दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
Dashakumaracharitam (with Commentary – Purvapithika and Main Story)
by महाकवि दण्डी
Source: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (origin)
४३६ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां
४३६ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां
प्रासरन्परोपजापाः । तदा च मृगयुवेषमृगबाहुल्यवर्णनेनाद्रिद्रोणीरनपसा-
रमार्गाः शुष्कतृणवंशगुल्माः प्रवेश्य द्वारतोऽग्निविसर्गैः, व्याघ्रादिवधे
प्रोत्साह्य तन्मुखपातनैः, इष्टकूपतृष्णोत्पादनेनातिदूरहारितानां प्राणहा-
रिभिः क्षुत्पिपासाभिवर्धनैः तृणगुल्मगूढच्छन्नतटप्रदरपातहेतुभिर्विषम-
मार्गप्रधावनैः विषमुखीभिः क्षुरिकाभिश्चरणकण्टकोद्धरणैः विष्वग्विसर-
विच्छिन्नानुयातृतयैकाकीकृतानां यथेष्टघातनैः, मृगदेहापराद्धैर्नामेषुमो-
क्षणैः, सपणबन्धमधिरुह्याद्रिशृङ्गाणि दुरधिरोहाण्यनन्यलक्ष्यैः प्रभ्रंशनैः,
आटविकच्छद्मना विपिनेषु विरलसैनिकानां प्रतिरोधनैः, अक्षद्यूतपक्षि-
परोपजापाः भेदाः । तदा भेदे समुत्पन्ने । मृगयुवेषेति—मृगयुवेषेण व्याधरूपधा-
रिणा यन्मृगबाहुल्यवर्णनं तेन । विश्वासोत्पादनाय स्वयं मृगयुर्भूत्वा अत्र बहवो
मृगा वर्त्तन्त इति कथयित्वेत्यर्थः । अद्रिद्रोणीः पर्वतमध्यपद्धतीः । द्रोणिः स्यान्म-
ध्यपद्धतिरिति कोपात् । नास्ति अपसारमार्गो निर्गमनमार्गो यासु ताः । शुष्काणि
तृणानि वंशगुल्मानि च यासु ताः । अद्रिद्रोणीरित्यस्य विशेषणद्वयम् । प्रवेश्य
जनानिति शेषः । अग्निविसर्गैरनलप्रदानैः अनन्तवर्मकटकं जर्जरमकुर्वन् इत्यने-
नान्त्रयः । एवं सर्वत्रापि । तन्मुखपातनैः व्याघ्रमुखपातनैः । इष्टेषु मनोज्ञेषु कूपेषु
तृष्णोत्पादनेन तत्र मनोज्ञः कूपोऽस्ति तस्यैव जलं पातव्यमिति तृष्णामुत्पाद्य ।
अतिदूरहारितानां दूरं नीतानाम् । तृणगुल्मेति—तृणगुल्मैर्गूढच्छन्नानामाच्छादितानां
तटानामुच्चैःप्रदेशानां प्रदरेषु निम्नमार्गेषु पातहेतुभिः पतनकारणैः । विषमु-
खीभिः विषलिप्ताग्राभिः । विष्वगिति—विष्वक् समन्ताद् विसरेण प्रसरणेन विच्छिन्ना
अष्टा अनुयातारोऽनुसारिणो येषां तेषां भावस्तया । हेतौ तृतीया । यथेष्टघातनै-
र्यथेच्छमारणैः, मृगदेहे मृगशरीरे अपराद्धैर्लक्ष्यभ्रष्टैः । इषुमोक्षणैर्बाणक्षेपैः ।
सपणबन्धं पणं कृत्वा । प्रभ्रंशनैः पातनैः । आटविक आरण्यकस्तस्य कपटेन ।
निरादरसे जनता शोकातुर क्षुभित हो गयो । तरह-तरहके अनाचारोंसे शनैः शनैः शत्रुओं
द्वारा प्रचारित भेदनीति फलित हो गयी । इस कारण कितने शत्रुगणोंके दूत बहेलियो व
अन्य लोगोंके स्वरूप धारण कर अनन्तवर्माकी सेनामें प्रविष्ट हो गये और उन्हें वनके
किसी प्रदेशमें अन्य जन्तुओंकी अधिकता तथा सहज ही में उनकी प्राप्ति का प्रलोभन
देकर पर्वतों की ऐसी कण्टकाकीर्ण वोहड़ गुफाओंमें ले गये जहां से निकल भागने का कोई
सीधा मार्ग ही न था । वहां उन्हें पहुँचाकर उन लोगोंने गुफाओं के दरवाजों पर घास-
फूस-लकड़ियों की राशि एकत्र करके आग जला दी जिससे वे सब वहीं जलकर मर गये ।
