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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-४, ब्राह्मण-३

मनुष्याणां मू॒लमिव पि॒तॄणां तस्मा॑दपमूलं दि॒नानि भवन्ति सकृदाच्छि॒न्नानि भव-
न्ति सकृ॒द्ध्येव॒ परा॑ञ्चः पि॒तर॒स्तस्मा॑त्सकृदाच्छि॒न्नानि भवन्ति ॥ १७ ॥ तानि दक्षि॑-
णो॒पस्तृ॑णाति । तत्र॑ ददाति स वा॒ऽइति ददा॒तीती॑व वै दे॒वेभ्यो जु॒ह्वत्यु॑द्धरन्ति
मनु॒ष्येभ्यो॒ऽथैवं पि॒तॄणां तस्मा॒दिति॑ ददाति ॥ १८ ॥ स॒ ददाति । असा॑वेत॒त्तऽइत्ये॑-
व॒ यज॑मानस्य पि॒त्रे ये च॑ त्वा॒मन्वित्य॑ हैक॒ऽआहु॒स्तदु तथा न ब्रूयात्स्वयं वै ते-
षाञ्च॒ सह॒ येषा॑ञ्च॒ सह॒ तस्मा॑ङ् ब्रूयादसा॑वेत॒त्तऽइत्ये॑व॒ यज॑मानस्य पि॒त्रेऽसा॑वेत॒त्त
ऽइति॑ पिताम॒हाया॒सावे॑त॒त्तऽइति॑ प्रपितामहाय॒ तद्य॑दितः परा॒ग्ददा॑ति सकृ॒द्ध्ये॑-
व॒ परा॑ञ्चः पि॒तरः॑ ॥ १९ ॥ तत्र॑ जपति । अत्र॑ पितरो मादयध्वं यथाभागमावृ॑षायध्व-
मिति॑ यथाभागमश्नी॒तेत्ये॒वैतदा॑ह ॥ २० ॥ अथ परा॒ङ् पर्या॑वर्तते । ति॒र्-इव॒ वै
पि॒तरो मनुष्येभ्यस्ति॒र्-इवैतद्भवति स वा॒ऽआ त॑मितोरासीतेत्याङ्करेतावान्त्सुसु-
रिति॒ स वै मू॒हूर्त॑मे॒वासित्वा॑ ॥ २१ ॥ अथोपपल्‍य्य जपति । अमी॑मदन्त पि॒तरो
यथाभागमावृ॑षायिषतेति यथाभागमशिषि॒रित्ये॒वैतदा॑ह ॥ २२ ॥ अथोदपात्रमादाया॑-
वने॑जयति । असा॑ववनेनिक्ष््वेत्ये॒व यज॑मानस्य पि॒तर॑मसा॑ववनेनिक्ष््वेति पिताम-
हमसा॑ववनेनिक्ष््वेति प्रपितामहं॒ तद्य॑था जग्मु॒षेऽभि॑षिञ्चे॒देवं तत् ॥ २३ ॥ अथ नी-
विमु॑द्वृह्य॒ नम॑स्करोति । पि॒तृदे॑वत्या॒ वै नी॒विस्तस्मा॑न्नी॒विमु॑द्वृह्य॒ नम॑स्करोति य-
ज्ञो वै नमो॑ य॒ज्ञिया॑ने॒वैना॑ने॒तत्क॑रोति षट् कृत्वो॑ नमस्करोति षड्वा॒ऽऋत॑व ऋ॒तवः॑
पि॒तर॒स्तस्मा॒त्षट् कृ॒त्वो नम॑स्करोति ॰ गृ॒हान्नः॑ पितरो दत्तेति गृ॒हाणां॑ ह पि॒तर
ईश॑त॒ऽएषो॒ऽएत॒स्याशीः॒ कर्म॑णो॒ऽथाव॑जिघ्रति प्रत्यवधाय पि॒ण्डांस्तद्यज॑मानभा॒गो
ऽग्नौ सकृ॑दाच्छि॒न्नान्य॒भ्याद॑धाति पुनरु॒ल्मुक॒मपि॑ सृजति ॥ २४ ॥ ब्राह्मणम् ॥ ४ [४.
