑ति॒ स ह॒ ताव॑त्ताव॒देवान्व॑वससर्प॒ त-
दे॒तदु॑त्त॒रस्य गि॒रेर्मनो॒रव॑सर्प॒णमित्यौ॒घो ह॒ ताः सर्वाः प्र॒जा नि॑र्ज्जा॒हाथे॒ह मनु॑रे-
वैकः॑ परिशिशि॒षे ॥६॥ सोऽर्च॑ञ्च्श्रा॒म्यंश्च॑चार प्र॒जाका॑मः । तत्रा॑पि पाकय॒ज्ञेने॑जे स॒
घृ॒तं दधि॑ म॒स्त्वामि॒क्षामित्य॒प्सु जु॑हुवाञ्चकार॒ ततः॒ संवत्स॒रे योषि॑त्सम्ब॒भूव सा ह॑
पि॒ब्दमा॑नेवो॒देया॑य॒ तस्यै॑ ह॒ स्म घृ॒तं प॒दे संति॑ष्ठते॒ तया॑ मित्रावरु॒णौ संज॑ग्माते
॥७॥ ताꣳ हो॑चतुः॒ कासीति॑ । मनो॑र्द्दुहि॒तेत्याव॑योर्द्दुहि॒ति नेति॒ हो॑वाच॒ य ए॒व
मामजी॑जनत॒ तस्यै॒वाहम॒स्मीति॒ तस्याम॒पित्व॑मीषाते॒ तद्धा ज॒ज्ञौ तद्धा न॑ ज॒ज्ञावति॒
त्वे॒विया॑य॒ सा मनु॒माज॑गाम ॥८॥ ताꣳ ह॒ मनू॑रुवाच॒ कासीति॑ । तव दुहि॒तेति॑
क॒थं भग॑वति॒ मम॑ दुहि॒तेति॒ या अमू॒रप्स्वाहु॑तीरहौ॒षीर्घृतं॒ दधि॑ म॒स्त्वामि॑क्षां॒ ततो॑
मामजी॑जनथाः॒ साशी॒रस्मि॒ तां मा य॒ज्ञेऽव॑कल्पय य॒ज्ञे चेद्वै मावकल्पयिष्य॑सि ब॒हुः
प्र॒जया॑ प॒शुभि॑र्भविष्यसि॒ याम॒मुया॒ कां चाशि॑षमाशासि॒ष्यसे॒ सा ते॒ सर्वा॒ समर्धि॑-
ष्यत॒ऽइति॒ तामेतन्मध्ये॑ य॒ज्ञस्यावा॑कल्पयन्मध्ये॒ ह्येतद्य॒ज्ञस्य॒ यद॑न्त॒रा प्र॑याजानुया-
जान् ॥९॥ त॒यार्च॑ञ्च्श्रा॒म्यंश्च॑चार प्र॒जाका॑मः । तये॒मां प्र॒जातिं॑ प्र॒जज्ञे॒ येयं मनोः प्र॒जा-
तिर्याम्वे॑नया॒ कां चाशि॑षमा॒शास्त॒ सास्मै॒ सर्वा॒ समा॑र्ध्यत ॥१०॥ सैषा निदा॒नेन॒
यदि॒डा । स यो॒ हैवं॑ वि॒द्वानिडया॒ चर॑त्येताꣳ हैव प्र॒जातिं॑ प्र॒जायते॒ यां मनुः॒ प्रा-
जायत याम्वे॑नया॒ कां चाशि॑षमा॒शास्ते॒ सास्मै॒ सर्वा॒ समृ॑ध्यते ॥११॥ सा वै प॒ञ्चा-
व॒त्ता भव॑ति । प॒शवो॒ वाऽइ॑डा पा॒ङ्क्ता वै प॒शव॒स्तस्मात्पञ्चाव॒त्ता भव॑ति ॥१२॥
स॒ सम॑वदायेडाम् । पूर्वार्धं पुरोडाशस्य प्रशीर्य्य पुरस्ताद्द्ध्रुवाये॒ निद॑धाति॒ ताꣳ होत्रे॒
का० १, अ० ८, ब्रा० १, कं० ५-१३ शतपथब्राह्मण / १५३
जब वह उसको इस प्रकार पाल चुका तो उसे समुद्र में ले गया, और जिस वर्ष के लिए
उसने कहा था उसी वर्ष उसी के कहने के अनुसार नाव बनाई । जब तूफान उठा तो वह नाव में
बैठ गया । तब मछली उस तक तैर आई और उसके सींग से उसने नाव की रस्सी को बाँध दिया ।
इससे वह उत्तरी पहाड़ तक जल्दी से पहुँच गया ॥५॥
उसने कहा, 'मैंने तुझे बचा लिया । वृक्ष में नाव बाँध दे । परन्तु जब तू पहाड़ पर है उस
समय ऐसा न होने दे कि जल तुझे काट दे । जब जल कम हो जाय तो नीचे उतर आना ।' अतः
वह धीरे-धीरे उतरा । इसलिए उत्तरी पहाड़ के उस भाग को 'मनोरवसर्पणम्' अर्थात् 'मनु का
उतार' कहते हैं। तूफान ने उस सब प्रजा को नष्ट कर दिया । केवल मनु बच रहा ॥६॥
