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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-५, ब्राह्मण-७

जनयति॒ तं कृ॑त्स्नं य॒ज्ञं ज॑नयित्वा॒ तमा॒त्मन्ध॑त्ते॒ तमा॒त्मन्कु॑रुते ॥ ५ ॥ ब्राह्मणम्
॥ ७ [५. ६.] ॥
ता वा॒ऽएताः॑ । चतु॑स्त्रिंशद्व्याहृ॑तयो भवन्ति॒ प्राय॑श्चित्तयो॒ नामै॑ष वै प्र॒जाप॑-
ति॒र्य॒ ए॒ष य॒ज्ञस्ता॑यते॒ यस्मा॑दि॒माः प्र॒जाः प्र॒जाता ऋ॒त्व्वे॒वाप्ये॑त॒र्ह्यनु प्र॒जाय॑न्ते ॥ १ ॥
अ॒ष्टौ वस॑वः । एकादश रु॒द्रा द्वाद॑शादित्या इ॒मेऽए॒व द्यावा॑पृथि॒वी त्रय॑स्त्रिंशौ
त्रय॑स्त्रिंशद्वै दे॒वाः प्र॒जाप॑तिश्चतुस्त्रिं॒शस्तदे॑नं प्र॒जाप॑तिं करोत्ये॒तद्वाऽअ॒स्त्ये॒तदमृ॑-
तं॒ यद्ध॒मृतं॒ तद्ध्यस्त्ये॒तद् तद्यन्मर्त्य॑ꣳ स ए॒ष प्र॒जाप॑तिः सर्वं॒ वै प्र॒जाप॑तिस्त॒द्देनं॑
प्र॒जाप॑तिं करोति तस्मा॑देताश्चतु॑स्त्रिंशद्व्याहृ॑तयो भवन्ति॒ प्राय॑श्चित्तयो॒ नाम॑ ॥ २ ॥
ता हैके॑ । य॒ज्ञत॒न्व इत्या॑चक्षते य॒ज्ञस्य ह्वेवैतानि॒ पर्वा॑णि स ए॒ष य॒ज्ञस्ता॑य-
मान ए॒ता ए॒व दे॒वता भव॒न्नेति॑ ॥ ३ ॥ सा यदि॑ घ॒र्मधु॑ग्दुह्लेत् । अ॒न्यामु॒पसं॑-
क्रामेयुः स यस्या॑मे॒वैनं॒ वेला॑यां पु॒रा पि॑न्व॒यन्ति॒ तद्दैवैनामुदीचीꣳ स्थापयेदग्रे॑ण
वा शालां॒ प्राची॑म् ॥ ४ ॥ तयो॑ऽर॒त्नेऽअभितः॑ । पुरुषा॒ण्डꣳ शि॒खण्डा॒स्ये॑ऽउह्य॑ते
तयो॒र्यद्द॑क्षि॒णं तस्मि॑न्नेताश्चतु॑स्त्रिंशतमाहु॒तीर्जुहुया॒द्येता॒वान्वै सर्वो॑ य॒ज्ञो या-
वत्य ए॒ताश्चतु॑स्त्रिंशद्व्याहृ॑तयो भवन्ति॒ तद॒स्यां कृ॑त्स्न॒मेव सर्वं॑ य॒ज्ञं द॑धात्येषा ह्या-
तो घ॒र्मं पिन्वत॒ऽऋषो तत्र॒ प्राय॑श्चित्तिः क्रियते ॥ ५ ॥ अथ यद्य॒ज्ञस्य॒ दुह्ले॑त् । त-
त्समन्वीक्ष्य॑ जुहुयाद्दी॒क्षोप॒सत्स्वा॑हव॒नीये॒ प्रसूत॒ऽआ॑ग्नी॒ध्रे वि वाऽए॒तद्य॒ज्ञस्य॒ पर्व॑
स्रꣳसते॒ यद्दुह्लति॒ सा यैव तर्हि॒ तत्र दे॒वता भव॑ति तयै॒वैतद्भिषज्य॑ति॒ तया॒ संद॑-
धाति ॥ ६॥ अथ यदि॑ स्कन्दे॒त् । तद॒द्भिरुप॒निन॑येद॒द्भिर्वाऽइ॒दꣳ सर्व॒माप्तꣳ सर्व॑स्यैवा-
प्त्यै वै॒ष्ण॒ववारु॒ण्यऽर्चा यद्वाऽइ॒दं किं चार्च्छ॑ति वरु॑ण ए॒वेदꣳ सर्व॒मर्प॑यति॒ द्यौरो॑-
जसा स्कभिता रोच॑ना॒ दिवि वी॒र्ये॑भिर्वि॒रित॒मा शवि॑ष्ठा । या पत्ये॑ते॒ऽअप्र॑तीता॒ सहो॑-
भिर्विष्णू॒ऽअगन्वरुणा पूर्व॒हूतौविति॑ य॒ज्ञो वै विष्णु॑स्तस्यैतदार्च्छ॒ति वरु॑णो वाऽआ-
र्पयिता तद्य॒स्या॑श्चैवैतद्दे॒वता॑या आर्च्छ॒ति या च दे॒वताऽर्प॑यति ताभ्या॑मे॒वैतदु॒भाभ्यां

कां० ४, अ० ५, ब्रा० ६-७, क० ५ व १-७ शतपथब्राह्मण / ६४७
को उत्पन्न करता है और सब यज्ञ को उत्पन्न करके वह उसको अपने में धारण करता है। वह
