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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

अध्याय-४, ब्राह्मण-४

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॑त्रं॒ : ऽआग्रयणम॒न्यद॒ग्निहो॑त्रं॒ (line under ma, line under da, tick on ho, line under traṃ)

  • तस्मा॒न्नाग्निहो॑त्रे (tasmā॒nnāgniho॑tre - line under mā, tick on ho)
  • जुहुयात् (juhuyāt)
  • ॥ १४॥
  • ब्रा॒ह्मणम् (brā॒hmaṇam - line under brā)
  • ॥ ५ [४. ३.] ॥

तृतीयः प्रपाठकः ॥ ॥ कण्डिकासंख्या ११३ ॥ ॥
(No svaras on this line)

प्र॒जाप॑तिर्ह॒ वाऽ॒एतेनाग्रे॑ य॒ज्ञेने॑जे । प्र॒जाका॑मो बहुः॑ प्र॒जया॑ प॒शुभिः॑ स्याꣳ श्रि-
Let's check L18:

  • प्र॒जाप॑तिर्ह॒ (pra॒jāpa॑tirha॒ - line under pra, tick on pa, line under ha)
  • वाऽ॒एतेनाग्रे॑ (vā'॒etenāgre॑ - line under vā', tick on gre)
  • य॒ज्ञेने॑जे (ya॒jñene॑je - line under ya, tick on ne)
  • ।
  • प्र॒जाका॑मो (pra॒jākā
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का० २, अ० ४, ब्रा० ३-४, कं० १०-१४ व १-२ शतपथब्राह्मण / २६६
तो चाहे दस बार उलट जाय कुछ परवाह नहीं। और यदि कोई कहे कि इन (दोषों) के भार
को कौन सहे तो केवल घी की ही आहुति दे, क्योंकि इन द्यावा-पृथिवी का प्रत्यक्ष रस घी है। इस
प्रकार प्रत्यक्ष रूप में इनको वह इन्हीं के रस या मेध (तत्त्व) से तृप्त करता है, इसलिए घी की
ही आहुति दे ॥१०॥
यज्ञ करके देवों ने उन सब ओषधियों को, जिनके सहारे मनुष्य रहते हैं या पशु रहते हैं,
(असुरों की) चालाकी और विष (के प्रभाव) से मुक्त कर दिया। इसलिए अब मनुष्य भोजन
करने लगे और पशु चरने लगे ॥११॥
अब वह जो यज्ञ करता है, या तो इसलिए करता है कि कोई चालाकी या विष से
(वनस्पति) को बिगाड़ने न पाये, या केवल इसलिए कि देवों ने ऐसा किया था। और जो भाग
देवों ने अपने लिए निकाला था वह भी उनके लिए निकाल देता है। इसके अतिरिक्त वह दोनों
प्रकार के पौधों को अर्थात् जिनके सहारे मनुष्य रहते हैं और जिनके सहारे पशु रहते हैं, उनको
विषरहित कर देता है और ये मनुष्य और पशु इसके दोष-रहित पौधों के सहारे जीते हैं।
इसलिए वह इस यज्ञ को करता है ॥१२॥
इस यज्ञ की दक्षिणा है पहलोटी बछड़ा, क्योंकि यह (गाय का) अग्र अर्थात् पहला फल
होता है। यदि दर्श और पूर्णमास यज्ञ कर चुका हो तो पहले वह आहुतियां दे और फिर इस यज्ञ
को पीछे से करे। और यदि (दर्श और पूर्णमास) नहीं किया तो अन्वाहार्य-पचन अग्नि पर
चातुष्प्राश्य को पका ले और ब्राह्मणों को खिला दे ॥१३॥
देव दो प्रकार के हैं - एक तो देव; और दूसरे ब्राह्मण जो वेदपाठी हैं, ये मनुष्य-देव हैं।
जिस प्रकार वषट्कार की आहुति होती है वैसी यह भी है। इस समय भी वह जितना हो सके
उतनी दक्षिणा दे, क्योंकि कहते हैं कि कोई हवि दक्षिणा के बिना पूरी नहीं होती। अग्निहोत्र में
(नया अन्न) न डाले, नहीं तो झगड़ा होगा। आग्रयण भिन्न है और अग्निहोत्र भिन्न। इसलिए
अग्निहोत्र में (नया अन्न) न डाले ॥१४॥
अध्याय ४-ब्राह्मण ४
प्रजापति ने पहले प्रजा की कामना से यह यज्ञ किया। उसने सोचा- 'मैं बहुत प्रजा और
पशु-युक्त हो जाऊँ, श्री मिल जाय, यशस्वी हो जाऊँ, अन्न पचानेवाला हो जाऊँ' ॥१॥
उसका नाम दक्ष था। और चूंकि पहले उसने इस यज्ञ को किया, इसलिए यज्ञ का
'दाक्षायण यज्ञ' नाम पड़ा। कुछ लोग दक्ष को वसिष्ठ-यज्ञ कहते हैं, क्योंकि वह वसिष्ठ ही है।
उसी के नाम पर यज्ञ का नाम पड़ा। उसने यज्ञ किया और इस यज्ञ से उस प्रजापति ने जो
सन्तान, जो श्री, जो विभूति प्राप्त की उसी सन्तान, उसी श्री को वह भी प्राप्त होता है जो इस

