शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 665, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० ४, अ० ५, ब्रा० ६-७, क० ५ व १-७ शतपथब्राह्मण / ६४७
को उत्पन्न करता है और सब यज्ञ को उत्पन्न करके वह उसको अपने में धारण करता है। वह
उसको अपना बना लेता है ॥५॥
सोमप्रायश्चित्तानि
अध्याय ५—ब्राह्मण ७
चौंतीस व्याहृतियां होती हैं जिनको प्रायश्चित्ति कहते हैं। यह जो यज्ञ किया जाता है
वही प्रजापति है जिससे ये प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं और जिससे अब तक ये प्रजाएँ उत्पन्न होती
हैं ॥१॥
आठ वसु, ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य और ये दो द्यौ तथा पृथिवी—ये हुए तैंतीस।
प्रजापति है चौंतीसवाँ। यह (यजमान को) प्रजापति कर देता है। यह जो है वह अमृत है; जो
अमृत है वह यह है। जो मर्त्य है वह भी प्रजापति है, क्योंकि प्रजापति सब-कुछ है। इस प्रकार
वह इसको प्रजापति बनाता है। इस प्रकार ये चौंतीस व्याहृतियाँ हैं जिनको प्रायश्चित्ति कहते
हैं ॥२॥
कुछ इनको 'यज्ञ का तनु' कहते हैं। ये यज्ञ के ही पर्व हैं। यह यज्ञ जब किया जाता है
तो वह इन देवताओं का रूप धारण करता जाता है ॥३॥
यदि वह घर्मदुघा दूध न दें (वह गाय जिसके दूध को औटा कर घर्म बनाया जाता है
घर्मदुघा कहलाती है) तो दूसरी को लेवें। और जिस स्थान पर उसको दुहते, उसी स्थान पर
उसको खड़ा करें, उत्तराभिमुख या शाला की ओर मुख करके ॥४॥
और जो पूँछ की डण्डी के दोनों ओर जो शिखण्ड या निकली हुई हड्डियाँ हैं उनमें जो
दाहिनी है, उसी पर वह चौंतीस आहुतियाँ देता है। ये सब यज्ञ ही तो हैं ये जो चौंतीस आहुतियाँ
हैं। इस प्रकार वह उस सम्पूर्ण यज्ञ को उसमें स्थापित कर देता है। क्योंकि वहीं से घर्म निकलता
है; यही उसका प्रायश्चित्त है ॥५॥
अब यज्ञ का जो भाग सफल न हो उसी के उद्देश्य से आहुति दे—उपसदों में और
आहवनीय में, दीक्षा यज्ञ में, तथा सोम यज्ञ में, अग्नीध्र में। क्योंकि यज्ञ के जिस भाग में
सफलता न हो वही टूटा हुआ समझो। और जो उसका देवता है उसी के द्वारा वह सम्पूर्ण होता
है ॥६॥
यदि कुछ गिर जाय तो उस पर पानी डाल दे, क्योंकि वे सब जलों से ही व्याप्त हैं—
सबकी प्राप्ति के लिए, विष्णु और वरुण की ऋचा पढ़कर। यहाँ जो कुछ कष्ट मनुष्य को होता
है वह सब वरुण देवता के ही द्वारा होता है। "ययोरोजसा स्कभिता रजाꣳसि वीर्येभिर्वीरतमा
शविष्ठा। य पत्येते ऽ अप्रतीता सहोभिर्विष्णु ऽ अगन्वरुणा पूर्वहूती" (यजु० ८।५६, अथर्व
७।२५।१)—"जिन दोनों के ओज से ये लोक ठहरे हुए हैं जो पराक्रमों के द्वारा सबसे वीर और
उत्तम हैं; जो अपूर्व शक्ति से युक्त हैं। इन बुलाये हुए विष्णु और वरुण के पास (यह यज्ञ)
गया है।" यज्ञ विष्णु है। यह यज्ञ ही कष्ट में है। वरुण ने कष्ट दिया है। जिस देवता की हानि
होती है और जिस देवता के द्वारा हानि होती है उन दोनों के द्वारा उसका उपचार करता है।