सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-२, ब्राह्मण-४

३२ शतपथ ब्राह्मण
ऽपचक्राम सोऽश्वं प्र॒विवेश तेऽश्व॒मालभन्त तस्याल॑ब्धस्य मेधोऽप॑चक्राम स गां
प्र॒विवेश ते गामार सोऽविं प्र॒विवेश तेऽविमा०--म् सोऽजं प्र॒विवेश तेऽज॒माल-
भन्त तस्याल॑ब्धस्य मेधोऽप॑चक्राम ॥ ६॥ स इ॒मां पृ॑थि॒वीं प्र॒विवेश । तं खनन्त-
इ॒वान्व॑विन्दंस्त॒मन्व॑विन्दंस्तावि॒मौ व्री॒हियवौ तस्मादे॒तावित॑र्हि खनन्त-इ॒वेवानु॑-
विन्दन्ति स यावद्वीर्यवद् वाऽअन्यैते सर्वे पशव आल॒भ्याः स्युस्तावद्वीर्यवद्वास्य
ह॒विरिव भवति य ए॒वमेतद्वेदात्रो सा सम्पद्यूदाहुः पाङ्कः पशुरिति ॥ ७॥ यदा पि-
ष्टान्यथ लोमानि भवन्ति । यदाप आनयन्त्यथ त्वग्भवति यदा संयौन्यथ मा ंसं भ-
वति संतत- इव हि स तर्हि भवति संततमिव हि मा ंसं यदा शृतोऽथास्थि भव-
ति दारुण- इव हि स तर्हि भवति दारुणमित्यस्थ्या यदुद्वासयिष्यन्नभिघारयति तं
मज्जानं दधात्येषो सा सम्पद्यदाहुः पाङ्कः पशुरिति ॥ ८॥ स यं पुरुष॒मालभन्त ।
स किम्पुरूषोऽभवद्यावश्वं च गां च तौ गौरश्च गवयश्चाभवतां यमविमालभन्त स
उष्ट्रोऽभवद्यमज॒मालभन्त स शरभोऽभवत्तस्मादे॒तेषां पशूनां नाशितव्यमपक्रान्ते-
धा ह्येते पशवः ॥ ९॥ ब्राह्मणम् ॥ १ [२.३.]॥
इन्द्रो ह यत्र वृत्राय वज्रं प्रजहार । स प्रहृतश्चतुर्धाऽभवत्तस्य स्फ्यस्तृतीयं वा
यावद्वा यूपस्तृतीयं वा यावद्वा रथस्तृतीयं वा यावद्वाथ यत्र प्राहरत्तच्छकलोऽशी-
र्यत स पतित्वा शरोऽभवत्तस्माच्छरो नाम यदर्शयतित्वमु स चतुर्धा वज्रोऽभवत्
॥ १॥ ततो द्वाभ्यां ब्राह्मणा यज्ञे चरन्ति द्वाभ्या७ राजन्यबन्धवः संव्याधि यूपेन च
स्फ्येन च ब्राह्मणा रथेन च शरेण च राजन्यबन्धवः ॥२॥ स यत्स्फ्यमादत्ते ।
यथैव तदिन्द्रो वृत्राय वज्रमुद्यच्छदेवमेवैष एतं पाप्मने द्विषते भ्रातृव्याय वज्रमुद्य
च्छति तस्माद्धि स्फ्यमादत्ते ॥ ३॥ तमादत्ते । दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्रस॒वेऽश्विनोर्बा॒हु-
भ्यां पू॒ष्णो हस्ताभ्यामाद॑देऽध्वरकृतं दे॒वेभ्य इति सविता वै देवानां प्रसविता त्-
त्सवितृप्रसूत ए॒वैनमेतदादत्तेऽश्विनोर्बाहुभ्यामित्यश्विनावध्वर्यू तत्तयोरेव बाहुभ्या-

कां० १, अ० २, ब्रा० ४, कं० १-४ शतपथब्राह्मण / ३३
मेध चला गया और घोड़े में जा घुसा । उन्होंने घोड़े का आलभन किया। तब मेध घोड़े से निकल-
कर गाय में घुस गया । तब उन्होंने गाय का आलभन किया । तब मेध गाय से निकलकर भेड़ में
घुस गया । तब उन्होंने भेड़ का आलभन किया । तब मेध भेड़ में से निकलकर बकरी में चला