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ते॒न य॒ज्ञेन॒ यज॑ते॒ तस्मा॑द्वाऽए॒तेन॒ यजे॑त ॥ २॥ तेनो॑ ह॒ तत॑ ईजे । प्रतीद॒र्शः श्यै॒-
क्यः॒ स ये॒ तं प्र॒त्यासु॒स्तेषां॑ वि॒वच॑नमिव॒ास वि॒वच॑नमिव ह॒ वै भ॑वति॒ य ए॒वं
वि॒द्वाने॒तेन॒ य॒ज्ञेन॒ यज॑ते॒ तस्मा॑द्वाऽए॒तेन॒ यजे॑त ॥ ३॥ तमा॒जगा॑म । सु॒क्षा सार्ङ्गयो॒
ब्रह्मच॒र्यं॒ तस्मा॑दे॒तं च॑ य॒ज्ञमनू॒चेऽन्य॑मु च॒ सोऽनू॒च्य पुन॑ः सृञ्जया॒न्जगा॑म॒ ते ह॒ सृ॒-
ञ्जया वि॒दां च॒क्रुर्यज्ञं॑ वै नो॒ऽनूच्या॑गन्निति॒ ते हो॑चुः सह॒ वै न॒स्तद्देवै॒राग॒न्यो नो॑
य॒ज्ञमनू॒च्याग॒न्निति॒ स वै सह॑देवः सार्ङ्गयस्तदु॒ह्ये॑तद्वि॒वच॑नमिवास्त्यन्य॒द्वाऽअ॒ग्रे सु॒-
क्षा नाम॑ दधृ॒ङ्ङिति॒ स ए॒तेन॒ य॒ज्ञेने॑जे॒ स ए॒तेन॒ य॒ज्ञेने॒ष्ट्वा येयं॑ सृञ्जया॒नां प्र॒जाति॒र्या
श्रीरे॒तद्बभू॑वेताँ॒ ह॒ वै प्र॒जातिं॑ प्र॒जायत॒ऽएताँ॒ श्रियं॑ गच्छति॒ य ए॒वं वि॒द्वाने॒तेन॒
य॒ज्ञेन॒ यज॑ते॒ तस्मा॑द्वाऽए॒तेन॒ यजे॑त ॥ ४॥ तेनो॑ ह॒ तत॑ ईजे । दे॒वभा॒गः श्रौत॒र्षः
स उ॒भये॑षां कु॒रूणां॑ च सृञ्जया॒नां च॑ पु॒रोहि॑त॒ आस॑ पर॒मता॒ वै सा यो न्वेवै॑कस्य॒
राष्ट्रस्य॑ पु॒रोहि॑तोऽसत्सा॒ न्वेव॑ पर॒मता॒ किमु॒ यो द्वयो॑ः पर॒मतामिव ह॒ वै ग॒च्छ-
