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दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

Dashakumaracharitam (with Commentary – Purvapithika and Main Story)

by महाकवि दण्डी

Source: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (origin)

DevanagariHindipublished474 pages

Page 437 of 474

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Page 437

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri.Funding: MIDF
अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्योपेतम् । ४३७

युद्धयात्रोत्सवादिसंकुलेषु बलवदनुप्रवेशनैः इतरेषां हिंसोत्पादनैः, गूढो-
त्पादितव्यलीकेभ्योऽप्रियाणि प्रकाशं लब्ध्वा साक्षिषु तद्विख्याप्याकीर्ति-
गुप्तिहेतुभिः पराक्रमैः, परकलत्रेषु सुहृत्त्वेनाभियोज्य जारान्भर्तृभयमप-

विरलसैनिकानां स्वल्पसैन्यानाम्। गूढेत्यादि-गूढं गुप्तमुत्पादितं व्यलीकं दुःखं
येषां तेभ्यः तत्सकाशमित्यर्थः। प्रकाशं सर्वसमक्षं अप्रियाणि अप्रियवाक्यानि
लब्ध्वा श्रुत्वा अकीर्तेरयशसो गुप्तेर्गोपनस्य हेतुभिः कारणैः पराक्रमैः साक्षिषु द्रष्टृषु
तद् विख्याप्य ख्यापयित्वा। अभियोज्य नियोज्य। तत्साहसेति-तेषां 'जाराणां

अरण्यमें एक सिंह है जो बड़ा उपद्रव मचा रहा है, उसे मारना धर्म है' और वहाँ ले
जाकर उन्होंने उसी सिंहसे तथा स्वयं भी उस सेनाके लोगोंको मरवा डाला। कितने ही
प्यासे सिपाहियोंको किसी कूपका पता बताकर भेज दिया और मार्गमें बड़ी-बड़ी सुरंगें
पहले ही जाकर खोद दीं तथा उनपर घास बिछा दी, जिस कारण वे प्यासे सिपाही
उधरसे जाते हुए उन्हीं सुरंगोंमें गिरकर मर गये। ऐसे-ऐसे कौशल उन लोगोंने रचे कि
कितने सिपाही पर्वतोंके दुर्गम प्रदेशमें इधर-उधर भटक कर मर गये। वनोंके प्रदेशमें
जब सैनिकोंको काँटे गड़ जाते तो उन्हें निकालनेके लिए वे लोग विषभरी सूइयाँ देते,
जिनसे रक्त का संस्पर्श होते ही कितने यमलोक चले गये। अथवा उनके घाव सड़ गये
जिससे वे सड़ सड़कर मरे। कभी-कभी कुछ सैनिकोंकी टोलियोंको बहकाकर जंगलमें ले
जाकर स्वयं ही मार डालते, वन-जन्तुओंके शिकारके बहाने तो अगणितोंको मार डाला।
कभी-कभी पहाड़को चोटीपर दौड़की बाजी लगाकर ले जाते और एकान्त पाकर वहाँसे
उन्हें ढकेलकर मार डालते थे। कितने सैनिकोंको वनवासीका वेष धारण कर छिपकर
शत्रुदूतोंने मार डाला। कभी-कभी सैनिकोंके आमोद-प्रमोदके समय शत्रुदूत एकाएक
छापा मारकर उन्हें मार डालते थे। कभी-कभी कोल भीलोंके रूपोंमें सहायताके बहाने
कुटियामें ले जाकर शत्रुदूत सैनिकोंको मार देते। कभी-कभी वे लोग कोई ऐसा झमेला
खड़ा कर देते थे कि सैनिक गण परस्पर ही लड़कर कट मरते थे। कभी-कभी वे
लोग झूठी-ूठी अफवाहें उड़ाकर लोगोंमें आतंक फैला देते थे, जिस कारण साधारण
जनतामें महाराज अनन्तवर्माकी बदनामी फैल जाती थी। फिर समय पाकर सेनाके
वीरों को वे लोग मारके यमलोक भेज देते थे। कभी-कभी वे लोग किसी स्त्रीसे किसी
अधिकारी का अनुचित सम्बन्ध झूठ-मूठ जोड़कर लड़ा देते और तत्पक्षके वीरोंको
मार डालते। कभी-कभी किसी सुन्दरीको प्रलोभन देकर उसके द्वारा सैनिकों तथा मन-
चले लोगों को पूर्व संकेतित स्थान पर बुला लेते और वहाँ पर पहलेसे ही छिपे शत्रु पक्षी
लोग उन्हें मार डालते। कभी-कभी वे लोग अमुक कन्दरा वा गुफामें धन गड़ा है ऐसा

Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu