शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 291, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० २, अ० ४, ब्रा० ४, कं० १०-१८ शतपथब्राह्मण / २७३
जिससे वह बहुत (या अनेक) हो जाता है जिससे उत्पन्न होता है ॥१०॥
और जो पूर्णमासी को पहले दिन अग्नि-सोम का पुरोडाश दिया जाता है, वह ऐसा ही
है जैसा कि (सोम यज्ञ में) उपवास के दिन पशु-आलम्भन है ॥११॥
दूसरे दिन अग्नि का पुरोडाश और इन्द्र का सान्नाय्य । अग्नि का पुरोडाश वैसा ही है
जैसा (सोम यज्ञ में) प्रातःकाल की आहुति, क्योंकि प्रातःकाल का सवन अग्नि का होता है।
इन्द्र का सान्नाय्य वैसा ही है जैसा (सोम यज्ञ में) मध्य दिन का सवन, क्योंकि मध्य दिन का
सवन इन्द्र का होता है ॥१२॥
अमावस्या को पहले दिन जो इन्द्र और अग्नि का पुरोडाश दिया जाता है वह वैसा ही
है जैसा तृतीय सवन। क्योंकि तृतीय सवन विश्वेदेवों का है और वस्तुतः इन्द्र और अग्नि विश्वेदेव
ही हैं ॥१३॥
और जो दूसरे दिन अग्नि के लिए पुरोडाश और मित्र-वरुण के लिए दही होता है, इसमें
अग्नि का पुरोडाश केवल इसलिए है कि कहीं अग्नि यज्ञ को छोड़कर चला न जाय। और पयस्या
अर्थात् दही मित्र और वरुण के लिए उसी प्रकार है जैसे (सोमयज्ञ में) मित्र और वरुण के लिए
अनुबन्ध्या (बाँझ गाय) मारी जाती है। इस प्रकार पूर्णमासी और अमावस्या की इष्टियों से
मनुष्य को उतना ही फल मिल जाता है जितना सोमयज्ञ से, क्योंकि यह महायज्ञ है ॥१४॥
और यह जो पूर्णमासी को पहले दिन अग्नि और सोम के लिए आहुति दी जाती है वह
इसलिए है कि इन्द्र ने वृत्र को मारा था। इसी से उसको वह विजय प्राप्त हुई जो आज उसे प्राप्त
है। इसी प्रकार यह (यजमान) भी इस यज्ञ से द्वेषी पापी शत्रु को मारता है और उस पर विजय
प्राप्त करता है। और यह जो सान्नाय्य अर्थात् दूध और दही को मिलाना है, यह सान्नाय्य
अमावस्या का है। अमावस्या का अर्थ है दूर होना । जिस (इन्द्र) ने वृत्र को मारा था उसको
तुरन्त ही यह आहुति दी गई थी और तुरन्त ही उसको रस से प्रसन्न किया गया था। इसलिए
जो पुरुष इस रहस्य को समझकर पूर्णमासी को सान्नाय्य बनाता है, वह तुरन्त ही पाप को दूर
भगा देता है। यह जो चरु है वह सोम राजा और देवों का अन्न है। वे पहले दिन रस निकालते
हैं कि दूसरे दिन खायेंगे। इसलिए जब (चाँद) क्षीण होने लगता है तो मानो (देव) उसको
खाने लगते हैं ॥१५॥
और यह जो पूर्णमासी को पहले दिन अग्नि और सोम के लिए पुरोडाश दिया जाता है,
मानो उस प्रकार वह सोम-रस निचोड़ लेते हैं। और निचोड़ने के पश्चात् उसमें मिलाता है और
उस रस को तीव्र करता है। जो पुरुष इस भेद को समझकर पूर्णमासी को सान्नाय्य तैयार करता
है वह मानो देवों के लिए हव्य को स्वादिष्ट बनाता है और उसका द्रव्य देवों के लिए स्वादिष्ट
हो जाता है ॥१६॥
और यह जो अमावस्या को पहले दिन इन्द्र और अग्नि के लिए पुरोडाश दिया जाता है
वह इसीलिए है कि इन्द्र और अग्नि अमावस्या और पूर्णमासी के देवता हैं। इन्हीं के लिए वह
सीधा प्रत्यक्ष रूप से हव्य देता है। और जो इस भेद को समझता है वह दर्श और पूर्णमास की
इष्टियों को करता है ॥१७॥
और दूसरे दिन अग्नि का पुरोडाश होता है और मित्र और वरुण के लिए पयस्या (दही)।