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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-३, ब्राह्मण-१

जिरे ते॒ श्रेयाꣳस्त॒ आसुस्ततो॒ऽश्रद्धा मनु॒ष्यान्विवेद॒ ये यज॑न्ते पापी॑याꣳस्ते॒
भव॑न्ति॒ यऽउ॑ न यज॑न्ते॒ श्रेया॑ꣳस॒स्ते भव॑न्तीति॒ तत॒ इतो॑ दे॒वान्ह॒विर्न जगा॑मतः प्र-
दाना॒द्धि दे॒वा उप॑जीवन्ति ॥ २४॥ ते ह॒ देवा॑ ऊचुः । बृह॒स्पति॒माङ्गि॑रस॒मश्रद्धा वै॒
मनु॒ष्यानबि॑द॒त्तेभ्यो॑ विधेहि य॒ज्ञमि॑ति॒ स हे॒त्योवा॑च बृह॒स्पति॒राङ्गि॑रसः क॒था न॒
यज्ञधु॒ङ्ङ्इति॒ ते होचुः किंकाम्या यजे॑महि॒ ये यज॑न्ते पापी॑याꣳस॒स्ते भव॑न्ति॒ यऽउ॑ न
यज॑न्ते॒ श्रेया॑ꣳस॒स्ते भव॑न्तीति॒ ॥ २५॥ स होवाच । बृह॒स्पति॒राङ्गि॑रसो यद्वै शुश्रुम॒
दे॒वानां॑ परि॒षूतं॒ तदे॒ष य॒ज्ञो भ॑वति॒ यहू॒तानि ह॒वींषि कृ॒ता वेदि॒स्तेनावम॑र्शम-
चारिष्ट॒ तस्मात्पापी॑याꣳसोऽभूत॒ तेना॑नवम॒र्शं य॑जध्वं॒ तथा॒ श्रेया॑ꣳसो भविष्यथेत्या
क्रिय॑त॒ इत्या ब॒र्हिष स्त॒रणा॒दिति ब॒र्हिषा ह॒ वै खल्वे॑षा शा॒म्यति॒ स यदि॑ पु॒रा
ब॒र्हिष स्त॒रणा॒त्किंचि॑दाप॒द्येत ब॒र्हिरेव तत्स्तृण॒न्नपा॑स्ये॒द्य यदा॑ ब॒र्हि स्तृ॒णन्त्य॒पि
पदा॒भिति॑ष्ठन्ति॒ स यो॒ हैवं वि॒द्वान॑नवम॒र्शं यज॑ते॒ श्रेया॑न्त्हैव॑ भवति॒ तस्मा॒दनव-
म॒र्शमे॑व य॑जेत ॥ २६॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ [५.] ॥ अध्यायः ॥ २ ॥
स वै स्रुचः॒ संमा॑ष्टि॑ । तद्यत्स्रुचः॒ संमा॑र्ष्टि॒ यथा॒ वै दे॒वानां॑ चर॒णं तद्वाऽअ॒नु
मनु॒ष्याणां तस्माद्यदा॑ मनु॒ष्याणां॑ परिवे॒षणामु॑षक्लृप्तं॒ भव॑ति ॥ १॥ अथ पात्रा॑णि
निर्णे॑निजति । तैर्निर्णिक्त्यै परि॑वेवे॒षित्ये॒वं वाऽए॒ष दे॒वानां य॒ज्ञो भ॑वति॒ यद्धूता-
नि ह॒वींषि कृ॒ता वेदि॒स्तेषामेतान्येव पात्रा॑णि॒ यत्स्रुचः॑ ॥ २॥ स यत्संमा॑ष्टि॑ ।
निर्णिक्त्यै॒वैना एतन्निर्णिक्ताभिः प्र॑चरा॒णीति॒ तद्वै द्वये॑नैव दे॒वेभ्यो॒ निर्णे॑निक्त्ये-
केन मनु॒ष्येभ्यो॑ऽद्भि॒श्च ब्र॒ह्मणा च दे॒वेभ्य॒ऽआपो हि कुशा ब्रह्म यद्यु॒त्विके॑नैव मनु-
ष्येभ्यो॒ऽद्भि॑रे॒वैवन्त्वेतन्नाना भवति ॥ ३॥ अथ स्रुवमाद॑त्ते । तं प्र॒तप॑ति प्र॒त्युष्ट॒ꣳ रक्षः॒
प्रत्यु॑ष्टा॒ऽअरा॑तयो॒ निष्ट॑प्त॒ꣳ रक्षो॒ निष्ट॑प्ता॒ अरा॑तय इति वा ॥ ४॥ दे॒वा ह॒ वै य॒ज्ञं
