शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-६, ब्राह्मण-७
६६४ शतपथ ब्राह्मण
आ॑स्ता॒मथा॑भ॒येऽना॑ष्ट्र॒ऽउत्त॑र॒तो य॒ज्ञमु॑पच॒रिष्या॑म॒ इति॑ ॥३॥ ते॒ हेन्द्र॑मूचुः । त्वं वै
नो वी॒र्य्य॑वत्तमोऽसि॒ त्वं दक्षि॑णत॒ आस्वाथा॑भ॒येऽना॑ष्ट्र॒ऽउत्त॑रतो य॒ज्ञमु॑पच॒रिष्या॑म
इति॑ ॥४॥ स॒ हो॑वाच । किं मे॒ ततः॑ स्या॒दिति॑ ब्राह्मणा॒हू॒त्त्या ते॒ ब्रह्म॑सा॒म् तᳵइति॑
तस्मा॑द्ब्राह्मणा॒हूत्सिनं॑ प्र॒वृणी॑त॒ऽइन्द्रो॒ ब्रह्मा॒ ब्राह्म॑णादितीन्द्र॑स्य॒ ह्ये॑षा॒ स इन्द्रो॑
द॒क्षि॒णत॒ आ॑स्ता॒थाभ॑ये॒ऽनाष्ट्र॒ऽउत्त॑र॒तो य॒ज्ञम॒पाच॑रं॒स्तस्मा॒द्य ए॒व वी॒र्य्य॑वत्तमः स्या-
त्स द॑क्षिण॒त आ॑सी॒ताथा॑भ॒येऽना॑ष्ट्र॒ उत्त॑र॒तो य॒ज्ञमु॑पचरे॒युर्यो वै ब्रा॑ह्मणा॒नामनू॑-
चानत॑मः स॒ षां॑ वी॒र्य्य॑वत्तमो॒ऽथ यदि॒दं य ए॒व क॑श्च॒ ब्रह्मा॒ भव॑ति कु॒वित्त्सू॒क्षीमा॑-
स्तᳵइति॒ तस्मा॒द्य ए॒व वी॒र्य्य॑वत्तमः स्यात्स दक्षि॑णत॒ आसी॒ताथा॑भ॒येऽना॑ष्ट्र॒ऽउत्त॑र-
तो य॒ज्ञमु॑पचरेयु॒स्तस्मा॑द्ब्राह्म॒णो दक्षि॑णत॒ आस्तेऽथा॑भ॒येऽना॑ष्ट्र॒ऽउत्त॑र॒तो य॒ज्ञमु॑पच-
रन्ति॑ ॥५॥ स य॒त्राह॑ । ब्रह्मᳵस्तो॒ष्या॑मः प्रशास्त॒रिति॒ तद्ब्रह्मा॑ जपे॒त्येतं॑ ते देव
सवितर्य्य॒ज्ञं प्राहु॒र्बृह॑स्पतये॒ ब्रह्म॑णे । तेन॑ य॒ज्ञम॑व॒ तेन॑ य॒ज्ञप॑तिं॒ तेन॒ माम॑व ।
स्तुतं॑ सवि॒तुः प्र॑स॒वᳵइति॒ सोऽसा॑वे॒व ब॒न्धुरेते॑न॒ न्वेव भूयि॑ष्ठा-इवो॑पच॒रन्ति॑
॥६॥ अने॑न त्वे॑वो॑पच॒रेत् । दे॒व स॑वितरे॒तद्बृह॑स्पते॒ प्रेति॒ तत्स॑वि॒तारं॑ प्रस॒वायो॑-
पधावति स॒ हि दे॒वानां॑ प्रसवि॒ता बृह॑स्पते॒ प्रेति॒ बृह॒स्पति॑र्हि दे॒वानां॒ ब्रह्मा॑
तद्य ए॒व दे॒वानां॒ ब्रह्मा॒ तस्मा॒ऽएवैत॒त्प्राह॒ तस्मा॑दाह॒ बृह॑स्पते॒ प्रेति॑ ॥७॥ अथ॑
मै॒त्राव॑रु॒णो ज॑पति । प्रसू॑तं दे॒वेन॑ सवि॒त्रा जुष्टं॑ मित्रावरु॑णाभ्या॒मिति॒ तत्स॑वि॒तारं॑
प्र॒स॒वायो॑पधावति स॒ हि दे॒वानां॑ प्रसवि॒ता जुष्टं॑ मित्रावरु॑णाभ्या॒मिति॑ मित्रावरु॑-
णौ वै मै॒त्राव॑रु॒णस्य॑ दे॒वते॒ तद्येऽए॒व मै॒त्रावरु॑णस्य दे॒वते॒ ताभ्या॑मे॒वैतत्प्राह॒ त-
स्मा॑दाह॒ जुष्टं॑ मित्रावरु॑णाभ्या॒मिति॑ ॥८॥ ब्रा॒ह्म॒णम् ॥ ८ [६. ६.] ॥ ॥
त्रयी॒ वै वि॒द्या । ऋचो॒ यजूं॑षि सामा॒नीयमे॒वऽर्चो॒ऽस्या॒७॒॑ ह्यर्च॑ति॒ योऽर्च॑ति
स वागे॒वर्ची वा॒चा ह्यर्च॑ति॒ योऽर्च॑ति॒ सोऽन्तरि॑क्षमेव॒ यजूं॑षि॒ द्यौः सामा॑नि
सैषा त्रयी॑ वि॒द्या सौम्येऽध्व॒रे प्रयु॑ज्यते ॥१॥ इ॒ममे॒व लो॒कमृचा जय॑ति । अ॒न्तरि॑क्षं
कां० ४, अ० ६, ब्रा० ६-७, कं० ३-८ व १-२ शतपथब्राह्मण / ६६५
