शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
शतपथ ब्राह्मण
ओ३म्
श्री शुक्लयजुर्वेदीय
शतपथब्राह्मण
प्रथम भाग
माध्यन्दिनी शाखा
मूल संस्करण
डॉ० अल्बेर्त वेबेर
हिन्दी अनुवाद
पं० गंगाप्रसाद उपाध्याय
(रत्नदीपिका भाष्य)
सम्पादक
स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती
विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द
© सर्वाधिकार प्रकाशकाधीन
ISBN 81-7077-016-5 (Set)
ISBN 81-7077-017-3 (Volume I)
प्रकाशक : विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द
4408, नई सड़क, दिल्ली-110 006
दूरभाष : 23977216, 65360255
e-mail : [email protected]
Website : www.vedicbooks.com
वैदिक-ज्ञान-प्रकाश का गरिमापूर्ण 89वाँ वर्ष (1925-2014)
संस्करण : 2014
मूल्य : ₹ 1500.00 (तीनों भाग)
मुद्रक : अजय प्रिंटर्स, दिल्ली-110 032
भूमिका
भूमिका
वैदिक ऋचाओं के आर्विर्भाव के सहस्रों वर्षों के अनन्तर, ईश्वर, ईश्वरीय सृष्टि, ईश्वरीय
ज्ञान और ईश्वरीय व्यवस्था को समझने के लिए आर्यावर्त्त देश के आर्यमनीषियों ने वैदिक
वाङ्मय का सृजन आरम्भ किया। यह वाङ्मय आज भी हमारी परम्परा की अमूल्य धरोहर है।
सम्भवतया वैदिक वाङ्मय की ऐतिहासिक परम्परा में वेदांगों की रचना सबसे प्राचीन हो। मनुष्य
ने परम्परा से ऋचाओं का उच्चारण सीखा हो, और बाद में उसे इस बात का पता चला हो
कि वाक् और श्रोत्र के माध्यम से जिस ज्ञान का आदान-प्रदान हो रहा है, वह कुछ मूल ध्वनियों
की संहति है जो हमारे वाक्यन्त्र से स्थान-स्थान से, और विशेष प्रयत्नों से प्रसूत होती हैं। यह
पहला वेदांग रहा होगा, जिसका अत्यन्त प्राञ्जल रूप हमें पाणिनि की वेदांग "शिक्षा" में उप-
लब्ध है। महर्षि पाणिनि की यह रचना अपने विषय की न तो प्रथम रचना है, और न अन्तिम।
संसार में आज अनेक वर्णमालाएं हैं, जिनमें स्वरों और व्यञ्जनों के अनेकानेक भेदोपभेद हैं;
आज के "शिक्षा-शास्त्री" इनकी ध्वनियों का भी बड़ी सूक्ष्मता से अध्ययन कर रहे हैं। 'शिक्षा'
के बाद दूसरे वेदांग का नाम व्याकरण होना चाहिए, और फिर छन्द, क्योंकि ऋचाएँ छन्दोबद्ध
थीं। पाणिनि की जो व्याकरण मिलती है वह लौकिक संस्कृत के भी काम की है, और वैदिक के
भी काम की, और यही स्थिति पिंगल के छन्दशास्त्र की भी है। संसार के विभिन्न वाङ्मयों में
व्याकरण और छन्द की विविधता प्रत्येक युग के साथ परिवर्तित और विकसित होती रहेगी।
ज्योतिष और कल्प वेदांग भी इसी प्रकार विकासशील हैं। केवल एक वेदांग ऐसा है, जो केवल
वेद (चार संहिताओं) के लिए है—वह है यास्क का निघण्टु, और उस ग्रन्थ पर उनकी लिखी
टीका निरुक्त। शब्दार्थ समझने में नैरुक्तिक पद्धति के उपयोग का एकमात्र अधिकार हमें ऋग्वेद,
और अनुवर्ती वैदिक संहिताओं के क्षेत्र में है, जिनके शब्द आख्याताज, यौगिक और योगरूढ़ि हैं।
प्रत्येक तत्त्वज्ञान, दर्शन या विज्ञान की शब्दावली अपने-अपने अर्थों और अभिप्रायों में रूढ़ि हो
जाती है।
महर्षि दयानन्द के अनुसार आर्यावर्त्त में ब्रह्मा से जैमिनि-पर्यन्त जितना भी साहित्य रचा
गया, उसका केन्द्रबिन्दु वेद था। इस वेद को समझने-समझाने के लिए उपांग बने (छह दर्शन-
शास्त्र)। चार कोटि के उपवेदों का विकास हुआ, जिनकी कथावस्तु आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद
और अर्थवेद कहलाई, और वेद के अभिप्राय से ही प्रातिशाख्यों की रचना हुई। हमारे ब्राह्मण-
ग्रन्थ, गृह्यसूत्र, श्रौतसूत्र, आरण्यक और उपनिषदें भी इसी वेद के विस्तार से सम्बन्ध रखती हैं।
मनुष्य अपने भीतर एक विशेष मानसयन्त्र लेकर अवतरित हुआ था (अन्य पशुओं के मानस-तन्त्र
से, जिसमें उभयेन्द्रियों का तन्त्र भी सम्मिलित है, मनुष्य का मानस-तन्त्र सर्वथा भिन्न रहा है)।
जन्मजात कौतूहल, फिर कौतूहल से प्रेरित प्रश्न, और अन्त में प्रश्नों के समाधान का प्रयास, ये
तीन क्षमताएँ उसमें सदा रहीं। कौतूहल, प्रश्न (जिज्ञासा) और समाधान—इन तीनों प्रक्रियाओं
में उसने तीन विद्याओं को अपनाया—(क) स्वगत, (ख) समष्टिगत, और (ग) परम्परागत।
(१) अकेले में विचार, (२) वादों-प्रवचनों और गोष्ठियों में मिलजुलकर विचार, और (३) अन्त
( ६ )
में, यह आगे की पीढ़ियों को सौंपकर । कौतूहल, जिज्ञासा और समाधान की यह प्रक्रिया अतीत-
काल में आरम्भ हुई थी, और जबतक पृथिवी पर मनुष्य जीवित है, यह बनी रहेगी ।
इस त्रिविध पद्धति के फलस्वरूप मनुष्यों को प्रारम्भ में जो पुरुषार्थ-प्रेरक प्रेरणायें
मिलीं उनसे मानव-समाज का विकास हुआ और शनैः-शनैः उस समाज में उदात्तगुणों का प्रस्फुटन
हुआ । बाद में इसी त्रिविधता ने समाज में वैभव के साथ-साथ विलास, दुर्गुण, प्रमाद, आलस्य,
द्वेष, सत्तारूढ़िता, वैमनस्य आदि उत्पन्न किये । कर्म के स्थान पर कर्मकाण्ड आसीन हो गया, और
समाज शिथिल हो गया । हमारे समस्त ब्राह्मणग्रन्थ इसी युग की कृतियाँ हैं। वेद कर्म का प्रेरक
रहा, ब्राह्मण-ग्रन्थ कर्मकाण्ड के प्रेरक हो गए। किन्तु इस ब्राह्मण-वाङ्मय में समाज का वह समस्त
इतिहास भी छिपा हुआ है, जो कर्मकाण्ड से पूर्व समाज को प्राप्त हो गया था । दोनों युगों के इस
अन्तर को नहीं भूलना चाहिए—(१) वैदिक युग—कर्म और पुरुषार्थ का प्रेरक (उदात्तयुग)