तन्वा॒नाः । तेऽसु॑ररक्षसेभ्य आ॒सङ्गा॑द्बिभयांञ्चक्रुस्तद्य॒ज्ञमुख॑मे॒वैतन्नाष्ट्रा रक्षा॑ꣳस्यतो
ऽपह॑न्ति ॥ ५॥ स वाऽइ॒त्यग्रैरु॒त्तरतः॒ संमा॑ष्टि॑ । अ॒निशि॑तो॒ऽसि सपत्न॒क्षिदिति॑ य-

का० १, अ० ३, ब्रा० १, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / ४५
हाथ धो डाले, उन्होंने ठीक किया। अब अश्रद्धा उत्पन्न हो गई। लोग कहने लगे-'जो यज्ञ करते
हैं वे पापी हो जाते हैं। जो यज्ञ नहीं करते वे पुण्यवान् होते हैं।' अब इस पृथिवी से देवताओं के
पास कुछ भी हवि नहीं पहुँची। देवता तो उसी हवि के आश्रय रहते हैं जो इस पृथिवीलोक से दी
जाती है ॥२४॥
तब देवों ने बृहस्पति आंगिरस से कहा- "मनुष्य में अश्रद्धा ने घर कर लिया है। उनके
लिए यज्ञ का आदेश दीजिये।" तब बृहस्पति आंगिरस ने कहा- "आप लोग यज्ञ क्यों नहीं
करते ?" वे बोले- "यज्ञ क्या करें ? जो यज्ञ करते हैं वे पापी हो जाते हैं, जो यज्ञ नहीं करते
पुण्यात्मा रहते हैं" ॥२५॥
तब बृहस्पति आंगिरस ने कहा- "हमने ऐसा सुना है कि जो देवताओं के लिए तैयार किया
जाता है अर्थात् पकी हुई हवि, वही यज्ञ है। तुमने वेदी को छूकर उसको किया, अतः पापी हो
गये। वेदी को न छूकर करते तो पुण्यात्मा होते। बिना छुए ही यज्ञ करो। ठीक हो जायगा।"
बर्हि से वेदी सन्तुष्ट रहती है। इसलिये यदि बर्हि बिछाने से पूर्व वेदी पर कोई चीज गिर जाय तो
बर्हि बिछाते समय ही उठानी चाहिए। क्योंकि जब वे बर्हि को बिछाते हैं तो वेदी पर पैर रखते
हैं। जो इस रहस्य को समझकर बिना स्पर्श किये यज्ञ करता है पुण्यात्मा हो जाता है। इसलिये
(वेदी और हवि को) बिना छुए ही यज्ञ करे ॥२६॥
अध्याय ३-ब्राह्मण १
अब (अग्नीध्र) चमचों को माँजता है। चमचों को इसलिये माँजता है कि जैसा मनुष्यों
का चलन होता है वैसा ही देवों का। जब मनुष्यों का भोजन परोसा जाता है तो-॥१॥
बरतनों को माँजते हैं, और तब उनमें खाना परोसते हैं। इसी प्रकार देवों को हवि दी
जाती है; अर्थात् हवि को पकाते हैं और वेदी को बनाते हैं और देवों के पात्रों अर्थात् चमचों आदि
को ठीक करते हैं ॥२॥
जब वह माँजता है तो धोता भी है। तात्पर्य यह है कि मैं इस प्रकार करूँगा। देव-पात्रों
को दो चीजों से शुद्ध करते हैं और मनुष्य के पात्रों को एक से। देव-पात्रों को जल और प्रार्थना
