शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 285, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंका० २, अं० ४, ब्रा० ३, कं० २-१० शतपथब्राह्मण / २६७
याज्ञवल्क्य का भी कथन है कि प्रजापति की सन्तान देव और असुर बड़ाई के लिए लड़
पड़े। तब असुरों ने दोनों प्रकार की ओषधियों को, अर्थात् उनको भी जिनके सहारे मनुष्य रहते
हैं और उनको भी जिनके सहारे पशु रहते हैं, कुछ अपनी चालाकी से (कृत्यया) और कुछ विष
के द्वारा नष्ट कर दिया कि इस प्रकार हम देवों पर विजय पा लेंगे। इस पर न मनुष्य कुछ खा
सके और न पशु, और भोजन के अभाव में ये सब पराजित-से हो गये ॥२॥
अब देवों ने सुना कि बिना भोजन के यह सब प्रजा पराजित हो रही है। उन्होंने कहा,
'इस सब (विष आदि) को हटाना चाहिए।' 'कैसे?' 'यज्ञ के द्वारा।' देव जो कुछ करना चाहते
थे वह उन्होंने यज्ञ के द्वारा किया और ऋषियों ने भी ॥३॥
तब उन्होंने कहा, 'यह (यज्ञ) हममें से किसका होगा?' हर एक ने कहा, 'मेरा'-'मेरा'
और निश्चित न कर सके। निश्चय न कर सकने पर उन्होंने कहा, 'चलो बाजी बदकर दौड़ें।
हममें से जो जीत जायगा यह (यज्ञ) उसी का होगा।' 'अच्छा' कहकर वे दौड़े ॥४॥
इन्द्र और अग्नि जीत गये। इसलिए पुरोडाश के बारह कपाल इन्द्र और अग्नि के होते
हैं। क्योंकि इन्द्र और अग्नि ने अपना भाग जीत लिया और इन्द्र और अग्नि जीतने पर जहाँ खड़े
थे वहाँ सब देव भी चले गये ॥५॥
इन्द्र और अग्नि क्षत्रिय हैं, सब देव वैश्य। जहाँ क्षत्रिय जीतता है वहाँ वैश्यों को अवश्य.
भाग मिलता है। इसलिए देवों को भाग मिल गया, इसलिए चरु सब देवों (विश्वेदेवा) का होता
है॥६॥
कुछ लोगों का विचार है कि (चरु) पुराने (अन्न) का हो, क्योंकि इन्द्र और अग्नि
क्षत्रिय हैं इसलिए (विश्वेदेवों को भी यदि इन्द्र और अग्नि के समान नया अन्न दिया जायगा
तो) वैश्य क्षत्रियों के बराबर हो जाएँगे। परन्तु दोनों को नया ही होना चाहिए। केवल यह
पुरोडाश है और यह चरु है। इन दोनों के नये होने से ही क्षत्रियों के बराबर (वैश्य) नहीं हो
सकते। इसलिए दोनों (पुरोडाश और चरु) नये अन्न के ही हों ॥७॥
अब देवों ने कहा, 'यह रस वस्तुतः द्यावापृथिवी का है, इसलिए हम इनको यज्ञ में भाग
देवें।' इसलिए उन्होंने उन दोनों को भाग दिया अर्थात् एक कपाल का पुरोडाश द्यावापृथिवी को
दिया। इसलिए एक कपाल का पुरोडाश द्यावापृथिवी का होता है। अब चूंकि यह पृथिवी उस
(रस) का कपाल है और वह एक ही है, इसलिए (पुरोडाश भी) एक कपाल का होता है ॥८॥
(ऐसा करने में) उसका एक दोष (है)। चाहे किसी देवता को हवि दी जाय, पीछे से
एक भाग स्विष्टकृत् का होता है। परन्तु यहाँ (पुरोडाश) की पूरी आहुति दे दी जाती है।
स्विष्टकृत् के लिए कुछ बचाया नहीं जाता। यह एक दोष है, इसलिए आहुति उलटी पड़ जाती
है ॥६॥
इसलिए कहते हैं, 'यह एक कपाल उलटा पड़ गया। यह राष्ट्र को बिगाड़ देगा।' परन्तु
इसमें कुछ दोष नहीं। आहुतियों की प्रतिष्ठा आहवनीय है। जब आहुति आहवनीय में पहुँच गई -