बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
About this granth
The Brihadaranyaka Upanishad (बृहदारण्यकोपनिषद्) forms the closing part of the Shatapatha Brahmana of the Shukla Yajurveda and is the largest of the Upanishads, in length and in range. Its six chapters fall into the Madhu, Yajnavalkya and Khila sections. Famous passages include the dialogue of Yajnavalkya and Maitreyi, Yajnavalkya's debate with Gargi and others at King Janaka's court, the description of the Self as 'neti neti', the great saying 'aham brahmasmi', the prayer 'asato ma sad gamaya' and Prajapati's teaching of 'da da da'.
Shankara's commentary on it is among his longest and is central to the study of Advaita Vedanta.
This Gita Press, Gorakhpur edition (book code 577) gives the text, Shankara's commentary and a Hindi translation of both. Its imprint records 26,250 copies printed between Samvat 1995 and 2050 and a seventh edition of 5,000 in Samvat 2052. In the preface to the first edition the translator recalls first hearing a sentence from the Yajnavalkya-Maitreyi dialogue as a student at Agra College. The volume has 1402 pages.
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३९
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३९
हुता उज्ज्वलन्ति या हुता अतिनेदन्ते या हुता अधिशेरते किं ताभिर्जयतीति या हुता उज्ज्वलन्ति देवलोकमेव ताभिर्जयति दीप्यत इव हि देवलोको या हुता अतिनेदन्ते पितृलोकमेव ताभिर्जयत्यतीव हि पितृलोको या हुता अधिशेरते मनुष्यलोकमेव ताभिर्जयत्यध इव हि मनुष्यलोकः ॥ ८ ॥
'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'आज इस यज्ञमें यह अध्वर्यु कितनी आहुतियाँ होम करेगा !' [ याज्ञवल्क्य-] 'तीन ।' [ अश्वल- ] 'वे तीन कौन-कौन-सी हैं, [ याज्ञवल्क्य- ] 'जो होम की जानेपर प्रज्वलित होती हैं, जो होम की जानेपर अत्यन्त शब्द करती हैं और जो होम की जानेपर पृथ्वीके ऊपर लीन हो जाती हैं।' [ अश्वल- ] 'इनके द्वारा यजमान किसको जीतता है।' [ याज्ञवल्क्य- ] 'जो होम की जानेपर प्रज्वलित होती हैं; उनसे यजमान देवलोकको ही जीत लेता है; क्योंकि देवलोक मानो देदीप्यमान हो रहा है। जो होम की जानेपर अत्यन्त शब्द करती हैं, उनसे वह पितृलोकको ही जीत लेता है; क्योंकि पितृलोक मानो अत्यन्त शब्द करनेवाला है। जो होम की जानेपर पृथ्वीपर लीन हो जाती हैं, उनसे मनुष्यलोकको ही जीतता है; क्योंकि मनुष्यलोक अधोवर्ती-सा है' ॥ ८ ॥
| याज्ञवल्क्येति होवाचेति पूर्ववत् । कत्ययमद्याध्वर्युरस्मिन् यज्ञ आहुतीर्होष्यतीति, कत्याहुतिप्रकाराः ? तिस्र इति, कतमास्तास्तिस्र इति पूर्ववत् । <br><br> इतर आह—या हुता उज्ज्व- | 'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने पूर्ववत् [ अपने अभिमुख करनेके लिये ] कहा, 'आज यह अध्वर्यु इस यज्ञमें कितनी आहुतियाँ हवन करेगा ?' अर्थात् आहुतियोंके कितने प्रकार हैं ?' [याज्ञवल्क्य-] 'तीन ।' फिर पूर्ववत् पूछता है—'कौन-कौन तीन ?' <br><br> इसपर इतर ( याज्ञवल्क्य ) कहता है—'जो हवन की जानेपर |
६४० | वृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ६४० | वृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| लन्ति समिदाज्याहुतयः या हुता अतिनेदन्तेऽतीव शब्दं कुर्वन्ति मांसाद्याहुतयः, या हुता अधिशेरतेऽध्यधो गत्वा भूमेरधिशेरते पयःसोमाहुतयः ।<br><br>किं ताभिर्जयतीति, ताभिरेवं निर्वर्त्तिताभिराहुतिभिः किं जयतीति । या आहुतयो हुता उज्ज्वलन्त्युज्ज्वलनयुक्ता आहुतयो निर्वर्तिताः, फलं च देवलोकाख्यमुज्ज्वलमेव, तेन सामान्येन या मया ता उज्ज्वलन्त्य आहुतयो निर्वर्त्यमानास्ता एताः साक्षाद्देवलोकस्य कर्मफलस्य रूपं देवलोकाख्यं फलमेव मया निर्वर्त्यत इत्येवं सम्पादयति ।<br><br>या हुता अतिनेदन्ते आहुतयः पितृलोकमेव ताभिर्जयति कुत्सितशब्दकर्तृत्वसामान्येन । पितृ- | प्रज्वलित होती हैं, वे समिध् और घृतकी आहुतियाँ, जो होम की जानेपर अत्यन्त शब्द करती हैं, वे आहुतियाँ और जो होम की जानेपर अधिशयन करतीं अर्थात् नीचे पृथ्वीपर जाकर लीन हो जाती हैं, वे दुग्ध और सोमकी आहुतियाँ।’<br><br>‘इनसे यजमान किसको जीतता है ? अर्थात् इस प्रकार सम्पन्न की हुई उन आहुतियोंसे यजमान क्या जीत लेता है !’ [याज्ञवल्क्य–] जो हवन की हुई आहुतियाँ उज्ज्वलित होती हैं अर्थात् उज्ज्वलनयुक्त होती हैं, उनका देवलोकसंज्ञक फल भी उज्ज्वल ही है । इन दोनोंमें यह समानता होनेके कारण यजमान इस प्रकार सम्पादन (भावना) करता है कि मेरेद्वारा जो ये उज्ज्वलित आहुतियाँ दी जा रही हैं, वे साक्षात् इस कर्मके फलस्वरूप देवलोकका रूप हैं, अतः इनके द्वारा मैं देवलोकरूप फलको निष्पन्न कर रहा हूँ ।<br><br>जो आहुतियाँ होम की जानेपर अत्यन्त शब्द करती हैं, उनसे यजमान पितृलोकको ही जीतता है, क्योंकि कुत्सित शब्द करनेवाले होनेसे इनके साथ उनकी समानता है। |
