शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 387, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंका० ३, अ० २, ब्रा० ४, कं० १-१० शतपथब्राह्मण / ३६६
आ जाय तो उसके द्वारा यज्ञ करें। उन्होंने दो माया बनाईं, सुपर्णी और कद्रू। सुपर्णी और कद्रू
की कथा धिष्ण्यों के ब्राह्मण में लिखी है ॥१॥
उनके लिए गायत्री सोम के पास उड़ गई। जब वह उसे ला रही थी तो गन्धर्व विश्वा-
वसु ने उसको चुरा लिया। देवताओं ने जान लिया कि सोम अब द्युलोक में नहीं है, गन्धर्वों ने
इसे चुरा लिया है ॥२॥
उन्होंने कहा—'गन्धर्व लोगों को स्त्रियां प्रिय हैं। उनके पास वाणी भेज दें। वह सोम
के साथ हमारे पास चली आवेगी।' उन्होंने वाणी को भेजा और वह सोम को लेकर चली
आई ॥३॥
गन्धर्व उसके पीछे-पीछे आये और कहने लगे कि 'सोम तुम्हारा और वाणी हमारी।'
देवों ने कहा 'अच्छा। परन्तु यदि वह यहाँ आना चाहे तो उसको बलात्कार से न ले जाओ।
उसको राजी करो।' इस प्रकार उन्होंने उसको राजी करना चाहा ॥४॥
गन्धर्वों ने उसके लिए वेदों का पाठ किया और कहने लगे—'हम जानते हैं, हम जानते
हैं' ॥५॥
तब देवों ने वीणा बनाई और बजा-बजाकर कहने लगे कि 'हम इस प्रकार बजायेंगे, हम
इस प्रकार तुझे प्रसन्न करेंगे।' वह देवों के पास चली आई। परन्तु वह व्यर्थ ही आई क्योंकि जो
लोग स्तुति और प्रार्थना करते थे (अर्थात् वेद-पाठी गन्धर्व) उनसे हटकर गाने-बजानेवालों के
पास आ गई। इसीलिए स्त्रियाँ आज तक व्यर्थ बातों में फँसी रहती हैं। जैसे वाणी ने किया वैसे
ही अन्य स्त्रियाँ भी करती हैं, और जो गाता-बजाता है उसी पर वे मोहित हो जाती हैं ॥६॥
इस प्रकार सोम और वाणी दोनों देवों को मिल गये। सोम को खरीदा इसलिए जाता
है कि अपनी सम्पत्ति से यज्ञ किया जा सके। यदि बिना खरीदे सोम से यज्ञ किया तो मानो
नाजायज सम्पत्ति से यज्ञ किया गया ॥७॥
ध्रुवा में जो घी बचा था, उसको चार भाग करके जुहू में डाल देता है, और बर्हि (कुशा)
से सोने का टुकड़ा बाँधकर (जुहू में) रख देता है और आहुति देने में यह समझता है कि मैं शुद्ध
घी से आहुति देता हूँ, क्योंकि घी और सोना दोनों समान-जन्मा है। दोनों की उत्पत्ति अग्नि के
वीर्य से हुई ॥८॥
सोने के टुकड़े को रखने में यह मन्त्र पढ़ता है—"एषा ते शुक्र तनूरेतद् वर्चः" (यजु०
४।१७)—"हे चमकनेवाले शुक्र या अग्नि ! यह (घी) तेरा शरीर है, यह (सोना) तेरी ज्योति है।"
हिरण्य यानी सोना वस्तुतः ज्योति ही है। अब कहता है—"तया सम्भव भ्राजं गच्छ" (यजु०
४।१७)—"उससे मिल और ज्योति को प्राप्त कर।" 'उससे मिल' का अर्थ है 'उसके साथसंयुक्त
हो जाय', 'ज्योति को प्राप्त कर' का अर्थ है 'सोम को प्राप्त कर', क्योंकि 'भ्राजं' या 'ज्योति'
का अर्थ है 'सोम' ॥९॥
जिस प्रकार देवों ने वाणी को सोम के पास भेजा था, इसी प्रकार इसको भी वह सोम के
पास भेजता है। वाणी ही सोम-क्रय करनेवाली है। इस आहुति से वह इसी को प्रसन्न करता है