उसने सन्तान की इच्छा से पूजा और श्रम किया । उस समय पाकयज्ञ भी किया और
घी, दही, मट्ठा भी जलों में चढ़ाया । तब एक वर्ष में एक स्त्री उत्पन्न हुई । वह मोटी होकर
निकली । उसके पैर में घी था । मित्र और वरुण उसे मिले ॥७॥
उन्होंने उससे पूछा, 'तू कौन है ?' उसने कहा, 'मनु की लड़की ।' उन्होंने कहा, 'कह कि
तू हम दोनों की है ।' उसने कहा, 'नहीं, मैं उसी की हूँ जिसने मुझे जना है ।' उन्होंने उसमें भाग
माँगा । उसने माना या न माना । वह वहाँ से चली आई और मनु के पास आई ॥८॥
मनु ने उससे पूछा, 'तू कौन है ?' 'तेरी लड़की ।' उसने पूछा, 'भगवति ! तू मेरी लड़की
कैसे ?' उसने उत्तर दिया, 'तूने जलों में जो घी-मट्ठा अर्पण किया, उसी से तूने मुझे उत्पन्न
किया । मैं आशी हूँ । तू मेरा प्रयोग कर । यदि तू यज्ञ में मेरा प्रयोग करेगा तो बहुत-से पशुओं
और सन्तानवाला होगा । जो कुछ चीज तू मेरे द्वारा माँगेगा वह सब तुझको मिलेगी ।' अब उसने
उसका यज्ञ के मध्य में प्रयोग किया, क्योंकि प्रयाज और अनुयाज के बीच में जो कुछ है वही
यज्ञ का मध्य है ॥९॥
वह प्रजा की कामना से उसी के द्वारा पूजा और श्रम करता रहा । उसके द्वारा इस प्रजा
को उत्पन्न किया, जो यह मनु की सन्तान है । जो कोई चीज उसके द्वारा माँगी वह सब उसको
मिल गई ॥१०॥
निदान में यही इडा है । जो कोई इस रहस्य को समझकर 'इडा'-यज्ञ करता है वह इस
प्रजा को जिसे मनु ने उत्पन्न किया बढ़ाता है, और जो कुछ चीज उसके द्वारा माँगता है, वही
उसे मिल जाती है ॥११॥
इस (इडा) के पाँच भाग होते हैं । पशु ही इडा है । पशु के भी पाँच भाग होते हैं ।
इसलिए इडा के भी पाँच भाग होते हैं ॥१२॥
इडा के बराबर-बराबर टुकड़े करके और पुरोडाश के पूर्वार्द्ध को काटकर वह ध्रुवा
प्रदा॒य दक्षि॒णात्ये॑ति ॥ १३ ॥ स होतु॒रक्षि॒ निर्लि॑म्पति । तद्धो॒तौष्ठयो॒र्निर्लि॑म्पते
मन॒सस्प॑तिना ते हु॒तस्या॑श्नामी॒षे प्रा॒णायेति॑ ॥ १४ ॥ अथ॒ होतुरक्षि॒ निर्लि॑म्पति ।
तद्धो॒तौष्ठयो॒र्निर्लि॑म्पते वाच॒स्पति॑ना ते हु॒तस्या॑श्नाम्यू॒र्ध्वऽउ॑दाना॒येति॑ ॥ १५ ॥ एत॒द्ध
वै मनु॒र्बिभ॑यां चकार । इदं वै मे॒ तनि॑ष्ठं य॒ज्ञस्य॒ यदिय॒मिडा पा॑कय॒ज्ञिया॒ यदि॑ म
ऽइ॒ह रक्षा॑ꣳसि य॒ज्ञं न हिꣳस्युरिति॒ तम॑तत्पु॒रा रक्षो॑भ्यः पु॒रा रक्षो॑भ्य इ॒त्येव प्रा-
पय॒त् तथो॒ऽए॒वैना॑मे॒ष ए॒तत्पु॒रा रक्षो॑भ्यः पु॒रा रक्षो॑भ्य इ॒त्येव प्राप॑य॒त्येऽथ॒ यत्प्र-
त्यक्षं॒ न प्रा॒श्नाति॒ नेदु॑पहू॒तां प्राश्ना॒मीत्ये॒तद्वैवैनां॑ प्रापयते॒ यद्धो॒ष्ठयो॒र्निर्लि॑म्पते
॥ १६ ॥ अथ॒ होतुः॑ पा॒णौ सम॑वद्यति । समव॑त्तमिव॒ सतीं॒ तदे॑नां॒ प्रत्य॒क्षꣳ होतृ॑-
रि श्रयति॒ तया॑त्मं॒हूत॑या॒ होता॒ यज॑मानाया॒शिष॒माशा॑स्ते॒ तस्मा॒द्धोतुः॑ पा॒णौ सम॑-
