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सर्वकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 699 में से

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पृष्ठ 159

का० १, अ० ७, ब्रा० ३, कं० १-१० शतपथब्राह्मण / १४१
है। यवा और अयवा, जिसको 'यवा' भी कहते हैं, इससे ही 'होता' सम्बन्धित होता है,
इसलिये उसको 'याविहोत्र' कहते हैं ॥२६॥
अध्याय ७—ब्राह्मण ३
यज्ञ से ही देवों ने द्यौलोक को प्राप्त किया। जो देव पशुओं का अधिष्ठाता था वह यहीं
रह गया, इसलिए उसको 'वास्तव्य' कहा, क्योंकि वह वहाँ 'वास्तु' अर्थात् वेदि में रह
गया ॥१॥
जिस यज्ञ के द्वारा देव द्यौलोक को चढ़े थे, उसी यज्ञ से वे पूजा और परिश्रम करते रहे।
अब जो पशुओं का अधिष्ठाता देव था और जो यहीं रह गया था—॥२॥
उसने देखा 'अरे ! मैं यहाँ रह गया, ये मुझे यज्ञ से निकाले दे रहे हैं !' वह उनके पीछे-
पीछे चढ़ा और अपने (शस्त्र को) उठाकर उत्तर की ओर चला। यह स्विष्टकृत् आहुति का
समय था ॥३॥
वे देव बोले—' (शस्त्र) मत मार।' (उन्होंने कहा) 'मुझे यज्ञ से बहिष्कृत न करो।
मेरे लिए आहुति दो।' देवों ने कहा—'अच्छा।' उसने शस्त्र हटा लिया; न मारा, न किसी को
सताया ॥४॥
ये देव बोले—'जितनी हवियां हमारे लिए ली गईं, वे सब दी जा चुकीं। अब सोचो
जिससे इसके लिए एक आहुति दे सकें' ॥५॥
उन्होंने अध्वर्यु से कहा—'पूर्व की भांति हवियों के ऊपर घी छोड़ो (अभिधारय)।
एक अवदान (भाग) के लिए फिर पूरा करो। और फिर एक-एक भाग अलग-अलग कर
दो' ॥६॥
अध्वर्यु ने पूर्व की भाँति हवियों पर घी छोड़ा, एक भाग के लिए फिर पूरा किया और
तैयार करके एक-एक भाग को अलग किया। इसलिये उस रुद्र को वास्तव्य कहा, क्योंकि यज्ञ में
दी हुई आहुतियों की हवि में से जो कुछ बच रहता है उसको 'वास्तु' कहते हैं। इसलिये जिस
किसी देवता के लिए 'हवि' दी जाती है, सब जगह 'स्विष्टकृत्' (अर्थात् अग्नि) को पीछे से
आहुति देते हैं, क्योंकि सर्वत्र ही देवों ने अग्नि को पीछे से भाग दिया ॥७॥
वह अग्नि के लिए ही दी जाती है। अग्नि ही वह देव है। उसके ये नाम हैं—'शर्व'
पूर्व के लोग कहते हैं, 'भव' बाहीक लोग कहते हैं, 'पशुओं का पति', 'रुद्र', 'अग्नि'। उसमें
और नाम अशान्त अर्थात् अशुभ हैं। केवल 'अग्नि' एक नाम ही शान्त या शुभ है, इसलिये यह
आहुति 'अग्नि' (स्विष्टकृत्) के लिए दी जाती है ॥८॥
उन्होंने कहा—'जो आहुति हमने तुझ दूर ठहरे हुए को दी, उसे तू हमारे लिए स्विष्ट
(हितकर) बना दे।' उसने उनके लिए उस आहुति को शुभ कर दिया, इसलिये उसका नाम
'स्विष्टकृत्' हुआ ॥९॥
वह (होता) अनुवाक्य को बोलकर देखता है कि किन्हों ने अग्नि स्विष्टकृत् को लिया।
'अग्नि, अग्नि के प्रिय धामों को दे।' इससे अग्नि के आज्य भाग का तात्पर्य है 'सोम के प्रिय धामों