२.] ॥ ५
तद्ध॒ होवाच कहो॑डः कौषी॑तकिः । अ॒न॒योर्वा॒ऽअयं द्यावा॑पृथिव्यो॒ रसो॒ऽस्य
र॒सस्य॑ हु॒त्वा दे॒वेभ्यो॒ऽथेमम॑न्ना॒मेति॒ तस्मा॑द्वा॒ऽआग्र॑यणे॒ष्ट्या य॑जत॒ऽइति॑ ॥ १ ॥ तद्ध

कां० २, अ० ४, ब्रा० २-३, कं० १७-२४ व १ शतपथब्राह्मण / २६५
का मनुष्यों का और मूल पितरों का। इसलिए वे मूल से काटे जाते हैं। वे एक ही चोट से
इसलिए काटे जाते हैं कि पितर लोग एक ही बार में गुजर गये ॥१७॥
वह उनके सिरों को दक्षिण की ओर करके फैलाता है। तब (पिण्ड) देता है। वह इस
प्रकार पिण्ड देता है (हाथ से बनाकर)। देवों को इस प्रकार. दिया जाता है (यहाँ भी हाथ से
विधि बताई जाती है)। मनुष्यों को इस प्रकार परोसते हैं, और पितरों के लिए इस प्रकार।
इसलिए वह इस प्रकार देता है ॥१८॥
यजमान के बाप का नाम लेकर 'यह तुम्हारे लिए', कुछ लोग इसके साथ यह भी कहते
हैं—'और उनके लिए जो तुम्हारे पीछे आवें।' परन्तु उसको ऐसा न कहना चाहिए, क्योंकि वह
भी तो उन्हीं में से है। इसलिए पिता का नाम लेकर कहे 'यह तुम्हारे लिए', बाबा का नाम
लेकर, 'यह तुम्हारे लिए', पर-दादे का नाम लेकर, 'यह तुम्हारे लिए।' वर्तमान समय से
आरम्भ करके पिछले-पिछले के क्रम से देता है, क्योंकि पितरों के गुजरने का वर्तमान की अपेक्षा
यही क्रम है ॥१९॥
अब वह जपता है, “अत्र पितरो मादयध्वं यथाभागमावृषायध्वम्” (यजु० २।३१)—
“हे पितरो ! यहाँ प्रसन्नता से खाओ जैसे बैल आकर खाते हैं अपने-अपने हिस्से का।” इसका
तात्पर्य यह है कि 'अपना-अपना भाग खाओ' ॥२०॥
अब मुड़कर खड़ा होता है (अर्थात् उत्तर की ओर), क्योंकि पितर मनुष्यों से बिल्कुल
दूसरी ओर हैं और वह भी पितरों से दूसरी ओर है। कुछ लोग कहते हैं कि जब तक साँस रोक
सके उस समय तक खड़ा रहे, क्योंकि प्राण इतने ही होते हैं। अस्तु, एक मुहूर्त्त रहकर—॥२१॥
(दाहिनी ओर) मुड़कर जपता है, “अमीमदन्त पितरो यथा भागमावृषायिषत" (यजु०
२।३१) — “पितरों ने खा लिया। बैलों के समान उन्होंने अपना-अपना भाग पा लिया” ॥२२॥
अब जल-पात्र लेकर हाथ धुलाता है। यजमान के बाप का नाम लेकर 'तुम धोओ',
बाबा का नाम लेकर 'तुम धोओ', परदादे का नाम लेकर 'तुम धोओ।' जिस प्रकार मेहमानों
को खाना खिलाकर धुलाते हैं उसी प्रकार यहाँ भी ॥२३॥
नीवि (निचला कपड़ा और ऊपर का कपड़ा दोनों में गाँठ दी जाती है) को खोलकर
नमस्कार करतो है। नीवि पितरों की है इसलिए उसे खोलकर नमस्कार करता है। नमस्कार यज्ञ
है। इसलिए इस प्रकार वह उनको यज्ञ के योग्य बनाता है। छः बार नमस्कार करता है। क्योंकि
छः ऋतुएँ हैं और पितर ऋतुएँ हैं, इसलिए छः बार नमस्कार करता है। अब वह कहता है,
“गृहान्नः पितरो दत्त” (यजु० २।३२)—“हे पितरो, हमको घर दीजिए।” पितर घरों के रक्षक
हैं, इसलिए इस कर्म से आशीर्वाद चाहता है। पिण्डों को पीछे हटाकर सूंघता है, क्योंकि यह