(२) ब्राह्मण-युग—कर्मकाण्ड का प्रेरक—समाज के शैथिल्य का युग ।
ऐसा लगता है कि चारों वेदों ने (कृष्ण और शुक्ल यजुर्वेदों को अलग मानें, तो पाँचों
वेदों ने) हमारे समाज को पाँच भागों में बाँट दिया । ऋग्वेद के अभिप्राय से, अर्थात् ऋग्वेद की
ऋचाओं को लेकर जो कर्मकाण्ड किया जाने लगा, उसकी झाँकी ऐतरेय ब्राह्मण में मिलेगी ।
यजुर्वेद परम्परावालों का ब्राह्मणग्रन्थ शतपथब्राह्मण कहलाया, कृष्णयजुर्वेद (तैत्तिरीय संहिता)
वालों का तैत्तिरीय ब्राह्मण, सामवेदवालों का साम ब्राह्मण (ताण्ड्य ब्राह्मण) और अथर्ववेद से
सम्बन्ध रखनेवाला गोपथ ब्राह्मण ।
सायणाचार्य वैदिक वाङ्मय का सबसे बड़ा सम्पादक और भाष्यकार हुआ है । इसने
शुक्लयजुर्वेद पर तो भाष्य नहीं किया, किन्तु शतपथब्राह्मण (माध्यन्दिननीय) पर इसका भाष्य
उपलब्ध है । डॉ० अल्बर्ट वेबर (Albert Weber) ने जो शतपथब्राह्मण बड़े परिश्रम से सम्पा-
दित करके बर्लिन (जर्मनी) से मार्च १८४६ ई० में छापा था, उसमें उसने सायणाचार्य के
अतिरिक्त हरि स्वामी और द्विवेद गङ्ग के भाष्यों से भी कुछ अंश दिये थे। वाराणसी के प्रसिद्ध
संस्कृत-साहित्य-प्रकाशक और विक्रेता "चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस" ने १६६४ में वेबेर के
शतपथ ब्राह्मण का पुनर्मुद्रण किया ।
माध्यन्दिन शाखा के शतपथ ब्राह्मण के सम्पादन के लिए वेबेर को चेम्बर्स संग्रह
(Chambers Collection) से माध्यन्दिन शाखा के शतपथ ब्राह्मण की हस्तलिखित प्रति मिली
जो बर्लिन की रॉयल लाइब्रेरी में सुरक्षित थी। प्रशिया के राजा ने यह प्रति इस पुस्तकालय को
भेंट की थी । वेबेर ने अपने शतपथ ब्राह्मण का संस्करण हिज़ एक्सेलेन्सी शेवेलिए डॉ० सी० सी०-
जे० बुन्सन (The Chevalier Dr. C. C. J. Bunsen) को समर्पित किया है, जो स्वयं अपने
पाण्डित्य और नीति-कुशलता के लिए विख्यात था । डॉ० बुन्सन की कृपा से ही वेबेर को यह
पाण्डुलिपि सम्पादन के लिए मिल पायी थी । कई अन्य खण्डित प्रतिलिपियाँ भी चैम्बर्स संग्रह में
विद्यमान हैं, जिनसे डॉ० वेबेर ने सहायता ली । इन प्रतियों के अतिरिक्त एक और प्रति वेबेर
को सहायक हुई—रेवरेण्ड डॉ० मिल (Rev. Dr. Mill) की, जो ऑक्सफोर्ड की बॉडलियन
(Bodleian) पुस्तकालय में है। इस पाण्डुलिपि के काण्ड १-५, और काण्ड ७-१३ सम्वत्
१७०५-७ में श्री वृद्ध नगर के लिखे हुए हैं (पुरुषोत्तम के पुत्र दामोदर द्वारा) । इसपर ४० वर्ष
के बाद किसी व्यक्ति विद्याधर ने स्वरचिह्न लगाए थे ।
माध्यन्दिन शाखा के शतपथब्राह्मण में १४ काण्ड हैं, जिनका विवरण हम तालिका में
देते हैं—
(७)
माध्यन्दिन शतपथ
| काण्ड | काण्ड का नाम | प्रारम्भ के शब्द | अध्याय | प्रपाठक | ब्राह्मण | कण्डिका |
|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | हविर्यज्ञम् | व्रतमुपैष्य० | ६ | ७ | ३७ | ८३७ |
| २ | एकपादिका | स यद्वा ऽ इत० | ६ | ५ | २४ | ५४६ |
| ३ | अध्वरम् | देवयजनं० | ६ | ७ | ३७ | ८५६ |
| ४ | ग्रहनाम | प्राणो ह वा० | ६ | ५ | ३६ | ६४८ |
| ५ | सवम् | देवाश्च वा० | ५ | ४ | २५ | ४७१ |
| ६ | उषासम्भररणम् | असद् वा ऽ इदम० | ८ | ५ | २७ | ५३० |
| ७ | हस्तिघट् | गार्हपत्यं चेष्यन् | ५ | ४ | १२ | ३६८ |
| ८ | चितिः | प्राणभृत उपदधाति | ७ | ४ | २७ | ४३७ |
| ९ | संचितिः | अथातः शतरुद्रियम् | ५ | ४ | १५ | ४०२ |
| १० | अग्निरहस्यम् | अग्निरेष० | ६ | ४ | ३१ | ३६६ |
| ११ | अष्टाध्यायी | संवत्सरो वै यज्ञः | ८ | ४ | ४२ | ४३७ |
| १२ | मध्यमम्<br>(सौत्रामणी) | अयं वै यज्ञो० | ६ | ४ | २६ | ४५६ |
| १३ | अश्वमेधम् | ब्रह्मोदनं पचति | ८ | ४ | ४३ | ४३२ |
| १४ | बृहदारण्यकम् | देवा ह वै० | ६ | ७ | ५० | ७६६ |
| योग | १०० | ६८ | ४३८ | ७६२४ | ||
| इसी ब्राह्मण की एक काण्वशाखा का भी उल्लेख हैं, जिसमें १७ काण्ड हैं। इनके | ||||||
| विवरण की तालिका इस प्रकार है— |
काण्व शाखा
| काण्ड | काण्ड का नाम | प्रारम्भ के शब्द | अध्याय | ब्राह्मण | कण्डिका |
|---|---|---|---|---|---|
| १ | एकपात् काण्डम् | स वै सम्भारा० | ६ | २२ | ३७६ |
| २ | हविर्यज्ञ काण्डम् | सं वै व्रतमुपै० | ८ | ३२ | ५३२ |
| ३ | उद्धारि काण्डम् | २ | २२ | १२४ | |
| ४ | अध्वरम् | तद् वै देवयजन० | ६ | ३६ | ६४६ |
| ५ | ग्रहनाम | प्राणो ह वा० | ८ | ३८ | ६७४ |
| ६ | वाजपेय काण्डम् | देवाश्च ह | २ | ७ | ७०० |
| ७ | राजसूय काण्डम् | स वै पूर्णाहुति | ५ | १६ | २८६ |
| ८ | उषासम्हरणम् | असद् वा ऽ इद० | ८ | २७ | ५११ |
| ९ | हस्तिघट काण्डम् | अथातो नैऋती० | ५ | १६ | २५७ |
| १० | चिति | प्राणभृत उप० | ५ | २० | २४३ |
| ११ | साग्निचिति | नाकसद उप० | ७ | २० | ४३७ |
| १२ | अग्निरहस्यम् | अग्निरेष० | ६ | २८ | २८६ |
| १३ | अष्टाध्यायी | — | ८ | ३१ | २४१ |
| १४ | मध्यमम् | अयं वै यज्ञो | ६ | २८ | ३६२ |
| १५ | अश्वमेध काण्डम् | ब्रह्मोदनं० | ८ | ४४ | ३०८ |
| १६ | प्रवर्ग्य काण्डम् | अथास्मं श्मशा० | २ | ८ | १६२ |
| १७ | बृहदारण्यकम् | उषा वा ऽ अश्व० | ६ | ४७ | २६५ |
| योग | १०४ | ४४५ | ६७७६ |
शतपथ ब्राह्मण र स्वरचिह्न
( ८ )
शतपथ ब्राह्मण और स्वरचिह्न
वेद-संहिताओं में स्वरचिह्न लगाने की परिपाटी अतीत काल से चली आ रही है। वैदिक