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६४१
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६४१
| लोकसम्बद्धायां हि संयमन्यां पुर्यां वैवस्वतेन यात्यमानानां ‘हा हताः स्म मुञ्च मुञ्च’ इति शब्दो भवति। तथावदानाहुतयः तेन पितृलोकसामान्यात् पितृलोक एव मया निर्वर्त्यत इति सम्पादयति ।<br><br>या हुता अधिशेरते मनुष्यलोकमेव ताभिर्जयति भूम्युपरि सम्बन्धसामान्यात् । अध इव ह्यध एव हि मनुष्यलोकः उपरितनान् साध्याँल्लोकानपेक्ष्य, अथवाधोगमनमपेक्ष्य । अतो मनुष्यलोक एव मया निर्वर्त्यत इति सम्पादयति पयःसोमाहुतिनिर्वर्तनकाले ॥ ८ ॥ | पितृलोकसे सम्बद्ध संयमनीपुरीमें यमराजके द्वारा यातना भोगते हुए जीवोंका ‘हाय मरे ! छोड़ ! छोड़ !’ ऐसा शब्द होता रहता है। इसी प्रकार अवदान-आहुतियाँ भी शब्द करनेवाली हैं। अतः पितृलोकसे समानता होनेके कारण इनसे मेरेद्वारा पितृलोक ही प्राप्त किया जाता है, इस प्रकार यजमान सम्पादन करता है।<br><br>जो आहुतियाँ होम की जानेपर पृथ्वीपर लीन हो जाती हैं, उनसे यजमान मनुष्यलोकपर ही विजय प्राप्त करता है; क्योंकि पृथ्वीके ऊपरी भागसे सम्बद्ध होनेमें उन दोनोंकी समानता है। मनुष्यलोक ऊपरके साधनसाध्य लोकोंकी अपेक्षा अधः—नीचे ही स्थित है। अथवा अधोगमनकी अपेक्षासे वे मनुष्यलोकको ही जीतते हैं। अतः दूध या सोमकी आहुति देते समय यजमान यही सम्पादन करता है कि इससे मेरेद्वारा मनुष्यलोक ही प्राप्त किया जाता है ॥ ८ ॥ |
ब्रह्माके यज्ञरक्षाके साधन और उससे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन
याज्ञवल्क्येति होवाच कतिभिरयमद्य ब्रह्मा यज्ञं दक्षिणतो देवताभिर्गोपायतीत्येकयेति कतमा सैकेति मन
बृ० उ० ४१—
६४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ६४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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एवेत्यनन्तं वै मनोऽनन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ ६ ॥
‘हे याज्ञवल्क्य !’ ऐसा अश्वलने कहा, ‘आज यह ब्रह्मा यज्ञमें दक्षिणकी ओर बैठकर कितने देवताओं द्वारा यज्ञकी रक्षा करता है?’ [ याज्ञवल्क्य–] ‘एकके द्वारा।’ [ अश्वल–] ‘वह एक देवता कौन है?’ [ याज्ञवल्क्य–] ‘वह मन ही है। मन अनन्त है और विश्वेदेव भी अनन्त हैं; अतः उस मनसे यजमान अनन्त लोकको जीत लेता है’ ॥ ६ ॥
| याज्ञवल्क्येति होवाचेति पूर्ववत्। अयमृत्विग्ब्रह्मा दक्षिणतो ब्रह्मासने स्थित्वा यज्ञं गोपायति। कतिभिर्देवताभिर्गोपायतीति प्रासङ्गिकमेतद्बहुवचनम्, एकया हि देवतया गोपायत्यसौ, एवं ज्ञाते बहुवचनेन प्रश्नो नोपपद्यते स्वयं जानतः। तस्मात् पूर्वयोः कण्डिकयोः प्रश्नप्रतिवचनेषु कतिभिः कति तिसृभिः तिस्र इति प्रसङ्गं दृष्ट्वेहापि बहुवचनेनैव प्रश्नोपक्रमः क्रियते। अथवा प्रतिवादिव्यामोहार्थं बहुवचनम् | ‘हे याज्ञवल्क्य !’ ऐसा अश्वलने पूर्ववत् [ अभिमुख करनेके लिये ] कहा ‘यह ब्रह्मानामक ऋत्विक् दक्षिणकी ओर ब्रह्माके लिये निश्चित आसनपर बैठकर यज्ञकी रक्षा करता है। वह कितने देवताओं-द्वारा उसकी रक्षा करता है?’ यहाँ देवता शब्दमें जो बहुवचन है, वह प्रसङ्गवश है; क्योंकि ब्रह्मा एक ही देवतासे यज्ञकी रक्षा करता है–यह स्वयं जानते हुए व्यक्तिके लिये बहुवचनद्वारा प्रश्न करना उचित नहीं है। अतः पहली दो कण्डिकाओं-के प्रश्न और उत्तरोंमें ‘कतिभिः कति’ और ‘तिसृभिः तिस्रः’ ऐसा प्रसङ्ग देखकर यहाँ भी प्रश्नका आरम्भ बहुवचनसे ही किया जाता है। अथवा यह बहुवचन अपने प्रतिवादीको भ्रममें डालनेके लिये भी हो सकता है। |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६४३ |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६४३ |
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| इतर आहैकयेति । एका सा देवता यया दक्षिणतः स्थित्वा ब्रह्मा आसने यज्ञं गोपायति । कतमा सैकैति । मन एवेति, मनः सा देवता । मनसा हि ब्रह्मा व्याप्रियते ध्यानेनैव । “तस्य यज्ञस्य मनश्च वाक्च वर्तनी तयोरन्यतरां मनसा संस्क-रोति ब्रह्मा” (छा० उ० ४ । १६ । १) इति श्रुत्यन्तरात् । तेन मन एव देवता तया मनसा हि गोपायति ब्रह्मा यज्ञम् ।<br><br>तच्च मनो वृत्तिभेदेनानन्तम् । वैशब्दः प्रसिद्धार्थद्योतनार्थः । प्रसिद्धं मनस आनन्त्यम् । तदा-नन्त्याभिमानिनो देवाः, अनन्ता वै विश्वे देवाः । “सर्वे देवा यत्रैकं भवन्ति” इत्यादिश्रुत्यन्त-रात् । तेन आनन्त्यसामान्यादन-न्तमेव स तेन लोकं जयति ॥९॥ | इसपर (याज्ञवल्क्य) कहते हैं, 'एकया इति; जिसके द्वारा दक्षिणकी ओर आसनपर बैठकर ब्रह्मा यज्ञकी रक्षा करता है, वह देवता एक है।' 'वह एक देवता कौन है?' इसपर कहते हैं—वह मन ही है—वह देवता मन ही है। मनके द्वारा ध्यान करके ही ब्रह्मा अपना कार्य करता है। “उस यज्ञके मन और वाक्—ये दो मार्ग हैं, उनमेंसे एक (वाक्) का संस्कार ब्रह्मा मन यानी मौनसे करता है” इस अन्य श्रुतिसे भी यही कहा गया है। अतः मन ही देवता है, उस मनसे ही ब्रह्मा यज्ञकी रक्षा करता है।<br><br>और वह मन वृत्तिभेदसे अनन्त है। 'वै' शब्द प्रसिद्ध अर्थका द्योतन करनेके लिये है। मनका अनन्तत्व प्रसिद्ध है। उस अनन्तत्वके अभि-मानी जो देव हैं, वे सम्पूर्ण देव भी अनन्त हैं। “जिस मनमें समस्त देव एक (अभिन्न) हो जाते हैं” इत्यादि अन्य श्रुतिसे भी यही प्रकट होता है। अतः अनन्ततामें समानता होनेके कारण वह उसके द्वारा अनन्तलोकको ही जीत लेता है ॥६॥ |
६४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ६४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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स्तवनसम्बन्धिनी ऋचाओंका और उनसे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन
याज्ञवल्क्येति होवाच कत्ययमद्योद्गातास्मिन् यज्ञे स्तोत्रियाः स्तोष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया कतमास्ता या अध्यात्ममिति प्राण एव पुरोनुवाक्यापानो याज्या व्यानः शस्या किं ताभिर्जयतीति पृथिवीलोकमेव पुरोनुवाक्यया जयत्यन्तरिक्षलोकं याज्यया द्युलोकँ शस्यया ततो ह होताश्वल उपरराम ॥१०॥
'हे याज्ञवल्क्य!' ऐसा अश्वलने कहा, 'आज इस यज्ञमें उद्गाता कितनी स्तोत्रिया ऋचाओंका स्तवन करेगा?' [याज्ञवल्क्य-] 'तीनका' [अश्वल—] 'वे तीन कौन-सी हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'पुरोनुवाक्या, याज्या और तीसरी शस्या।' [अश्वल-] इनमें जो शरीरान्तर्वर्ती हैं, वे कौन-सी हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'प्राण ही पुरोनुवाक्या है; अपान याज्या है और व्यान शस्या है।' [अश्वल-] 'इनसे यजमान किनपर जय प्राप्त करता है?' [याज्ञवल्क्य-] पुरोनुवाक्यासे पृथिवीलोकपर ही जय प्राप्त करता है, तथा याज्यासे अन्तरिक्षलोकपर और शस्यासे द्युलोकपर विजय प्राप्त करता है। इसके पश्चात् होता अश्वल चुप हो गया ॥१०॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| याज्ञवल्क्येति होवाचेति पूर्ववत्। कति स्तोत्रियाः स्तोष्यतीत्ययमुद्गाता। स्तोत्रिया नाम ऋक्सामसमुदायः कतिपयानामृचाम्। स्तोत्रिया वा शस्या वा याः | 'हे याज्ञवल्क्य!' ऐसा अश्वलने पूर्ववत् [अभिमुख करनेके लिये] कहा, 'यह उद्गाता कितनी स्तोत्रिया ऋचाओंका स्तवन करेगा?' 'स्तोत्रिया' यह कुछ ऋचाओंके ऋक्सामसमुदायका नाम है। स्तोत्रिया हो अथवा शस्या, जो कुछ |
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ६४५
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ६४५
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| काश्चन ऋचः, ताः सर्वास्तिस्र एवेत्याह । ताश्च व्याख्याताः— पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीयेति । | भी ऋचाएँ हैं, वे सब तीन ही प्रकारकी हैं—यही बात अब बतायी जाती है। उन्हींकी पुरोनुवाक्या, याज्या और तीसरी शस्या—ऐसा कहकर व्याख्या की गयी है। |
| तत्र पूर्वमुक्तम्—यत्किञ्चेदं प्राणभृत् सर्वं जयतीति तत् केन सामान्येन ? इत्युच्यते—कतमास्तास्तिस्र ऋचो या अध्यात्मं भवन्तीति । प्राण एव पुरोनुवाक्या, पशब्दसामान्यात् । अपानो याज्या, आनन्तर्यात् । अपानेन हि प्रत्तं हविर्देवता ग्रसन्ति, यागश्च प्रदानम् । | यहाँ पहले (मन्त्र ७ में) जो यह कहा गया है कि यह जो कुछ प्राणिवर्ग है, उस सभीको जीत लेता है, सो किस समानताके कारण है—यह कहते हैं अर्थात् 'इनमें जो अध्यात्म (देहान्तर्वर्ती) हैं, वे तीन ऋचाएँ कौन-सी हैं'—इस प्रश्नद्वारा यह बतलाया जाता है—प्राण ही पुरोनुवाक्या है; क्योंकि 'प' शब्दमें इन दोनोंकी समानता है। अपान याज्या है क्योंकि आनन्तर्यमें दोनोंकी समानता है।² इसके सिवा देवगण दी हुई हविको अपानसे ही ग्रहण करते हैं; और प्रदान ही याग है [अतः अपान याज्या ऋचाएँ हैं]। |
| व्यानः शस्या—"अप्राणन्नपानन्नृचमभिव्याहरति" (छा० उ० १ । ३ । ४) । इति श्रुत्यन्तरात् । | व्यान शस्या है, जैसा कि "प्राण अपान-व्यापार न करता हुआ ऋचाओंका उच्चारण करता है" इस अन्य श्रुतिसे कहा गया है। |
१. प्रगीत ऋचाओंको स्तोत्र कहते हैं और अप्रगीत ऋचाओंको शस्त्र। इनमें स्तोत्र ही स्तोत्रिया ऋचाएँ हैं और शस्त्र शस्या हैं।
२. कारण जैसे अपान प्राणके अनन्तर है, उसी प्रकार याज्या ऋचाएँ पुरोनुवाक्या ऋचाओंके अनन्तर हैं।