यजमान का भाग है। एक चोट में काटी हुई (कुश) को अग्नि पर रखता है, और जलती हुई
लकड़ी (उल्मुक) को फेंकता है ॥२४॥
अध्याय ४—ब्राह्मण ३
कहोड कौषीतकि ने कहा, यह (वृक्षों का) रस वस्तुतः द्यावापृथिवी का है। हम देवों
को आहुति देकर खावें। इसलिए 'आग्रयणेष्टि' यज्ञ किया जाता है ॥१॥

२६६ शतपथ ब्राह्मण

होवा॒च या॑ज्ञव॒ल्क्यः॑ । दे॒वाश्च॒ वाऽअसु॑राश्चो॒भये॑ प्राजाप॒त्याः प॑स्पृधिरे॒ ततो॒ऽसुरा॑
उ॒भयी॒रोष॑धी॒र्याश्च॑ मनु॒ष्या॑ उ॒पजी॑वन्ति॒ याश्च॑ पशवः॑ कृत्यये॑व लद्विषेणे॑व ब॒त्प्रलि॑-
लि॒पुरू॒तैवं चि॑द्दे॒वान॑भिभवे॒मेति॒ ततो॒ न म॑नु॒ष्या आ॑श्न्रुव॒न् पश॑व आलि॑लिशिरे
ता हे॒माः प्र॒जा अ॑नाश॒केन॒ नोत्प॑राबभूवुः ॥२॥ तद्वै॑ दे॒वाः शु॑श्रुवुः । अ॑नाश॒केन
ह वा॒ऽइमाः प्र॒जाः प॑राभव॒न्तीति॒ ते हो॑चुर्ह॒न्तेद॒मासा॒मप॑जिघाꣳसा॒मेति॒ केनेति॑ य॒-
ज्ञेनेवे॑ति य॒ज्ञेन॑ ह॒ स्म वै तद्दे॒वाः क॑ल्पयन्ते॒ यदे॑षां क॒ल्पमा॒सैर्यद्य॒ज्ञ ॥३॥ ते
हो॒चुः । कस्य॑ न इ॒दं भ॑विष्य॒तीति॒ ते मम॑-म॒मेत्ये॑व न सम्पा॒द्यां च॑क्रुस्ते हास॑-
म्पा॒द्योचु॑रा॒जिमे॒वास्मि॒न्नाजा॑महै स॒ यो न॒ उज्जे॑ष्यति॒ तस्य॑ न इ॒दं भ॑विष्य॒तीति॒ त-
थेति॒ तस्मि॒न्नाजि॑माजत ॥४॥ ताविन्द्रा॒ग्नीऽउ॑दजयतां । तस्मा॑दिन्द्रा॒ग्नी द्वाद॑शकपा-
लः पु॑रो॒डाशो भ॑वतीन्द्रा॒ग्नी ह्य॑स्य भाग॒धेय॒मुद॑जयतां॒ तौ यत्रे॑न्द्रा॒ग्नीऽउ॒ज्जिगि॑वाꣳ-
सौ तस्या॒नुस्तद्दिश्ये॑ दे॒वा अन्वा॒ऽऽज॑ग्मुः ॥५॥ क्ष॒त्रं वा॒ऽइन्द्रा॒ग्नी । विशो॑ वि॒श्वे दे॒वा
यत्र॒ वै क्ष॒त्रमु॒ञ्जय॑त्यन्वाभ॒क्ता वै तत्र॒ विट्‌द्वि॒द्यान्वि॒दान्व॒न्वाभ॑जतां॒ तस्मा॒द्वैश्व॑-
दे॒वश्च॒रुर्भवति ॥६॥ तं वै पुरा॑णानां कुर्या॒दित्या॑हुः । क्ष॒त्रं वा॒ऽइन्द्रा॒ग्नी नेत्क्षत्र॑-
म॒भ्यारो॑हा॒णीति॒ तौ वा॒ऽउभा॑वेव न॑वानाꣳ स्यातां॒ यदि॑ पु॒रोडा॑श इत॒रश्च॒रुस्ति॒-
रस्तेनै॑व क्ष॒त्रमन॑भ्यारूढं॒ तस्मा॑दु॒भावे॑व न॑वानाꣳ स्याताम् ॥७॥ तऽउ॑ ह॒ विश्वे॑
दे॒वा ऊ॑चुः । अ॒नयो॒र्वाऽअ॒यं द्या॑वापृथि॒व्यो रसो॒ हन्ते॒मेऽअ॒स्मिन्नाभ॑जा॒मेति॒ ता-
भ्यामे॒तं भा॒गम॑कल्पय॒न्नेतं द्या॑वापृथि॒व्यमे॑ककपालं पु॒रोडा॑शं॒ तस्मा॑द्द्यावापृथि॒व्य
ए॑ककपालः पु॑रो॒डाशो भ॑वति तस्ये॒यमे॑व क॒पाल॒मेके॑व॒ हीयं॒ तस्मा॒देक॑कपालो
भ॑वति ॥८॥ तस्य॑ परि॒चक्षा॑ । यस्यै॒ वै कस्यै॑ च दे॒वता॑यै ह॒विर्गृ॒ह्यते॒ सर्व॑त्रैव
स्विष्ट॒कृद॑न्वाभ॒क्तोऽथैतꣳ॑ सर्व॑मेव जु॒होति॒ न स्विष्ट॒कृते॒ऽवद्य॑ति सा परि॒चक्षोतो॑
ह्रु॒तः पर्या॑वर्तते ॥९॥ तदा॑हुः । पर्या॑भूद्वा॒ऽअयमे॑ककपालो मोक्षि॒ष्यति॑ रा॒ष्ट्रमिति॑
नास्य॑ सा परि॒चक्षा॑हव॒नीयो॑ वा॒ऽआहु॑तीनां प्रति॒ष्ठा स यदा॑हव॒नीयं॒ प्राप्यापि॑

का० २, अं० ४, ब्रा० ३, कं० २-१० शतपथब्राह्मण / २६७