ति॒ य ए॒वं वि॒द्वाने॒तेन॒ य॒ज्ञेन॒ यज॑ते॒ तस्मा॑द्वाऽए॒तेन॒ यजे॑त ॥ ५॥ तेनो॑ ह॒ तत॑
ईजे । द॒क्षः पा॑र्व॒तिस्त॒ऽइमे॒ऽप्येत॑र्हि दाक्षाय॒णा रा॒ज्यमि॑वैव प्राप्ता रा॒ज्यमि॑ह॒ वै
प्राप्नो॑ति॒ य ए॒वं वि॒द्वाने॒तेन॒ यज॑ते॒ तस्मा॑द्वाऽए॒तेन॒ यजे॑त॒ स वाऽऐ॒कैक॒ ए॒वानू॒-
चीना॒कं पु॒रोडा॒शो भ॑वत्येते॒नो हास्यास॒प्तवा॒नुप॑बाधा॒ श्रीर्भव॑ति॒ स वै द्वे पौर्ण-
मा॒स्यौ य॑जते॒ द्वेऽअ॑मावा॒स्ये॑ द्वे वै मि॑थु॒नं मि॑थु॒नमे॒वैतत्प्र॒जननं॑ क्रियते ॥ ६॥ अथ॒
यत्पूर्वेद्यु॑ः । अ॒ग्नीषोमी॑येण॒ यज॑ते पौर्णमा॒स्यां ते द्वे दे॒वते॒ द्वे वै मि॑थु॒नं मि॑थु॒नमे॒-
वैतत्प्र॒जननं॑ क्रियते ॥ ७॥ अथ प्रा॒तः । आ॒ग्ने॒यः पु॒रोडा॒शो भ॑वत्यैन्द्रा॒ग्नँ सांना॒य्यं
ते द्वे दे॒वते॒ द्वे वै मि॑थु॒नं मि॑थु॒नमे॒वैतत्प्र॒जननं॑ क्रियते ॥ ८॥ अथ॒ यत्पूर्वेद्यु॑ः । ऐ॒-
न्द्रा॒ग्नेन॒ यज॑तेऽमावा॒स्या॑यां ते द्वे दे॒वते॒ द्वे वै मि॑थु॒नं मि॑थु॒नमे॒वैतत्प्र॒जननं॑ क्रियते
॥ ९॥ अथ प्रा॒तः । आ॒ग्ने॒यः पु॒रोडा॒शो भ॑वति मैत्रावरु॒णी प॒यस्या॑ नेद्यज्ञा॒द्यानी॒-
ति॒ न्वे॒वाग्ने॒यः पु॒रोडा॒शोऽथैतावे॒व मि॑त्रावरु॒णौ द्वे दे॒वते॒ द्वे वै मि॑थु॒नं मि॑थु॒नमे॒-

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कां० २, अ० ४, ब्रा० ४, कं० २-१० शतपथब्राह्मण / २७१
यज्ञ को समझकर करता है। इसलिए इस यज्ञ को अवश्य करे ॥२॥
प्रतीदर्श श्वैक्न ने भी इसी यज्ञ को किया। और जिन्होंने उसका अनुकरण किया उनके
लिए वह विवचन (authority) से था। जो इस रहस्य को समझकर इस यज्ञ को करता है वह
विवचन ही हो जाता है। इसलिए इस यज्ञ को अवश्य करे ॥३॥
सृप्ला साञ्जय ब्रह्मचर्य व्रत के लिए उसके पास आया, इसलिए उसे यह यज्ञ और अन्य
भी सिखाया। वह उनको सीखकर साञ्जय वाले लोगों के पास (अपने देश में) चला गया।
अब उन्होंने जान लिया कि यह हमारे लिए यज्ञ को सीखकर आया है। उन्होंने कहा, 'यह जो
यज्ञ सीखकर आया है मानो 'देवों के साथ' आया है, इसलिए उसका सहदेव साञ्जय नाम पड़
गया। अब तक यह कहावत चली आती है कि अरे सृप्ला का दूसरा नाम रख दिया गया। उसने
उस यज्ञ को किया और जो सन्तान और वैभव इस यज्ञ के करने से सृञ्जयों को प्राप्त हुआ, उसी
सन्तान को वह भी उत्पन्न करता है और उसी वैभव को प्राप्त होता है जो इस रहस्य को समझ-
कर यह यज्ञ करता है। इसलिए इस यज्ञ को अवश्य करे ॥४॥
देवभाग श्रौतष ने भी यह किया था। वह कुरुओं और सृञ्जयों दोनों का पुरोहित था।
जो एक राष्ट्र का पुरोहित होता है उसकी बड़ी पदवी होती है, और उसकी पदवी का क्या कहना
जो दो राष्ट्रों का पुरोहित हो ! जो इस रहस्य को समझकर इस यज्ञ को करता है वह उसी बड़ी
पदवी को पाता है। इसलिए इस यज्ञ को अवश्य करे ॥५॥
दक्ष पार्वति ने भी यही यज्ञ किया था। और आज तक यह दाक्षायण (उसी की सन्तान)
राज्य को पाये हुए हैं। जो कोई इस रहस्य को समझकर इस यज्ञ को करता है वह भी राज्य को
पा जाता है। इसलिए इस यज्ञ को अवश्य करे। एक-एक पुरोडाश प्रतिदिन देना होता है।
इसलिए उसकी श्री बिना सपत्नी के और बिना बाधा के होती है। वह पूर्णमासी के दो दिन और
अमावस्या के दो दिन यज्ञ करता है। दो का नाम है जोड़ा। इस प्रकार वह उत्पन्न करनेवाले
जोड़े से सम्पन्न हो जाता है ॥६॥
पूर्णमासी को पहले दिन अग्नि और सोम को एक पुरोडाश देता है। ये दो देवता हैं।
दो का अर्थ है जोड़ा। इस प्रकार वह उत्पन्न करनेवाले जोड़े से सम्पन्न हो जाता है ॥७॥
दूसरे दिन अग्नि का पुरोडाश और इन्द्र का सान्नाय्य ये दो देवता हैं। दो का अर्थ है
जोड़ा। इस प्रकार वह उत्पन्न करनेवाले जोड़े से सम्पन्न हो जाता है ॥८॥
अमावस्या को पहले दिन इन्द्र और अग्नि को पुरोडाश देता है। ये दो देवता हैं। दो
का अर्थ है जोड़ा। इस प्रकार एक उत्पत्ति करनेवाले जोड़े से सम्पन्न हो जाता है ॥६॥
दूसरे दिन अग्नि के लिए पुरोडाश और मित्र-वरुण के लिए दही (पयस्या)। अग्नि का
पुरोडाश केवल इसलिए कि वह यज्ञ से चला न जाय। मित्र और वरुण दो देवता हैं। दो का अर्थ
है जोड़ा। वह इस प्रकार उत्पन्न करनेवाले जोड़े से सम्पन्न हो जाता है। यह उसका वह रूप है