गया । तब उन्होंने बकरी का आलभन किया । तब मेध बकरी में से निकल भागा ॥६॥
वह पृथिवी में चला गया। वे पृथिवी को खोदकर खोजने लगे, और उसको पा लिया ।
यही चावल और जौ हैं। इनको आजकल भी पृथिवी को जोतकर निकालते हैं। उन सब पशुओं के
आलभन से जो लाभ होता है वही चावल की हवि से होता है, उस मनुष्य को जो इस रहस्य को
समझकर यज्ञ करता है। यह पांक्त यज्ञ है अर्थात् पाँच पशुओं का ॥७॥
यह जो पीठी है वह लोम है। जो जल है वह त्वचा है। जब गूँधते हैं तो यह मांस है।
मांस गूँधा हुआ होता है। पकने से कड़ी हड्डी के समान हो जाता है। हड्डी तो कड़ी होती है। जब
उस पर घी डालते हैं तो मज्जा हो जाता है। इस प्रकार यह हवि पांक्त पशु हो जाती है ॥८॥
जो पुरुष का आलभन किया था वह किं-पुरुष हो गया। जो घोड़े का आलभन किया
और गाय का, वह गौर और गवय बन गये। भेड़ का आलभन किया तो ऊँट बन गया। बकरी
का आलभन किया तो वह शरभ बन गया। इसलिए हमें पाँच पशुओं को न खाना चाहिए, क्योंकि
इनमें मेध नहीं रहा ॥६॥
अध्याय २-ब्राह्मण ४
जब इन्द्र ने वृत्र के वज्र मारा तो उसके चार टुकड़े हो गये। इसके तीन भागों में तिहाई
या उसके लगभग स्फ्या हो गई। तिहाई या लगभग यूप हो गया और तिहाई या लगभग रथ हो
गया। जो भाग वृत्र के लगा वह टूटकर शर (बाण) हो गया। बाण को शर इसलिए कहते हैं कि
वह टूट गया ('शृ' का अर्थ है टूटना') । वज्र के इस प्रकार चार टुकड़े हो गये ॥१॥
इनमें से दो टुकड़े ब्राह्मण यज्ञ के काम में लाता है अर्थात् स्फ्या और यूप, और शेष दो
टुकड़े क्षत्रिय लड़ाई के काम में लाता है अर्थात् रथ और शर ॥२॥
वह स्फ्या को लेता है। जैसे इन्द्र ने वृत्र को मारने के लिए वज्र लिया था, उसी प्रकार
अध्वर्यु अपने वैरी को मारने के लिए स्फ्या¹ लेता है। स्फ्या को लेने का यही प्रयोजन है ॥३॥
वह स्फ्या को यजु० १।२४ के मन्त्रांश को पढ़कर पकड़ता है- "देव सविता की प्रेरणा से,
अश्विनों की भुजाओं से, देव पूषा के दोनों हाथों से देवताओं के अध्वर के लिए तुझे उठाता हूँ।"
सविता देवों का प्रेरक है, अतः वह देव सविता की प्रेरणा से ही स्फ्या लेता है। अग्नि दो अध्वर्यु
१. स्फ्या तलवार की आकृति की (खदिर की) लकड़ी की होती है जो यज्ञ में काम आती है।

३४ शतपथ ब्राह्मण
माद॑त्ते न स्वा॒भ्यां वज्रो वाऽए॒ष तस्य॒ न ममु॑क्षो भर्त्ता तमे॒ताभि॑र्द्दे॒वता॑भि॒राद॑त्ते
॥४॥ आददेऽध्वर॒कृतं॑ दे॒वेभ्य॒ इति॑ । अध्वरो॒ वै य॒ज्ञो य॒ज्ञकृतं॑ दे॒वेभ्य॒ इत्ये॒वैतदा॑ह॒
तत् स॒व्ये पा॒णौ कृ॒त्वा द॑क्षि॒णेनाभि॒मृश्य॒ जपति॒ सꣳश्यत्ये॒वैन॑मेतद्यज॑स्पति ॥५॥