कुछ शत्रुके दूत छलसे अन्य सेना को दूसरे जंगलमें यह कह कर ले गये कि 'अमुक
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri.Funding: MIDF
अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्योपेतम् । ४३७
युद्धयात्रोत्सवादिसंकुलेषु बलवदनुप्रवेशनैः इतरेषां हिंसोत्पादनैः, गूढो-
त्पादितव्यलीकेभ्योऽप्रियाणि प्रकाशं लब्ध्वा साक्षिषु तद्विख्याप्याकीर्ति-
गुप्तिहेतुभिः पराक्रमैः, परकलत्रेषु सुहृत्त्वेनाभियोज्य जारान्भर्तृभयमप-
विरलसैनिकानां स्वल्पसैन्यानाम्। गूढेत्यादि-गूढं गुप्तमुत्पादितं व्यलीकं दुःखं
येषां तेभ्यः तत्सकाशमित्यर्थः। प्रकाशं सर्वसमक्षं अप्रियाणि अप्रियवाक्यानि
लब्ध्वा श्रुत्वा अकीर्तेरयशसो गुप्तेर्गोपनस्य हेतुभिः कारणैः पराक्रमैः साक्षिषु द्रष्टृषु
तद् विख्याप्य ख्यापयित्वा। अभियोज्य नियोज्य। तत्साहसेति-तेषां 'जाराणां
अरण्यमें एक सिंह है जो बड़ा उपद्रव मचा रहा है, उसे मारना धर्म है' और वहाँ ले
जाकर उन्होंने उसी सिंहसे तथा स्वयं भी उस सेनाके लोगोंको मरवा डाला। कितने ही
प्यासे सिपाहियोंको किसी कूपका पता बताकर भेज दिया और मार्गमें बड़ी-बड़ी सुरंगें
पहले ही जाकर खोद दीं तथा उनपर घास बिछा दी, जिस कारण वे प्यासे सिपाही
उधरसे जाते हुए उन्हीं सुरंगोंमें गिरकर मर गये। ऐसे-ऐसे कौशल उन लोगोंने रचे कि
कितने सिपाही पर्वतोंके दुर्गम प्रदेशमें इधर-उधर भटक कर मर गये। वनोंके प्रदेशमें
जब सैनिकोंको काँटे गड़ जाते तो उन्हें निकालनेके लिए वे लोग विषभरी सूइयाँ देते,
जिनसे रक्त का संस्पर्श होते ही कितने यमलोक चले गये। अथवा उनके घाव सड़ गये
जिससे वे सड़ सड़कर मरे। कभी-कभी कुछ सैनिकोंकी टोलियोंको बहकाकर जंगलमें ले
जाकर स्वयं ही मार डालते, वन-जन्तुओंके शिकारके बहाने तो अगणितोंको मार डाला।
कभी-कभी पहाड़को चोटीपर दौड़की बाजी लगाकर ले जाते और एकान्त पाकर वहाँसे
उन्हें ढकेलकर मार डालते थे। कितने सैनिकोंको वनवासीका वेष धारण कर छिपकर
शत्रुदूतोंने मार डाला। कभी-कभी सैनिकोंके आमोद-प्रमोदके समय शत्रुदूत एकाएक
छापा मारकर उन्हें मार डालते थे। कभी-कभी कोल भीलोंके रूपोंमें सहायताके बहाने
कुटियामें ले जाकर शत्रुदूत सैनिकोंको मार देते। कभी-कभी वे लोग कोई ऐसा झमेला
खड़ा कर देते थे कि सैनिक गण परस्पर ही लड़कर कट मरते थे। कभी-कभी वे
लोग झूठी-ूठी अफवाहें उड़ाकर लोगोंमें आतंक फैला देते थे, जिस कारण साधारण
जनतामें महाराज अनन्तवर्माकी बदनामी फैल जाती थी। फिर समय पाकर सेनाके
वीरों को वे लोग मारके यमलोक भेज देते थे। कभी-कभी वे लोग किसी स्त्रीसे किसी
अधिकारी का अनुचित सम्बन्ध झूठ-मूठ जोड़कर लड़ा देते और तत्पक्षके वीरोंको
मार डालते। कभी-कभी किसी सुन्दरीको प्रलोभन देकर उसके द्वारा सैनिकों तथा मन-
चले लोगों को पूर्व संकेतित स्थान पर बुला लेते और वहाँ पर पहलेसे ही छिपे शत्रु पक्षी
लोग उन्हें मार डालते। कभी-कभी वे लोग अमुक कन्दरा वा गुफामें धन गड़ा है ऐसा
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu