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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-८, ब्राह्मण-३

पा॒प्तास्त॒स्मा॒द्वान्य॒ञ्चेत्ये॒वाध्व॒र्युराह॒ देवं॒ देव॒मिति॒ सर्वे॑षु॒ होता॑ ॥ १४ ॥ वसु॒वने॑ व-
सु॒धेय॒स्येति॑ । दे॒वता॑याऽए॒व वषट्क्रियते दे॒वता॑यै हूयते न वाऽअ॒त्र दे॒वता॒स्त्य-
नूया॒जेषु॑ दे॒वं बर्हिरिति॒ तन्न ना॒ग्निर्नेन्द्रो॑ न सोमो॑ दे॒वो नरा॒शꣳस॒ इति॒ न्नत
ऽएकं॑ चन यो वाऽअ॒त्राग्नि॒र्गाय॒त्री स नि॒दाने॑न ॥ १५ ॥ अथ॒ यद्वसु॒वनि॑ वसु॒धेय॒स्येति॑
यज॑ति । अ॒ग्निर्वे॑ वसु॒वनि॒रिन्द्रो॑ वसु॒धेयो॒ऽस्ति वै छन्द॑सां दे॒वतेन्द्राग्नी॒ऽए॒वैवमु
चैतद्दे॒वता॑याऽए॒व वषट्क्रियते दे॒वता॑यै हूयते ॥ १६ ॥ अथोत्तममनूयाजमिष्ट्वा स-
मानी॑य॒ जुहो॑ति । प्र॒या॒जानुया॒जा वाऽए॒ते तद्य॑थैवा॒दः प्र॒या॒जेषु॑ यज॑मानाय द्विष॒न्तं
भ्रातृ॑व्यं बलिं॒ हार॑यत्यन्व॒ञ्चाग्यं बलिं॒ हार॑यत्येव॒मेवैतद॑नुया॒जेषु बलिं॒ हार-
यति ॥ १७ ॥ ब्राह्मणम् ॥ ४ [८. २.] ॥ षष्ठः प्रपाठकः ॥ कण्डिकासंख्या १११ ॥ ॥
स वै स्रुचौ॒ व्यू॑हति । अ॒ग्नीषो॑मयो॒रुज्जि॑तिमनू॒ज्जेषं॒ वाज॑स्य मा प्रस॒वेन॒ प्रो-
क्षामीति जुहू॑ प्राचीं॒ दक्षि॑णेन पा॒णिना॒ग्नीषोमौ॒ तम॑पनुदतां॒ योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑
व॒यं द्वि॒ष्मो वाज॑स्येनं प्रस॒वेनापो॑हामीत्युप॒भृतं॑ प्रतीचीꣳ सव्येन पाणिना यदि
स्व॒यं यज॑मानः ॥ १ ॥ यद्यु॒ऽअध्व॒र्युः । अ॒ग्नीषोमयो॒रुज्जि॑तिमनू॒ज्जय॑त्व॒यं यज॑मानो वा-
ज॑स्यैनं प्रस॒वेन॒ प्रोक्षा॒म्यग्नीषोमौ॒ तम॑पनुदतां॒ यम॒यं यज॑मानो द्वेष्टि॒ यश्चैनं॑ द्वेष्टि॒
वाज॑स्येनं प्रस॒वेनापो॑हामीति पौर्णमास्यामग्नीषोमीयꣳ हि पौर्णमा॒स्याꣳ ह॒विर्भव॑ति
॥ २ ॥ अथामावास्यायाम् । इन्द्राग्न्यो॒रुज्जि॑तिमनू॒ज्जेषं॒ वाज॑स्य मा प्रस॒वेन॒ प्रोक्षा-
मीन्द्रा॒ग्नी तम॑पनुदतां॒ योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मो वाज॑स्येनं प्रस॒वेनापोहा-
मीति॒ यदि॑ स्व॒यं यज॑मानः ॥ ३ ॥ यद्यु॒ऽअध्व॒र्युः । इन्द्राग्न्यो॒रुज्जि॑तिमनू॒ज्जय॑त्व॒यं य-
ज॑मानो॒ वाज॑स्येनं प्रस॒वेन॒ प्रोक्षा॒मीन्द्रा॒ग्नी तम॑पनुदतां॒ यम॒यं यज॑मानो द्वेष्टि॒ यश्चैनं॑
द्वेष्टि॒ वाज॑स्येनं प्रस॒वेनापो॑हामीत्यमावास्यायामिन्द्रा॒ग्नꣳ ह्या॑मावास्यꣳ ह॒विर्भव॑त्ये-
वं यथदैवतं॒ व्यू॑हति॒ तद्य॑दै॒वं व्यू॑हति ॥ ४॥ यज॑मान ए॒व जु॒हूमन्वा॒ योऽस्मा
ऽअरा॑ती॒यति॒ स उप॒भृत॑मन्व॒ प्राञ्च॑मे॒वैतद्यज॑मानमुद्गृह्णात्य॒पाञ्चं॒ तमपो॑हति॒ योऽस्मा

का० १, अ० ८, ब्रा० ३, कं० १-५ शतपथब्राह्मण / १६५
अनुयाज ही छन्द हैं। इसीलिए अध्वर्यु कहता है कि 'देवों के लिए यज्ञ करो', और हर एक बार
होता इस प्रकार आरम्भ करता है, 'देवं देवम्' ॥१४॥
अब कहता है—"वसुवने वसुधेयस्य" अर्थात् "वसुधा की अधिक प्राप्ति के लिए।"
वषट्कार देवता के लिए ही होता है। देवता के लिए ही आहुति दी जाती है। परन्तु यहाँ
अनुयाजों में कोई देवता नहीं है। जब वह कहता है—'देवं बर्हिः', तब न तो अग्नि है, न इन्द्र, न