स॒ जपति॑ । इन्द्र॑स्य बा॒हुर॑सि दक्षि॑ण॒ इत्येष॒ वै वीर्य॑वत्तमो य इन्द्र॑स्य बा॒हुर्द्द-
क्षि॒णस्तस्मा॑दाहेन्द्र॑स्य बा॒हुर॑सि दक्षि॑ण॒ इति॑ स॒हस्र॑भृष्टिः शत॒तेजा॒ इति॑ स॒हस्र॑भृ-
ष्टिर्वै स वज्र॑ आसीच्छत॒तेजा॒ यं तं वृ॒त्राय॒ प्राह॑रत्तमे॒वैतत्क॑रोति ॥६॥ वायु॑रसि
तिग्म॒तेजा॒ इति॑ । एतद्वै तेजि॑ष्ठं तेजो॒ यद्वा॒युं॒ योऽयं॒ पव॑त॒ऽए॒ष ह्ये॑मांल्लो॒कांस्ति॒र्य्यङ्-
नु॒पव॑ते सꣳश्यत्ये॒वैन॑मेतद्विष॒तो ब॒ध इति॒ यदि॑ नाभि॒चरे॒द्यद्यु॑ऽअभि॒चरे॒दमु॑ष्य ब॒ध
इति॑ ब्रूयात्तेन॒ सꣳशि॑तिन् ना॒त्मान॑मुपस्पृशति॒ न पृ॑थि॒वीं नेद॒नेन॒ वज्रे॑ण सꣳशि॑-
तेना॒त्मानं॑ वा पृथि॒वीं वा॒ हिन॒सानी॑ति॒ तस्मा॒न्नात्मान॑मुपस्पृशति॒ न पृ॑थि॒वीम्
॥७॥ दे॒वाश्च॒ वाऽअ॑सुराश्च । उ॒भये॑ प्राजाप॒त्याः पस्पृ॑धिरे ते ह॒ स्म यद्देवा असु॑रा-
ञ्जय॑न्ति ततो ह॒ स्मैवैनान्यु॒त्था॒योपो॑त्तिष्ठन्ति ॥८॥ ते ह॒ देवा॒ ऊचुः॑ । जया॑मो वा
ऽअसु॒रांस्त॒त्वे॑व नः॒ पुन॒रुपो॑त्तिष्ठन्ति क॒थं न्वे॑नाननपज॒य्यं ज॑ये॒मेति॑ ॥९॥ स हा-
ग्रिरुवाच । उ॒द्धो वै नः॒ पलाय्य मुच्यन्त॒ऽइत्यु॒द्धो ह॒ स्मैवैषां॑ पला॒य्य मुच्य॑ते
॥१०॥ स॒ ह्यग्नि॑रुवाच । अ॒हमु॑त्तर॒तः पर्ये॑ष्याम्यथ यु॒यमि॒त उपसꣳरु॑न्त्स्यथ ता-
न्त्सꣳरु॒ध्येभि॑श्च लो॒कैर॑भिनिधास्यामो य॒डु चेमांल्लोकानति चतुर्थं ततः पुन॒र्न सꣳ-
हास्यन्त॒ऽइति॑ ॥११॥ सोऽग्नि॑रुत्तर॒तः पर्ये॑त् । अथेम॒ऽइत उपसमरुन्धंस्तान्सꣳ-
ध्येभि॑श्च लो॒कैर॑भिन्यदधुर्य॒ड्डु चेमांल्लोकानति चतुर्थं ततः॒ पुन॒र्न सम॑जिह्रत तदेत-
न्निदा॒नेन॒ यत्स॒म्बय॑ङ्गुः ॥१२॥ स॒ योऽसाव॒ग्नीङ्कत्तर॒तः पर्ये॑ति । अ॒ग्निरे॒वैष निदा॒-
नेन॒ तानध॒र्युरे॒वैत॒ उपसꣳरु॑णद्धि तांत्सꣳरु॒ध्येभि॑श्च लो॒कैर॑भिनिदधाति॒ यडु चेमां-
ल्लोकानति॒ चतुर्थं ततः॒ पुन॒र्न सं॑जिह्रीते तस्माद्यद्ये॒तर्ह्य॑सुरा न सं॑जिह्रीते येन ह्ये-
वैनान्दे॒वा अवा॑बाधन्त तेनै॒वैनानप्ये॒तर्हि॑ ब्राह्मणा य॒ज्ञेऽव॑बाधन्ते ॥१३॥ य उ॒ऽएव

कां० १, अ० २, ब्रा० ४, कं० ४-१३ शतपथब्राह्मण / ३५
हैं। उन्हीं की भुजाओं से उठाता है, अपनी से नहीं। यह वज्र है। वज्र कोई मनुष्य उठा नहीं
सकता। इसलिए वह देवों की सहायता से यह काम करता है ॥४॥
'मैं तुझे देवों के अध्वर के लिए लेता हूँ'; 'अध्वर' का अर्थ है यज्ञ। इसका तात्पर्य है कि
वह देवों के लिए यज्ञ करता है। इसको बायें हाथ से उठाकर और दाहिने हाथ से छूकर जप
करता है; जप का प्रयोजन है 'तेज करना' ॥५॥
वह जपता है (यजु० १।२४)-"तू इन्द्र की दाहिनी बाहु है।" इन्द्र की दाहिनी बाहु बहुत