वद्यति ॥ १७ ॥ अथोपा॑ꣳशू॒पह्व॑यते । ए॒तद्वै मनु॑र्बिभयां चकारेदं वै मे तनि॑ष्ठं
य॒ज्ञस्य॒ यदिय॒मिडा पा॑कय॒ज्ञिया॒ यदि॑ म॒ऽइ॒ह रक्षा॑ꣳसि य॒ज्ञं न॒ हन्यु॒रिति॒ तामे॑त-
त्पु॒रा रक्षो॑भ्यः पु॒रा रक्षो॑भ्य इ॒त्येवोपा॑ꣳशूपा॒ह्वयत॒ तथो॒ऽए॒वैना॑मे॒ष ए॒तत्पु॒रा र-
क्षो॑भ्यः पु॒रा रक्षो॑भ्य इ॒त्येवोपा॑ꣳशूप॒ह्वय॑ते ॥ १८ ॥ स उप॑ह्वयते । उप॑हू॒तꣳ रथन्त-
र॒ꣳ सह पृ॑थि॒व्योप॒ माꣳ रथन्तर॒ꣳ सह पृ॑थि॒व्या ह्व॑यतामुप॑हूतं वाम॑दे॒व्य॒ꣳ स॒हा॒न्त-
रिक्षे॒णोप॒ मां वा॑मदे॒व्य॒ꣳ सहा॒न्तरि॑क्षेण ह्वयतामुप॑हूतं बृह॒त्स॒ह दि॒वोप॒ मां बृ॒-
ह॒त्स॒ह दि॒वा ह्व॑यता॒मिति॒ तदे॑तानि॒वैतदुप॑ह्वय॒मान इ॒मांश्च लो॒कानुप॑ह्वयतऽए॒ता-
नि च॒ सामा॑नि ॥ १९ ॥ उप॑हूता गावः॒ सह॑ऽर्षभा॒ इति॑ । प॒शवो॒ वाऽइ॒डा तदे॑नां
परो॒ऽक्षमू॒पह्व॑यते॒ सह॑ऽर्षभा॒ इति॑ स॒मिथु॑नामे॒वैना॑मे॒तदुप॑ह्वयते ॥ २० ॥ उप॑हूता
स॒प्तहोत्रेति॑ । तदे॑नाꣳ स॒प्तहोत्रा सौम्ये॒नाध्व॑रेणोप॒ह्वय॑ते ॥ २१ ॥ उप॑हूतेडा ततु॒-
रिरिति॑ । तदे॑नां प्रत्य॒क्षमू॒पह्व॑यते ततु॒रिरिति॒ सर्वꣳ ह्येषा पा॒प्मानं॑ तरति॒ तस्मा॑-
दाह ततु॒रिरिति॑ ॥ २२ ॥ उप॑हूतः सखा भ॒क्ष इति॑ । प्रा॒णो वै सखा॑ भ॒क्षस्त॒त्प्रा-
णमुप॑ह्वयत॒ऽउप॑हूत॒ꣳ हेगिति॑ तच्छरीरमुप॑ह्वयते तत्सर्व॑मुप॒ह्वय॑ते ॥ २३ ॥ अथ प्र-
कां० १, अ० ८, ब्रा० १, कं० १३-२३ शतपथब्राह्मण / १५५
(चमसे) के सामने रखता है, और उसे होता को देकर दक्षिण की ओर आता है ॥१३॥
वह होता के इस जगह (पहली अँगुली के बीच में) घी लगाता है । होता घी अपने होठों
से लगाता है, यह मन्त्र पढ़कर— “मनस्पतिना ते हुतस्याश्नामीषे प्राणाय”—“मन के पति द्वारा
आहुति दिये गये तुझको वह इस (बल) और प्राण के लिए खाता हूँ” ॥१४॥
अब वह होता के इस जगह (अँगुली पर) घी लगाता है। होता घी अपने होठों से लगाता
है, यह मन्त्र पढ़कर “वाचस्पतिना ते हुतस्याऽश्नाम्यूर्जैऽउदानाय”—“वाणी के पति द्वारा आहुति
दिये गये तुझको तेज और उदान के लिए खाता हूँ” ॥१५॥
इस पर मनु डरा कि यह जो पाक-यज्ञिया इडा है, यह मेरे यज्ञ का सबसे कमजोर भाग
है। कहीं ऐसा न हो कि राक्षस लोग मेरे यज्ञ को इस स्थान पर विध्वंस कर दें, इसलिए (उस इडा
को) राक्षसों के आने से पहले ही उसने (होठों से लगाकर) सुरक्षित कर दिया। इसी प्रकार यह
होता भी राक्षसों के आने से पहले ही सुरक्षित कर देता है। यद्यपि वह इसे खाता नहीं कि बिना
आहुति दिये कैसे खा लूँ, परन्तु वह होठों से लगाकर उसे सुरक्षित कर देता है ॥१६॥
अब वह होता के हाथ में इडा के टुकड़े-टुकड़े करता है। इस प्रकार टुकड़े-टुकड़े की गई
