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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१०४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

१०४८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| भवन् क्रतुत्वमापद्यते। क्रतुर्नामाध्यवसायो निश्चयो यदनन्तरा क्रिया प्रवर्तते। <br><br> यत्क्रतुर्भवति यादृक्कामकार्येण क्रतुना यथारूपः क्रतुरस्य सोऽयं यत्क्रतुर्भवति, तत् कर्म कुरुते, यद्विषयः क्रतुस्तत्फलनिर्वृत्तये यद् योग्यं कर्म, तत् कुरुते निर्वर्तयति, यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते, तदीयं फलमभिसम्पद्यते। तस्मात् सर्वमयत्वेऽस्य संसारित्वे च काम एव हेतुरिति ॥ ५ ॥ | होनेपर क्रतुरूप हो जाती है। 'क्रतु' अध्यवसाय अर्थात् निश्चयको कहते हैं, जिसके पीछे क्रियाकी प्रवृत्ति होती है। <br><br> यह 'यत्क्रतु' होता है अर्थात् कामनाके कार्यरूप जिस प्रकारके क्रतुसे यह युक्त होता है, इस प्रकार यह जैसे क्रतुवाला होता है, वही कर्म करता है। इसका जिस विषयको लेकर क्रतु होता है, उसका फल सिद्ध करनेके लिये जो योग्य कर्म होता है, उसीको करता है और जैसा कर्म करता है, वही अभिसम्पन्न होता अर्थात् उसीका फल प्राप्त करता है। अतः इसके सर्वमयत्व और सांसारित्वमें कामना ही कारण है ॥ ५ ॥ |

कामनाके अनुसार शुभाशुभ गति तथा निष्काम ब्रह्मज्ञके मोक्षका निरूपण

तदेष श्लोको भवति। तदेव सक्तः सह कर्मणैति लिङ्गं मनो यत्र निषक्तमस्य। प्राप्यान्तं कर्मणस्तस्य यत्किञ्चेह करोत्ययम्। तस्माल्लोकात् पुनरैत्यस्मै लोकाय कर्मण इति नु कामयमानोऽथाकामयमानो योऽकामो निष्काम आप्तकाम आत्मकामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति ॥ ६॥

उस विषयमें यह मन्त्र है—इसका लिङ्ग अर्थात् मन जिसमें अत्यन्त आसक्त होता है, उसी फलको यह साभिलाष होकर कर्मके सहित प्राप्त