बलवान् होती है। इसीलिए कहा कि 'तू इन्द्र की दक्षिण बाहु है'-'हजार नोकों वाला, सैकड़ों
धारों वाला'। वज्र हजारों नोकों वाला था। इन्द्र ने जो वज्र फेंका, वह सैकड़ों धारों वाला था।
इस प्रकार वह स्फ्या में वैसी ही भावना करता है ॥६॥
'तू तेज धार वाला वायु है।' वायु जो बहता है तेज धार वाला होता है, क्योंकि वह
संसार-भर को चीरकर बहता है, इस प्रकार वह उसको तेज करता है-'वैरी के वध के लिए'।
चाहे किसी को मारना चाहे, या न, उसको कहना चाहिए 'अमुक को मारने के लिए'। जब वह
तेज हो जाय तो इससे न अपने को छुए, और न पृथिवी को, यह सोचकर कि 'कहीं इससे मुझे
वा जमीन को हानि न पहुँच जाय।' इसीलिए वह न स्वयं को छूता है न उससे पृथिवी को छूता
है ॥७॥
देव और असुर दोनों प्रजापति की सन्तान अपनी बड़ाई के लिए झगड़ बैठे। देवों ने
असुरों को हरा दिया। परन्तु असुर भी देवों को कष्ट देने लगे ॥८॥
देवों ने कहा, 'हमने असुरों को हरा दिया, फिर भी असुर हमको सताते रहे। क्या काम
करें कि अब फिर हम असुरों को हरा दें और दोबारा लड़ना न पड़े' ॥६॥
अग्नि ने कहा-'हम उत्तर को भागें।' वहाँ वे बच गये। उत्तर में भागने से वस्तुतः बच
गये ॥१०॥
अग्नि ने कहा--'मैं उत्तर की ओर से इनको घेरे लेता हूँ, तुम इधर से रोको। जब हम
रोकेंगे तो तीनों लोकों से इनको दबा देंगे और तीनों लोकों के आगे जो चौथा लोक है, इससे वे
फिर सिर न उठा सकेंगे' ॥११॥
इस पर अग्नि उत्तर को चला गया और दूसरे देवों ने उन असुरों को इधर से रोक
दिया। रोककर उनको तीनों लोकों से दबा दिया, और जो चौथा लोक इन लोकों से परे है
उससे वे फिर न उठ सके। यह जो घास फेंकता है यह वही असुरों को दबाने के कृत्य का रूप
है ॥१२॥
अग्नीध्र उत्तर की ओर जाता है क्योंकि अग्नीध्र अग्नि है। अध्वर्यु उनको उधर से रोक
देता है। इनको रोककर इन लोगों द्वारा उनको दबा देता है। इन तीन लोकों के अतिरिक्त जो
चौथा लोक हो वहाँ से भी वे उठने न पावें। वे इस प्रकार नहीं उठ पाते क्योंकिजैसे देवों ने पहले
उनको रोक दिया था, इसी प्रकार इन ब्राह्मणों ने भी उनको रोक दिया ॥१३॥

३६ शतपथ ब्राह्मण
य॒ज॒माना॒यारा॑ती॒यति॒ , यश्चै॑नं द्वेष्टि॒ तमे॒वैते॑दि॒भिश्च लो॒कैर॑भि॒निद॑धाति॒ षडु चेमां-
ल्लो॒कान॒ति चतु॑र्थमस्या एव सर्व॒ꣳ हर॒त्यस्या॒ꣳ हीमे सर्वे॑ लो॒काः प्र॒तिष्ठि॑ताः
किं हि क॒रन्न॒न्तरिक्ष॒ꣳ हरा॑मि दि॒वꣳ हरा॒मीति॒ हरे॑त्त॒स्माद॒स्या एव सर्व॒ꣳ हर-
ति ॥ १४ ॥ अथ तृण॒मन्त॑र्धाय॒ प्रहर॑ति । नेद॒नेन व॒ज्रेण सꣳशि॑तेन पृथि॒वीꣳ हि-
न्सा॒नीति॒ तस्मा॒त्तृण॒मन्त॑र्धाय॒ प्रहर॑ति ॥ १५ ॥ स प्रहर॑ति । पृथि॒वि दे॒वय॒जन्यो-