सोम, और जब कहता है—'देवो नराशंसः', तब भी कोई नहीं; और जो अग्नि है वह निदान
में गायत्री ही है ॥१५॥
अब 'वसुवने वसुधेयस्य' कहने का प्रयोजन यह है कि अग्नि ही वसुवान् (धन को लेने-
वाला) और इन्द्र ही वसुधेय (धन को धारण करनेवाला) है। छन्दों के देवता हैं इन्द्र + अग्नि।
इस प्रकार देवता के लिए ही वषट्कार बोला जाता है और देवता के लिए ही आहुति दी जाती
है ॥१६॥
अन्तिम अनुयाज में सब घी लाकर छोड़ देता है, क्योंकि यही प्रयाज और अनुयाज है।
इसलिये वहाँ अनुयाजों में भी वह हानिकारक शत्रु से यजमान के लिए बलि दिलवाता है। जो
खद्य है उससे बलि दिलवाता है। अनुयाजों में बलि दिलवाता है ॥१७॥
अध्याय ८—ब्राह्मण ३
अब वह दो स्रुचों (जुहू और उपभृत्) को अलग करता है इस मन्त्र से—"अग्नीषोम-
योरुज्जितिमनूज्जेषं वाजस्य मा प्रसवेन प्रोहामि' (यजु० २।१५)—"अग्नि और सोम की जीत
से मैं विजयी होऊँ। अन्न की प्रेरणा से मैं आगे बढ़ता हूँ।" जुहू को पूर्व से सीधे हाथ से पूर्व की
ओर हटाता है इस मन्त्र से—"अग्नीषोमौ तमपनुदतां योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मो वाजस्यैनं
प्रसवेनापोहामि", (यजु० २।१५)—"अग्नि और सोम उसको हटा दें, जो हमसे द्वेष करता है
या जिससे हम द्वेष करते हैं। अन्न की इस प्रेरणा से मैं आगे बढ़ता हूँ।" उपभृत् को बायें हाथ
से पश्चिम की ओर हटाता है, यदि यजमान स्वयं हटावे तो इस प्रकार से ॥१॥
और यदि अध्वर्यु (हटावे तो वह कहेगा)—"अग्नीषोमयो रुज्जितिमनूज्जयत्वयं यजमानो
वाजस्यैनं प्रसवेन प्रोहाम्यग्नीषोमौ तमपनुदतां यमयं यजमानो द्वेष्टि यश्चैनं द्वेष्टि वाजस्यैनं
प्रसवेनापोहामि" (यजु० २।१५) — “अग्नि और सोम की जीत से यह यजमान विजयी होवें।
अन्न की प्रेरणा से मैं आगे बढ़ता हूँ। अग्नि और सोम उसको हटा दें जो इस यजमान से द्वेष
करता है या जिससे यह यजमान द्वेष करता है। इस अन्न की प्रेरणा से मैं आगे बढ़ता हूँ।" यह
पौर्णमास यज्ञ में ऐसा करता है, क्योंकि पौर्णमास यज्ञ अग्नि-सोम का है ॥२॥
अमावश्या में वह यह कहता है—"इन्द्राग्न्योरुज्जितिमनूज्जेषं वाजस्य मा प्रसवेन
प्रोहामीन्द्राग्नी तमपनुदतां योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मो वाजस्यैनं प्रसवेनापोहामि" (यजु०
२।१५) —"इन्द्र और अग्नि की जीत से मैं विजयी होऊँ। अन्न की प्रेरणा से मैं आगे बढ़ता हूँ।
इन्द्र और अग्नि उसको हटा दें, जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं। अन्न की
इस प्रेरणा से मैं आगे बढ़ता हूँ।" यह उस समय कहना चाहिए जब यजमान स्वयं कहे ॥३॥
और अध्वर्यु कहे तो इस प्रकार—"इन्द्राग्न्योरुज्जितमनूज्जयत्वयं यजमानो वाजस्यैनं
प्रसवेन प्रोहामीन्द्राग्नी तमपनुदतां यमयं यजमानो द्वेष्टि यश्चैनं द्वेष्टि वाजस्यैनं प्रसवेनापोहामि।"
"इन्द्र और अग्नि की जीत से यजमान विजयी होवे। अन्न की प्रेरणा से मैं आगे बढ़ता हूँ। इन्द्र
और अग्नि उसको हटा दें, जिससे यह यजमान द्वेष करता है या जो इस यजमान से द्वेष करता
है। अन्न की प्रेरणा से मैं आगे बढ़ता हूँ।" यह आमावास्य यज्ञ में होता है। इन्द्र और अग्नि ही