इडा को वह प्रत्यक्ष रूप से होता के हवाले कर देता है। जो उसके हवाले हो गई उस इडा से वह
यजमान के लिए आशीर्वाद चाहता है। इसलिए होता के हाथ में रखता है ॥१७॥
अब (इडा को) चुपके-चुपके बुलाता है। उस समय सचमुच मनु यह सोचकर डरा कि
यह पाक-यज्ञिया इडा मेरे यज्ञ का सबसे कमजोर भाग है; कहीं राक्षस इसको हानि न पहुँचावे ।
इसीलिए उसने चुपके-चुपके कहा, 'राक्षस (के आने) से पूर्व, राक्षस (के आने) से पूर्व।' इसी
प्रकार यह होता भी चुपके-चुपके कहता है, 'राक्षस (के आने) से पूर्व' ॥१८॥
वह इस प्रकार (धीरे से) कहता है, 'पृथिवी के साथ रथन्तर बुलाया गया। पृथिवी के
साथ रथन्तर मुझे बुलाये। अन्तरिक्ष के साथ वामदेव्य बुलाया गया । अन्तरिक्ष के साथ वामदेव्य
मुझे बुलावे। द्यौ के साथ बृहत् बुलाया गया। द्यौ के साथ बृहत् मुझे बुलावे।' वह इस प्रकार
बोलकर तीनों लोकों और तीनों सामों को बुलाता है (रथन्तर, वामदेव्य और बृहत् तीन साम
हैं) ॥१९॥
अब कहता है, 'गायें बैलों के साथ बुलाई गईं।' पशु ही इडा है। उन्हीं को परोक्ष रीति
से बुलाता है। 'बैलों के साथ' से तात्पर्य उनके जोड़े से है ॥२०॥
अब कहता है, 'सात होताओं से की गई इडा बुलाई गई।' इस प्रकार वह सात होताओं
द्वारा किये गये सोम यज्ञ के नाम से उसे बुलाता है ॥२१॥
अब कहता है, 'विजय पाने वाली (ततुरि) इडा बुलाई गई।' इस प्रकार उसको प्रत्यक्ष
रूप से बुलाता है। यह सब पापों को पार कर देती है। इसलिए इसको 'ततुरिः' कहा गया ॥२२॥
अब कहता है, 'भक्ष-मित्र बुलाया गया'। प्राण ही सखा भक्ष है। इससे प्राण को बुलाता
है । 'हेक्,' अर्थात् बुलाया गया। इससे वह शरीर को बुलाता है। इस प्रकार वह सबको बुलाता
है ॥२३॥
१५६ शतपथ ब्राह्मण
तिपद्यते । इ॒डोपहू॑तोपहू॑ते॒डोपो॒ऽअ॒स्मांऽइडा॑ ह्वयतामि॒डोपहू॑तेति॒ तदुपहूता-
मे॒वैना॑ने॒तत्सतॊ॑ प्रत्य॒क्षमुपह्व॑यते या वै सासीदौर्वे॑ सासीच्चतु॑ष्पदी वै गौस्तस्मा-
च्चतु॒रुप॑ह्वयते ॥२४॥ स वै चतुरुप॑ह्वयमानः । अथ नानि॑वोप॒ह्वये॒तेऽजामि॑तायै जा-
मि ह कुर्याद्यदि॒डोपहू॑ते॒डोपहू॑ते॒त्येवोप॑ह्वयेतोपहू॑ते॒डेति वे॒डोपहू॑तेति॒ तद॒र्वाची॑-
मुप॑ह्वयत॒ऽउप॑हूते॒डेति तत्पराची॑मुपो॒ऽअ॒स्मांऽइडा॑ ह्वयतामिति॒ तदा॒त्मानं॑ चै-
वै॒तन्नान्तरे॒त्यन्ये॑व च भवती॒डोपहू॑तेति॒ तत्पुनर॒र्वाची॑मुप॑ह्वयते॒ तद॒र्वाचीं॑ चै॒वै-
न॑मेतत्पराचीं॑ चॊप॑ह्वयते ॥२५॥ मानवी घृ॒तप॑दीति । म॒नुर्ह्यै॑तामग्रे॑ऽजनयत॒ त-
स्मादाह मानवी॑ति घृ॒तप॑दीति॒ यदि॒वास्यै घृ॒तं प॒दे सम॑तिष्ठत॒ तस्मा॑दाह घृ॒तप॒दी-
ति ॥२६॥ उ॒त मै॑त्रावरु॒णीति॑ । यदि॒व मित्रावरुणाभ्या॒ꣳ सम॑गच्छत॒ स एव मै॑त्रा-