षध्यास्ते मूलं॒ मा हिꣳसिष॒मित्युत्त॑रूला॒मिव॒ वाऽए॒नामे॒तत्करोत्यादृढानस्तामेत-
दाहाैषधीनां ते मूला॑नि॒ मा हि॑ꣳसिष॒मिति व्र॒जं ग॑छ गो॒ष्ठान॒मित्य॑भि॒निधा॒स्यन्ने॒-
वैतद॒नप॑क्रमि कुरुते तद्य॒नप॑क्रमि॒ यद्ब्र॒जेऽन्त॒स्तस्मा॑दाह॒ व्र॒जं ग॑छ गो॒ष्ठान॒मिति
वर्ष॑तु ते॒ द्यौरिति॒ यत्र वाऽअ॒स्यै खनन्तः क्रू॒रीकुर्वन्त्य॒पघ्न॑न्ति॒ शान्ति॒राप॒स्तद॒द्भिः
शा॒न्त्या श॑मयति॒ तद॒द्भिः॒ संद॑धाति॒ तस्मा॑दाह॒ वर्ष॑तु ते॒ द्यौरिति॑ बधा॒न दे॒व सवि-
तः पर॒मस्यां॑ पृथि॒व्यामि॑ति दे॒वमे॒वैतत्सवितार॒माहा॒न्धे तम॑सि बधा॒नेति यदा॒ह
पर॒मस्यां॑ पृथि॒व्यामि॑ति श॒तेन॒ पाशै॑रित्य॒मृचे तदा॒ह॒ योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि-
ष्मस्तमतो॒ मा मौ॑गिति॒ यदि॑ ना॒भिचरे॑द्य॒द्युऽअ॑भि॒चरे॒दमूमतो मा मौ॑गिति ब्रू-
यात् ॥ १६ ॥ अथ द्वि॒तीयं॒ प्रहर॑ति । अ॒पारुरुं॒ पृथि॒व्यै दे॒वयज॑नाद॒ध्यास॒मित्य॑र॒रुर्ह॒
वै नामा॑सु॒ररक्ष॑स॒मास॒ तं दे॒वा अ॒स्या अ॒पाघ्न॑त तथो॒ऽए॒वैनमेतद्द्वेष्यो॒ऽस्या अ॒पह॑ते
व्र॒जं ग॑छ गो॒ष्ठानं॒ वर्ष॑तु ते॒ द्यौर्बधा॑न॒ देव सवितः पर॒मस्यां॑ पृथि॒व्याꣳ श॒तेन पा॒-
शैर्योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मस्तमतो॒ मा मौ॑गिति ॥ १७ ॥ तम॒ग्नीद॑भि॒निद॑धा-
ति । अर॑रो दि॒वं मा प॑प्त॒ इति॒ यत्र॒ वै दे॒वा अर॑रुमसु॒ररक्ष॑सम॒पाघ्न॑त स दि॒वम-
पिय॑तिषत्त॒मग्नि॑रभि॒न्यद॑धादर॑रो दि॒वं मा प॑प्त॒ इति॒ स न दि॒वम॑पत्तथो॒ऽए॒वैनमेत॒-
दध्व॒र्युुरे॒वास्मा॒ल्लोका॒दन्त॑रेति दि॒वोऽध्य॒ग्नीत्तस्मा॑देवं क॑रोति ॥ १८ ॥ अथ तृती॑यं प्र॒-
हर॑ति । द्र॒प्सस्ते॒ द्यां मा स्क॒न्नित्ययं वाऽअ॒स्यै द्र॒प्सो यमस्या इ॒मꣳ रस॒ प्रजा उप॑-
जी॒वन्त्येष ते॒ दिवं॒ मा प॒प्तद्वित्ये॒वैतदाह व्र॒जं गछ गो०--मौगिति ॥ १९ ॥ स वै त्रिर्य॑जुषा
हर॑ति । त्रयो वाऽइ॒मे लोका ए॒भिरे॒वैनमेतल्लोकैर॑भि॒निद॑धात्यद्धा वै तद्यदिमे

कां० १, अ० २, ब्रा० ४, कं० १४-२० शतपथब्राह्मण / ३७
जो यजमान से वैर करता है या उससे द्वेष करता है उसको वह इन तीनों लोकों द्वारा;
या यदि कोई चौथा लोक हो उसके द्वारा भी दबा देता है। इन तीनों अथवा चौथे से भी इसको
निकाल देता है क्योंकि इसी पृथिवी पर तो सब लोक स्थित हैं। यदि वह कहेगा कि मैं अन्तरिक्ष
को फेंक दूं या द्यौ को फेंक दूं तो वह क्या फेंकेगा ? अतः वह पृथिवी से ही सबको फेंक देता है ॥१४॥
अब तृण को बीच में रखकर स्फ्या से प्रहार करता है। बीच में तृण को इसलिए रखता
है कि कहीं वज्र से पृथिवी को हानि न पहुँच जावे ॥१५॥