६४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ६४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| किं ताभिर्जयतीति व्याख्यातम् । तत्र विशेषसम्बन्धसामान्यमनुक्तमिहोच्यते, सर्वमन्यद् व्याख्यातम् । लोकसम्बन्धसामान्येन पृथिवीलोकमेव पुरोनुवाक्यया जयति, अन्तरिक्षलोकं याज्यया, मध्यमत्वसामान्यात् । द्युलोकं शस्ययोर्ध्वत्वसामान्यात् । ततो ह तस्मादात्मनः प्रश्ननिर्णयादसौ होता अश्वल उपरराम नायमस्मद्गोचर इति ॥ १० ॥ | ‘किं ताभिर्जयति’ (उनसे किसपर विजय प्राप्त करता है)—इसकी व्याख्या पहले की जा चुकी है। वहाँ जो इनका विशेषसम्बन्धसामान्य नहीं बतलाया गया, वह यहाँ बतलाया जाता है; और सब (संख्यासामान्यादि) की व्याख्या तो कर दी गयी है। लोकसम्बन्धी सामान्य होनेसे पुरोनुवाक्यासे पृथिवीलोकपर ही विजय प्राप्त करता है। मध्यमत्वमें समानता होनेके कारण याज्यासे अन्तरिक्षलोकपर जय प्राप्त करता है तथा ऊर्ध्वत्वमें समानता होनेसे शस्यासे द्युलोकपर जय प्राप्त करता है। तब उस अपने प्रश्नके निर्णयसे होता अश्वल यह समझकर कि ‘यह याज्ञवल्क्य हमारे काबूका नहीं है’ चुप हो गया ॥ १० ॥ |
<div align="center">इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये
प्रथममश्वलब्राह्मणम् ॥ १ ॥
१. लोकोंमें पृथिवीलोक प्रथम है और ऋचाओंमें पुरोनुवाक्या ऋचाएँ प्रथम हैं। इस प्रकार 'प्रथमत्व' रूप सम्बन्धकी दोनोंमें समानता होनेसे पुरोनुवाक्यासे पृथिवीलोकको ही जीतता है।
द्वितीय ब्राह्मण
द्वितीय ब्राह्मण
याज्ञवल्क्य-आर्तभाग-संवाद
| उपक्रमः आख्यायिकासम्बन्धः प्रसिद्ध एव। मृत्योरतिमुक्तिर्व्याख्याता काललक्षणात् कर्मलक्षणाच्च। कः पुनरसौ मृत्युर्यस्मादतिमुक्तिर्व्याख्याता ? स च स्वाभाविकज्ञानासङ्गास्पदोऽध्यात्माधिभूतविषयपरिच्छिन्नो ग्रहातिग्रहलक्षणो मृत्युः। तस्मात् परिच्छिन्नरूपान्मृत्योरतिमुक्तस्य रूपाण्यग्न्यादित्यादीन्युद्गीथप्रकरणे व्याख्यातानि। अश्वलप्रश्ने च तद्गतो विशेषः कश्चित्। तच्चैतत् कर्मणां ज्ञानसहितानां फलम्। <br><br> एतस्मात् साध्यसाधनरूपात् संसारान्मोक्षः कर्तव्य इत्यतो बन्धनरूपस्य मृत्योः स्वरूपमुच्यते। बद्धस्य हि मोक्षः कर्तव्यः। यदप्यतिमुक्तस्य स्वरूपमुक्तं तत्रापि ग्रहातिग्रहाभ्यामविनिर्मुक्त एव | आख्यायिकाका सम्बन्ध तो प्रसिद्ध ही है। कालरूप और कर्मरूप मृत्युसे अतिमुक्तिकी व्याख्या की गयी। किंतु जिससे अतिमुक्तिकी व्याख्या की गयी है, वह मृत्यु क्या है? वह मृत्यु स्वाभाविक अज्ञानजनित आसक्तिका स्थान, अध्यात्म और अधिभूत विषयसे परिच्छिन्न ग्रह-अतिग्रहरूप है। उस परिच्छिन्नरूप मृत्युसे अतिमुक्त हुए पुरुषके अग्नि-आदित्यादि [अपरिच्छिन्न] रूपोंकी व्याख्या उद्गीथ-प्रकरणमें की गयी है। अश्वलके प्रश्नमें उसीके अन्तर्वर्ती किसी विशेष¹ का वर्णन है। वह यह विशेष ज्ञानसहित² कर्मोंका फल है। <br><br> इस साध्यसाधनरूप संसारसे मोक्ष करना है, इसलिये यहाँसे बन्धनरूप मृत्युका स्वरूप बतलाया जाता है; क्योंकि बद्धको ही मुक्त करना होता है। तथा जो अतिमुक्तका स्वरूप बतलाया गया है, वहाँ भी वह मृत्युरूप ग्रह और अतिग्रहसे |
१. अर्थात् अग्न्यादिमें ही दृष्टिभेदका।
२. देवताज्ञान अर्थात् उपासनासहित।
६४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ६४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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| मृत्यूरुपभ्याम् । तथा चोक्तं "अशनाया हि मृत्युः" (बृ० उ० १ । २ । १) "एष एव मृत्युः" इति । आदित्यस्थं पुरुषमङ्गीकृत्याह "एको मृत्युर्बह्वेवा" इति च । <br><br> तदात्मभावापन्नो हि मृत्योरप्रिमतिमुच्यत इत्युच्यते । न च तत्र ग्रहातिग्रहौ मृत्युरूपौ न स्तः । "अथैतस्य मनसो द्यौः शरीरं ज्योतीरूपमसावादित्यः" ( बृ० उ० १ । ५ । १२) "मनश्च ग्रहः स कामेनातिग्राहेण गृहीतः" (३ । २ । ७) इति, वक्ष्यति "प्राणो वै ग्रहः सोऽपानेनातिग्राहेण" (३ । २ । २) इति, "वाग्वै ग्रहः स नाम्नातिग्राहेण" (३।२।३) इति च । तथा ऽन्नविभागे व्याख्यातमस्माभिः । सुविचारितं चैतद् यदेव प्रवृत्तिकारणं तदेव निवृत्तिकारणं न भवतीति । | अतिमुक्त (विशेषरूपसे मुक्त) नहीं है । इस विषयमें कहा भी है— "भूख ही मृत्यु है" "यही मृत्यु है" इत्यादि । आदित्यान्तर्गत पुरुषको अङ्गीकार करके श्रुति कहती है "एक ही मृत्यु बहुत प्रकारकी है।" <br><br> अग्न्यादिके तादात्म्यको प्राप्त हुआ पुरुष मृत्युकी प्राप्तिसे अतिमुक्त हो जाता है—ऐसा कहा जाता है; किंतु वहाँ मृत्युके रूप ग्रह और अतिग्रह न हों—ऐसी बात नहीं है । "तथा इस मनका द्युलोक शरीर है और ज्योतीरूप वह आदित्य है" "मन ही ग्रह है, वह कामरूप अतिग्रहसे गृहीत है" ऐसा श्रुति कहेगी भी, तथा "प्राण ही ग्रह है, वह अपानरूप अतिग्रहसे गृहीत है" और "वाक् ही ग्रह है, वह नामरूप अतिग्रहसे गृहीत है" ऐसा भी श्रुति कहेगी । तीन अन्नोंका विभाग करते समय हमने इनकी ऐसी ही व्याख्या भी की है । तथा इस बातका भी अच्छी तरह विचार किया जा चुका है कि जो प्रवृत्तिका कारण होता है, वही निवृत्तिका भी कारण नहीं होता ।² |