अमावश्या के देवता हैं। इस प्रकार वह चमचों को भिन्न-भिन्न देवतों के लिए अलग करता है।
यही कारण है कि वह इस प्रकार उनको अलग करता है ॥४॥
जो जुहू के पीछे यजमान होता है और उपभृत् के पीछे वह जो उससे शत्रुता करता है।
इस प्रकार वह यजमान को पूर्व में लाता है, और जो उसका शत्रु है उसको वह पीछे हटा देता

१६६ शतपथ ब्राह्मण
ऽअरातीय॒त्यत्ते॑व जु॒हू॒मन्वा॒द्य उप॒भृत॒मनु॒ प्राञ्च॑मे॒वैतद॒त्तार॑मु॒द्धृत्य॒पाञ्च॑म॒द्याम॒पो-
क्षति ॥ ५॥ तद्वाऽए॒तत् । समा॒नऽए॒व कर्म॑न्व्याक्रि॒यते॒ तस्मा॑त् समा॒नादे॒व पुरु॑-
षादत्ता चाद्यश्च जायते॒ऽइ॒दं हि॒ चतुर्थे पुरु॑षे तृती॒ये संगृह्णाम॒हऽइति॒ त्रिदे॒वं दी-
व्यमाना ज्ञातय आसतऽए॒तस्मा॑द् तत् ॥ ६॥ अथ जुह्वा॑ परि॒धीन्समन॑क्ति । यथा॒
दे॒वेभ्यो॒ऽहौषी॒द्यथा॑ य॒ज्ञः सम॑तिष्ठि॒पत्ये॒वैतत्परि॒धीन्प्रीणाति॒ तस्माज्जुह्वा॑ परि॒धी-
न्समन॑क्ति ॥ ७॥ स समन॑क्ति । वसु॑भ्यस्त्वा रु॒द्रेभ्य॑स्त्वादि॒त्येभ्य॑स्त्वेति॒ त्रयो॒ वै त्रया॑ दे॒वा
यद्वस॑वो रु॒द्रा आदित्या॒ एतेभ्य॑स्त्वेत्ये॒वैतदाह॑ ॥ ८॥ अथ परि॒धिम॑भिप॒द्याश्रा॑वयति ।
परि॒धिभ्यो॒ ह्येतदाश्रा॑वयति य॒ज्ञो वाऽआश्रा॑वणं य॒ज्ञेनैवैतत्प्रत्यक्षं परि॒धीन्प्रीणा-
ति॒ तस्मात्परि॒धिम॑भिप॒द्याश्रा॑वयति ॥ ९॥ स आश्राव्याह॑ । इ॒षिता दैव्या॑ होता॒र
इति॒ दैव्या॒ वाऽए॒ते होता॑रो॒ यत्परि॒धयो॒ऽग्नयो ह्येत दैव्या॑ होता॒र इ॒त्येवैतदाह
यदा॒हेषि॑ता दैव्या॑ होता॒र इति भद्रवा॒च्या॑येति स्वयं वाऽए॒तस्मै॑ दे॒वा युक्ता भवं-
न्ति॒ यत्सा॒धु व॑दे॒युर्यत्सा॒धु कु॒र्युस्तस्मा॑दाह भद्रवा॒च्या॑येति प्रेषि॒तो मानु॒षः सूक्तवा-
कायेति॒ तदि॒मं मानु॒षं होता॑रं सूक्तवाकाय॒ प्रसौ॑ति ॥ १०॥ अथ प्रस्तर॒माद॑त्ते ।
यज॑मानो॒ वै प्र॑स्तरस्तद्य॒त्रास्य य॒ज्ञोऽगं॑स्तद्वैवैतद्यज॑मानं स्वगाक॑रोति देवलो॒कं
वाऽअ॒स्य य॒ज्ञोऽग॑न्दे॒वलो॒कमे॒वैतद्यज॑मानम॒पिन॑यति ॥ ११॥ स यदि॑ वृष्टि॒कामः
स्यात् । ए॒तेनै॑वा॒ददी॑त संजानाथां द्यावापृथिवी॒ऽइति॒ यदा॑ वै द्यावापृथिवी॒ संजा-
नाथे॒ऽथ वर्षति॒ तस्मा॑दाह॒ संजानाथां द्यावापृथिवी॒ऽइति मित्रावरुणौ वा वृ-
ष्ट्यावतामिति तद्यो वर्षस्येष्टे स वा वृष्ट्यावत्वित्येवैतदाहायं वै वर्षस्येष्टे योऽयं
पव॑ते सोऽयमे॒क-इ॒वैव पव॑ते॒ सोऽयं पुरु॑षे॒ऽन्तः प्रवि॑ष्टः प्राङ् प्रत्यङ् तावि॒मौ
प्रा॒णोदा॒नौ प्रा॒णोदा॒नौ वै मित्रावरु॑णौ तयो॒ एव॒ वर्षस्येष्टे स वा वृष्ट्याव॒त्वित्ये-
वैत॒दाह॒ त॒मेतेनै॒वाददीत यदा ह्येव कदा च वृष्टिः समिव तन्मन्यन्तेऽग्निमेवैत-
त्करोत्याहु॑तिर्भूत्वा॑ दे॒वलो॒कं गच्छादिति॑ ॥ १२॥ स वाऽअ॒यं जुह्वामम॑क्ति । मध्य-

का० १, अ० ८, ब्रा० ३, क० ५-१३ शतपथब्राह्मण / १६७
है। जुहू के पीछे अत्ता (खानेवाला) होता है, और उपभृत् के पीछे आद्य (खाद्य पदार्थ) होता
है। इस प्रकार वह खानेवाले को सामने लाता है और खाद्य को पीछे हटा देता है ॥५॥
इस प्रकार एक ही कर्म से वियोग हो जाता है। इसलिये एक ही पुरुष से अत्ता (भोक्ता
या पति) और आद्य (भोग्य या पत्नी) उत्पन्न होते है। इसीलिए लोग हँसी में कहते हैं कि चौथे