और निश्चिन्त होकर उत्तर में यज्ञ करें' ॥३॥
उन्होंने इन्द्र से कहा—'तू हममें सबसे प्रबल है, तू दक्षिण की ओर बैठ जिससे हम अभय
और निश्चिन्त होकर उत्तर में यज्ञ करें' ॥४॥
उसने उत्तर दिया—'तो मुझे क्या मिलेगा ?' उन्होंने कहा कि 'ब्राह्मणाच्छंसी का पद
तेरा होगा, ब्रह्मसाम तेरा होगा।' इसलिए ब्राह्मणाच्छंसी का वरण करते हैं तो कहते हैं कि 'इन्द्रो
ब्रह्मा ब्राह्मणात्' अर्थात् 'इन्द्र ब्राह्मण होने के कारण ब्रह्मा है।' यह पदवी इन्द्र की है। इन्द्र
दक्षिण की ओर बैठा और वे अभय तथा निश्चिन्त स्थान में यज्ञ करने लगे। इसलिए जो सबसे
बलिष्ठ हो उसको दक्षिण की ओर बैठना चाहिए और उत्तर की ओर अभय और निश्चिन्त
स्थान में उनको यज्ञ करना चाहिए। ब्राह्मणों में जो सबसे अधिक वेद पढ़ा है वही सबसे प्रबल
है। अब जो कोई ब्रह्मा हो जाता है वह क्या चुपचाप नहीं बैठता ? इसलिए जो कोई सबसे प्रबल
हो उसको दक्षिण की ओर बैठना चाहिए और औरों को उत्तर की ओर अभय तथा निश्चिन्त
स्थान में यज्ञ करना चाहिए। इसलिए ब्राह्मण वेदी के दक्षिण भाग में बैठते हैं और दूसरे लोग
उत्तर की ओर अभय और निश्चिन्त स्थान में यज्ञ करते हैं ॥५॥
जब प्रस्तोता कहता है कि 'हे ब्रह्मन् प्रशास्ता, हम स्तुति करेंगे।' तब ब्रह्मा जपता है,
“एतं ते देव सवितर्यज्ञं प्राहुर्बृहस्पतये ब्रह्मणे । तेन यज्ञमव तेन यज्ञपतिं तेन मामव” (यजु०
२।१२)—“हे देव सविता ! तेरे इस यज्ञ को ब्रह्म बृहस्पति के लिए विज्ञप्त किया है। इसलिए
यज्ञ की रक्षा कर, यज्ञपति की रक्षा कर, मेरी रक्षा कर।” सविता की प्रेरणा से स्तुति करो।
इसका भी वही फल है। वे अधिकतर स्तुति इसी मन्त्र से करते हैं ॥६॥
ऐसा कहकर भी स्तुति हो सकती है कि 'हे देव सविता' यह, 'हे बृहस्पति, आगे बढ़िए ।'
इससे वह प्रेरणा के लिए सविता की उपासना करता है। वही देवों का प्रेरक है। बृहस्पति,
बढ़ो' वह इसलिए कहता है कि बृहस्पति देवों का ब्रह्मा है। इस प्रकार जो देवों का ब्रह्मा है
उसकी घोषणा करता है। इसलिए कहता है कि 'बृहस्पति, बढ़ो' ॥७॥
अब मैत्रावरुण जपता है, 'देव सविता से प्रेरित होकर मित्र और वरुण के लिए प्रिय
हो ।' इस प्रकार प्रेरणा के लिए सविता की उपासना करता है क्योंकि वह देवों का प्रेरक है।
'मित्र और वरुण के लिए प्रिय' इसलिए कि मैत्रावरुण के दो देवता हैं—मित्र और वरुण । इस
प्रकार मैत्रावरुण के जो दो देवता हैं उनके प्रति घोषणा करता है। इसलिए कहता है 'मित्र और
वरुण के लिए' ॥८॥
ब्रह्मत्व-सदो-हविर्धान-विधिशेषः
अध्याय ६-ब्राह्मण ७