१. उपनिषद्में 'मनो वै' पाठ है ।
२. अर्थात् कर्म तो फलभोगका निमित्त होनेके कारण बन्धनका ही कारण है, वह मुक्तिका कारण नहीं हो सकता ।
ब्राह्मण २] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६४९
| ब्राह्मण २] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६४९ |
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| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| केचित्तु सर्वमेव निवृत्तिकारणं मन्यन्ते। अतःकारणात् पूर्वस्मात् पूर्वस्मान्मृत्योर्मुच्यते उत्तरमुत्तरं प्रतिपद्यमानो व्यावृत्त्यर्थमेव प्रतिपद्यते न तु तादर्थ्यम्, इत्यत आ द्वैतक्षयात् सर्वं मृत्युः, द्वैतक्षये तु परमार्थतो मृत्योराप्तिमतिमुच्यते। अतश्च आपेक्षिकी गौणी मुक्तिरन्तराले । सर्वमेतद् एवम् अबार्हदारण्यकम् । | कोई-कोई तो सारे ही साधनोंको निवृत्तिका कारण मानते हैं। इस कारणसे उत्तरोत्तर उत्कृष्ट फलको प्राप्त होनेवाला कर्मठ भी पूर्व-पूर्व मृत्युसे मुक्त हो जाता है, अतः वह उस उत्कृष्ट फलको त्यागनेके लिये ही प्राप्त करता है, तद्रूप होनेके लिये नहीं। इस प्रकार द्वैतका क्षय होनेतक सब मृत्यु ही है, द्वैतका क्षय होनेपर तो वह परमार्थतः मृत्युकी प्राप्तिसे अतिमुक्त हो जाता है। इसलिये बीचमें जो मुक्ति बतलायी जाती है, वह आपेक्षिकी और गौणी ही है। इस प्रकार यह सब कल्पनाएँ बृहदारण्यकसे बाहरकी ही हैं। |
| ननु सर्वैकत्वं मोक्षः “तस्मात्तत्सर्वमभवत्” (बृ० उ० १ । ४ । १०) इति श्रुतेः। | पूर्व०—किंतु सबकी एकता तो मोक्ष ही है, क्योंकि “इसलिये वह सर्व हो गया” ऐसी श्रुति है। |
| बाढं भव्येतदपि, न तु “ग्रामकामो यजेत, पशुकामो यजेत” इत्यादिश्रुतीनां तादर्थ्यम् । यदि ह्यद्वैतार्थत्वमेव आसां ग्रामपशुस्वर्गाद्यर्थत्वं नास्तीति ग्रामपशु- | सिद्धान्ती—ठीक है, यह तो बृहदारण्यकका विषय है। परंतु “ग्रामकी इच्छावाला यजन करे, पशुओंकी इच्छावाला यजन करे” इत्यादि श्रुतियोंका तात्पर्य मोक्षमें नहीं हो सकता। यदि इनका तात्पर्य अद्वैतमें ही हो तो इनका ग्राम, पशु अथवा स्वर्गादिके लिये होना सम्भव नहीं है और इनसे |
६५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ६५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| स्वर्गादयो न गृह्येरन्, गृह्यन्ते तु कर्मफलवैचित्र्यविशेषाः । यदि च वैदिकानां कर्मणां तादर्थ्यमेव, संसार एव नाभाविष्यत् । | ग्राम, पशु और स्वर्गादिका ग्रहण भी नहीं होना चाहिये, परंतु कर्मफलवैचित्र्यरूप विशेषोंका ग्रहण होता ही है। यदि वैदिक कर्म मोक्षार्थ ही होते तो संसार ही नहीं रह सकता था ।^१ |
| अथ तादर्थ्येऽपि अनुनिष्पादितपदार्थस्वभावः संसार इति चेत् । यथा च रूपदर्शनार्थ आलोके सर्वोऽपि तत्रस्थः प्रकाश्यत एव । | पूर्व०—यद्यपि कर्मश्रुति मोक्षार्थक है, तो भी उसके पीछे निष्पन्न हुए पदार्थका स्वभाव ही संसार है, जिस प्रकार कि प्रकाश रूपदर्शनके लिये होनेपर भी उससे वहाँ रखे हुए सभी पदार्थ प्रकाशित होते ही हैं। [ अतः कर्मके मोक्षार्थक होनेपर संसार ही नहीं रह सकता था, ऐसी शङ्का नहीं उठानी चाहिये ] । |
| न; प्रमाणानुपपत्तेः। अद्वैतार्थत्वे वैदिकानां कर्मणां विद्यासहितानाम् अन्यस्यानुनिष्पादितत्वे प्रमाणानुपपत्तिः । न प्रत्यक्षं नानुमानमत एव च नागमः । | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं हो सकता। यदि ज्ञानसहित वैदिक कर्मोंको मोक्षार्थक माना जाय तो उनसे किसी अन्य पदार्थके अनुनिष्पन्न होनेमें कोई प्रमाण नहीं हो सकता। इसमें न प्रत्यक्ष प्रमाण हो सकता है न अनुमान और इसीसे आगम प्रमाण भी नहीं हो सकता । |
१. संसारका मूल तो कर्मफल ही है। उसीके भोगके लिये उत्तमाधम योनियोंकी प्राप्ति होती है। यदि कर्मोंका फल मोक्ष ही माना जाय तो फिर संसारका कोई कारण ही नहीं रहता ।
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५१
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५१