या तीसरे पुरुष में हम मिल जाते हैं (तात्पर्य यह मालूम होता है कि तीसरी या चौथी पीढ़ी में
विवाह हो सकता था जैसा कि दक्षिणियों में आजकल भी होता है)। इसके अनुसार चमचे भी
अलग होते हैं ॥६॥
अब परिधि-समिधाओं को जुहू से (घी लेकर) चुपड़ता है। जिससे देवों के लिए यज्ञ-
आहुति दी, जिससे यज्ञ को समाप्त किया, उसी से परिधियों को प्रसन्न करता है, इसीलिए जुहू से
चुपड़ता है ॥७॥
वह इस मन्त्र को पढ़कर घी लगाता है—"वसुभ्यस्त्वा रुद्रेभ्यस्त्वादित्येभ्यस्त्वा' (यजु०
२।१६)—"वसुओं के लिए तुझको, रुद्रों के लिए तुझको, आदित्यों के लिए तुझको।" यही तीन
देव हैं—वसु, रुद्र, और आदित्य । 'इनके लिए तुझको' ऐसा कहने का तात्पर्य है ॥८॥
अब परिधि को उठवाकर आश्रावण करता है (अर्थात् सुनवाता है)। परिधियों के
लिए ही इसको सुनवाता है। यज्ञ ही आश्रावण है। स्पष्ट बात यह है कि यज्ञ से ही परिधियों को
प्रसन्न कराता है। इसलिये परिधि को उठवाकर आश्रावण करता है ॥९॥
आश्रावण के पश्चात् कहता है—"इषिता दैव्या होतारः"—"दिव्य होता बुलाये गये।"
ये जो परिधियाँ हैं वे ही दिव्य होता हैं क्योंकि वे अग्नि हैं। जब वह कहता है कि 'इषिता दैव्या
होतारः' तो यहाँ तात्पर्य है 'इष्टा दैव्या होतारः' से (इषित) 'इष्ट' के अर्थ में लिया गया है।
'बुलाये गये' अर्थात् 'चाहे गये।' अब कहता है—"भद्रवाच्याय"—"शुभ वाणी के लिए।" देव
स्वयं ही तैयार होते हैं कि इसके लिए अच्छी बात कहें, अच्छी बात करें। इसलिए कहा—'शुभ
वाणी के लिए।' अब कहता है—"प्रेषितो मानुषः सूक्तवाकाय"—"सूक्तवाक (प्रशंसा) के लिए
मनुष्य बुलाया गया।" इस प्रकार मनुष्य होता को सूक्तवाक के लिए बुलाता है ॥१०॥
अब प्रस्तर को लेता है। यजमान ही प्रस्तर है। इसलिये जहाँ कहीं उसका यज्ञ जाय
वहीं यजमान का स्वागत करता है। चूंकि उसका यज्ञ देवलोक में गया, इसलिये इस प्रकार वह
यजमान को भी ले जाता है ॥११॥
यदि वृष्टि की इच्छा हो तो (प्रस्तर को यह पढ़कर) उठावें—"सञ्जानाथां द्यावा-
पृथिवी" (यजु० २।१६)—"द्यौ और पृथिवी साथ चलें।" क्योंकि जब द्यौ और पृथिवी साथ-
साथ चलते हैं तभी वर्षा होती है, इसलिए कहा—'द्यावापृथिवी साथ चलें।' अब कहता है—
"मित्रावरुणौ त्वा वृष्ट्यावताम्" (यजु० २।१६)—"मित्र और वरुण तेरी वृष्टि द्वारा रक्षा करें।"
इस कहने से तात्पर्य यह है कि जो वर्षा का अध्यक्ष है वह तेरी वृष्टि द्वारा रक्षा करे। वही वर्षा
का अध्यक्ष है जो यह बहता है (अर्थात् वायु), यह एक ही के समान बहता है। परन्तु वही पुरुष
के भीतर जाकर आगे-पीछे होकर दो हो जाते हैं, उनका नाम है प्राण और उदान। प्राण और
उदान ही मित्र और वरुण हैं। इसीलिए यह कहता है 'वह जो वर्षा का अध्यक्ष है तेरी वृष्टि
द्वारा रक्षा करे।' इस (प्रस्तर) को वह इस (मन्त्र) द्वारा ले तो सदा वृष्टि उसके अनुकूल
रहेगी। वह (प्रस्तर पर) घी लगाता है, मानो यजमान को भी आहुति का रूप देता है, जिससे
वह आहुति होकर देव-लोक को चला जाय ॥१२॥
वह उस (प्रस्तर) के अगले भाग को जुहू में से चुपड़ता है, बीच को उपभृति में से, जड़