विद्या के तीन भाग हैं—ऋक्, यजुः और साम। यह पृथिवी ऋक् है क्योंकि जो कोई
ऋक् पढ़ता है यही पढ़ता है। वाणी ऋक् है क्योंकि जो कोई पढ़ता है वाणी से पढ़ता है।
अन्तरिक्ष यजुः है और द्यौ साम है। सोम यज्ञ में इस तीनों भाग वाली विद्या का प्रयोग होता
है ॥१॥
इस लोक को ऋक् से जीतता है, अन्तरिक्ष को यजुः से और द्यौ को साम से । इसलिए
६६६ शतपथ ब्राह्मण
य॒जुषा दि॒वमेव साम्ना॒ तस्माद्य॒स्यैका वि॒द्यानूक्ता स्याद॒न्वेवापीतरयोर्नि॒र्मितं वि-
वन्दे॒तेममे॒व लोक॒मृचा ज॒यत्य॒न्तरि॑क्षं यजु॑षा दि॒वमेव साम्ना ॥२॥ तद्वाऽए॒तत् ।
सहस्रं वाचः प्रजातं हेऽइन्द्रस्तृतीये तृतीयं वि॒सृ॑क्षद्यच्च सामानि चेन्द्रो यजूꣳषि
वि॒सृज॒स्तस्मात्स॒दस्यृक्सामान्यां कुर्वन्त्ये॒न्द्धꣳ हि सदः ॥३॥ अथैतं वि॒ष्णुं य॒ज्ञम् ।
ए॒तैर्युजु॑र्भिः पु॒रस्ता॑देव विश॑ति तस्मात्पुरश्चरणं नाम ॥४॥ वागेवर्क्सामानि
च । मन एव य॒जूंषि सा य॒त्रेयं वागासीत्स॒र्वमेव तत्रा॑क्रिय॒त सर्वं प्राज्ञा॑य॒ताथ
यत्र॒ मन॒ आसीत्तत्र॒ किं च॒नाक्रि॑यत न प्राज्ञा॑यत नो॒ हि मन॑सा ध्याय॒तः
कश्च॒नाजा॑नाति ॥५॥ ते देवा वाचमब्रुवन् । प्राची प्रेहीदं प्रज्ञा॑पयेति सा॒ हो-
वाच किं मे ततः स्यादिति यत्किं चावषट्कृतꣳ स्वाहाकारेण यज्ञे हूयते तत
ऽइति तस्माद्यत्किं चावषट्कृतꣳ स्वाहाकारेण यज्ञे हूयते तद्वाचः सा प्राची
प्रैत्सैतत्प्राज्ञ॑पयदि॒तीदं कुरुते॒तीदं कुरुतेति॑ ॥६॥ तस्माडु कुर्वन्त्येवर्क्स ह॒विर्धाने
। प्रातरनुवाकमन्वाह समिधिनोरन्वाह ग्राव्णोऽभिष्टौत्येवꣳ हि समु॒त्राभव-
ताम् ॥७॥ तस्माडु कुर्वन्त्येव सदसि । य॒ज्ञुपैौडुम्बरीमुद्द्ब्रयन्ति सदः संमिन्वन्ति
धिष्ण्यान्युपकिरन्त्येवꣳ हि स॒युजावभवताम् ॥८॥ तद्वाऽए॒तत्सदः॒ परि॑श्रयन्ति । ए-
तस्मै मिथुनाय ति॒र्-इवेदं मिथुनं चर्याताऽइ॒ति व्यू॑ढं वाऽए॒तन्मिथुनं यद॒न्यः पु-
श्यति तस्माद्य॒द्यपि जायापती मिथुनं चर॒न्तौ पश्य॑न्ति व्येव द्रव्त आग एव कु-
र्व्वाते तस्माद्वारेण सदः प्रेक्ष॑माणं ब्रूयान्मा प्रेक्षथा इति यथा ह मिथुनं चर्य्यमा-
णं पश्येदेवं तत्कामं द्वारेण देवकृतꣳ हि द्वारम् ॥९॥ एव॒मैवैतद्धविर्धानं परि॑श्र-
यन्ति । एतस्मै मिथुनाय ति॒र्-इवेदं मिथुनं चर्याताऽइ॒ति व्यू॑ढं वाऽए॒तन्मिथुनं
यदन्यः पश्यति तस्माद्य॒द्यपि जायापती मिथुनं चर॒न्तौ पश्य॑न्ति व्येव द्रव्त आग
एव कुर्व्वाते तस्माद्वारेण हविर्धानं प्रेक्ष॑माणं ब्रूयान्मा प्रेक्षथा इति यथा ह मि-
थुनं चर्य्यमाणं पश्येदेवं तत्कामं द्वारेण देवकृतꣳ हि द्वारम् ॥१०॥ तद्वाऽए॒तहु-
