शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 63, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंका० १, अ० ३, ब्रा० १, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / ४५
हाथ धो डाले, उन्होंने ठीक किया। अब अश्रद्धा उत्पन्न हो गई। लोग कहने लगे-'जो यज्ञ करते
हैं वे पापी हो जाते हैं। जो यज्ञ नहीं करते वे पुण्यवान् होते हैं।' अब इस पृथिवी से देवताओं के
पास कुछ भी हवि नहीं पहुँची। देवता तो उसी हवि के आश्रय रहते हैं जो इस पृथिवीलोक से दी
जाती है ॥२४॥
तब देवों ने बृहस्पति आंगिरस से कहा- "मनुष्य में अश्रद्धा ने घर कर लिया है। उनके
लिए यज्ञ का आदेश दीजिये।" तब बृहस्पति आंगिरस ने कहा- "आप लोग यज्ञ क्यों नहीं
करते ?" वे बोले- "यज्ञ क्या करें ? जो यज्ञ करते हैं वे पापी हो जाते हैं, जो यज्ञ नहीं करते
पुण्यात्मा रहते हैं" ॥२५॥
तब बृहस्पति आंगिरस ने कहा- "हमने ऐसा सुना है कि जो देवताओं के लिए तैयार किया
जाता है अर्थात् पकी हुई हवि, वही यज्ञ है। तुमने वेदी को छूकर उसको किया, अतः पापी हो
गये। वेदी को न छूकर करते तो पुण्यात्मा होते। बिना छुए ही यज्ञ करो। ठीक हो जायगा।"
बर्हि से वेदी सन्तुष्ट रहती है। इसलिये यदि बर्हि बिछाने से पूर्व वेदी पर कोई चीज गिर जाय तो
बर्हि बिछाते समय ही उठानी चाहिए। क्योंकि जब वे बर्हि को बिछाते हैं तो वेदी पर पैर रखते
हैं। जो इस रहस्य को समझकर बिना स्पर्श किये यज्ञ करता है पुण्यात्मा हो जाता है। इसलिये
(वेदी और हवि को) बिना छुए ही यज्ञ करे ॥२६॥
अध्याय ३-ब्राह्मण १
अब (अग्नीध्र) चमचों को माँजता है। चमचों को इसलिये माँजता है कि जैसा मनुष्यों
का चलन होता है वैसा ही देवों का। जब मनुष्यों का भोजन परोसा जाता है तो-॥१॥
बरतनों को माँजते हैं, और तब उनमें खाना परोसते हैं। इसी प्रकार देवों को हवि दी
जाती है; अर्थात् हवि को पकाते हैं और वेदी को बनाते हैं और देवों के पात्रों अर्थात् चमचों आदि
को ठीक करते हैं ॥२॥
जब वह माँजता है तो धोता भी है। तात्पर्य यह है कि मैं इस प्रकार करूँगा। देव-पात्रों
को दो चीजों से शुद्ध करते हैं और मनुष्य के पात्रों को एक से। देव-पात्रों को जल और प्रार्थना
से। कुश जल का प्रतिनिधि है और प्रार्थना तो है ही। मनुष्यों के पात्रों को केवल एक अर्थात्
जल से। इस प्रकार दोनों में भेद हो जाता है ॥३॥
पहले स्रुवा को लेता है, और आग पर तपाता है, इस (यजु० १।२६) मन्त्र को जपते
हुए-"झुलस गये राक्षस, झुलस गये शत्रु। जल गये राक्षस, जल गये शत्रु" ॥४॥
जब देवों ने यज्ञ किया था तो उनको भय था कि कहीं राक्षस असुर यज्ञ को विध्वंस न
कर दें। अतः वह पहले से ही राक्षस और असुरों को भगा देता है ॥५॥
वह पात्र के आगे से लेकर भीतर की ओर इस प्रकार स्रुवा को माँजता है, यह पढ़कर
(यजु० १।२६) - "तू तेज तो नहीं है; परन्तु शत्रुओं का घातक है।" यह इसलिए कहता है कि