शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 185, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंका० १, अ० ८, ब्रा० ३, क० ५-१३ शतपथब्राह्मण / १६७
है। जुहू के पीछे अत्ता (खानेवाला) होता है, और उपभृत् के पीछे आद्य (खाद्य पदार्थ) होता
है। इस प्रकार वह खानेवाले को सामने लाता है और खाद्य को पीछे हटा देता है ॥५॥
इस प्रकार एक ही कर्म से वियोग हो जाता है। इसलिये एक ही पुरुष से अत्ता (भोक्ता
या पति) और आद्य (भोग्य या पत्नी) उत्पन्न होते है। इसीलिए लोग हँसी में कहते हैं कि चौथे
या तीसरे पुरुष में हम मिल जाते हैं (तात्पर्य यह मालूम होता है कि तीसरी या चौथी पीढ़ी में
विवाह हो सकता था जैसा कि दक्षिणियों में आजकल भी होता है)। इसके अनुसार चमचे भी
अलग होते हैं ॥६॥
अब परिधि-समिधाओं को जुहू से (घी लेकर) चुपड़ता है। जिससे देवों के लिए यज्ञ-
आहुति दी, जिससे यज्ञ को समाप्त किया, उसी से परिधियों को प्रसन्न करता है, इसीलिए जुहू से
चुपड़ता है ॥७॥
वह इस मन्त्र को पढ़कर घी लगाता है—"वसुभ्यस्त्वा रुद्रेभ्यस्त्वादित्येभ्यस्त्वा' (यजु०
२।१६)—"वसुओं के लिए तुझको, रुद्रों के लिए तुझको, आदित्यों के लिए तुझको।" यही तीन
देव हैं—वसु, रुद्र, और आदित्य । 'इनके लिए तुझको' ऐसा कहने का तात्पर्य है ॥८॥
अब परिधि को उठवाकर आश्रावण करता है (अर्थात् सुनवाता है)। परिधियों के
लिए ही इसको सुनवाता है। यज्ञ ही आश्रावण है। स्पष्ट बात यह है कि यज्ञ से ही परिधियों को
प्रसन्न कराता है। इसलिये परिधि को उठवाकर आश्रावण करता है ॥९॥
आश्रावण के पश्चात् कहता है—"इषिता दैव्या होतारः"—"दिव्य होता बुलाये गये।"
ये जो परिधियाँ हैं वे ही दिव्य होता हैं क्योंकि वे अग्नि हैं। जब वह कहता है कि 'इषिता दैव्या
होतारः' तो यहाँ तात्पर्य है 'इष्टा दैव्या होतारः' से (इषित) 'इष्ट' के अर्थ में लिया गया है।
'बुलाये गये' अर्थात् 'चाहे गये।' अब कहता है—"भद्रवाच्याय"—"शुभ वाणी के लिए।" देव
स्वयं ही तैयार होते हैं कि इसके लिए अच्छी बात कहें, अच्छी बात करें। इसलिए कहा—'शुभ
वाणी के लिए।' अब कहता है—"प्रेषितो मानुषः सूक्तवाकाय"—"सूक्तवाक (प्रशंसा) के लिए
मनुष्य बुलाया गया।" इस प्रकार मनुष्य होता को सूक्तवाक के लिए बुलाता है ॥१०॥
अब प्रस्तर को लेता है। यजमान ही प्रस्तर है। इसलिये जहाँ कहीं उसका यज्ञ जाय
वहीं यजमान का स्वागत करता है। चूंकि उसका यज्ञ देवलोक में गया, इसलिये इस प्रकार वह
यजमान को भी ले जाता है ॥११॥
यदि वृष्टि की इच्छा हो तो (प्रस्तर को यह पढ़कर) उठावें—"सञ्जानाथां द्यावा-
पृथिवी" (यजु० २।१६)—"द्यौ और पृथिवी साथ चलें।" क्योंकि जब द्यौ और पृथिवी साथ-
साथ चलते हैं तभी वर्षा होती है, इसलिए कहा—'द्यावापृथिवी साथ चलें।' अब कहता है—
"मित्रावरुणौ त्वा वृष्ट्यावताम्" (यजु० २।१६)—"मित्र और वरुण तेरी वृष्टि द्वारा रक्षा करें।"
इस कहने से तात्पर्य यह है कि जो वर्षा का अध्यक्ष है वह तेरी वृष्टि द्वारा रक्षा करे। वही वर्षा
का अध्यक्ष है जो यह बहता है (अर्थात् वायु), यह एक ही के समान बहता है। परन्तु वही पुरुष
के भीतर जाकर आगे-पीछे होकर दो हो जाते हैं, उनका नाम है प्राण और उदान। प्राण और
उदान ही मित्र और वरुण हैं। इसीलिए यह कहता है 'वह जो वर्षा का अध्यक्ष है तेरी वृष्टि
द्वारा रक्षा करे।' इस (प्रस्तर) को वह इस (मन्त्र) द्वारा ले तो सदा वृष्टि उसके अनुकूल
रहेगी। वह (प्रस्तर पर) घी लगाता है, मानो यजमान को भी आहुति का रूप देता है, जिससे
वह आहुति होकर देव-लोक को चला जाय ॥१२॥
वह उस (प्रस्तर) के अगले भाग को जुहू में से चुपड़ता है, बीच को उपभृति में से, जड़