वरु॒णो न्य॒ङ्गो ब्र॒ह्मा दे॑व॒कृतोप॑हूतेति॒ ब्रह्मा ह्ये॑षां॑ दे॒वकृ॑तोप॒हूतोप॑हूता दैव्या॑
ऋ॒त्विज॒ उप॑हूता मनु॒ष्या॒ इति तद्देवांश्चैवाध्व॑र्यूनू॒प॑ह्वयते॒ ये च मानु॒षा वत्सा वै
दैव्या॑ ऋ॒त्विजॊऽथ य॒ऽइतरे॑ ते मानु॒षाः ॥२७॥ य॒ऽइ॒मं य॒ज्ञमवा॒न्त्ये च॑ य॒ज्ञप॑तिं
व॒र्धानि॑ति । ए॒ते वै य॒ज्ञम॑वन्ति॒ ये ब्राह्म॑णाः शुश्रुवा॒ꣳसो॑ऽनूचा॒ना ए॒ते ह्ये॑नं त-
न्वत॒ऽए॒तं जन॑यन्ति॒ तद् तेभ्यो॒ निह्व॑ते व॒त्सा उ वै य॒ज्ञप॑तिं वर्ध॑न्ति॒ यस्य॑
ह्ये॑ते॒ भूयि॑ष्ठा भव॒न्ति स हि य॒ज्ञप॑तिर्व॒र्धते॒ तस्मा॑दाह॒ ये च॑ य॒ज्ञप॑तिं व॒र्धानि॑ति
॥२८॥ उप॑हूते द्यावापृथिवी पूर्व॒जेऽऋ॒तावरी॑ दे॒वी दे॒वपु॑त्रे॒ऽइति॑ । तदि॒मे द्या-
वापृथि॒वीऽउप॑ह्वयते ययो॒रिद॒ꣳ सर्व॑म॒ध्युप॑हूतो॒ऽयं यज॑मान॒ इति तद्यज॑मानमुप॑-
ह्वयते॒ तद्यदत्र नाम॑ न गृह्णा॑ति परो॒ऽक्षं ह्ये॑त्राशी॒र्दि॒डायां मानु॒षꣳ ह कुर्याद्य-
त्रास्य नाम॑ गृह्णीयाद्य॒द्वै तद्य॒ज्ञस्य यन्मानु॑षं॒ नेद्य॒दं यज्ञं करवा॑णीति॒ तस्मा॒न्न नाम॑
गृह्णा॑ति ॥२९॥ उत्त॒रस्यां॑ दे॒वय॒ज्यायामुपहू॑त॒ इति॑ । तद॒स्माऽए॒तत्सञ्जीवा॑तुमे॒व प॒-
रो॒ऽक्षम॒ाशास्ते जीवन्हि पूर्व॑मि॒ष्ट्वाथाप॑रं यज॑ते ॥३०॥ तद॒स्मा ए॒तत्प्र॒जामि॑व प॒रो-
ऽक्षम॒ाशास्ते । यस्य॒ हि प्र॒जा भव॑त्य॒मुं लो॒कमात्मनैत्यथा॒स्मिँल्लो॒के प्र॒जा यज॑ते
कां० १, अ० ८, ब्रा० १, कं० २४-३१ शतपथब्राह्मण / १५७
अब वह जोर से कहता है, 'इडा बुलाई गई। बुलाई गई इडा हमको अपनी ओर बुलाये।'
'इडा यहाँ बुलाई गई' से तात्पर्य यह है कि जो पहले वास्तविक रूप में बुलाई जा चुकी है उसे
अब प्रत्यक्ष रूप से बुलाता है। इडा गौ चार पैर वाली होती है। इसलिए उसको चार बार
बुलाया ॥२४॥
चार बार बुलाता हुआ कई प्रकार से बुलाता है जिससे दुहराने का दोष न लगे। यदि 'इडा
उपहूता'-'इडा उपहूता' ही कई बार कहे या 'उपहूता इडा'-'उपहूता इडा' ही कई बार कहे तो
दुहराने का दोषी हो। इसलिए 'इडा उपहूता' कहकर वह उसे इधर बुलाता है और 'उपहूता इडा'
कहकर वह उसे उधर बुलाता है। 'इडा हमको बुलाये' यह कहकर वह अपने को अलग नहीं
करता और कहने की शैली भी बदल जाती है। 'इडा उपहूता' कहकर वह उसे फिर इधर बुलाता
है। इस प्रकार वह उसको इधर भी बुलाता है और उधर भी बुलाता है ॥२५॥
अब कहता है, 'मानवी घृतपदी'—'मनु की लड़की घी के पैरों वाली'। मनु ने ही पहले
उसे जना था, इसीलिये कहा 'मानवी' (मनु की लड़की)। 'घृतपदी' इसलिए कहा कि उसके
पदचिह्न में घृत रहता है, इसलिए 'घृतपदी' नाम हुआ ॥२६॥
अब कहता है, 'मैत्रा-वरुणी'—'मित्र और वरुणी वाली'। चूंकि उसका मित्र और वरुण
से समागम हुआ, इसलिए उसकी मैत्रा-वरुण प्रकृति हुई। वह देवकृत ब्रह्मा हुई, क्योंकि वह