१६८ शतपथ ब्राह्मण
मुपभृति मूलं ध्रुवायामग्रमिव हि जूर्द्ध्वमिवोपभृन्मूलमिव ध्रुवा ॥ १३॥ सो
ऽनक्ति। व्यन्तु वयोऽक्तꣳ रिहाणा इति वय ए॒वैनमेतद्भूतमस्मान्मनुष्यलोकाद्दि-
वलोक॒मभ्युत्पातयति तन्नीचैरिव हरति द्वयं तद्यस्मान्नीचैरिव हरत्यजमानो वै
प्रस्त॒रोऽस्या॒ऽए॒वैनमेतत्प्रतिष्ठा॑यै॒ नोद्गतीह्योऽएव वृष्टिं नियच्छति ॥१४॥ स हर-
ति। म॒रुतां पृष॒तीर्गच्छेति देवलोकं गच्छेत्येवैतदाह यदाह मरुतां पृषतीर्गच्छेति
वशा पृश्निर्भूत्वा दिवं गच्छ ततो नो वृष्टिमावह॒तीयं वै वशा पृश्निर्यदिदमस्यां मू-
लि चामूलं चान्नाद्यं प्रतिष्ठितं तेनेयं वशा पृश्निरियं भूत्वा दिवं गच्छेत्येवैतदाह
ततो नो वृष्टिमावहेति वृष्टाद्वाऽऊ॒र्य्यसः सम्भूतं जायते तस्मादाह ततो नो वृ-
ष्टिमावहेति ॥ १५॥ अथैकं तृणमपगृह्णाति । यजमानो वै प्रस्तरः स यत्कृत्स्नं प्र-
स्तर॒मनुप्रहरेत्क्षि॒प्रे ह यजमानोऽमूं लोक॒मियात्तथो ह यजमानो व्योग्जीवेति
यावद्वेवास्यैह मानुषमायुस्तस्मा॒ऽएवैतदपगृह्णाति ॥१६॥ तन्मुहूर्त्तं धारयित्वानुप्रा-
हरति । तद्यत्रास्येतर आ॒त्मागंस्तद्देवा॒स्यैतद्रमयन्त्यथ यन्नानुप्रहरेत्तरियाङ्यज-
मानं लोकात्तथो ह यजमानं लोकात्रात्तेरति ॥ १७॥ तं प्राञ्चमनुस॒मस्यति । प्रा-
ची हि देवानां दिगत्योऽउदञ्चमुदीची हि मनुष्याणां दित्तमङ्गुलिभिरिव योषुयुरन्न्
काष्ठैर्दारुभिर्वाऽइतरꣳ शवं व्यृषन्ति नेत्तथा करवाम यथेतरꣳ शवमिति तस्मा-
दङ्गुलिभिरिव योषुय्येरन्न् काष्ठैर्व्यदा होता सूक्तवाकमाह ॥ १८॥ अथाग्नीदाह्वानुप्रा-
हरेति । तद्यत्रास्येतर आत्मागंस्तद्देवा॒स्यैतद्रमयेत्येवैतदाह तूष्णीमेवानुप्रहृत्य च-
क्षुष्या अग्नेऽसि चक्षुर्मे पाहीत्यात्मानमुपस्पृशति तेनोऽअप्यात्मानं नानुप्रवृणक्ति
॥१९॥ अथाह संवदस्वेति । संवादयेनं देवेरित्येवैतदाहागानग्नीदित्यगन्खल्वित्ये-
वैतदाहागन्नितीतरः प्रत्याह श्रावयेति तं वै देवैः श्रावय तमनुबोधयेत्येवैतदाह
श्रौषडिति विद्वाऽएनमनु बुद्ध्वाऽएनमभुतसतित्येवैतदाहेवमध्वर्य्युश्चाग्नीध्र देवलोकं
यजमानमपिनयतः ॥ २०॥ अथाह स्वगा दैव्या होतृभ्य इति दैव्या वाऽएते हो-

कां० १, अ० ८, ब्रा० ३, कं० १३-२१ शतपथब्राह्मण / १६६
को ध्रुवा में से। क्योंकि जुहू अग्रभाग के समान है, उपभृति मध्य-भाग के और ध्रुवा मूल के
समान है ॥१३॥
वह इस मन्त्र से घी लगाता है— "व्यन्तु वयोक्तं रिहाणा" (यजु० २।१६)—"व्यन्तु
(खावें देव लोग) उक्तं (चुपड़े हुए) वयः (पक्षी को) रिहाणः (चाटते हुए)। इस प्रकार
वह (यजमान को) पक्षी का रूप देता है और इस मनुष्य-लोक से देव-लोक को भेजता है। अब
वह उसको दो बार नीचे लाता है। नीचे इसलिये लाता है कि प्रस्तर यजमान का रूप है। इस
प्रकार वह उसको प्रतिष्ठा से नहीं हटाता और अपने स्थान पर वर्षा को लाता है ॥१४॥
वह नीचे लाने में यह मन्त्र पढ़ता है— "मरुतां पृषतीर्गच्छ" (यजु० २।१६)—"मरुतों
की चितकबरी (घोड़ियों) के पास जाओ।" जब वह कहता है कि 'मरुतों की चितकबरियों के
पास जाओ' तो ऐसा कहने का तात्पर्य है देव-लोक को जाओ। अब कहता है—"वशा पृश्निर्र्भूत्वा