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शतपथ ब्राह्मण

वै॒तत्प्र॒जननं॑ क्रिय॒त ऽए॒तद्वा॑स्य॒ तद्रू॒पं येन॑ बहुर्भव॑ति॒ येन॒ प्र॒जाय॑ते ॥१०॥ अथ॑
य॒त्पूर्वेद्यु॑ः । अ॒ग्नीषोमीये॑ण य॒जते॑ पौर्णमा॒स्यां य॒मेवामु॒मुपव॑सथेऽग्नीषोमी॒यं प॒शु-
माल॑भते॒ स ए॒वास्य॒ सः ॥११॥ अथ॒ प्रातः॑ । आ॒ग्नेयः॑ पुरो॒डाशो॑ भव॒त्यैन्द्रं॒ सां-
नाय्यं॑ प्रातःस॒वन॑मे॒वास्या॑ग्ने॒यः पु॑रो॒डाश॒ आग्ने॒यो हि प्रातःस॒वन॒मैन्द्रं॒ सांनाय्यं॑
माध्यन्दिनमे॒वास्य॒ तत्सवन॒मैन्द्रं॒ हि माध्यन्दिनं॒ सव॑नम् ॥१२॥ अथ॒ यत्पूर्वे॑-
द्युः । ऐ॒न्द्रा॒ग्नेन॒ यज॑तेऽमावा॒स्या॑यां तृतीयसवनमे॒वास्य॒ तद्वैश्वदे॒वं वै तृ॑तीयसवन-
मिन्द्रा॒ग्नी वै विश्वे॑ दे॒वाः ॥१३॥ अथ॒ प्रातः॑ । आ॒ग्नेयः॑ पुरो॒डाशो॑ भवति मैत्राव-
रु॒णी पय॒स्या नेद्य॑ज्ञाद॒यानीति॑ न्वेवाग्ने॒यः पु॑रो॒डाशोऽथ॒ यामे॒वामूं मै॒त्रावरु॒णीं व॒-
शामनूबन्ध्या॒मालभ॑ते॒ सैवास्य मैत्रावरु॒णी पय॒स्या स पौ॑र्णमा॒सेन॑ चामावा॒स्येन॑
चे॒ष्ट्वा याव॒त्सौम्ये॑नाध्व॒रेणे॒ष्ट्वा जय॑ति॒ ताव॑ज्जयति॒ तदु॒ खलु॑ महाय॒ज्ञो भ॑वति ॥१४॥
अथ॒ यत्पूर्वेद्युः॑ । अ॒ग्नीषोमीये॑ण य॒जते॑ पौर्णमा॒स्यामे॒तेन॒ वाऽइ॒न्द्रो वृ॒त्रम॑हंस्तेनेनो
ऽए॒वै॒ष व्य॑जयत॒ यास्ये॒यं विजि॑ति॒स्तां तथो॑ऽए॒वैष ए॒तेन॑ पा॒प्मानं॒ द्विषन्तं॒ भ्रातृ॑व्यं
हन्ति॒ तथो॑ऽए॒व वि॑जयतेऽथ॒ यत्संन॑यत्यामावा॒स्यं वै सांनाय्यं॑ दू॒रे तद्यद॑मावा॒स्ये-
ति क्षि॒प्रऽए॒वैतद्भूतं॒ शत्रू॑षे त॒मेते॑न॒ रसे॑नाप्रीणा॒न्क्षिप्रं॑ ह॒ वै पा॒प्मान॒मप॑हते॒ य
ए॒वं वि॒द्वान्पौ॑र्णमा॒स्यां संन॑यत्ये॒ष वै सोमो राजा॑ दे॒वाना॒मन्नं॒ यच्च॒न्द्रमा॒स्तमे॒त-
त्यू॒र्वेद्युर॑भिषुण्वन्ति प्रा॒तर्भक्ष॑यिष्य॒न्तस्तमे॒तद्र॒द्धय॑न्ति॒ यदप॑क्षीयते ॥१५॥ अथ॒ यत्पू-
र्वेद्युः॑ । अ॒ग्नीषोमीये॑ण य॒जते॑ पौर्णमा॒स्याम॑भिषु॒णोत्ये॒वैन॑मेत॒त्तस्मि॒न्नभि॑षुत॒ऽएत॑
रसं दधात्ये॒तेन॒ रसे॑न तीव्रीक॑रोति स्वदय॑ति ह॒ वै दे॒वेभ्यो ह॒व्यं स्वद॑ते हास्य
दे॒वेभ्यो ह॒व्यं य ए॒वं वि॒द्वान्पौ॑र्णमा॒स्यां संनय॑ति ॥१६॥ अथ॒ यत्पूर्वेद्युः॑ । ऐ-
न्द्रा॒ग्नेन॒ यज॑तेऽमावा॒स्या॑यां दर्शपूर्णमा॒सयो॒र्वे दे॒वते स्तः इन्द्रा॒ग्नीऽए॒व तेऽए॒वैतद्-
ञ्ज॒सा प्र॒त्यक्षं॑ यजत्य॒ञ्जसा ह॒ वाऽअ॒स्य दर्श॑पूर्णमा॒साभ्या॒मिष्टं भव॑ति॒ य ए॒वमे॒तद्वेद॑
॥१७॥ अथ॒ प्रातः॑ । आ॒ग्नेयः॑ पुरो॒डाशो भव॑ति मैत्रावरु॒णी पय॒स्या नेद्य॑ज्ञाद॒यानी-