से। कुश जल का प्रतिनिधि है और प्रार्थना तो है ही। मनुष्यों के पात्रों को केवल एक अर्थात्
जल से। इस प्रकार दोनों में भेद हो जाता है ॥३॥
पहले स्रुवा को लेता है, और आग पर तपाता है, इस (यजु० १।२६) मन्त्र को जपते
हुए-"झुलस गये राक्षस, झुलस गये शत्रु। जल गये राक्षस, जल गये शत्रु" ॥४॥
जब देवों ने यज्ञ किया था तो उनको भय था कि कहीं राक्षस असुर यज्ञ को विध्वंस न
कर दें। अतः वह पहले से ही राक्षस और असुरों को भगा देता है ॥५॥
वह पात्र के आगे से लेकर भीतर की ओर इस प्रकार स्रुवा को माँजता है, यह पढ़कर
(यजु० १।२६) - "तू तेज तो नहीं है; परन्तु शत्रुओं का घातक है।" यह इसलिए कहता है कि

थानुप॑रतो॒ यज॑मानस्य स॒पन्ना॒न्निणु॒द्यादि॒वमे॒तदाह॒ वाजि॑नं वा वा॒जिध्ये॑ संमा॒र्ज्मी-
ति य॒ज्ञियं॑ वा य॒ज्ञाय॒ संमा॒र्ज्मीत्ये॒वैतदा॒हैतेनैव सर्वाः॒ स्रुचः॒ संमा॑र्ष्टि॒ वाजि॑नीं
त्वेति॒ स्रुचं॑ तू॒ष्णीं प्रा॑शित्र॒हरण॑म् ॥६॥ स वाऽइ॒त्यग्रे॒त्तर॑तः॒ संमा॑र्ष्टि॒ति । मूले-
र्वा॒ह्यात्तऽइ॑तीव॒ वाऽअ॒यं प्राण॒ इती॒वोदा॑नः प्राणोदा॒नावे॒वैतद्द॑धाति॒ तस्मा॒दिती-
वे॒मानि॒ लोमा॑नीतीवे॒मानि॑ ॥७॥ स वै॒ संमृ॑ज्य-संमृज्य॒ प्रत॑प्य-प्रतप्य॒ प्रय॑च्छति । य॒-
थावम॒र्शं निर्णि॑ज्यानवमर्शमुत्त॒मं परि॑क्षाल॒येदे॒वं तत्त्स्मात्प्रत॑प्य-प्रतप्य॒ प्रय॑च्छति
॥८॥ स वै स्रुव॑मे॒वाग्रे॒ संमा॑र्ष्टि । अथे॒तराः॒ स्रुचो॒ योषा॒ वै स्रुग्वृषा॑ स्रुव॒स्तस्मा॒-
द्यद्यपि॑ ब॒हूव्य॒-इव॒ स्त्रियः॑ सा॒र्धं यन्ति॒ य ए॒व तास्वपि॑ कुमा॒रक॒-इव॒ पुमांन्भव॑ति
स ए॒व तत्र॒ प्रथ॑म॒ एत्य॒नूच्य॑ इत॒रास्तस्मा॑त्स्रुव॑मे॒वाग्रे॒ संमा॒र्ष्ट्यथे॒तराः॒ स्रुचः॑ ॥९॥
स वै तथै॑व संमृ॑ज्यात् । प॒त्राणि॑ नाभि॒व्युन्जे॒द्यथा॒ यस्मा॒ऽअश॑नमा॒हरि॒ष्यन्त्स्यात्तं॑ पा-
त्रं॒निर्णेनि॑जेन्नाभि॒व्युन्जे॒देवं॒ तत्त्स्मा॒ड् तथै॑व॒ संमृ॒ज्याद्य॒त्राणि॑ नाभि॒व्युन्जे॒त्प्राङि॑वै॒वो-
त्क्रम्य॑ ॥१०॥ तद्धैके॑ । स्रुक्सं॑मा॒र्जना॑न्य॒न्वाग्र॒मभ्याद॑धति वेदस्या॒ह्वाभूव॒न्त्स्रुच॑ ए॒भिः
सम॒मार्जि॑षुरि॒दं वै किंचि॒द्यज्ञस्य॒ नेदि॒दं ब॒हिर्धा य॒ज्ञाद्भव॒दिति॒ तदु॒ तथा॒ न कु॒र्या-
द्यथा॒ यस्मा॒ऽअश॑नमा॒हरे॑त्तं॒ पात्रं॒निर्णेनि॑जनं पार्यये॒देवं तत्त्स्मा॑डु॒ परा॒स्ये॒वैता॑नि