| उभयम् एकेन वाक्येन प्रदर्श्यत इति चेत् कुल्याप्रणयनालोकादिवत् । तन्नैवम्; वाक्यधर्मानुपपत्तेः। न च एकवाक्यगतस्यार्थस्य प्रवृत्तिनिवृत्तिसाधनत्वमवगन्तुं शक्यते । कुल्याप्रणयनालोकाद्यार्थस्य प्रत्यक्षत्वाददोषः ।<br><br>यदप्युच्यते मन्त्रा अस्मिन्नर्थे दृष्टा इति । अयमेव तु तावदर्थः प्रमाणागम्यः। मन्त्राः पुनः किम् अस्मिन्नर्थ आहोस्विदन्यस्मिन्नर्थ इति मृग्यमेतत् । तस्माद् ग्रहातिग्रहलक्षणो मृत्युर्बन्धः, तस्मा- | पूर्वं०—यदि ऐसा मानें कि नाली निकालने और प्रकाश करने आदिके समान एक ही वाक्यसे [ कर्मफल और मोक्ष ] दोनोंका प्रदर्शन हो जाता है तो?¹<br><br>सिद्धान्ती—यह बात ऐसी नहीं है, क्योंकि ऐसा होना वाक्यका धर्म नहीं हो सकता। एक ही वाक्यका अर्थ प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनोंका साधन हो—यह नहीं जाना जा सकता। नाली निकालने और प्रकाश करने आदिमें तो यह बात प्रत्यक्ष देखी जाती है, इसलिये इसमें कोई दोष नहीं है।<br><br>और ऐसा जो कहा जाता है कि इस अर्थमें [ 'विद्यां चाविद्यां च' इत्यादि ] मन्त्र देखे गये हैं, सो पहले तो यह विषय ही किसी भी प्रमाणसे अवगत होनेवाला नहीं है। मन्त्र भी क्या इसी अर्थमें हैं? अथवा किसी अन्य अर्थमें हैं?—यह बात भी विचारणीय ही है।<br><br>अतः ग्रहातिग्रहरूप मृत्यु बन्धन है, उससे मुक्त होनेका उपाय |
१. नाली खेती सींचनेके लिये निकाली जाती है, परंतु वह आचमनादिमें भी उपयोगी होती है; प्रकाश रूपप्रकाशनके लिये किया जाता है, परंतु वह गमनादि क्रियाओंमें भी सहायक होता है, इसी प्रकार एक ही कर्मप्रतिपादक वाक्य कर्मफल और मोक्ष दोनोंकी प्राप्तिका कारण हो सकता है—यह पूर्वपक्षका अभिप्राय है।
६५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ६५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| न्मोक्षो वक्तव्य इत्यत इदमारभ्यते। <br><br> न च जानीमो विषयसन्धात्रि- <br> वान्तरालेऽवस्थानमर्धजरतीयं कौ- <br> शलम् । यत्तु मृत्योरतिमुच्यत <br> इत्युक्त्वा ग्रहातिग्रहावुच्येते, तच्च- <br> र्थसम्बन्धात् । सर्वोऽयं साध्य- <br> साधनलक्षणो बन्धः, ग्रहातिग्रहा- <br> विनिर्मोक्षात् । निगडे हि निर्ज्ञाते <br> निगडितस्य मोक्षाय यत्नः कर्तव्यो <br> भवति; तस्मात्तदर्थ्येनारम्भः । | बतलाना है, इसलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। जैसे जाग्रत्-स्वप्न आदि दो विषयोंकी सन्धिमें स्थित होना असम्भव है, उसी प्रकार वैदिक कर्मोंसे न बन्धन होता है न मोक्ष, अपितु बीचकी अवस्था प्राप्त होती है-ऐसी कल्पना भी असङ्गत है, अतः हम इस प्रकार अर्धजरतीय व्याख्या करनेकी युक्ति नहीं जानते।¹ यहाँ जो मृत्युसे अतिमुक्त हो जाता है-ऐसा कहकर ग्रह और अतिग्रहका वर्णन किया जाता है, वह तो अर्थके सम्बन्धसे है, यह सब साध्य-साधनरूप बन्धन है; क्योंकि उसके द्वारा ग्रह और अतिग्रहसे उसकी मुक्ति नहीं होती। बन्धनका ज्ञान होनेपर ही उसमें बँधे हुए पुरुषका उससे मुक्त होनेके लिये यत्न करना आवश्यक होता है; अतः मोक्षके लिये ही इसका आरम्भ हुआ है। |
ग्रह और अतिग्रहकी संख्या एवं स्वरूप
अथ हैनं जारत्कारव आर्तभागः पप्रच्छ याज्ञ-
वल्क्येति होवाच कति ग्रहाः कत्यतिग्रहा इति । अष्टौ
ग्रहा अष्टावतिग्रहा इति ये तेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः
कतमे त इति ॥ १ ॥
१. जैसे आधी गाय बूढ़ी हो जाय और आधी जवान रहकर बच्चा देती रहे। यह अर्धजरतीय कल्पना असम्भव है, उसी प्रकार कर्मकाण्ड साक्षात् मोक्ष या बन्धनका नहीं, दोनोंके बीचकी स्थितिका कारण है—ऐसा अर्थ भी असंगत ही है।
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५३
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५३
फिर उस (याज्ञवल्क्य) से जारत्कारव आर्तभागने पूछा; वह बोला, 'याज्ञवल्क्य ! ग्रह कितने हैं और अतिग्रह कितने हैं?' [ याज्ञवल्क्य- ] 'आठ ग्रह हैं और आठ अतिग्रह हैं।' [ आर्तभाग- ] 'वे जो आठ ग्रह और आठ अतिग्रह हैं, वे कौन-से हैं?' ॥ १ ॥
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| **अथ हैनम्-**हशब्द ऐतिह्यार्थः ! अथानन्तरमश्वले उपरते प्रकृतं याज्ञवल्क्यं जरत्कारुगोत्रो जारत्कारवः-ऋतभागस्यापत्यमार्तभागः पप्रच्छ । याज्ञवल्क्येति होवाचेत्यभिमुखीकरणाय । पूर्ववत् प्रश्नः—कति ग्रहाः कत्यतिग्रहा इति । इतिशब्दो वाक्यपरिसमाप्त्यर्थः । | 'अथ हैनम्' इसमें 'ह' शब्द इतिहासको सूचित करनेके लिये है। अथ-अनन्तर यानी अश्वलके चुप हो जानेपर उस प्रकृत याज्ञवल्क्यसे जो जरत्कारुगोत्रवाला था उस जारत्कारव आर्तभाग—ऋतभागके पुत्रने पूछा। वह अपने अभिमुख करनेके लिये बोला—'हे याज्ञवल्क्य !'। 'कितने ग्रह हैं और कितने अतिग्रह हैं। यह प्रश्न पहलेहीके समान है। इसमें 'इति' शब्द वाक्यकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है। |
| तत्र निर्ज्ञातेषु वा ग्रहातिग्रहेषु प्रश्नः स्यादनिर्ज्ञातेषु वा ? यदि तावद्ग्रहा अतिग्रहाश्च निर्ज्ञाताः, तदा तद्गतस्यापि गुणस्य सङ्ख्याया निर्ज्ञातत्वात् कति ग्रहाः कत्यतिग्रहा इति सङ्ख्याविषयः प्रश्नो नोपपद्यते । अथानिर्ज्ञातास्तदा | किंतु यह प्रश्न सम्यक् प्रकारसे जाने हुए ग्रह और अतिग्रहोंके विषयमें है अथवा न जाने हुओंके विषयमें ? यदि ग्रह और अतिग्रह सम्यक् प्रकारसे ज्ञात हों तो उनमें रहनेवाला गुण जो संख्या है, वह भी ज्ञात ही रहेगी; उस अवस्थामें 'ग्रह कितने हैं और अतिग्रह कितने हैं, ऐसा संख्याविषयक प्रश्न उपपन्न नहीं होगा। और यदि उन्हें अज्ञात माना |