दिवं गच्छ ततो नो वृष्टिमावह" (यजु० २।१६)—"पृश्निः (चितकबरी) वशा (गाय) होकर
द्यौलोक को जा और हमारे लिए वहाँ से वर्षा ला" [इसका ठीक अर्थ शायद यह होगा कि पृथिवी
अन्तरिक्ष में होकर द्यौ को जावे। (वशा—पृथिवी, पृश्नि, अन्तरिक्षं) अर्थात् यज्ञ पृथिवी से
अन्तरिक्ष और वहाँ से द्यौ में होकर वर्षा लावे], यह (पृथिवी) वशा पृश्निः (चितकबरी) गाय
है, जिसमें मूल वाले और बिना मूल के अन्न और खाद्य-पदार्थ होते हैं। ऐसा कहने से अर्थ यह
है कि पृथिवी बनकर द्यौलोक को जा और 'वहां से वर्षा ला।' वर्षा से शक्ति, रस और सम्पत्ति
होती है। इसीलिए वह कहता है 'वहाँ से वर्षा यहाँ ला' ॥१५॥
अब उसमें से एक तृण उठा लेता है। प्रस्तर यजमान है। इसलिये यदि कहीं समस्त
प्रस्तर को आग में डाल दे तो यजमान तुरन्त ही परलोक को चला जाय। परन्तु इस प्रकार
यजमान बहुत जीता है। जितनी इस संसार में मनुष्य की आयु हो सकती है उसी के लिए उस
प्रस्तर को लेता है ॥१६॥
उसको थोड़ी देर पकड़े रखकर आग में फेंक देता है और जहाँ उसका इतना आत्मा
या भाग गया वहाँ उसको भी भेज देता है। यदि वह उसको आग में न फेंके तो वह उसका
परलोक से सम्बन्ध तोड़ देता है। परन्तु इस प्रकार करने से वह यजमान को परलोक से अलग
नहीं करता ॥१७॥
उसको पूर्व की ओर (सिरा करके) फेंकता है। पूर्व ही देवों की दिशा है। या उत्तर की
ओर क्योंकि उत्तर मनुष्यों की दिशा है। उसको अँगुलियों से ही चिकना करें; लकड़ी या काठ
से नहीं। काष्ठ या लकड़ी से लाश को छेदते हैं। ऐसा न हो कि इसके साथ लाश के जैसा
व्यवहार करें, इसलिए वह उसे अँगुलियों से ही चिकना करता है, लकड़ी से नहीं। जब होता
सूक्तवाक को कहता है—॥१८॥
अग्नीध्र कहता है—'अनुप्रहर अर्थात् (प्रस्तर के) पीछे फेंक दो।' इससे तात्पर्य यह है
कि जहाँ उसका दूसरा भाग गया वहाँ इसे भी जाने दो। (अध्वर्यु) उसे चुपके से फेंककर इस
मन्त्र से अपने शरीर को छूता हैं—"चक्षुष्पा अग्नेऽसि चक्षुर्मे पाहि" (यजु० २।१६)—'हे अग्नि !
तू आँख की रक्षा करनेवाला है। मेरी आँख की रक्षा कर।' इस प्रकार वह अपने को आग में
नहीं फेंकता ॥१९॥
अब (अग्नीध्र अध्वर्यु से) कहता है—'संवादस्व' अर्थात् 'संवाद कर।' इसके कहने से
तात्पर्य यह है कि देवताओं के साथ संवाद कर। अब (अध्वर्यु) पूछता है—'हे अग्नीध्र ! क्या
वह (देव लोक) चला गया?' इसका तात्पर्य यह है कि क्या सचमुच चला गया? वह उत्तर
देता है—'हाँ ! चला गया।' अब (अध्वर्यु) कहता है—'श्रावय अर्थात् सुना।' इससे तात्पर्य
यह है कि (यजमान की बात को) 'देव सुनें और देव जानें।' अब कहता है—'श्रौषट् अर्थात्
उसको सुनें।' (अग्नीध्र का) ऐसा कहने से तात्पर्य है कि देवों ने उसे जान लिया, पहचान लिया।
इस प्रकार अध्वर्यु और अग्नीध्र यजमान को देवलोक को ले जाते हैं ॥२०॥
अब (अध्वर्यु) कहता है—"स्वगा१ दैव्या होतृभ्यः" अर्थात् "देवताओं के होता लोग
१. जिस प्रकार बुलाने के लिए स्वागत (सु + आगत) होता है, इसी प्रकार भेजने के लिए स्वगा
(सु + अगा) कहा।

१७० शतपथ ब्राह्मण
तारो॒ ह्य॑परिधयो॒ऽग्नयो हि ताने॒वैतत्स्व॒गाक॑रोति॒ तस्मा॑दाह॒ स्वगा दे॒व्या हो॒-