॥११॥ अथ॒ पत्नीं॒ संन॑ह्यति । ज॒घना॒र्धो वाऽए॒ष य॒ज्ञस्य॒ यत्पत्नी॒ प्राङ्मै॑ य॒ज्ञस्ता॒-
यमानो॑ या॒द्विति॒ युनक्त्ये॒वैना॑मे॒तद्युक्ता॑ मे य॒ज्ञम॒न्वासा॒ताऽइ॑ति ॥१२॥ योक्त्रे॑ण॒ सं-
नह्य॑ति । योक्त्रे॑ण॒ हि यो॒ग्यं यु॒ञ्जन्त्य॑स्ति॒ वै पत्न्या॒ अमे॑ध्यं॒ यद॒वाची॑नं नाभे॒रैत-
द्वा॒यमवे॑क्षिष्यमाणा॒ भव॑ति॒ तद्देवा॑स्या ए॒तद्योक्त्रे॒णार्त्ति॑र्दधात्यथ॒ मेध्ये॑नै॒वोत्त॑रार्धेना-
ऽम्यवे॑क्षते॒ तस्मा॒त्पत्नीं॒ संन॑ह्यति ॥१३॥ स वाऽअ॒भिवासः॒ संन॑ह्यति । ओष॑-
धयो॒ वै वासो॒ वरु॑ण्या र॒ज्जुस्तदोष॑धीरे॒वैतद॒न्तर्द॑धाति॒ तयो॒ हैन॑मेषा॒ वरु॑ण्या
र॒ज्जुर्न॑ हिनस्ति॒ तस्मा॑दभिवासः॒ संन॑ह्यति ॥१४॥ स संन॑ह्यति । अदि॑त्यै रास्ना॒-
सीती॒यं वै पृथि॒व्यदि॑तिः॒ सेयं दे॒वानां॒ पत्न्ये॒षा वाऽए॒तस्य॒ पत्नी॑ भवति॒ तद॑स्या

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४८ शतपथ ब्राह्मण

ए॒तदा॒त्मान॑मे॒व क॒रोति॒ न र॒ज्जुँ शिरो॒ वै रा॒स्ना तमे॒वास्या ए॒तत्क॑रोति ॥१५॥ स
वै न॒ ग्रन्थिं॑ कुर्यात् । व॒रु॒ण्यो॑ वै ग्र॒न्थिर्व॑रु॒णो ह॒ पत्नीं॑ गृह्णी॒याद्यद्ग्र॒न्थिं कु॒र्यात्तस्मा॒न्न
ग्रन्थिं॑ करोति ॥१६॥ ऊ॒र्ध्वमे॒वोदू॑हति । विष्णो॒र्वेष्यो॒ऽसीति॒ सा वै न प॒श्चात्प्राची॒
दे॒वानां॑ य॒ज्ञम॒न्वासी॒तेयं वै पृ॑थि॒व्यदि॑तिः॒ सेयं दे॒वानां॒ पत्नी॒ सा प॒श्चात्प्राची दे॒वा-
नां य॒ज्ञम॒न्वास्ते॒ तद्घेमा॒मध्यारो॒हेत्सा पत्नी क्षिप्रेऽमुं लो॒कमि॑यात्तथो ह॒ पत्नी॒ ज्यो-
ग्‍जी॑वति॒ तद॒स्या॑ऽए॒वैतन्नि॒ह्नुते॒ तथो॒ हैना॒मियं॒ न हि॑नस्ति॒ तस्मा॒द् दक्षि॑णा॒त-इ॑वै-
वा॒न्वासी॑त ॥१७॥ अथा॑ज्य॒मवे॑क्षते । योषा॒ वै पत्नी॒ रेत॒ आज्यं॑ मिथु॒नमे॒वैतत्प्र॑ज-
ननं॑ क्रियते॒ तस्मा॒दाज्य॒मवे॑क्षते ॥१८॥ स॒विद्र॑सि॒ । ऽद॑ब्धेन त्वा॒ चक्षु॒षाव॑पश्यामी-
त्यना॑र्त्तेन त्वा॒ चक्षु॒षाव॑पश्यामी॒त्येवैतदा॑हा॒ग्नेर्जि॒ह्वासी॒ति यदा वाऽए॒तद॒ग्नौ जुह्व-
त्यथा॒ग्नेर्जि॒ह्वा-इ॒वोत्त्ति॑ष्ठन्ति॒ तस्मा॑दाहा॒ग्नेर्जि॒ह्वासी॒ति सु॒हूर्द्दे॒वेभ्य॒ इति॒ साधु दे॒वेभ्य॒
इत्ये॒वैतदा॑ह॒ धाम्ने॑-धाम्ने मे भव॒ यजु॑षे-यजुष॒ऽइति॒ सर्व॑स्मै मे य॒ज्ञायेधी॒त्येवैतदा॑ह