देवकृत ब्रह्मा कहकर बुलाई गई। 'देव अध्वर्यु और मनुष्य बुलाये गये' ऐसा कहकर वह दैव्य
अध्वर्यु और मनुष्य अध्वर्यु दोनों को बुलाता है। दैव्य अध्वर्यु वत्स या बछड़े हैं, और जो दूसरे
हैं वे मनुष्य अध्वर्यु ॥२७॥
अब कहता है, 'जो इस यज्ञ को बढ़ावें, जो इस यज्ञपति को बढ़ावें।' जिन ब्राह्मणों ने
वेदों को पढ़ा और पढ़ाया है वे इस यज्ञ की रक्षा करते हैं, चूंकि वे इसको फैलाते और करते हैं।
उनको इस प्रकार सन्तुष्ट करता है, और बछड़े यज्ञपति को बढ़ाते हैं क्योंकि जिस यज्ञपति के
बछड़े बहुत होंगे वह बढ़ेगा। इसीलिये कहा 'वे जो इस यज्ञपति को बढ़ावें' ॥२८॥
अब कहता है, "उपहूते द्यावापृथिवी पूर्वजेऽऋतावरी देवी देवपुत्रे"—'बुलाई गई द्यावा-
पृथिवी जो दोनों पूर्वज (पहले जन्मी हुई हैं), ऋतावरी (ऋत को पालने वाली), देवी (दिव्य
गुण वाली), देवपुत्र (देवता हैं पुत्र जिनके ऐसी) हैं।" इस प्रकार वह द्यावापृथिवी को बुलाता है,
जिसमें सब संसार आ जाता है। अब कहता है, 'यजमान बुलाया गया' इससे यजमान को बुलाता
है। यहाँ नाम नहीं लेता। इससे परोक्ष रूप में इडा के लिए आशीर्वाद है। यदि नाम ले तो
मानुषी भाषा हो जाय। जो मानुषी भाषा है वह यज्ञ में अशुभ है। यज्ञ में अशुभ नहीं करना
चाहिये, इसलिए नाम नहीं लेना चाहिए ॥२९॥
अब कहता है, "उत्तरस्यां देव यज्यायामुपहूतः"—अर्थात् "आगे होनेवाली देवपूजा के लिए
(यजमान) बुलाया गया।" इस प्रकार उस (यजमान) के लिए परोक्ष रीति से जीविका के लिए
आशीर्वाद देता है। जैसे उसने जीवन-भर यज्ञ किया है, आगे भी करेगा ॥३०॥
वह उसके लिए परोक्ष-रीति से सन्तान के लिए भी आशीर्वाद देता है, क्योंकि जिसके
सन्तान होती है जब वह मर जाता है तो उसकी सन्तान इस लोक में यज्ञ करती है। इसलिए
१५८ शतपथ ब्राह्मण
तस्मात्प्रजोत्तरा देव॒यज्या॑ ॥ ३१॥ त॒दस्मा॒ऽएतत्प॒शूने॒व प॒रोऽक्ष॒माशा॑स्ते । यस्य॑
हि॒ पश॑वो भव॑न्ति स पू॒र्वमिष्ट्वा॒याप॑रं यजते ॥ ३२॥ भूय॑सि ह॒विष्करण॒ऽउप॑हूत
इति॑ । त॒दस्मा ए॒तज्जीवातु॑मेव॒ परो॒ऽक्षमाशा॑स्ते जी॒वन्हि पू॒र्वमिष्ट्वा॑य॒ भूयो॑-भूय
ए॒व ह॒विष्करोति॑ ॥ ३३॥ त॒दस्मा॒ऽएतत्प्र॒जामि॑व प॒रोऽक्ष॒माशा॑स्ते । यस्य॒ हि प्र॒जा
भव॒त्येक॑ आ॒त्मना॒ भव॑त्यथो॒त द॑श॒धा प्र॒जया ह॒विर्निष्क्रि॑यते॒ तस्मा॑त्प्र॒जा भूयो॑ ह॒वि-
ष्करणम् ॥ ३४॥ त॒दस्मा ए॒तत्पशूने॒व प॒रोऽक्ष॒माशा॑स्ते । यस्य॒ हि पश॑वो भव॑न्ति
स पू॒र्वमिष्ट्वा॑य॒ भूयो॑-भूय ए॒व ह॒विष्करो॑ति ॥ ३५॥ ए॒षा वा आ॒शीः । जी॒वेयं॑ प्र॒जा
मे स्या॒च्छ्रियं॑ गच्छेय॒मिति॒ तद्यत्पशूनाशा॑स्ते तच्छ्रिय॒माशा॑स्ते श्रीर्हि प॒शव॑स्तदे॒ताभ्या॑-