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कां० २, अ० ४, ब्रा० ४, कं० १०-१८ शतपथब्राह्मण / २७३
जिससे वह बहुत (या अनेक) हो जाता है जिससे उत्पन्न होता है ॥१०॥
और जो पूर्णमासी को पहले दिन अग्नि-सोम का पुरोडाश दिया जाता है, वह ऐसा ही
है जैसा कि (सोम यज्ञ में) उपवास के दिन पशु-आलम्भन है ॥११॥
दूसरे दिन अग्नि का पुरोडाश और इन्द्र का सान्नाय्य । अग्नि का पुरोडाश वैसा ही है
जैसा (सोम यज्ञ में) प्रातःकाल की आहुति, क्योंकि प्रातःकाल का सवन अग्नि का होता है।
इन्द्र का सान्नाय्य वैसा ही है जैसा (सोम यज्ञ में) मध्य दिन का सवन, क्योंकि मध्य दिन का
सवन इन्द्र का होता है ॥१२॥
अमावस्या को पहले दिन जो इन्द्र और अग्नि का पुरोडाश दिया जाता है वह वैसा ही
है जैसा तृतीय सवन। क्योंकि तृतीय सवन विश्वेदेवों का है और वस्तुतः इन्द्र और अग्नि विश्वेदेव
ही हैं ॥१३॥
और जो दूसरे दिन अग्नि के लिए पुरोडाश और मित्र-वरुण के लिए दही होता है, इसमें
अग्नि का पुरोडाश केवल इसलिए है कि कहीं अग्नि यज्ञ को छोड़कर चला न जाय। और पयस्या
अर्थात् दही मित्र और वरुण के लिए उसी प्रकार है जैसे (सोमयज्ञ में) मित्र और वरुण के लिए
अनुबन्ध्या (बाँझ गाय) मारी जाती है। इस प्रकार पूर्णमासी और अमावस्या की इष्टियों से
मनुष्य को उतना ही फल मिल जाता है जितना सोमयज्ञ से, क्योंकि यह महायज्ञ है ॥१४॥
और यह जो पूर्णमासी को पहले दिन अग्नि और सोम के लिए आहुति दी जाती है वह
इसलिए है कि इन्द्र ने वृत्र को मारा था। इसी से उसको वह विजय प्राप्त हुई जो आज उसे प्राप्त
है। इसी प्रकार यह (यजमान) भी इस यज्ञ से द्वेषी पापी शत्रु को मारता है और उस पर विजय
प्राप्त करता है। और यह जो सान्नाय्य अर्थात् दूध और दही को मिलाना है, यह सान्नाय्य
अमावस्या का है। अमावस्या का अर्थ है दूर होना । जिस (इन्द्र) ने वृत्र को मारा था उसको
तुरन्त ही यह आहुति दी गई थी और तुरन्त ही उसको रस से प्रसन्न किया गया था। इसलिए
जो पुरुष इस रहस्य को समझकर पूर्णमासी को सान्नाय्य बनाता है, वह तुरन्त ही पाप को दूर
भगा देता है। यह जो चरु है वह सोम राजा और देवों का अन्न है। वे पहले दिन रस निकालते
हैं कि दूसरे दिन खायेंगे। इसलिए जब (चाँद) क्षीण होने लगता है तो मानो (देव) उसको
खाने लगते हैं ॥१५॥
और यह जो पूर्णमासी को पहले दिन अग्नि और सोम के लिए पुरोडाश दिया जाता है,
मानो उस प्रकार वह सोम-रस निचोड़ लेते हैं। और निचोड़ने के पश्चात् उसमें मिलाता है और
उस रस को तीव्र करता है। जो पुरुष इस भेद को समझकर पूर्णमासी को सान्नाय्य तैयार करता
है वह मानो देवों के लिए हव्य को स्वादिष्ट बनाता है और उसका द्रव्य देवों के लिए स्वादिष्ट
हो जाता है ॥१६॥
और यह जो अमावस्या को पहले दिन इन्द्र और अग्नि के लिए पुरोडाश दिया जाता है
वह इसीलिए है कि इन्द्र और अग्नि अमावस्या और पूर्णमासी के देवता हैं। इन्हीं के लिए वह
सीधा प्रत्यक्ष रूप से हव्य देता है। और जो इस भेद को समझता है वह दर्श और पूर्णमास की
इष्टियों को करता है ॥१७॥
और दूसरे दिन अग्नि का पुरोडाश होता है और मित्र और वरुण के लिए पयस्या (दही)।