स्वर साधारणतया उदात्त, अनुदात्त और स्वरित कहलाते हैं, जिनका विवरण महर्षि दयानन्द ने
सौवर प्रकरण में दिया है।
हमारी समस्त वर्णमाला दो वर्गों में विभक्त हैं—स्वर और व्यञ्जन। इस प्रकरण से
स्वयं राजन्त इति स्वरा:—अर्थात् जिनके प्रकाशमान होने में किसी की सहायता की अपेक्षा न
हो वह स्वर है। ये स्वर स्वयं प्रकाशमान हैं, अर्थात् बोले जा सकते हैं, सुने जा सकते हैं। अ, इ,
उ, ऋ, लृ, ए, ऐ, ओ और औ (और इनमें से प्रथम पांच के दीर्घ आ, ई, ऊ, ॠ, ॡ)—ये स्वर हैं।
अष्टाध्यायी के प्रारम्भ के माहेश्वर सूत्रों में वैदिक वाङ्मय की समस्त वर्णमाला (स्वर और
व्यंजन) परिगणित की गई है।
वर्णमाला के स्वरों से अलग दो वर्गों के १४ स्वरों का और उल्लेख किया जाता है—
प्रथम वर्ग—उदात्त, अनुदात्त और स्वरित-भेद से सात स्वर—(१) उदात्त, (२)
उदात्ततर, (३) अनुदात्त, (४) अनुदात्ततर, (५) स्वरित, (६) स्वरिते यः उदात्तः (स्वरित में
जो उदात्त हो) और (७) एकश्रुति ।
द्वितीय वर्ग—षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद (सरेगमपधनि)
यः सामगानां प्रथमः स वेणोर्मध्यमः स्वरः ।
यो द्वितीय सः गान्धारस्तृतीयस्त्वृषभः स्मृतः ॥
चतुर्थ षड्ज इत्याहुः पञ्चमो धैवतो भवेत् ।
षष्ठ निषादो विज्ञेयः सप्तमः पञ्चमः स्मृतः ॥
अर्थात् वीणा के स्वरों में, और सामगान में निम्न सम्बन्ध है—
सामगान वीणा
प्रथम मध्यम (म)
द्वितीय गान्धार (ग)
तृतीय ऋषभ (रे)
चतुर्थ षड्ज (स)
पञ्चम धैवत (ध)
षष्ठ निषाद (नि)
सप्तम पञ्चम (प)
एक और भेद से स्वर तीन भागों में विभाजित हैं—मन्द (bass), मध्य (medium),
और तार (high) । इसी प्रकार त्रिधा गानविद्या में द्रुत (fast), मध्यम (medium) और
विलम्बित (slow) पाठ या उच्चारण होता है। ऋषि दयानन्द का कहना है कि ऋग्वेद के
स्वरों का उच्चारण द्रुत अर्थात् शीघ्रवृत्ति में होता है, यजुर्वेद के स्वरों का उच्चारण मध्यमवृत्ति
में और सामवेद के स्वरों का उच्चारण विलम्बित में। तीनों का उच्चारण-काल १:२:३ अनुपात
में है (ऋग् की द्रुतगति से दुगुना समय यजुर्वेद के पाठ में, और तिगुना समय सामवेद के पाठ
में)।
शतपथ ब्राह्मण के वाक्य गद्य श्रेणी के हैं। इनमें स्वरों का लगाना कोई आवश्यक बात
नहीं है। डॉ० वेबेर को बॉडलिअन लाइब्रेरी से जो पाण्डुलिपि मिली, उसका मूल लिपिकार
( ६ )
दामोदर था (१७०५ वि०)। इसी लिपि पर ४० वर्ष बाद विद्याधर नामक दूसरे व्यक्ति ने स्वर-
चिह्न लगाये थे (१७४८ वि० के लगभग)।
शतपथ ब्राह्मण के स्वरचिह्नों के सम्बन्ध में डॉ० वेबेर का कथन है—शतपथ ब्राह्मण
की पुरानी पाण्डुलिपियों में एक ही स्वरचिह्न मिलता है—पंक्ति के नीचे 'पड़ी' (horizontal)
रेखा (—)। शतपथ में इस रेखा द्वारा उदात्त और स्वरित दोनों स्वरों को व्यक्त किया जाता
है (ऋग्वेद और यजुर्वेद में पंक्ति के नीचे की यह 'पड़ी' रेखा अनुदात्त का सूचक होती है)। उदात्त
का सूचक जब यह रेखा (—) होती है, तो इसे तत्सम्बन्धी वर्णस्वर के नीचे ही लगाया जाता है,
पर जब यह स्वरित होती है, तो इसे पहले के (बगलवाले) वर्णस्वर के नीचे लगाते हैं।
उदात्त का उदाहरण—नृ॒षदम् (ष उदात्त है)
स्वरित का उदाहरण—वी॒र्यम् (य स्वरित है)
उदात्त और स्वरित चिह्नों में अन्तर व्यक्त करने के लिए डॉ० वेबर ने स्वरितसूचक 'पड़ी', रेखा को
एक जगह दो पड़ी रेखाओं (=) से व्यक्त किया है। यह युग्म स्वरित स्वर के वाम पार्श्व के वर्ण-
स्वर में लगाया जाता है—वी॒॒र्यम्।
उदात्त के सम्बन्ध में निम्न नियम स्मरण रखने चाहिएँ—
१. अकारादि स्वरों से युक्त वर्ण ही उदात्त, अनुदात्त या स्वरित होते हैं—हलन्त व्यंजन
न उदात्त होंगे, न अनुदात्त, न स्वरित।
२. किसी भी एक पद में एक से अधिक उदात्त नहीं हो सकता। यह तो हो सकता है कि
किसी पद में कोई भी उदात्त न हो।
३ एक पद में अनुदात्त कई हो सकते हैं—हो सकता है कि सभी स्वरान्त-वर्ण अनुदात्त
हों। इसी प्रकार एक पद में एक से अधिक स्वरित भी हो सकते हैं। शतपथ ब्राह्मण में अनुदात्त
व्यक्त करने के लिए कोई चिह्न नहीं है। हमने अपने शतपथब्राह्मण में समस्त पाठ वेबेर का लिया
है, और इसलिए इस ग्रन्थ के स्वरचिह्न उदात्त (—), और स्वरित (=) वे ही हैं जिनका उपयोग
डॉ० वेबेर ने किया है।
स्वर-संकेत का एक उदाहरण यहाँ दिया जाता है—
१. अग्ने॑ने॒वृ जुहुयात्। सजू॒र्देवे॒न सवि॒त्रेति।
तत्सवितृ॒मुत्प्रस॒वाय सजू रा॒त्रेन्द्रे व॒ण्येति तद्रा॒त्र्या मिथुनं करोति।
—(शत० २।३।१।३७)
इसमें जिन-जिन स्वर-वर्णों के नीचे 'पड़ी' लकीरें '(-)' खिंची हैं वे सब उदात्त-स्वर-
सूचक हैं।
२. य॒ त्नै॒॒ याग्निहोत्रस्य देवताग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहेति तन्न॒॒ नाग्नये स्वाहा।
—(शत० २।३।१।३६)
इस उदाहरण में त्नै और न्न के नीचे रेखा-युग्म (=) है। इसका अर्थ यह है कि इनके अगले
अक्षर "या" से लेकर 'ता' तक स्वरित या एकश्रुति (या प्रचय) हैं, अर्थात् बराबर एक ही स्वर
चल रहा है।
डॉ० वेबेर ने अपनी भूमिका में स्पष्ट इंगित कर दिया है कि यदि अगले वर्ण पर स्वर-
चिह्न लगा हो तो उससे पूर्व के उदात्त पर स्वर-चिह्न लगाना अनावश्यक हो जाता है। [Be-
fore a following accented syllable, the preceding udatta loses its denota-
tion.]
उपाध्यायजीको हिन्दी अनुवाद
(१०)
(क) केतपूःकेतम्, इसमें के॒ के नीचे स्वर-चिह्न है, अतः पूः के नीचे लगा उदात्त-चिह्न
बेकार है, अतः इसे केतपूःकेतम् ही लिखेंगे (पूः के नीचे का स्वर-चिह्न निकाल
देंगे।)
(ख) 'महो ये॒ धूनम्' को ऐसा न लिखकर 'महो ये धूनम्' लिखेंगे (ये॒ के नीचे का चिह्न
बेकार है।)
(ग) 'प॒र्णं न॒ वे॒रनु' को ऐसा न लिखकर 'पर्णं न वेरनु' लिखेंगे—र् के पहले के सभी
उदात्त बेकार हो गए—र्णं, न॒, वे॒,—इनके नीचे लगे उदात्त-चिह्न बेकार हो गए।
जिन पाठकों को स्वर-विषयक गम्भीरता से विचार करना हो, वे डॉ० वेबेर के अंग्रेजी
Preface को पढ़ें।
उपाध्यायजी का हिन्दी अनुवाद
प्रयाग के श्री पं० गंगाप्रसादजी उपाध्याय ने अपनी वृद्धावस्था में ऐतरेय ब्राह्मण और
शतपथ ब्राह्मण के हिन्दी-अनुवाद किये। ऐतरेय ब्राह्मण के हिन्दी-अनुवाद का प्रकाशन (बिना मूल
संस्कृत के) 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग' ने प्रकाशित किया था। प्रयाग के ही अथर्ववेद-भाष्य-
कार पं० क्षेमकरणदास त्रिवेदी ने गोपथ ब्राह्मण का मूल और हिन्दी अनुवाद बड़े परिश्रम से
सम्पादित और प्रकाशित किया। दिल्ली के स्व० पं० रामस्वरूप शर्मा के प्रयास से उपाध्यायजी
का शतपथ ब्राह्मण तीन खण्डों में १६६७, १६६६ और १६७० ई० में प्रकाशित हुआ था। बहुत
दिनों से यह अनुवाद अनुपलब्ध था। मूल शतपथ ब्राह्मण का पाठ वैदिक यन्त्रालय, अजमेर के एक
संस्करण से लिया गया था, किन्तु मुद्रण की कठिनाई होने के कारण उसमें स्वर-चिह्न न दिये जा
सके। शतपथ ब्राह्मण का एक पाठ काशी से अच्युत ग्रन्थमाला ने भी प्रकाशित किया था (१६६४
वि०) दो जिल्दों में—श्री चन्द्रधर शर्मा द्वारा सम्पादित, एशियाटिक सोसायटी ऑव् बंगाल,
कलकत्ता से शतपथ ब्राह्मण और उस पर सायणाचार्य की टीका या भाष्य प्रकाशित हुए। खेमराज
कृष्णदास यन्त्रालय, बम्बई से भी सायनानुवाद छपा। अंग्रेजी में जूलियस ऐगर्लिंग (Julius
Eggeling) का शतपथ ब्राह्मण का पूर्ण अनुवाद विस्तृत टिप्पणियों और भूमिकाओं सहित
१८८२-८५ में सेक्रेड बुक्स ऑव् द ईस्ट सीरीज (Sacred Books of the East Series—
Max Muller) में प्रकाशित हुआ था, जिसका पुनर्मुद्रण मोतीलाल बनारसीदास (दिल्ली-
वाराणसी) नामक विख्यात प्रकाशक ने कर दिया है।
शतपथ ब्राह्मण मुख्यतया कर्मकाण्ड का ग्रन्थ है। ऋषि दयानन्द ने इस ग्रन्थ का प्रमाणत्व
उतना ही स्वीकार किया है, जितना वेदार्थ में सहायक है। शतपथ ब्राह्मण की ही तरह कात्यायन
श्रौतसूत्र का भी यजुर्वेदी कर्मकाण्ड से गहरा सम्बन्ध है। उवट और महीधर दोनों आचार्यों ने
यजुर्वेद के भाष्य में इन दोनों को आधार माना है। ये आचार्य जब शतपथ के सन्दर्भों का उल्लेख
करते हैं, तो उसे "इति श्रुतेः" कहते हैं, और साधारणतया कात्यायन श्रौतसूत्र का प्रामाण्य सभी
प्रकार स्वीकार करते हैं। शतपथ का आधार धीरे-धीरे उनके भाष्यों में कम होता जाता है।
(यजुर्वेद के १३-१४ अध्यायों के बाद शतपथ का प्रयोग बहुत कम है। कात्यायन श्रौतसूत्र और
पाणिनि की अष्टाध्यायी का आधार महीधर ने अपने भाष्य में यजुर्वेद के अन्तिम अध्यायों तक
लिया है।) साधारणतया शतपथ ब्राह्मण याज्ञवल्क्य की रचना समझी जाती है, पर ऐसा लगता
है कि शाण्डिल्य भी उसका मुख्य सहयोगी था : काण्ड ७, ८ और १० तो शायद उसी की रचना
हैं—इन काण्डों में याज्ञवल्क्य का नाम तक नहीं आया।
( ११ )
श्री उपाध्यायजी ने शतपथ ग्रन्थ का अनुवाद-मात्र किया है, न कि उसका भाष्य । शतपथ-
ब्राह्मण के समय से पूर्व कर्म (कर्मप्रेरक यज्ञ) का युग समाप्त हो गया था, और उसका स्थान
कर्मकाण्ड ने ले लिया था—स्वामी दयानन्द “कर्मकाण्ड के पोषक नहीं” वे “कर्म” के पोषक थे ।
कात्यायन श्रौतसूत्र तो निम्नतम कर्मकाण्ड का पोषक बना, अतः महीधर के समान विद्वान् आचार्यों
ने इससे प्रेरणा ली । ऋषि दयानन्द ने अपने यजुर्वेद-भाष्य में शतपथ के कर्मकाण्ड को कोई महत्त्व
नहीं दिया । स्पष्ट है कि ये ब्राह्मणग्रन्थ हमारी दार्शनिक आस्थाओं और मान्यताओं के ग्रन्थ नहीं
हैं । सभी विद्वान् पाठक अपनी रुचियों और मान्यताओं के आधार पर उपाध्यायजी के इस अनुवाद
से लाभ उठा पायेंगे । यह अनुवाद किसी आस्था के परिप्रेक्ष्य में नहीं किया गया है, यही इसकी
विशेषता है । निश्चय है कि यह ग्रन्थ हमारे उस युग का ग्रन्थ है, जब समाज का विकास शिथिल
हो गया था, और उस अधोगति के समय कर्मकाण्ड को प्रश्रय प्रचुरता से मिलने लगा था ।
हमें प्रसन्नता है कि उपाध्यायजी का यह शतपथ-अनुवाद डॉ० वेबेर के स्वरांकित
शतपथ-संस्करण के साथ प्रकाशित किया जा रहा है। इस हिन्दी-टीका का नाम “रत्नकुमारी-
दीपिका” रहा है। डॉ० रत्नकुमारीजी उपाध्यायजी की ज्येष्ठ पुत्रवधू थीं। “डॉ० रत्नकुमारी
प्रकाशन योजना” के अन्तर्गत शतपथ ब्राह्मण के इस अनुवाद का प्रथम संस्करण १९६७-७० में
दिल्ली से निकला था । यह दूसरा संस्करण दिल्ली के यशस्वी प्रकाशक गोविन्दराम हासानन्द
के सौजन्य से प्रकाशित किया जा रहा है। आयोजन के लिए हम इस प्रकाशन-संस्थान के वर्तमान
अध्यक्ष श्री विजयकुमार जी और उनके परिवार के अनुगृहीत हैं ।
शतपथ ब्राह्मण और उसके अनुवाद के सम्बन्ध में कतिपय भ्रान्तियाँ हैं। बहुत-से स्थल
ब्राह्मणग्रन्थ में ऐसे हैं, जिनमें पशुबलि की गन्ध मिलती है, अथवा जिनमें मांस खाने का भ्रम
होता है। कर्मकाण्ड के ग्रन्थों में यथार्थता का निश्चय करना सरल नहीं है। जिस प्रकार हत्या या
बलि के दृश्य नाटक की स्टेज पर नहीं दिखाये जाते, केवल संकेत मात्र से काम निकाल लिया जाता
है, ऐसा ही इन यज्ञों में भी सम्भवतया होता था । पशु-यज्ञ बहुधा सृष्टि-रचना की नाटिका थे ।
सूर्य और बादल के युद्ध थे । इस नाटिका में प्रतीक से काम चला लिया जाता था; यह चित्रण भी
ब्राह्मण-ग्रन्थों में मिलेगा । बहुत-से स्थल प्रक्षिप्त भी हो सकते हैं । भारत के इतिहास में एक समय
ऐसा भी रहा जब वेदों के नाम पर पशु-बलि निःसन्देह होने लगी थी । महात्मा बुद्ध को इसीलिए
वैदिक साहित्य से ग्लानि हुई । ऐसे पतनकाल के समय में हमारा समस्त आर्ष साहित्य प्रक्षेपों से
विकृत कर दिया गया ।
प्रस्तुत शतपथ ब्राह्मण प्राचीन ग्रन्थ का अनुवाद-मात्र हैं। पाठकों से आग्रह हैं कि किस
बात को सिद्धान्त के अनुकूल मानें, और किसको प्रतिकूल, इसका स्वयं निर्णय करें । हिन्दी अनु-
वादक का कर्त्तव्य केवल इतना है कि मूलग्रन्थ का सच्चा-सच्चा अनुवाद प्रस्तुत कर दे । अनुवादक
अपना अनुवाद अपनी आस्था के आधार पर नहीं करता । निस्सन्देह वेद, दयानन्द और आर्य-
समाज में एवं आर्ष साहित्य में निष्ठा रखनेवाला व्यक्ति न तो पशु-बलि को मानता है, न मांस-
भोजन को और न किसी अनैतिकता को । श्री उपाध्यायजी के इस अनुवाद को इसी भावना से
देखना चाहिए ।
नई दिल्ली —स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती
६ अप्रैल १९८८
Preface
THIS edition of the Brâhmanas of the white Yajurveda is destined only to com-
prehend the text. An introductory essay, a glossary, a partial translation and
deeper researches into all the materials, treasured up here and in the sûtras of
Kâtyâyana, shall follow in a separate work on the Yajur-Vedic ceremonies.