कां० ४, अ० ६, ब्रा० ७, कं० २-१० शतपथब्राह्मण / ६६७
जो एक विद्या को जानता हो उसको चाहिए कि अन्य दो विद्याओं को भी जान ले, क्योंकि ऋक्
से पृथिवी को जीतता है, यजुः से अन्तरिक्ष को और साम से द्यौ लोक को ॥२॥
यह वाणी की सहस्र प्रजा है। इन्द्र ने दो-तिहाई ले लिया और विष्णु ने एक-तिहाई।
ऋक् और साम को इन्द्र ने और यजुः को विष्णु ने। इसलिए सदस् में ऋक् और साम से स्तति
करते हैं क्योंकि सदस् इन्द्र का अपना है ॥३॥
यजुओं से इस विष्णु अर्थात् यज्ञ को आगे लाते हैं, इसलिए इसका नाम पुरश्चरण
है ॥४॥
वाणी ही ऋक् और साम ह। मन ही यजुः है। जहा वाणी थी वहाँ सब काम हो गया,
सब ज्ञात हो गया। जहाँ मन था वहाँ कुछ न हुआ, कुछ न ज्ञात हुआ। क्योंकि जो कोई मन में
विचार करता है उसको कोई भी नहीं जानता ॥५॥
उन देवों ने वाणी से कहा, 'आगे चल और इसका ज्ञान करा।' उसने कहा, 'मुझे क्या
होगा?' उन्होंने कहा कि 'जो कुछ बिना वषट्कार के स्वाहाकार से दिया जाता है वह सब तेरा
लाभ होगा।' इसलिए जो कुछ वषट्कार के बिना स्वाहाकार से दिया जाता है वह सब वाणी
का होता है। वह आगे बढ़ी और यह विज्ञप्ति दी कि 'ऐसा करो, ऐसा करो' ॥६॥
इसलिए वे भी हविर्धान में ऋक् से ही यज्ञ करते हैं। (होता) प्रातःकाल अनुवाक्
पढ़ता है, सामिधेनियों को पढ़ता है। वह (ग्रावस्तुत) ग्राव्ण की स्तुति करता है। इस प्रकार ये
दोनों अर्थात् मन और वाणी संयुक्त हो गए ॥७॥
इसलिए सदस् में यजुः से यज्ञ करते हैं। वे औदुम्बरी को उठाते हैं, सदस् को खड़ा करते
हैं। वे धिष्ण्या का निर्माण करते हैं। इस प्रकार मन और वाणी दोनों संयुक्त हो जाते हैं ॥८॥
इस सदस् को वे चारों ओर से घेर देते हैं, मैथुन के लिए, यह सोचकर कि 'गुप्त रीति
से ही मैथुन (मन और वाणी का संयोग) होगा।' क्योंकि यदि कोई देख ले तो मैथुन अनुचित
हो जाता है। इसीलिए जब स्त्री-पुरुष मैथुन करते हुए देख लिये जाते हैं तो वे एक-दूसरे को
छोड़कर अलग हो जाते हैं क्योंकि यह बुरा लगता है। इसलिए जो कोई सदस् में द्वार के
सिवाय अन्य स्थान से झाँके, उससे कहना चाहिए कि मत झाँको, क्योंकि यह ऐसी ही बात है जैसे
किसी को मैथुन करते हुए देखे। द्वार की ओर से कोई देख सकता है क्योंकि द्वार तो देवों का
बनाया हुआ है ॥९॥
इसी प्रकार हविर्धान को भी चारों ओर से घेर देते हैं, मैथुन के लिए, अर्थात् मैथुन गुप्त
रीति से किया जाय। जो कोई दूसरा मैथुन करते देख लेता है वह मैथुन अनुचित समझा जाता
है। इसलिए यदि पति-पत्नी मैथुन करते हुए देख लिये जाते हैं तो वे अलग हो जाते हैं क्योंकि