॥१९॥ अथा॑ज्यमा॒दाय॒ प्राङुदा॑द्रवति । तदा॑हव॒नीयेऽधिश्र॑यति॒ यस्या॑हव॒नीये ह॒वीँ-
षि श्रपय॑न्ति॒ सर्वो॑ मे य॒ज्ञ आह॑वनीये शृतो॒ऽसदित्यथ यदमूत्राग्ने॑ऽधिश्रयति पत्नी॒ँ
ह्य॑वकाशयिष्य॒न्भव॑ति॒ न हि तदवक॑ल्पते॒ यत्सा॒मि प्र॒त्यग्घरे॑त्पत्नीमवकाशयिष्या-
मीत्यथ यत्पत्नीं॒ नाव॑काशयेद॒न्तरि॑याद् य॒ज्ञात्पत्नीं॒ तथो॑ ह॒ यज्ञात्पत्नी॒ नान्त॒रेति॒
तस्मा॒ऽ सार्ध॑मे॒व वि॒ल्लाप्य॒ प्रागुदा॑द्रुत्यव॒काश्य॒ पत्नीं॒ यस्यो॒ पत्नी॒ न भ॑वत्य॒ग्र
ऽए॒व तस्या॑हवनी॒येऽधिश्र॑यति॒ तत्तत॒ आद॑त्ते॒ तदन्तर्वेद्यासा॑दयति ॥२०॥ तदाहुः॑ ।
नान्तर्वेद्यासा॑दयेदृतो वै दे॒वानां॒ पत्नीः संयाजयन्त्यवसभा ऋ॒ह देवा॒नां पत्नीः करो-
ति॒ परःपुं॑स्तो ह्यस्य॒ पत्नी॑ भवती॒ति तदु॑ होवाच याज्ञवल्क्यो यथारिष्टं पत्न्या
अस्तु॒ कस्त्तदाद्रि॑येत॒ यत्परःपुं॑स्ता वा॒ पत्नी॒ स्याद्यथा वा य॒ज्ञो वेदि॑र्य॒ज्ञ आज्यं॒ य-
ज्ञाय॒ज्ञं निर्मिमा॒ऽइति॒ तस्मा॒दन्त॒र्वेद्ये॒वासा॑दयेत् ॥२१॥ प्रोक्षणीषु प॒वित्रे॒ भवतः॑ ।
ते तत॒ आद॑त्ते ता॒भ्यामा॒ज्यमुत्पु॑नात्ये॒को वाऽउत्पवनस्य॒ बन्धु॒र्मेध्य॑मे॒वैतत्क॑रोति
॥२२॥ स उत्पू॒नाति॑ । सवि॒तुस्त्वा॑ प्रसव॒ऽउत्पु॑नाम्यच्छि॒द्रेण प॒वित्रे॑ण॒ सूर्य॑स्य र॒श्मि-

कां० १, अ० ३, ब्रा० १, कं० १५-२३ शतपथब्राह्मण / ४६
रस्सी को रस्सी न मानकर केवल यजमान की पत्नी की रास्ना बना देता है (रास्ना का अर्थ
है सीमा)। रज्जू पत्नी की रास्ना होती है ॥१५॥
रस्सी में गांठ नहीं बाँधनी चाहिए। गाँठ वरुण की होती है। गाँठ बाँधने से तो वरुण
पत्नी को पकड़ लेगा। इसलिए गांठ नहीं बाँधता ॥१६॥
(यजु० १।३०) के निम्न मन्त्रांश को पढ़कर वह उसे ऊपर की ओर मोड़ देता है—"तू
विष्णु से व्याप्य है।" पत्नी को चाहिए कि वह वेदी के पश्चिम को पूर्वाभिमुख न बैठे। यह
पृथिवी अदिति है, वह देवों की पत्नी है, देवों की पत्नी वेदी के पश्चिम को पूर्वाभिमुख बैठती है।
यदि यह स्त्री भी ऐसा ही करेगी तो अदिति हो जायगी और शीघ्र ही परलोक सिधारेगी। अपने
नियत स्थान पर बैठकर बहुत दिनों जीती है। अदिति को प्रसन्न रखती है और अदिति उसको
हानि नहीं पहुँचाती। इसलिए उसको दक्षिण की ओर हटकर बैठना चाहिए ॥१७॥
अब वह (पत्नी) आज्य को देखती है। पत्नी स्त्री है और आज्य वीर्य है। इस प्रकार