Therefore I shall here content myself with enumerating the critical apparatus,
exstant in Europe, and giving a short explanation of the accents. —
A. I Manuscripts of the text of the Çatapatha Brâhmaṇa: a. in the Mâ-
dhyandina-Çâkhâ: —
There is exstant a very great number of old as well as recent copies of it:
Those, which chiefly (with the exception only of the first book and part of the
thirteenth) furnished the text for this edition, exist in the Chambers-Collection
and I take this opportunity to congratulate the Royal Library of Berlin upon this
splendid donation made to it by the present King of Prussia through the care of
the Chevalier Bunsen. Next to these manuscripts in value stands the copy (= M)
of the Rev. Dr. Mill, now added to the Bodleian library, the greater part of
which, viz. the books I-V and VII-XIII is written Samvat 1705-7 in çrîvṛid-
dhanagara by Dâmodara son of Purushottama and accented forty years after
by Vidyâdhara. I shall now proceed to notice the single books with their re-
spective manuscripts. () —
I. Haviryaɟna: begins व्रतमुपैष्यन्नन्तरेणाहवनीयम् (7 prapâthaka, 9 adhyâ-
ya, 37 brâhmaṇa, 837 kaṇḍikâ). M foll 117. — Bodlei. Wils. 363 (= B.).
Samvat 1709. foll. 152 (ten leaves are wanting from 8, 2, 10 - 9, 1, 12 incl.).
nr. 368 (= C.) S. 1654. foll. 123. nr. 67. nr. 71. — E. I. H. 2143 (= I.). —
Paris Bibl. Nationale D 161. —
() All the copies are accented with the exception of Bodlei. Wils. 67 (1-3). 63 (4-8). 62 (9-14).
71 (1-3. 7. 13 twice). 70 (6. 14. 4. 11. 9. 12. 8. 5). .E. I. H. 2143 (1-7). 309 (8-14). 1277 (2. 3). and
partly of Chamb. No. 39 (10 twice. 2-5. 7-9. written in Benares S. 1851. Çâke 1716 krodhananâma-
samvatsare). These copies are recently written and very incorrect.
PREFACE. १३
II. Ekapádiká begins स यद्वाऽइतश्चेतश्च (5 prap. 6 adhy. 24 bráhm. 549
kaṇḍ.) Chamb. 3 written S. 1681 in Kâcî by Gangârâmamicra. foll. 116. nr. 39.
— M. foll. 84. — Bodl. Wils. 366 foll. 62. nr. 67. nr. 71. — E. I. H. 2143. nr.
1277 nr. 58J. foll. 27. — Paris D 147. —
III. Adhvara begins देवयजनं जोषयन्ते (7 prap. 9 adhy. 37 bráhm. 859
kaṇḍ.) Chamb 1. foll. 181 written by the same scribe as nr. 3. - nr. 39. — M.
foll. 125. — Bodl. Wils. 359 S. 1585 foll. 116. nr. 383. S. 1688. foll. 333. nr.
67. nr. 71. — E. I. H. 1277. 2143. —
IV. Graha begins प्राणो ह वाऽअस्योपांशुः (5 prap. 6 adhy. 39 br. 649
k.) Chamb. 5. foll. 240. S. 1689. Çâke 1554. angirânâmasamvatsare written in
Benares âbhirajnâtiyarânâranganâthasutanâmâjikena. nr. 39. — M. foll. 90 accen-
ted S. 1745 by Someçvara. — Bodl. W. 365. nr. 63. nr. 70. — E. I. H. 2143.
— Paris D 162. —
V. Sava begins देवाश्च वाऽअसुराश्च (4 pr. 5 adhy. 25 br. 471 k.) Chamb.
6. foll. 109. S. 1683. written by the same scribe as nr. 1 and 3. nr. 16. foll. 89.
S. 1648. nr. 21. foll. 59. S. 1572. nr. 39 (till to ३. १. ९.). — M foll. 68. accented
S. 1713 by Laghunâtha. — Bodl. W. 452. foll. 113. S. 1610. nr. 63. nr. 70. —
E. I. H. 2143. — Paris D. 144. —
VI. Ùshasambháraṇa begins असद्वाऽइदमग्रऽआसीत् (5 pr. 8 adhy. 27 br
540 k.) Chamb. 7. foll. 170. nr. 17. foll. 108. S. 1545. Câke 1461 written çrî-
mat hansapurapattane revâçrinarmadâyâ daxine tate on the order of Modhajnâtîya
Bhattakeçava. nr. 19. foll. 60. — M foll. 139 written S. 1628 and accented by
Mahâdeva. — Bodl. W. 454. foll. 165. S. 1610. nr. 457. S. 1688. foll. 211. nr.
63. nr. 70. — E. I. H. 2143. — Paris D. 148. 173. —
VII. Hastishat náma káṇḍam () begins गार्हपत्यं चेष्यन् (4 pr. 5 adhy. 12
br. 398 k.) Chamb. 9. foll. 115. nr. 39. — M. foll. 60. — Bodl. W. 462. foll.
114. S. 1571. nr. 63. nr. 71. — E. I. H. 268. 2143. — Paris D. 196. —
VIII. Citi begins प्राणभृत उपदधाति (4 pr. 7 adhy. 27 br. 437 k.) Chamb.
nr. 20. foll. 86. S. 1739. nr. 39. — M. foll. 72. — Bodl. W. 363. foll. 96. nr.
63. nr. 70. — E. I. H. 268. 309. — Paris D. 195. —
IX. Samciti begins अथातः शतरुद्रियम् (4 pr. 5 adhy. 15 br. 401 k.) Chamb
() The name of this kâṇḍa is rather questionable: the one above mentioned is taken from M. as the
best authority. The other manuscripts in the Mâdhyandina as well as the Kânva Câkhâ call it Hasti-
ghata. Is hastin = one? hastishat = seven? See A. W. v. Schlegel Réflexions sur l'étude des langues
asiatiques p. 197-199.