यह बुरी बात समझी जाती है। इसलिए यदि कोई द्वार के अतिरिक्त और किधर से ही हविर्धान
में झाँके तो उससे कहना चाहिए कि 'मत झाँको' अर्थात् मानो वह मैथुन को देख रहा है। द्वार
में होकर कोई देख सकता है, क्योंकि द्वार देवों द्वारा निर्मित है ॥१०॥
६६८ शतपथ ब्राह्मण
षा साम । योषामृक्ठ सदस्यूध्येति तस्मान्मिथुनादिन्द्रो जातस्तेजसो वै तत्तेजो
जातं यदृचश्च साम्नश्चेन्द्र इन्द्र इति ह्येतमाचक्षते य एष तपति ॥ ११॥ अथैतद्-
षा सोमः । योषा अपो हविर्धानेऽध्येति तस्मान्मिथुनाच्चन्द्रमा जातो ऽन्नाद्धि तदन्नं
जातं यदृचश्च सोमाच्च चन्द्रमाश्चन्द्रमा ह्येतस्यान्नं य एष तपति तद्यजमानं चैवै-
तज्जनयत्यन्नाद्यं चास्मै जनयत्यृचश्च साम्नश्च यजमानं जनयत्यृचश्च सोमाच्चान्ना-
दमन्नाद्यम् ॥ १२॥ यजुषा ह वै देवाः । अग्रे यज्ञं तेनिरेऽथर्चाय साम्ना तदिद-
मप्येतर्हि यजुषैवाग्रे यज्ञं तन्वतेऽथर्चाय साम्ना यज्ञो ह वै नामैतद्यद्यजूंषि
॥ १३॥ यत्र वै देवाः । इमा विद्याः कामान्दुदुहिरे तद् यजुर्विद्यैव भूयिष्ठान्कामा-
न्दुदुहे सा निर्धीततमेवास सा नेतरे विद्ये प्रत्यास नान्तरिक्षलोक इतरौ लो-
कौ प्रत्यास ॥ १४॥ ते देवा अकामयन्त । कथं न्वियं विद्येतरे विद्ये प्रतिस्यात्क-
थमन्तरिक्षलोक इतरौ लोकौ प्रतिस्यादिति ॥ १५ ॥ ते होचुः । उपाꣳश्वेव यजु-
र्भिश्चराम तत एषा विद्येतरे विद्ये प्रतिभविष्यति ततोऽन्तरिक्षलोक इतरौ
लोकौ प्रतिभविष्यतीति ॥ १६॥ तैरुपाꣳश्वचरन् । आप्याययन्त्येवैनानि तत्तत एषा
विद्येतरे विद्ये प्रत्यासीत्ततोऽन्तरिक्षलोक इतरौ लोकौ प्रत्यासीत्तस्माद्यजूंषि
निरुक्तानि सन्त्यनिरुक्तानि तस्मादयमन्तरिक्षलोको निरुक्तः सन्ननिरुक्तः ॥ १७॥
स य उपाꣳशु यजुर्भिश्चरति । आप्याययत्येवैनानि स तान्येनमापीनान्याप्यायय-
न्त्यथ य उच्चैश्चरति बृꣳहयत्येवैनानि स तान्येनꣳ बृꣳहाणि बृꣳहयन्ति ॥ १८॥ वा-
ग्वेवर्क् च सामानि च । मन एव यजूंषि स यऽऋचा च साम्ना च चरन्ति वाचि
भवन्त्यथ ये यजुषा चरन्ति मनस्ते भवन्ति तस्मान्नानभिप्रेषितमध्वर्युणा किं चन
क्रियते यदैवाध्वर्युराहानुब्रूहि यजेत्यथैव ते कुर्वन्ति यऽऋचा कुर्वन्ति यदैवाध्वर्यु-
राह सोमः पवताऽऽपावर्तध्वमित्यथैव ते कुर्वन्ति ये साम्ना कुर्वन्ति नो ह्यनभि-
गतं मनसा वाग्वदति ॥ १९॥ तद्वाऽएतन्मनोऽध्वर्युः । पुर-इवैव चरति तस्मात्यु-
कां० ४, अ० ६, ब्रा० ७, कं० ११-२० शतपथब्राह्मण / ६६६
इस सदस् में नर-साम नारी-ऋक् की कामना करता है। इनके मैथुन से इन्द्र उत्पन्न