मे॒वैतदाशी॒र्भ्या॑ सर्व॒माप्तं तस्मा॑द्वाऽए॒तेऽअत्र॒ द्वेऽआशिषौ॑ क्रियेते ॥ ३६॥ दे॒वा
म॒ऽइदꣳ॑ ह॒विर्जु॑षन्ता॒मिति॑ । त॒स्मिन्नुप॑हूत॒ इति॑ तद्य॒द्ध्यस्यै॒वैतत्समृ॑द्धि॒माशा॑स्ते॒ यदि॑
दे॒वा ह॒विर्जुष॑न्ते॒ तेन॒ हि म॒हद्गम॑यति॒ तस्मा॑दाह जु॒षन्ता॒मिति॑ ॥३७॥ ॥ शतम्
७०० ॥ ॥ तां वै प्राश्नन्त्येव । नाग्नौ जुह्वति पशवो वाऽइडा नेत्पशूनग्नौ प्रव्-
राजानिमिति तस्मान्नाग्नौ जुह्वति ॥ ३८॥ प्रा॒णेष्वेव हूयते । होत॑रि॒ यज॑माने॒ सद-
र्ध्यौ॑ व॒द्य यत्पूर्वार्धं पुरोडाशस्य प्रशीर्य पुरस्ताद्दध्रुवाये निदधाति यजमानो वै
ध्रुवा तद्यजमानस्य प्राशितं भवत्यथ यत्प्रत्यक्षं न प्राश्नाति नेदसꣳस्थिते यज्ञे प्रा-
श्नानीत्येतद्वैवास्य प्राशितं भवति सर्वे प्राश्नन्ति सर्वेषु मे हुतासदिति पञ्च प्राश्न-
न्ति पशवो वाऽइडा पाङ्क्ता वै पशवस्तस्मात्पञ्च प्राश्नन्ति ॥ ३९॥ अथ यत्र प्रति-
पद्यते । तच्चतुर्धा पुरोडाशं कृत्वा बर्हिषदं करोति तदत्र पितॄणां भाजनिन चतस्रो
वाऽअवान्तरदिशोऽवान्तरदिशो वै पितरस्तस्माच्चतुर्धा पुरोडाशं कृत्वा बर्हिषदं
करोति ॥ ४०॥ अथ यत्राहोपहूते द्यावापृथिवीऽइति । तदग्नीध्रऽआदधाति तद्-
ग्रीत्प्राश्नात्युपहूता पृथिवी मातोप मां पृथिवी माता ह्वयतामग्निराग्नीध्रात्स्वाहो-
पहूतो द्यौष्पितोप मां द्यौष्पिता ह्वयतामग्निराग्नीध्रात्स्वाहेति द्यावापृथिव्यो वा
कां० १, अ० ८, ब्रा० १, क० ३१-४१ शतपथब्राह्मण / १५६
'उत्तरा देवयज्या' का अर्थ है 'सन्तान' ॥३१॥
इस प्रकार वह परोक्ष-रीति से पशुओं के लिए भी आशीर्वाद देता है, क्योंकि जिसके पशु
हैं वह जैसे उसने पहले यज्ञ किया उसी प्रकार फिर भी यज्ञ करेगा ॥३२॥
अब कहा, "भूयसि हविष्करणऽउपहूतः"--"वह बहुत ज्यादा हवि देने के लिए बुलाया
गया।" इस प्रकार वह उसकी जीविका के लिए परोक्ष-रीति से आशीर्वाद देता है, क्योंकि जैसे
उसने पहले यज्ञ किया इस प्रकार जीता रहेगा तो आगे भी यज्ञ करेगा ॥३३॥
इससे वह परोक्ष रूप से सन्तान के लिए भी आशीर्वाद देता है, क्योंकि जिसके सन्तान
होती है वह चाहे अकेला ही हो सन्तान द्वारा दश गुनी हवि देता है। इसीलिये कहा कि 'सन्तान
का अर्थ है बहुत-सी हवि देना' ॥३४॥
इस प्रकार वह परोक्ष रूप से पशुओं के लिए भी आशीर्वाद देता है। जिसके पशु होते हैं
वह पहले जैसे यज्ञ करता था फिर भी अधिक यज्ञ करता है ॥३५॥
अब आशीर्वाद यह है, "जीवेयं प्रजा मे स्याच्छ्रियं गच्छेयम्"--"मैं जियूं। मेरी प्रजा हो,
मेरी सम्पत्ति हो।" 'पशुओं के लिए आशीर्वाद' से तात्पर्य है 'सम्पत्ति से', क्योंकि पशु ही सम्पत्ति
हैं। इन दो आशीर्वादों में सब आ गया, इसलिए यहाँ दो आशीर्वाद किये जाते हैं ॥३६॥