तृभ्य॒ इति॒ स्वस्ति॒र्मानु॑षेभ्य॒ इति॒ तद॒स्मै मानु॑षाय॒ होत्रे॑ऽह्वलामाशा᳭स्ते॑ ॥ २१॥
अथ परिधी॒ननु॑प्रह॒रति॒ स म॑ध्य॒ममे॒वाग्रे॒ परि॑धि॒मनु॑प्रह॒रति॒ यं परि॒धिं पर्यध॑त्था॒ अग्ने॒
दे॒व प॒णिभि॒र्गुह्य॑मानः। तं त॑ऽए॒तमनु॒ जोषं॑ भराम्ये॒ष नेद॒पचे॑तयाता॒ऽइत्य॒ग्नेः
प्रि॒यं पाथो॒ऽपीत॑मिती॒तराव॒नुसं॒मस्य॑ति ॥ २२॥ अथ जु॒ह्वं चोप॒भृतं॑ च॒ संप्र॑गृह्णाति ।
अ॒दो हैवाङ्गि॑तिं करोति॒ यद॒नतयाङ्गि॑तिर्भू॒त्वा दे॑वलो॒कं गच्छा॒दिति॒ तस्मा᳭ज्जु॒ह्वं चोप-
भृतं॑ च॒ संप्र॑गृह्णाति ॥ २३॥ स वै वि॒श्वेभ्यो॑ दे॒वेभ्यः॒ संप्र॑गृह्णाति । यद्धाऽअ॑नादि॒ष्टं
दे॒वता॑यै ह॒विर्गृह्य॑ते॒ सर्वा॑ वै तस्मिन्द्दे॒वता॒ अपि॑वन्त्यो मन्यन्ते॒ न वाऽए॒तत्कस्यै॑
च॒न दे॒वता॑यै ह॒विर्गृ॑ह्यते॒न्नादि॑शति॒ यदाज्यं॑ त॒स्माद्विश्वे॑भ्यो दे॒वेभ्यः॒ संप्र॑गृह्णात्ये॒तद्वै
वै॒श्वदे॒वं ह॒विर्य॑त्ते ॥ २४॥ स॒ संप्र॑गृह्णाति ॥ स᳭स्रवभागा स्थे॒षा बृह॒न्त॒ इति॒ स᳭-
स्र॒वो ह्ये॑व खलु॒ परि॑शिष्टो भव॑ति॒ प्रस्त॑रे॒ष्ठाः परि॑धयश्च दे॒वा इति॒ प्रस्त॑रश्च॒ हि
परि॑धयश्चानु॒प्रहृ॑ता भ॒वन्ती॒मां वाच॑म॒भि विश्वे॑ गृणन्त॒ इत्ये॒तद्वै वै॒श्वदे॒वं करो॑त्यास॒-
द्यास्मिन्ब॒र्हिषि॑ मादयध्व॒ᳪ॒ स्वाहा॒ वाडिति॒ तद्य॑था वषट्कृतᳪ हु॒तमे॑वम॒स्यैतद्भव॑-
ति ॥ २५॥ स य॒स्यानसो ह॒विर्गृह्णी॒तः । अनस॒स्तस्य॑ धु॒रि विमु॑ञ्चन्ति॒ यतो॒ युन॒क्तां
ततो॒ विमु॑ञ्चामिती॒ यतो॒ ह्ये॑व यु॒ञ्जन्ति॒ ततो॒ विमु॑ञ्चन्ति॒ यस्यो॑ पा॒त्र्यै स्फ्ये तस्य॑
यतो॒ युन॒क्तां ततो॒ विमु॑ञ्चामिती॒ यतो॒ ह्ये॑वं यु॒ञ्जन्ति॒ ततो॒ विमु॑ञ्चन्ति ॥ २६॥ यु॒ञ्जौ
ह वाऽए॒ते य॒ज्ञस्य यत्स्तुचौ॑। तेऽए॒तद्यु॒ङ्क्ते यत्प्र॑चर॑ति॒ स यं नि॑धा॒यावद्ये॑द्यथा वा-
हनमवार्हे॑ दे॒वं तत्तेऽए॒तत्त्विष्ट॑कृति विमो॒चन॒माग॑ह्वतस्ते तत्सादयति तद्विमु॑ञ्चति
तेऽए॒तत्पुनः॒ प्रयु॒ङ्क्तेऽनुया॒जेषु॒ सोऽनुया॒जैश्च॑रि॒त्वैतद्विमो॑चन॒माग॑ह्वति ते तत्सादयति
तद्विमु॑ञ्चति तेऽए॒तत्पुनः॒ प्रयु॑ङ्क्ते॒ यत्संप्र॑गृह्णाति॒ तस्यां॑ ग॒तिम॒भियु॒ङ्क्ते तां ग॒तिं ग॒त्वा
विमु॑च्येते य॒ज्ञं वाऽअनु॑ प्र॒जास्तस्मा॑दय पु॒रुषो यु॒ङ्क्तेऽथ॒ विमु॑ञ्चते॒ऽथ यु॒ङ्क्ते तस्यां॑ ग-
तिम॒भियु॒ङ्क्ते तां ग॑तिं ग॒त्वात्ततो॒ विमु॑ञ्चते॒ स॒ सादयति घृताची स्थो धु॒र्यौ पात᳭

कां० १, अ० ८, ब्रा० ३, कं० २१-२७ शतपथब्राह्मण / १७१
विदा हों।” ये जो परिधियां हैं यही देवताओं के होता हैं, क्योंकि (परिधियाँ ही) अग्नि हैं।
उन्हीं को विदा करता है। इसलिये कहता है-‘स्वगा दैव्या होतृभ्यः ।’ अब कहता है-“स्वस्तिः
मानुषेभ्यः” अर्थात् “मनुष्य के सम्बन्धियों के लिए कल्याण हो ।” इसके द्वारा वह आशीष देता
है कि मनुष्य होता असफल न हो ॥२१॥
अब वह परिधियों को आग में डालता है। पहले मध्यपरिधि को यह मन्त्र पढ़कर डालता
है-‘यं परिधिं पर्यधत्थाऽअग्ने देवपणिभिर्गुह्यमानः । तं तऽएतमनु जोषं भराम्‍येष मेत् त्वदपचेत-
याता” (यजु० २।१७)—“हे अग्नि देव ! जिस परिधि को तूने अपने चारों ओर रक्खा जब तू