१४ PREFACE
14. foll. 103. S. 1586. nr. 18. foil. 61. S. 1671. nr. 39. — M. foll. 66. — Bodl.
W. 363, 3. foll. 75. S. 1692. nr. 389. nr. 62. nr. 70. — E. I. H. 309. —
X. Agnirahasya begins अग्निर्वाऽएष पुरस्ताच्चीयते (4 pr. 6 adhy. 31 br.
369 k.) Chamb. 11. foll. 60. S. 1485 (A. D. 1428). nr. 39. twice. — M. foll.
58. accented S. 1715. by Krishnaputra Prabhûjika (?). — Bodl. W. 461. foll. 99.
S. 1655. nr. 62. — E. I. H. 309. —
XI. Ashṭâdhyâyî begins सवत्सरो वै यज्ञः (4 pr. 8 adhy. 42 br. 437 k.)
Chamb. 12. foll. 116. — M. foll. 59. — Bodl. W. 369, 1. S. 1645. foll. 86. nr.
62. nr. 70. — E. I. H. 309. — Paris D. 146. —
XII. Madhyama begins अयं वै यज्ञो योऽयं पवते (4 pr. 9 adhy. 29 br.
459 k.) Chamb. 13. foll. 69. — M. foll. 62. — Bodl. W. 62. nr. 70. — E. I. H.
309. — Paris D. 159. —
XIII. Açvamedha begins ब्रह्मौदनं पचति (4 pr. 8 adhy. 43 br. 430 k.)
Chamb. 22. foll. 7. a fragment beginning from 8, 1, 1. — M. foll. 60. — Bodl.
W. 365 (= B.). foll. 78. S. 1691. nr. 453 (= C.). foll. 81. S. 1808. nr. 62. nr.
71. — E. I. H. 268. 309. — Paris D. 160. —
XIV. Âraṇyakam begins देवा ह वै सत्रं निषेदुः (7 pr. 9 adhy. 50 br.
796 k.) Chamb. 15. foll. 173. S. 1583. — M. foll. 167. written by Pîtâmbara in
Benares. — E. I. H. 309. —
Detached from this kâṇḍa is the Vṛihad-Âraṇyakam, beginning with the
thirth prapâthaka: द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च. Bodl. W. 365. foll. 75. un-
accented. nr. 62. nr. 70. — E. I. H. 309. 1471. — Paris D. 163. 59g. —
b. in the Kâṇva-Çâkhâ. — Not having yet discovered a complete and
correct copy of this Çâkhâ — three books are still wanting and some of the ma-
nuscripts of the other 14 books are rather incorrect — I could not venture to
give in my edition also the text of this Çâkhâ, especially as its differences from
the Mâdhyandina-Çâkhâ are so very numerous and important, you may look at
»the readings of almost every passage«, as well at the single words and their or-
thography or even accentuation as at the whole kaṇḍikâs and their number or
distribution. The best copy extant in Europe is in the collection of the Rev. Dr.
Mill, now deposited in the Bodleian library: it contains eleven kâṇḍas written
and accented by three different scribes (I. withont any date by the one: IV. V.
XIV. foll. 1-23a. Samvat 1651 by an other: II. VI. VII. X. XII. XIV. from
foll 23, b-48. XV. XVII. Samvat 1875 by the thirth). Other copies are extant
only (with the exception of the kâṇḍas I. and XVII.) in Paris: Bibl. Nat. D. 167.
PREFACE. १५
172. 180-187 (= P.), which I am sorry to say I could not for want of time suf-
ficiently examine. From a list written on the reverse of the first leaf of the fourth
book and of the 48ᵗʰ leaf of the fourteenth in M. I take the names and the num-
ber of verses of the different kâṇḍas. —
I. Ekapâdikâ begins स वै सम्भारात्सम्भरति (6 adhy. 22 brâhm. 367 kaṇ-
ḍikâs). M. foll. 100. — E. I. H. 1560. see Colebrooke miscell. ess. I, 60 not. —
P. 180. —
II. Haviryaǰna begins सं वै व्रतमुपैष्यन् (8 adhy. 32 br. 572 k.) M. foll.
59. — P. 181. —
III. Uddhâri (124 k.) is wanting. —
IV. Adhvara begins तद्दि देवयजनमीक्षेत (628 k.) M. foll. 49. contains
only the prathana aṅga in 4 adhy. 16 br. 272 k. — P. 184 b. —
V. Graha begins प्राणो ह वाऽअस्योपांशुः (8 adhy. 38 br. 475 k.) M.
foll. 82. — P. 183. —
VI. Vâǰapeya begins देवाश्च ह वाऽअसुराश्चोभये (2 adhy. 6 br. 100 k.)
M. foll. 12. — P. 185 a. —
VII. Râjasûya begins स वै पूर्णाहुतिं जुहोति (5 adhy. 19 br. 288 k.) M.
foll. 28. — P. 185 b. —
VIII. Ushasambhâraṇa begins असदद्वाऽइदमग्रऽआसीत् (8 adhy. 27 br.
525 k. [509 in the list]) P. 167. the first 82 leaves are written by the same scribe
as P. 168 and 169., foll. 83-85 are dated S. 1806. —
IX. Hastiaghaṭa (see Wilson Sanskrit dictionary: घट an elephants frontal
sinus) begins अथातो नैऋतीर्हरति (5 adhy. 16 br. 261 k. [257 the list]) P. 168.
S. 1649. foll. 51 (= A.). nr. 172 (= B.) most likely a copy of the preceding,
written S. 1852. Çâke 1717. foll. 46. —
X. Citi begins प्राणभृत उपदधाति (5 adhy. 20 br. 241 k) M. foll. 25. —
P. 186 a. —
XI. Samciti begins नाकसद उपदधाति (7 adhy. 20 br. 441 k.) P. 169. S.
1651. nr. 171 a copy thereof. —
XII. Agnirahasya begins अग्निरेष पुरस्ताच्चीयते (6 adhy. 28 br. 286 k.)
M. foll. 39. — P. 186 b. —
XIII. Ashṭâdhyâyî (252 k.) is wanting. —
XIV. Madhyama begins अयं वै यज्ञो योऽयं पवते (8 adhy. 29 br. 382 k.)
M. foll. 48. — P. 187 a. —
१६ PREFACE.
XV. Açvamedha begins ब्रह्मोदनं पचति (7 adhy. 40 br. 308 k.) M. foll.
29. — P. 187b. —
XVI. Pravargya begins (?) अथास्मै श्मशानं कुर्वन्ति (180 k.) is wanting. —
XVII. Upanishad begins उषा वाऽश्वस्य मेध्यस्य (6 adhy. 47 br. 446 k.)
M. foll. 53. — Bodl. W. 369. foll. 73. a recent copy. nr. 485 a. a fragment. —
P. 182. — Chamb. 122 twice. 1., foll. 99. S. 1840. 2., foll. 85. nr. 395 frag-
ments. — Edited by Poley 1844 Bonn. —
II. Manuscripts of the commentaries on the Çatapatha-Brâhmaņa. —
- Sâyaṇâcârya's Mâdhavîya Vedârthaprakâça: when quoted in the
commentaries on the Kâtyâyanasûtra — and this happens very rarely —, this
commentary is quoted by इति माधवः. The copies thereof, extant in the E. I.
H. and in the Wilson-Collection of the Bodleian library, are very modern, in-
correct and defective: and as all of them, with the only exception of E. I. H.
613, partake of the same blunders and interruptions, they have most likely been
copied from the same manuscript: they contain the explanation of only eight
books, viz: kâṇḍa I as far as the end of the third brâhmaṇa in the seventh adhyâ-
ya. E. I. H. 657 (A.) foll. 67. nr. 1509 (B.) foll. 123. Bodl. Wils. 2 (C.) foll. - — kâṇḍa II E. I. H. 657. foll. 64. — kâṇḍa III ibid. (A.) foll. 69. Bodl.