उसको अपना बना लेता है ॥५॥
सोमप्रायश्चित्तानि
अध्याय ५—ब्राह्मण ७
चौंतीस व्याहृतियां होती हैं जिनको प्रायश्चित्ति कहते हैं। यह जो यज्ञ किया जाता है
वही प्रजापति है जिससे ये प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं और जिससे अब तक ये प्रजाएँ उत्पन्न होती
हैं ॥१॥
आठ वसु, ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य और ये दो द्यौ तथा पृथिवी—ये हुए तैंतीस।
प्रजापति है चौंतीसवाँ। यह (यजमान को) प्रजापति कर देता है। यह जो है वह अमृत है; जो
अमृत है वह यह है। जो मर्त्य है वह भी प्रजापति है, क्योंकि प्रजापति सब-कुछ है। इस प्रकार
वह इसको प्रजापति बनाता है। इस प्रकार ये चौंतीस व्याहृतियाँ हैं जिनको प्रायश्चित्ति कहते
हैं ॥२॥
कुछ इनको 'यज्ञ का तनु' कहते हैं। ये यज्ञ के ही पर्व हैं। यह यज्ञ जब किया जाता है
तो वह इन देवताओं का रूप धारण करता जाता है ॥३॥
यदि वह घर्मदुघा दूध न दें (वह गाय जिसके दूध को औटा कर घर्म बनाया जाता है
घर्मदुघा कहलाती है) तो दूसरी को लेवें। और जिस स्थान पर उसको दुहते, उसी स्थान पर
उसको खड़ा करें, उत्तराभिमुख या शाला की ओर मुख करके ॥४॥
और जो पूँछ की डण्डी के दोनों ओर जो शिखण्ड या निकली हुई हड्डियाँ हैं उनमें जो
दाहिनी है, उसी पर वह चौंतीस आहुतियाँ देता है। ये सब यज्ञ ही तो हैं ये जो चौंतीस आहुतियाँ
हैं। इस प्रकार वह उस सम्पूर्ण यज्ञ को उसमें स्थापित कर देता है। क्योंकि वहीं से घर्म निकलता
है; यही उसका प्रायश्चित्त है ॥५॥
अब यज्ञ का जो भाग सफल न हो उसी के उद्देश्य से आहुति दे—उपसदों में और
आहवनीय में, दीक्षा यज्ञ में, तथा सोम यज्ञ में, अग्नीध्र में। क्योंकि यज्ञ के जिस भाग में
सफलता न हो वही टूटा हुआ समझो। और जो उसका देवता है उसी के द्वारा वह सम्पूर्ण होता
है ॥६॥
यदि कुछ गिर जाय तो उस पर पानी डाल दे, क्योंकि वे सब जलों से ही व्याप्त हैं—
सबकी प्राप्ति के लिए, विष्णु और वरुण की ऋचा पढ़कर। यहाँ जो कुछ कष्ट मनुष्य को होता
है वह सब वरुण देवता के ही द्वारा होता है। "ययोरोजसा स्कभिता रजाꣳसि वीर्येभिर्वीरतमा
शविष्ठा। य पत्येते ऽ अप्रतीता सहोभिर्विष्णु ऽ अगन्वरुणा पूर्वहूती" (यजु० ८।५६, अथर्व
७।२५।१)—"जिन दोनों के ओज से ये लोक ठहरे हुए हैं जो पराक्रमों के द्वारा सबसे वीर और
उत्तम हैं; जो अपूर्व शक्ति से युक्त हैं। इन बुलाये हुए विष्णु और वरुण के पास (यह यज्ञ)
गया है।" यज्ञ विष्णु है। यह यज्ञ ही कष्ट में है। वरुण ने कष्ट दिया है। जिस देवता की हानि
होती है और जिस देवता के द्वारा हानि होती है उन दोनों के द्वारा उसका उपचार करता है।