६५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ६५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| सङ्ख्येयविषयप्रश्न इति के ग्रहाः केऽतिग्रहा इति प्रष्टव्यं न तु कति ग्रहाः कत्यतिग्रहा इति प्रश्नः। | जाय तो संख्येयविषयक प्रश्न होगा। ऐसी दशामें 'ग्रह कौन हैं और अतिग्रह कौन हैं' इस प्रकार प्रश्न करना चाहिये। 'ग्रह कितने हैं और अतिग्रह कितने हैं।' ऐसा प्रश्न नहीं। |
| अपि च निर्ज्ञातसामान्यकेषु विशेषविज्ञानाय प्रश्नो भवति— यथा कतमेऽत्र कठाः कतमेऽत्र कालापा इति। न चात्र ग्रहातिग्रहा नाम पदार्थाः केचन लोके प्रसिद्धाः, येन विशेषार्थः प्रश्नः स्यात्। | इसके सिवा, जिनके सामान्य स्वरूपका ज्ञान होता है, उन्हींके विशेषरूप जाननेके लिये ऐसा प्रश्न हुआ करता है, जिस प्रकार [ ये ब्राह्मण कठशाखा और कलापशाखाके हैं-ऐसा सामान्य ज्ञान होनेपर ] यह प्रश्न हो सकता है कि 'इनमें कठशाखाके कौन-से हैं और कलापशाखाके कौन-से हैं ?' किंतु यहाँ ग्रह और अतिग्रह नामवाले कोई पदार्थ लोकमें प्रसिद्ध नहीं हैं, जिससे कि उनके विशेष ज्ञानके लिये प्रश्न किया जाय। |
| ननु च 'अतिमुच्यते' इत्युक्तम्, ग्रहगृहीतस्य हि मोक्षः; 'स मुक्तिः सातिमुक्तिः' इति हि द्विरुक्तम्, तस्मात्प्राप्ता ग्रहा अतिग्रहाश्च। | किंतु पहले 'अतिमुच्यते'—अतिमुक्त होता है—ऐसा कहा गया है और मुक्ति ग्रहगृहीतकी ही होती है; और वहाँ 'वह मुक्ति है, वह अतिमुक्ति है' इस प्रकार दो बार कहा है, इससे ग्रह और अतिग्रह दोनोंहीकी प्राप्ति होती है। |
| ननु तत्रापि चत्वारो ग्रहा अतिग्रहाश्च निर्ज्ञाता वाक्चक्षुः | शङ्का—किंतु वहाँ तो वाक्, चक्षु, प्राण और मन—इन चार ग्रह और अतिग्रहोंका ज्ञान है ही; अतः |
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५५
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५५
| प्राणमनांसि, तत्र कतीति प्रश्नो नोपपद्यते निर्ज्ञातत्वात् । <br><br> न; अनवधारणार्थत्वात्; न हि चतुष्ट्वं तत्र विवक्षितम्, इह तु ग्रहातिग्रहदर्शनेऽष्टत्वगुणविवक्षया कतीति प्रश्न उपपद्यत एव । तस्मात् ‘स मुक्तिः सातिमुक्तिः’ इति मुक्त्यतिमुक्ती द्विरुक्ते । ग्रहातिग्रहा अपि सिद्धाः, अतः कतिसङ्ख्याका ग्रहाः कति वा अतिग्रहा इति पृच्छति । इतर आह—अष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहा इति । ये तेऽष्टौ ग्रहा अभिहिताः कतमे ते नियमेन ग्रहीतव्या इति ॥ १ ॥ | सम्यक् प्रकारसे ज्ञान होनेके कारण उनके विषयमें 'वे कितने हैं' ऐसा प्रश्न होना उपपन्न नहीं है । <br><br> समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि वहाँ ऐसा निश्चय नहीं किया गया अर्थात् वहाँ यह बतलाना अभीष्ट नहीं है कि वे चार ही हैं; यहाँ तो ग्रह-अतिग्रह दर्शनमें उनका आठ होना—यह गुण बतलाना अभीष्ट है, इसलिये वे कितने हैं? ऐसा प्रश्न बन ही सकता है। पूर्व ब्राह्मणवाक्यसे ‘स मुक्तिः सातिमुक्तिः’ इस प्रकार मुक्ति और अतिमुक्ति दो बतलाये गये हैं, इसलिये ग्रह और अतिग्रह भी सिद्ध हो जाते हैं। इसीसे आर्तभाग यह प्रश्न करता है कि ग्रह कितनी संख्यावाले हैं और अतिग्रह कितने हैं। इसपर याज्ञवल्क्य कहते हैं—आठ ग्रह हैं और आठ अतिग्रह हैं। तब आर्तभाग पूछता है—वे जो आठ ग्रह बतलाये गये, सो नियमसे किन्हें ग्रहण करना चाहिये ॥ १ ॥ |
घ्राणादि इन्द्रियोंका ग्रहत्व और गन्धादि विषयोंका अतिग्रहत्वनिरूपण
| तत्राह— | इसपर याज्ञवल्क्य कहता है – |
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प्राणो वै ग्रहः सोऽपानेनातिग्राहेण गृहीतोऽपानेन हि गन्धाञ्जिघ्रति ॥ २ ॥
६५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ६५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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प्राण ही ग्रह है, वह अपानरूप अतिग्राहसे गृहीत है, क्योंकि प्राण अपानसे ही गन्धोंको सूँघता है ॥ २ ॥
| प्राणो वै ग्रहः— प्राण इति घ्राणमुच्यते, प्रकरणात् । वायुसहितः सः । अपानेनेति गन्धेनेत्येतत् । अपानसचिवत्वादपानो गन्ध उच्यते । अपानोपहृतं हि गन्धं घ्राणेन सर्वो लोको जिघ्रति । तदेतदुच्यते—अपानेन हि गन्धाञ्जिघ्रतीति ।२। | प्राण ही ग्रह है—'प्राण' शब्दसे यहाँ घ्राणेन्द्रिय कही गयी है, क्योंकि उसीका प्रकरण है। वह वायुके सहित है। अपानसे अर्थात् गन्धसे। अपान गन्धका साथी है, इसलिये अपानको गन्ध कहा गया है, क्योंकि सम्पूर्ण लोक अपानद्वारा लाये गये गन्धको ही घ्राणेन्द्रियद्वारा सूँघता है। इसीसे यह कहा जाता है कि प्राणी अपानसे ही गन्धोंको सूँघता है ॥ २ ॥ |
वाग् वै ग्रहः स नाम्नातिग्राहेण गृहीतो वाचा हि नामान्यभिवदति ॥ ३ ॥