W. 3 (B.) foll. 129. — kâṇḍa V E. I. H. 657 (A.) foll. 66. Bodl. W. 3 (B.) foll. - — kâṇḍa VII E. I. H. 149 (A.) foll. 66. Bodl. W. 4 (B.) foll. 65. — kâṇḍa
IX in the same numbers A. foll. 44. B. foll. 58. — kâṇḍa X E. I. H. 149 (A.).
most defective fragments. foll. 39. nr. 613 (B.). S. 1610. foll. 185. — kâṇḍa XI
E. I. H. 1071 (A.) foll. 67. Bodl. W. 4 (B.). foll. 104. — - Âcârya-Harisvâminaḥ kṛitau Çatapathabhâshyam: quoted throughout
the commentaries on Kâtyâyana by: इति हरिस्वामिनः. The copies of this com-
mentary are even more defective and incorrect then those of the Mâdhavîyabhâ-
shya: they are bound together with these and written by the same scribes ():
they contain the explanation of only three kâṇḍas, viz: of kâṇḍa II. Bodl. W.
() There are four scribes of the three copies 149. 657. 1071 of the E. I. H. kâṇḍa I and k. II as
far as fol. 16 have been written by the one, kâṇḍa II from fol. 17 and the kâṇḍas III. VII. IX. XI by
another, the kâṇḍas V. VIII. X. XIII as far as fol. 19 by a third, and kâṇḍa XIII foll. 20-24. by a
fourth. — Three scribes are to be discerned in the three copies 2-4 of the Bodl. Wils. Coll. The
kâṇḍas I. VII. IX have been copied by the one, the kâṇḍas II. V by another, the kâṇḍas III. XI by a
third. —
PREFACE. १७
2. foll. 54. — kâṇḍa VIII E. I. H. 657. foll. 36. — kâṇḍa XIII E. I. H. 149.
foll. 24; and partly of a fourth, viz: of the first kâṇḍa from the fourth brâh-
maṇa of the seventh adhyâya (where the common copy of the Mâdhavîyabhâ-
shya failed) as far as the end (in B. only as far as VIII, 3, 14), occupying 12 leaves
in A. nine in B. and sixteen in C, —
3. Dvivedaçrînârâyaṇasûnu Dviveda Gaṅga's commentary of the Mâdhyan-
dina Âraṇyaka: a very excellent copy (= M.) in the collection of the Rev. Dr.
Mill, since added to the Bodleian library: foll. 322. —
There are extant in Europe several copies of commentaries on the Vṛihad-
Araṇyaka in the Kâṇvaçâkhâ, but as they have been already published by Dr.
Roer in the Bibliotheca Indica nro. 6. Calcutta 1848, I do not think it necessary
to notice them here.
III. Ṛishitarpaṇam. Cham 506 b. 735. foll. 11. a sort of anukramaṇî
of the Mâdhyandina Çatapatha Brâhmaṇa, enumerating a. the beginning words
(pratîkâni) 1) of each adhyâya. 2) of each hundred of (the 7624) kaṇḍikâs
(2800 · 5400 are enumerated twice differently). 3) of each prapâṭhaka. 4) of the
last kaṇḍikâ of each kâṇḍa: b. the closing words of each kâṇḍa. —
B. The accentuation in the manuscripts of the Çatapatha Brâhmaṇa is
rather strange, as there only one sign is made use of, an horizontal stroke be-
neath the line, for denoting the udâtta as well as the svarita. The udâtta has the
stroke beneath itself: नृष॒दम्, the svarita beneath the preceding syllable: वी॒र्यम्.
To avoid this ambiguity I have denoted the svarita in this edition by two hori-
zontal strokes beneath the preceding syllable: वी॒॒र्यम्. — Before a following ac-
cented syllable the preceding udâtta loses its denotation: 1) before an udâtta:
केत॒पूः के॒तम् instead of ॰पूः॒ के॒तम्, म॒हो ये धन॒म् i. of म॒हो ये॒ धन॒म्, प॒र्णा न
वे॒रनु i. of प॒र्णा न॒ वे॒रनु, अ॒ग्निर्हि वे धू॒र्य i. of अ॒ग्निर्हि॒ वे॒ धू॒र्य (१. १. २. १.), but
र॒थवाही सा हि॒ न स्त्री न पुमा॒न् i. of ॰ही सा हि॒ न स्त्री न पुमा॒न् (५. ५. ४.
३५.), as there would be wanting too many signs. A seeming exception only is
यं-य॒मसुराणाम् १. ६. ३. २८, as the second यम् is not accented: see पाणिनिसू० ८.
१. ३. 2) before a svarita: नेष्टृ॒॒ङ्नम् १. ७. २. १., मानुषं नेष्टृ॒॒ङ्नम्, यज्ञो वै॒॒ स्वः, दे-
वा वै॒॒ स्वः — The preceding svarita on the contrary retains its denotation be-
१८ PREFACE.
fore a following accented syllable: 1) before an udâtta: य॒ज्ञो वै स्व॒र्गः, दे॒वा
वै स्व॒र्गन्म॒, ए॒वैतत्॒, 2) before a svarita: वोदा॒नीता॑न् ॥ ५॥ सो॑ऽभ्युक्षति (*) ५.
१. ४. ६., इ॒ति सै॑षि॒तम् १. ४. १. २६., दे॒वाः सै॑षि॒तम् — The udâtta changes into the
svarita (and the original svarita remains unaltered: अनु॒वा॒क्ये॑यम् १. ७. २. ११.) in
all cases of crasis with a following unaccented vowel, see my Vâjasaneyasanhi-
tae specimen II p. 7 follow. (Berlin 1847 Asher) and Roth in his edition of Yâska's
Nirukta I p. LX. (Göttingen 1848 Dieterich). The only continual exception is
made by the praepositions आ and प्र, which remain udâtta: ए॒हि ५. २. १. १०. प्रा॒-
ह, प्रा॒धन्वन् १. ५. १. २०., प्रा॑रोचत १. ६. २. ८.: besides the udâtta is occasionally
retained (against पाणि० ८. ३. ४.) in the declension, but alternating even in the
same words with the svarita: दशम्यै॒ and द॒शम्या॑ Instr. of द॒शमी. – The udâtta
is regular in all cases of crasis with a following accented vowel: ए॒वाङ्ग॑तिम्, ए॒वे-
ति instead of ए॒व आ॑ इति १. ४. १. ५., आ॒द्येऽध्यू॑हति i. of आ॒द्ये अ॒ध्यू॑हति १. ५.
३. २०., सु॒श्वेति i. of सु॒श्वा इति १. ७. १. १६., या॒ड्याथ i. of या॒ड्या अथ १. ७. २.
७. —
(*) The denotation and the reciprocal influence of the accents does in general not undergo
any alteration from the divisions of the pratîkas, the kandikâs or the brâhmaṇas, with the only ex-
ception that the underlineal stroke is changed into three dots in the manuscripts: तत्॒ ॥५॥ स॒, and in
this edition respectively also into six of them, if the following svarita is denoted: तत्॒॥५॥ सोऽभि॑
Berlin March 1849.