अब कहता है, "देवा म इदं हविर्जुषन्ताम्"--"देव मेरी इस हवि को स्वीकार करें।"
'इसी यज्ञ में बुलाया गया' - यह जो देव हवि को स्वीकार करते हैं मानो यज्ञ की समृद्धि के लिए
ही आशीर्वाद देते हैं। इससे बड़ी जय होती है। इसलिए कहा, 'स्वीकार करें' ॥३७॥
(यजमान और पुरोहित) उस (इडा) को खाते हैं। अग्नि में नहीं छोड़ते। इडा का
अर्थ है पशु। इसलिए अग्नि में नहीं छोड़ते कि कहीं पशुओं को अग्नि में न छोड़ दें ॥३८॥
प्राणों में ही आहुति दी जाती है, कुछ होता में, कुछ यजमान में, कुछ अध्वर्यु में। अब
पुरोडाश का पूर्वार्द्ध काटकर ध्रुवा में रखता है। ध्रुवा यजमान है, इसलिए यजमान इसको
खाता है। यदि वह प्रत्यक्ष में उसे नहीं भी खाता है कि कहीं यज्ञ की समाप्ति के पहले खा लूं, तो
भी वह खाई हुई समझ ली जाती है। सब खाते हैं। तात्पर्य है कि 'सब में ये मेरे लिए हुत होवें'।
पांच इसमें से खाते हैं। इडा का अर्थ है पशु। पशु पांच प्रकार के होते हैं। इसलिए पांच इसमें से
खाते हैं ॥३९॥
जब (होता) जोर से बोलता है तो वह (अध्वर्यु) पुरोडाश के चार भाग करके कुशों पर
रखता है। वह यहाँ पितरों के स्थान पर होता है। अवान्तर दिशायें चार होती हैं। अवान्तर
दिशा ही पितर हैं। इसलिए पुरोडाश के चार भाग करके उनको कुशों पर रखता है ॥४०॥
और जब वह कहता है, 'उपहूते द्यावापृथिवी'--'द्यावा-पृथिवी बुलाये गये', तो उसको
अग्नीध्र को दे देता है। अग्नीध्र (उनमें से दो टुकड़ों को) यह मन्त्र पढ़कर खाता है, "उपहूता
पृथिवी मातोप मां पृथिवी माता ह्वयतामग्निरानीध्रात् स्वाहा" (यजु० २।१०)--"उपहूतो
द्यौष्पितोप मां द्यौष्पिता ह्वयतामग्निरानीध्रात् स्वाहा" (यजु० २।११)-"बुलाई गई पृथिवी
माता। पृथिवी माता मुझे बुलावे। अग्नीध्र होने के कारण मैं अग्नि हूँ", "बुलाया गया द्यौ पिता।
द्यौ पिता मुझे बुलावे। अग्नीध्र होने के कारण मैं अग्नि हूँ।" यह जो अग्नीध्र है वह मानो द्यावा-
अध्याय-८, ब्राह्मण-२
[८. १.] ॥ ॥
(Note: ॥ ३ [८. १.] ॥ ॥ - numeral ३ is standard Devanagari ३)
L10: ते वा॒ऽएते॒ऽउल्मुके॒ऽउ॒द्धरन्ति । अनुय॒ज्ञेभ्यो यातयामिव वा॒ऽएतद॒ग्निर्भवति
L11: दे॒वेभ्यो हि यज्ञमूहिवान्वत्ययातयाम्न्यनुयाजांस्तन्नवामहा॒ऽइति॒ तस्मा॒द्वा॒ऽएते॒
L12: ऽउल्मुके॒ऽउ॒द्धरन्ति ॥ १ ॥ ते पुन॒रनु॒सꣳस्पृ॑र्शयन्ति । पुन॒रेवैतद॒ग्निमाप्याययन्त्ययात-
L13: यामानं कुर्वन्त्ययातयाम्नि यदत ऊर्ध्वमसꣳस्थितं यज्ञस्य त॒त्तनवामहा॒ऽइति॒ तस्मा-
L14: त्युन्तरनु॒सꣳस्पृ॑र्शयन्ति ॥ २ ॥ अथ समिधमभ्यादधाति । समिद्ध॒ऽए॒वैनमेतत्समिट्टे
L15: यदत ऊर्ध्वमसꣳस्थितं यज्ञस्य त॒त्तनवामहा॒ऽइति॒ तस्मात्समिध