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सर्वकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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पृष्ठ 59

कां० १, अ० २, ब्रा० ५, कं० ६-१७ शतपथब्राह्मण / ४१
अंगुल नीचे होना चाहिए। तदनुसार ही 'पाञ्चि' ने सोमयाग की वेदी तीन अंगुल गहरी ही
रखी थी ॥६॥
किन्तु ऐसा न करे। यतः उन्होंने ओषधियों के मूल में यज्ञ को पाया, अतः (अध्वर्यु
अग्नीध्र से कहे कि) ओषधियों की जड़ें काट दो। यतः वहाँ यज्ञ को पाया, इसलिये (विद् लाभे
धातु से बनकर) इसका नाम वेदि पड़ा ॥१०॥
अब उन्होंने उसको फिर घेर दिया। दक्षिण का घेरा बनाते हुए कहा (यजु० १।२७) —
“तू सुक्ष्मा (अच्छी भूमि) और शिवा (कल्याणी) है।” इस प्रकार इस पृथिवी को सुक्ष्मा और
शिवा बना दिया। पश्चिम की ओर घेरा बनाकर कहा— “तू स्योना(सुखदा)और सुषदा (अच्छा
आसन) है।” (यजु० १।२७) इस प्रकार उसको स्योना, सुषदा बना दिया। उत्तर की ओर घेरा
बनाकर कहा(यजु० १।२७)—“तू ऊर्जस्वती(अन्न वाली)और पयस्वती (दूध या रस वाली)
है। इस प्रकार उस भूमि को रसवती और बसने योग्य बना दिया ॥११॥
पहले तीन रेखाओं का घेरा बनाता है, फिर तीन का। इस प्रकार छः हुए। ऋतुएं छः
हैं, संवत्सर यज्ञ प्रजापति है। जितना बड़ा यज्ञ, उतनी उसकी मात्रा, उतना ही उसको घेरता
है ॥१२॥
पहला घेरा बनाने में छः व्याहृतियां पढ़ता है, और दूसरे में छः। इस प्रकार बारह
हुईं। महीने बारह होते हैं। संवत्सर यज्ञ प्रजापति हैं, इसलिये जितना बड़ा यज्ञ, जितनी उसकी
मात्रा, उतना ही बड़ा उसको बनाता है ॥१३॥
कुछ लोग कहते हैं कि पश्चिम की ओर उसकी लम्बाई 'व्याम मात्री' (मनुष्य की देह के
बराबर) होनी चाहिए, क्योंकि पुरुष इतना ही लम्बा होता है। पूर्व की ओर तीन हाथ, क्योंकि
यज्ञ त्रिवृत् है। परन्तु यहाँ कोई मात्रा निश्चित नहीं है। जितना मन आवे उतना रख लेवे ॥१४॥
वेदी की दो भुजाओं को आहवनीय अग्नि के दोनों ओर आगे तक ले जाते हैं। वेदी स्त्री
है। अग्नि पुरुष हैं। स्त्री पुरुष को दोनों भुजाओं से लपेटकर सोया करती है। इस प्रकार वेदी
की दोनों भुजाओं को अग्नि के दोनों ओर बढ़ाकर मानो वह उन स्त्री-पुरुषों का सन्तानोत्पत्ति
के लिए सम्पर्क करा देता है ॥१५॥
वेदी पश्चिम में चौड़ी, बीच में तंग और पूर्व में फिर चौड़ी होनी चाहिये। इसी प्रकार
की स्त्री अच्छी समझी जाती है-नीचे का भाग भारी, कन्धों के निकट कुछ कम चौड़ी और कमर
पर पतली। इस प्रकार वह इसको देवों की दृष्टि में प्रिय बना देता है ॥१६॥
वह पूर्व की ओर ढालू होनी चाहिए, क्योंकि पूर्व देवों की दिशा है। पश्चिम की ओर भी
ढालू होनी चाहिए, क्योंकि पश्चिम मनुष्यों की दिशा है। कूड़े को दक्षिण की ओर हटा देता है,
क्योंकि दक्षिण पितरों की दिशा है। यदि दक्षिण की ओर ढालू हो तो यजमान शीघ्र ही परलोक
को सिधार जायगा। ऐसा करने से यजमान बहुत जीता है। इसलिए कूड़े को दक्षिण की ओर
हटा देते हैं। पशु ही कूड़ा हैं। इस प्रकार वह वेदी को पशु-सम्पन्न कर देता है ॥१७॥