Albrecht Weber
विषय-सूची
शतपथब्राह्मण
विषय-सूची
पृष्ठ
प्रथम काण्ड—अथ हविर्यज्ञं नाम प्रथमं काण्डम् ३
दर्शपूर्णमास निरूपणम्
अध्याय १ ३
अध्याय २ २१
अध्याय ३ ४५
अध्याय ४ ६७
अध्याय ५ ८६
अध्याय ६ १०७
अध्याय ७ १२६
अध्याय ८ १५१
अध्याय ९ १७३
द्वितीय काण्ड—अथ एकपादिकानाम द्वितीयं काण्डम् १९३
अध्याय १ १९३
अग्न्याधानम्
अध्याय २ २०६
अग्न्याधानम्, पुनराधेयम्, अग्निहोत्रम्
अध्याय ३ २२६
अग्निहोत्रम्
अध्याय ४ २५७
पिण्डपितृयज्ञः, आग्रयणेष्टिः, दाक्षायण यज्ञः, चातुर्मास्य निरूपणम्
अध्याय ५ २७५
चातुर्मास्यनिरूपणम्, वरुणप्रघासपर्वम्, साकमेधपर्वम्
अध्याय ६ ३०३
चातुर्मास्यनिरूपणम्
तृतीय काण्ड—अथाध्वरं नाम तृतीयं काण्डम् ३२७
अध्याय १ ३२७
सोमयागनिरूपणम्
अध्याय २ ३४५
सोमयागनिरूपणम्
(२०)
पृष्ठ
अध्याय ३ ३७३
सौमयागनिरूपणम्
अध्याय ४ ३९३
अवान्तर दीक्षा [३।४।३], उपसदिष्टः [३।४।४]
अध्याय ५ ४१५
महावेदिनामम् [३।५।१]; अग्नि—प्रणयनादि [३।५।२]; सदो हविर्धान
निर्माणादि [३।५।३]; उपरवनिर्माणम् [३।५।४]
अध्याय ६ ४३७
सदस्यौडुम्बरी निखननम् [३।६।१]; धिष्ण्यनिवापादि [३।६।२]; वैसर्जनं
होमः [३।६।३]; अग्निषोमीय पशु प्रयोगः; तत्र यूपच्छेदनम् [३।७।२]
अध्याय ७ ४५६
यूपोच्छ्रयणादि [३।७।१]; यूपैकादशिनी [३।७।२]; पशूपकरणादि
[३।७।३]; पशुंनियोजन प्रोक्षणादि [३।७।४]
अध्याय ८ ४७५
पशुसंज्ञपनम्; तत्रोपवेशनादि विधिः [३।८।१]; अग्निषोमीय वपायागः
[३।८।२]; पशुपुरोडाशयागः [३।८।३]; उपयड्डोमः [३।८।४]
अध्याय ९ ४९६
पश्वैकादशिनि [३।९।१]; वसतीवर ग्रहणविधिः [३।९।२]; सवनीय
पशुप्रयोगः [३।९।३]; सोमाभिषवः [३।९।४]
चतुर्थ काण्ड --अथ ग्रह नामकं चतुर्थं काण्डम् ५२७
अध्याय १ ५२७
उपांशु ग्रहः क्षुल्लकाभिषवश्च, अन्तर्यामग्रहः, ऐन्द्रवायव ग्रहः, मैत्रावरुण
ग्रहः, आश्विन ग्रहः
अध्याय २ ५४६
शुक्रामन्थि ग्रही, आग्रायणग्रहः, विप्रड्ढोमः
अध्याय ३ ५७७
ऋतु ग्रहैन्द्राग्न वैश्वदेव ग्रहाः, शस्त्रप्रतिगरा, माध्यन्दिन सवनम्—
मरुत्वतीय ग्रहादि, दाक्षिण होमो दक्षिणादानञ्च, आदित्यग्रहः
अध्याय ४ ६०५
सावित्रग्रहः, सौम्यश्चरु; पत्नीवतग्रहश्च, हरियोजनग्रहः; समिष्ट-
यजुर्होम, अवभृथः
अध्याय ५ ६२७
उदयनीयेष्टिः, आनुबन्ध्ययागः, षोडशिग्रहः, अतिग्राह्या ग्रहाः, ग्रहावेक्षणम्,
सोमप्रायश्चित्तानि, सहस्रदक्षिणा व्यूढद्वादशाह धर्म, सोमापहरणादि
अध्याय ६ ६५७
अंशु ग्रहः, अतिग्राह्य ग्रह ग्रहणम्, पश्वयनस्तोमायने, महाव्रतीय, ग्रहस्तुतिः,
सौमिकं ब्रह्मत्वम्, ब्रह्मत्वसदोहविधानं विधिशेषः, सत्रायणम्, सत्रधर्मा
प्रथम भाग
शतपथब्राह्मण
प्रथम भाग
०१-प्रथम काण्ड-०१
ओम् । व्रतमु॒पैष्यन्॑ । अ॒न्तरे॒णाह॑वनी॒यं च॑ गा॒र्हप॑त्यं च॒ प्रा-
ङ्तिष्ठ॑न्नप॒ उप॑स्पृशति॒ तद्यदप॒ उप॑स्पृश॒त्यमे॑ध्यो॒ वै पूरु॑षो॒ यदनृ॑तं व॒दति॒ तेन॑ पूति॒-
रन्तर॑तो मे॒ध्या वाऽआपो॑ मे॒ध्यो भू॒त्वा व्र॒तमु॒पाया॒नीति॑ प॒वित्रं॒ वाऽआपः॑ प॒वित्र॑पू-
तो व्र॒तमु॒पाया॒नीति॒ तस्मा॑द्वा॒ऽअप॒ उप॑स्पृशति ॥ १॥ सोऽग्नि॒मिवा॒भीक्ष॑माणो व्र॒त-
मुपै॑ति । अग्ने॒ व्रतपते व्र॒तं च॑रिष्यामि॒ तच्छ॑केयं॒ तन्मे॑ राध्यतामित्य॒ग्निर्वै दे॒वानां॑
व्र॒तप॑ति॒स्तस्मा॑ ऽए॒वैतत्प्रा॒ह व्र॒तं च॑रिष्यामि॒ तच्छ॑केयं॒ तन्मे॑ राध्यता॒मिति॒ नात्र॑ ति॒-
रोहि॑तमिवास्ति ॥ २॥ अथ॒ सꣳस्थि॑ते विसृ॒जते । अग्ने॒ व्रतपते व्र॒तम॑चारिषं॒
तद॑शकं॒ तन्मे॑ ऽराधीत्यश॒कꣳह्ये॑त॒द्यो य॒ज्ञस्य॒ सꣳस्थामग॒न्नरा॑धि॒ ह्य॑स्मै॒ यो य॒ज्ञस्य॒
सꣳस्थामग॒न्नेति॒ न्वे॑व भूयि॑ष्ठा-इव व्रतमु॒पयन्त्यने॑न॒ त्वे॒वोपे॑यात् ॥ ३॥ द्वयं॒ वाऽइ॒दं
न तृ॒तीय॑मस्ति । स॒त्यं चै॒वानृ॑तं च स॒त्यमे॒व दे॒वा अनृ॑तं मनु॒ष्या इ॒दम॒हमनृ॑तात्स॒-
त्यमु॒पैमीति॒ तन्मनु॑ष्येभ्यो दे॒वानुपै॑ति ॥ ४॥ स वै॑ स॒त्यमे॒व व॑देत् । ए॒तद्वै दे॒वा
व्र॒तं च॑रन्ति॒ यत्स॒त्यं तस्मा॑त्ति॒ यशो॒ यशो॑ ह भवति॒ य ए॒वं वि॒द्वांस॒त्यं व॑दति ॥ ५॥
अथ॒ सꣳस्थि॑ते विसृ॒जते । इ॒दम॒हं य ए॒वास्मि॒ सोऽस्मी॒त्यमानुष॒-इव॒ वाऽए॒तद्-
र्भव॑ति॒ यद्व्र॒तमुपै॑ति न हि॒ तद॑वकल्पते॒ यद्ब्रू॑यादि॒दम॒हꣳ स॒त्यद॑नृ॒तमु॒पैमीति॒ तद्
खलु॒ पुनर्म्मानु॑षो भवति॒ तस्मा॑दि॒दम॒हं य ए॒वास्मि॒ सोऽस्मीत्ये॒वं व्र॒तं विसृ॑जेत
॥ ६॥ अथातोऽशनानशनस्यैव । तदु॑ह्याषा॒ढः सा॑वय॒सोऽन॒शनमे॒व व्र॒तं मे॑ने
म॒नो ह॒ वै दे॒वा मनु॑ष्यस्या॒जान॑न्ति त॒ऽएन॑मे॒तद्व्र॒तमु॑पय॒न्तं वि॒दुः प्रात॒र्नो य॑क्ष्यत