पणियों से छिपा हुआ था, मैं उस तुझको तेरी प्रसन्नता के लिए भरता हूँ। यह तेरे प्रतिकूल न
हो ।” शेष दोनों (परिधियों) को इस मन्त्रांश से डालता हैं—‘‘अग्नेः प्रियं पाथोऽपीतम्” (यजु०
२।१७)—“तुम दोनों अग्नि के प्रिय स्थान को प्राप्त हो” ॥२२॥
अब वह जुहू और उपभृत् को ग्रहण करता है। पहले जो वह (प्रस्तर को) चुपड़ता है
तो मानो वह आहुति देता हैं कि वह आहुति बनकर देवलोक को जा सके। इसीलिए वह जुहू
और उपभृत् को साथ-साथ पकड़ता है ॥२३॥
वह विश्वे देवों के लिए उनको ग्रहण करता है। क्योंकि जब कोई हवि ऐसी दी जाती है
जिसमें किसी देवता के लिए निर्देश न हो तो उसमें सभी देवता समझते हैं कि हमारा भाग है।
जब वह आज्य को लेता है और किसी देवता का निर्देश करके तो हवि को लेता नहीं, इसलिये वह
सब देवों के लिए लेता है। इसलिए वह उस हविर्यज्ञ में आज्य को ‘वैश्वदेव’ अर्थात् सब देवताओं
का बना देता है ॥२४॥
वह उनको इस मन्त्र से ग्रहण करता है-‘‘सं॑स्रवभागा स्थेषा बृहन्तः’’(यजु० २।१८)
“इषा अर्थात् शक्ति के द्वारा बड़े आप बचा हुआ भाग लेनेवाले होओ।” (‘संस्स्रव’ कहते हैं बचे
हुए को) अब कहता है-‘‘प्रस्तरेष्ठाः परिधेयाश्च देवाः’’ (यजु० २।१८) अर्थात् “हे प्रस्तर पर
बैठे हुए और परिधिवाले देव !” प्रस्तर और परिधियाँ तो आग में फेंकी जा चुकीं। अब कहता
है-‘इमां वाचमभि विश्वे गृणन्तः”(यजु०२।१८)-“इस वाणी को आप सब ग्रहण करते हुए।”
इससे बह वैश्वदेव (सब देवों वाली) करता है। अब कहता है—“आसद्यास्मिन् बर्हिषि मादय-
ध्वँ॒ स्वाहा वाट्” (यजु० २।१८) - “इस आसन पर बैठो और स्वाहावाट् को चक्खो।” जैसे
वषट्कृत् हवि होता है वैसे ही यह भी है ॥२५॥
गाड़ी से जिसकी हवि लेते हैं उसकी ही गाड़ी की धुरी में (स्रुवों को) अलग करते हैं
कि जहाँ हम जोड़ें वहीं अलग करें, क्योंकि जहाँ जोड़ा करते हैं वहीं अलग करते हैं (गाड़ी के
जिस स्थान पर बैल जोते जाते हैं उसी स्थान पर खोले जाते हैं)। परन्तु पात्र से जिसकी हवि
ली जाय उसके लिए स्रुवों को स्फ्या पर रखकर (अलग करें) कि जहाँ जोड़ें वहीं अलग करें।
इसलिये जहाँ जोड़ते हैं वहीं अलग करते हैं ॥२६॥
ये जो स्रुच् (चमचे हैं) यही यज्ञ के दो बैल हैं। जब वह चलता है (यज्ञ आरम्भ
करता है) तब उनको जोतता है। अब यदि वह इसको रखकर ही अलग कर दे जैसे बैल को
(बिना खोले ही) बिठा दें, तो वह गिर पड़ेगा। स्विष्टकृत् में दोनों चमचों का विमोचन होता
होता है। अब वह इनको खोलता है अर्थात् विमोचन करता है। वह इनको अनुयाजों में फिर
जोतता है। अनुयाजों को करने के पश्चात् फिर इनका विमोचन करता है। वह इनको खोलता
है अर्थात् विमोचन करता है। जब वह इनका संप्रगृहण (साथ छूना) करता है तो फिर जोतता
है। जिस गति (यात्रा या कार्य) के लिए उनको जोतता है उसी गति के पार करने पर विमोचन
करता है। यज्ञ के पीछे ही प्रजा होती है। इसलिए यह पुरुष पहले जोतता है, फिर खोलता है।
फिर जोतता है और जिस गति के लिए उसने जोता था वह गति हो जाने के पश्चात् उसको
छोड़ देता है। वह इस मन्त्र को पढ़कर रखता है-‘घृताची स्थो धुर्यौ पातँ॒ सुम्ने स्थः सुम्ने मा