जिह्वा वै ग्रहः स रसेनातिग्राहेण गृहीतो जिह्वया हि रसान् विजानाति ॥ ४ ॥
चक्षुर्वै ग्रहः स रूपेणातिग्राहेण गृहीतश्चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति ॥ ५ ॥
श्रोत्रं वै ग्रहः स शब्देनातिग्राहेण गृहीतः श्रोत्रेण हि शब्दाञ्शृणोति ॥ ६ ॥
मनो वै ग्रहः स कामेनातिग्राहेण गृहीतो मनसा हि कामान् कामयते ॥ ७ ॥
हस्तौ वै ग्रहः स कर्मणातिग्राहेण गृहीतो हस्ताभ्यां हि कर्म करोति ॥ ८ ॥
त्वग् वै ग्रहः स स्पर्शेनातिग्राहेण गृहीतस्त्वचा हि स्पर्शान् वेदयत इत्येतेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः ॥ ९ ॥
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५७
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५७
वाक् ही ग्रह है, वह नामरूप अतिग्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणी वाक्से ही नामोंका उच्चारण करता है॥ ३॥ जिह्वा ही ग्रह है, वह रसरूप अतिग्रहसे गृहीत है; क्योंकि प्राणी जिह्वासे ही रसोंको विशेषरूपसे जानता है ॥ ४ ॥ चक्षु ही ग्रह है, वह रूप अतिग्रहसे गृहीत है; क्योंकि प्राणी चक्षुसे ही रूपोंको देखता है ॥ ५ ॥ श्रोत्र ही ग्रह है, वह शब्दरूप अतिग्रहसे गृहीत है; क्योंकि प्राणी श्रोत्रसे ही शब्दोंको सुनता है ॥ ६ ॥ मन ही ग्रह है, वह कामरूप अतिग्रहसे गृहीत है; क्योंकि प्राणी मनसे ही कामोंकी कामना करता है ॥ ७ ॥ हस्त ही ग्रह हैं, वे कर्मरूप अतिग्रहसे गृहीत हैं; क्योंकि प्राणी हस्तसे ही कर्म करता है ॥ ८ ॥ त्वचा ही ग्रह है, वह स्पर्शरूप अतिग्रहसे गृहीत है; क्योंकि प्राणी त्वचासे ही स्पर्शोंको जानता है। इस प्रकार ये आठ ग्रह हैं और आठ अतिग्रह हैं ॥ ६ ॥
| संस्कृत | हिन्दी |
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| वाग् वै ग्रहः—वाचा ह्यध्यात्मपरिच्छिन्नया आसङ्गविषयास्पद-या असत्यानृतासभ्यबीभत्सादि-वचनेषु व्यापृतया गृहीतो लोकोऽपहृतः, तेन वाग् ग्रहः। स नाम्नातिग्राहेण गृहीतः—स वागाख्यो ग्रहः; नाम्ना वक्तव्येन विषयेणातिग्रहेण, अतिग्राहेणेति दैर्घ्यं छान्दसं नाम। वक्तव्यार्था हि वाक्; तेन वक्तव्येनार्थेन तादर्थ्येन प्रयुक्ता वाक् तेन वशीकृता; तेन तत्कार्यमकृत्वा नैव तस्या मोक्षः। अतो | वाक् ही ग्रह है; क्योंकि असत्य, अनृत, असभ्य एवं बीभत्सादि वचनोंमें प्रवृत्ता आसक्तिकी विषयभूता अध्यात्मपरिच्छिन्ना वाक्से ही गृहीत होकर लोक भूला हुआ है, इसलिये वाक् ग्रह है। वह नामरूप अतिग्रहसे गृहीत है—वह वाक्संज्ञक ग्रह नाम अर्थात् वक्तव्य विषयरूप अतिग्रहसे गृहीत है। ‘अतिग्रहेण' के स्थानमें ‘अतिग्राहेण' ऐसा दीर्घ प्रयोग छान्दस (वैदिकप्रक्रियाके अनुसार) है। वाक् वक्तव्य विषयके ही लिये होती है; उस वक्तव्य अर्थसे उसीके लिये प्रयुक्त होनेवाली वाक् उसीके वशीभूत है; अतः उस कार्यको किये बिना उसकी मुक्ति |
बृ० उ० ४२-
६५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ६५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| नाम्नातिग्राहेण गृहीता वागित्युच्यते। वक्तव्यासङ्गेन हि प्रवृत्ता सर्वानर्थैर्युज्यते। समानमन्यत्। इत्येते त्वक्पर्यन्ता अष्टौ ग्रहाः स्पर्शपर्यन्ताश्चैतेऽष्टावतिग्रहा इति ॥ ३-९ ॥ | नहीं है। इसीसे यह कहा जाता है कि वाक् नामरूप अतिग्राहसे गृहीत है; क्योंकि वक्तव्यकी आसक्तिसे प्रवृत्त होनेपर वह समस्त अनर्थोंसे युक्त होती है। शेष मन्त्रोंका अर्थ इसीके समान है। इस प्रकार ये त्वक्पर्यन्त आठ ग्रह हैं और स्पर्शपर्यन्त आठ अतिग्रह हैं ॥ ३-६ ॥ |
सर्वभक्षक मृत्यु किसका खाद्य है ?
| उपसंहृतेषु ग्रहातिग्रहेषु आह पुनः— | ग्रह और अतिग्रहोंका उपसंहार हो जानेपर आर्तभाग फिर कहता है— |
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याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदँ सर्वं मृत्योरन्नं का स्वित् सा देवता यस्या मृत्युरन्नमित्यग्निर्वै मृत्युः सोऽपामन्नमप पुनर्मृत्युं जयति ॥ १० ॥
'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा, 'यह जो कुछ है सब मृत्युका खाद्य है; सो वह देवता कौन है, जिसका खाद्य मृत्यु है।' [ इसपर याज्ञवल्क्य कहता है— ] 'अग्नि ही मृत्यु है, वह जलका खाद्य है। [ इस प्रकारके ज्ञानसे ] पुनर्मृत्युका पराजय होता है' ॥ १० ॥
| याज्ञवल्क्येति होवाच, यदिदं सर्वं मृत्योरन्नम्—यदिदं व्याकृतं सर्वं मृत्योरन्नम्, सर्वं जायते विपद्यते च ग्रहातिग्रहलक्षणेन मृत्युना ग्रस्तम्—का स्वित् का नु | 'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा, 'वह जो कुछ है, सब मृत्युका खाद्य है—यह जितना व्याकृत जगत् है, सब मृत्युका खाद्य है; क्योंकि ग्रहातिग्रहरूप मृत्युसे ग्रस्त होकर सब उत्पन्न होता और नाशको प्राप्त होता है, अतः वह |
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