दोनों में सम्पर्क स्थापित करके सन्तति-प्रजनन कर देता है। इसीलिए पत्नी आज्य को देखती
है ॥१८॥
वह यजु० १।३० को पढ़कर आज्य को देखती है—"मैं तुझको दोषरहित आँख से देखती
हूँ।" अर्थात् शुभ दृष्टि से।—"तू अग्नि की जीभ है।" अग्नि में उसकी आहुति देते हैं तो अग्नि
की जीभ उसे ले लेती है, अतः आज्य अग्नि की जीभ है।—"तू देवों के लिए 'सुहू' है।" अर्थात्
भलीभाँति निमन्त्रित।—"मेरे कल्याण के लिए यह कृत्य हो।" इसका तात्पर्य यह है कि यह आज्य
समस्त यज्ञ के लिए सुहू हो ॥१९॥
अग्नीध्र आज्य को लेकर कुछ पूर्व की ओर ले जाता है। जो अपनी हवियों को आहवनीय
अग्नि पर पकाते हैं उनके यहाँ यह आज्य आहवनीय अग्नि पर पकाते हैं, यह मानकर कि हमारी
समस्त हवियाँ आहवनीय पर पकें। गार्हपत्य पर वह आज्य को इसलिए रखता है कि पत्नी को
देखने का अवकाश मिल सके। यह तो ठीक न होगा कि यज्ञ करते समय आहवनीय अग्नि पर से
उठाकर आज्य को केवल इसलिए पश्चिम को लाया जाय कि पत्नी को देखने का अवकाश मिल
सके। यदि पत्नी को आज्य न दिखाया जाय तो इसका अर्थ यह होगा कि पत्नी को यज्ञ में कोई
अधिकार नहीं दिया गया। ऐसा करने से वह पत्नी को यज्ञ के अधिकार से बहिष्कृत नहीं समझता
और (गार्हपत्य पर) पत्नी के निकट पकाकर और पत्नी को दिखाकर ही पूर्व की ओर ले जाता
है। यदि पत्नी न हो (मर गई हो या अन्य कारण हो) तो पहले से ही आहवनीय पर रखा देता
है। फिर वहाँ से उठाकर वेदी के भीतर रख देता है ॥२०॥
कुछ लोग कहते हैं कि वेदी के भीतर न रखना चाहिए। इससे देव-पत्नियों के लिए
आहुति दी जाती है। देव-पत्नियों को सभा से बहिष्कृत कर देता है। और यजमान की पत्नी भी
यजमान से रुष्ट हो जाती है। इस पर याज्ञवल्क्य का कहना है कि 'पत्नी के लिए जो नियत है
वही होना चाहिए। किसको चिन्ता है कि उसकी पत्नी दूसरों से सम्बन्ध रखती है!' 'वेदी यज्ञ
है, और आज्य भी यज्ञ है, मैं यज्ञ में से यज्ञ बनाऊँगा।' इसलिए आज्य को वेदी में ही रखना
चाहिए ॥२१॥
दोनों पवित्रे प्रोक्षणी पात्रों में होते हैं। वह उनको वहाँ से निकालकर आज्य को पवित्र
करता है। उनमें से एक तो पवन का है। इस प्रकार वह आज्य को यज्ञ के योग्य बनाता है ॥२२॥
वह यह मन्त्र (यजु० १।३१) पढ़कर पवित्र करता है—"सविता की प्रेरणा से, छिद्ररहित