याज्ञवल्क्य का भी कथन है कि प्रजापति की सन्तान देव और असुर बड़ाई के लिए लड़
पड़े। तब असुरों ने दोनों प्रकार की ओषधियों को, अर्थात् उनको भी जिनके सहारे मनुष्य रहते
हैं और उनको भी जिनके सहारे पशु रहते हैं, कुछ अपनी चालाकी से (कृत्यया) और कुछ विष
के द्वारा नष्ट कर दिया कि इस प्रकार हम देवों पर विजय पा लेंगे। इस पर न मनुष्य कुछ खा
सके और न पशु, और भोजन के अभाव में ये सब पराजित-से हो गये ॥२॥
अब देवों ने सुना कि बिना भोजन के यह सब प्रजा पराजित हो रही है। उन्होंने कहा,
'इस सब (विष आदि) को हटाना चाहिए।' 'कैसे?' 'यज्ञ के द्वारा।' देव जो कुछ करना चाहते
थे वह उन्होंने यज्ञ के द्वारा किया और ऋषियों ने भी ॥३॥
तब उन्होंने कहा, 'यह (यज्ञ) हममें से किसका होगा?' हर एक ने कहा, 'मेरा'-'मेरा'
और निश्चित न कर सके। निश्चय न कर सकने पर उन्होंने कहा, 'चलो बाजी बदकर दौड़ें।
हममें से जो जीत जायगा यह (यज्ञ) उसी का होगा।' 'अच्छा' कहकर वे दौड़े ॥४॥
इन्द्र और अग्नि जीत गये। इसलिए पुरोडाश के बारह कपाल इन्द्र और अग्नि के होते
हैं। क्योंकि इन्द्र और अग्नि ने अपना भाग जीत लिया और इन्द्र और अग्नि जीतने पर जहाँ खड़े
थे वहाँ सब देव भी चले गये ॥५॥
इन्द्र और अग्नि क्षत्रिय हैं, सब देव वैश्य। जहाँ क्षत्रिय जीतता है वहाँ वैश्यों को अवश्य.
भाग मिलता है। इसलिए देवों को भाग मिल गया, इसलिए चरु सब देवों (विश्वेदेवा) का होता
है॥६॥
कुछ लोगों का विचार है कि (चरु) पुराने (अन्न) का हो, क्योंकि इन्द्र और अग्नि
क्षत्रिय हैं इसलिए (विश्वेदेवों को भी यदि इन्द्र और अग्नि के समान नया अन्न दिया जायगा
तो) वैश्य क्षत्रियों के बराबर हो जाएँगे। परन्तु दोनों को नया ही होना चाहिए। केवल यह
पुरोडाश है और यह चरु है। इन दोनों के नये होने से ही क्षत्रियों के बराबर (वैश्य) नहीं हो
सकते। इसलिए दोनों (पुरोडाश और चरु) नये अन्न के ही हों ॥७॥
अब देवों ने कहा, 'यह रस वस्तुतः द्यावापृथिवी का है, इसलिए हम इनको यज्ञ में भाग
देवें।' इसलिए उन्होंने उन दोनों को भाग दिया अर्थात् एक कपाल का पुरोडाश द्यावापृथिवी को
दिया। इसलिए एक कपाल का पुरोडाश द्यावापृथिवी का होता है। अब चूंकि यह पृथिवी उस
(रस) का कपाल है और वह एक ही है, इसलिए (पुरोडाश भी) एक कपाल का होता है ॥८॥
(ऐसा करने में) उसका एक दोष (है)। चाहे किसी देवता को हवि दी जाय, पीछे से
एक भाग स्विष्टकृत् का होता है। परन्तु यहाँ (पुरोडाश) की पूरी आहुति दे दी जाती है।
स्विष्टकृत् के लिए कुछ बचाया नहीं जाता। यह एक दोष है, इसलिए आहुति उलटी पड़ जाती
है ॥६॥
इसलिए कहते हैं, 'यह एक कपाल उलटा पड़ गया। यह राष्ट्र को बिगाड़ देगा।' परन्तु
इसमें कुछ दोष नहीं। आहुतियों की प्रतिष्ठा आहवनीय है। जब आहुति आहवनीय में पहुँच गई -