होता है। तेज ही तेज उत्पन्न हुआ। ऋक् और साम से इन्द्र हुआ क्योंकि इन्द्र उसी को कहते
हैं जो तपता है (सूर्य) ॥११॥
इस हविर्धान में नर-सोम नारी-जल (संस्कृत में 'आप' स्त्रीलिंग है। अर्बी और हीब्रू
में भी जल के वाचक स्त्रीलिंग मिलते हैं) की कामना करता है। इसके मैथुन से चाँद उत्पन्न
होता है। यह जो जल और सोम के मैथुन से चाँद उत्पन्न हुआ, मानो अन्न से अन्न उत्पन्न
हुआ, क्योंकि चन्द्रमा उसका अन्न है जो तपता है (सूर्य का)। इस प्रकार वह यजमान को
उत्पन्न करता है, और उसके लिए अन्न को उत्पन्न करता है। ऋक् और साम से वह यजमान
को उत्पन्न करता है और सोम-जल से वह उसके लिए अन्न उत्पन्न करता है ॥१२॥
देवों ने पहले यजुः से यज्ञ किया, फिर ऋक् से, फिर साम से। इसीलिए ये भी पहले यजुः
से यज्ञ करते हैं, फिर ऋक् से, फिर साम से, क्योंकि वे कहते हैं कि 'यज' ही 'यजुः' है ॥१३॥
जब देवों ने इन विद्याओं से अपनी कामनाओं को दुहा तो सबसे अधिक यजुः से दुहा।
इस प्रकार यह खाली-सा हो गया। यह उन दो विद्याओं के बराबर न रहा, अन्तरिक्ष दोनों
लोकों के बराबर न था ॥१४॥
देवों ने चाहा कि यह विद्या उन दो विद्याओं के बराबर कैसे हो? यह अन्तरिक्ष उन
दो लोकों के बराबर कैसे हो ? ॥१५॥
उन्होंने कहा, 'धीमी आवाज से यजुः से यज्ञ करें, तब यह विद्या उन दो विद्याओं के
बराबर हो जायगी। तब अन्तरिक्ष इन दो लोकों के बराबर हो जायगा' ॥१६॥
उनके धीमी आवाज से यज्ञ करने से यजुओं की शक्ति बढ़ गई। यह विद्या दूसरी दो
विद्याओं के बराबर हो गई। इस प्रकार अन्तरिक्षलोक अन्य दो लोकों के तुल्य हो गया। इसलिए
यजुः निरुक्त (स्पष्ट) होते हुए भी अनिरुक्त है, इसलिए अन्तरिक्ष निरुक्त होते हुए भी अनि-
रुक्त है ॥१७॥
जो यजुओं को धीमी आवाज से पढ़ता है वह यजुओं को शक्तिशाली करता है और ये
शक्तिशाली होकर उसको शक्तिशाली करते हैं। जो यजुओं को उच्चस्वर से पढ़ता है वह उनको
निर्बल बनाता है और वे निर्बल होकर उसको निर्बल कर देते हैं ॥१८॥
ऋक् और साम वाणी हैं। मन ही यजुः है। जो ऋक् और साम से यज्ञ करते हैं वे
वाणी हैं और जो यजुः से यज्ञ करते हैं वे मन हैं। इसलिए बिना अध्वर्यु की आज्ञा के कुछ काम
नहीं किया जाता। जब अध्वर्यु कहता है 'अनुवाक् कहो, यज्ञ करो' तब वे यज्ञ करते हैं जो ऋक्
से यज्ञ करते हैं। जब अध्वर्यु कहता है कि 'सोम पवित्र हो गया, लौटो' तो वे यज्ञ करते हैं जो
साम से यज्ञ करते हैं। मन के द्वारा विचारे बिना तो वाणी कुछ कहती नहीं ॥१९॥
इस प्रकार मनरूपी अध्वर्यु आगे-आगे चलता है। इसीलिए पुरश्चरण नाम पड़ा। जो