प्रहार करते समय इस मन्त्रांश (यजु० १।२५) को पढ़ता है- "हे देवयजनि पृथिवि ! मैं
तेरी ओषधियों के मूल को हानि न पहुँचाऊँ।" इस प्रकार वह उसको उत्तर-मूला कर देता है
अर्थात् उसके मूल सुदृढ़ हो जाते हैं। जब वह स्फ्या से खुदी हुई मिट्टी उठाता है तो कहता है, 'मैं
तेरी ओषधियों के मूल को हानि न पहुँचाऊं। तू व्रज अर्थात् गोशाला को जा। दैव (द्यौ) तुझ पर
वर्षा करें।' जब पृथिवी खोदी गई तो खुदाई में पृथिवी को क्षति पहुँची। जल शान्ति है। अतः जल
को वहाँ डालकर उसका उपशमन कर देता है। इसीलिए कहा कि 'दैव तुझ पर वर्षा करें।' (खुदी
हुई मिट्टी को फेंकते समय) कहता है, 'हे देव सविता, तू इससे पृथिवी के परले सिरे से बाँध दे।'
इसका तात्पर्य यह है कि 'गहरे अँधेरे से बाँध', 'सौ फन्दों (पाशों) से', अर्थात् इस प्रकार कि
वह छूटने न पावे। फिर कहता है, 'जो हमसे द्वेष करता है या जिसको हम द्वेष करते हैं उसको
मत छोड़।' चाहे किसी निश्चित की ओर संकेत हो या न हो, उसे कहना चाहिए कि 'अमुक-
अमुक को मत छोड़' ॥१६॥
अब स्फ्या को दोबारा फेंकता है इस मन्त्र (यजु० १।२६) को पढ़कर- 'मैं अररु को इस
यज्ञ की स्थली पृथिवी से दूर कर दूँ।' अररु एक राक्षस था। देवों ने उसे भगा दिया था। इसी
प्रकार अध्वर्यु भी अररु को भगाता है। अब फिर (वह उन-उन कृत्यों को दुहराते हुए) कहता
है, 'तू गायों के स्थान अर्थात् व्रज को जा। दैव तुझ पर वर्षे। सविता देव तुझे पृथिवी के परले सिरे
से बाँधे। जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं, उसको यहाँ से मत छोड़' ॥१७॥
अग्नीध्र उसको यह मन्त्र (यजु० १।२६) पढ़कर कूड़े पर फेंकता है- "हे अररु ! तू स्वर्ग
को न जा।" जब देवों ने राक्षस अररुको निकाला तो उसने स्वर्ग को जाना चाहा। अग्नि ने उसे
दबा दिया और कहा, 'अररु, तू स्वर्ग को मत जा।' वह स्वर्ग को नहीं गया। इसी प्रकार अध्वर्यु
उसको पृथिवी से छुड़ा देता है और अग्नीध्र स्वर्ग से रोक देता है। यह इसीलिए किया जाता
है ॥१८॥
अब (स्फ्या को) तीसरी बार फेंकता है इस मन्त्रांश (यजु० १।२६) को पढ़कर- "तेरी
बूंदें द्यौलोक को न जावें।" यह बूंद वह रस है जिससे प्रजावें जीती हैं। इसलिए वह कहता है कि
'तेरी बूंदें द्यौलोक को न जावें।' अब कहता है, 'गोशाला या व्रज को जा। दैव तुझ पर वर्षे। हे
सविता देव, तू इसको पृथिवी के परले सिरे से बाँध, सौ फन्दों से। जो हमसे द्वेष करे या हम
जिससे द्वेष करें उसको मत छोड़' ॥१९॥
तीन बार यजुः-मन्त्रों से उसको फेंकता है। लोक तीन हैं। इन तीन लोकों से उस बुराई