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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

६८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

Page 690Permalink
६८०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
संस्कृतहिन्दी
चेत् कर्मफलं कल्पयितव्यम्, कर्माविरुद्धविषय एव श्रुतार्थापत्तेः क्षीणत्वान्नित्यो मोक्षः फलं कल्पयितुं न शक्यः, तद्व्यवधानाज्ञाननिवृत्तिर्वा; अविरुद्धत्वाद् दृष्टसामर्थ्यविषयत्वाच्चेति ।कल्पना करनी आवश्यक ही है तो श्रुतार्थापत्तिका पर्यवसान कर्मके अविरोधी विषयों (उत्पत्ति, आप्ति, संस्कार और विकार) में ही होनेके कारण उन्हींकी कल्पना करनी चाहिये, नित्य मोक्ष अथवा मोक्षके व्यवधानभूत अज्ञानकी निवृत्ति—ये कर्मोंके फलरूपसे कल्पना नहीं किये जा सकते; क्योंकि कर्म और अज्ञानका अविरोध है और जिन (उत्पत्ति आदि) में उनका सामर्थ्य देखा गया है, वे ही उनके विषय हैं।
पारिशेष्यन्यायान्मोक्ष एव कल्पयितव्य इति चेत्—सर्वेषां हि कर्मणां सर्वं फलम्, न चान्यदितरकर्मफलव्यतिरेकेण फलं कल्पनायोग्यमस्ति; परिशिष्टश्च मोक्षः, स चेष्टो वेदविदां फलम्; तस्मात् स एव कल्पयितव्य इति चेत् ?पूर्व०—पारिशेष्यन्यायसे मोक्षको ही नित्यकर्मोंका फल मानना चाहिये—ऐसा कहें तो ? तात्पर्य यह है कि सब कुछ समस्त कर्मोंका ही फल है, नित्य कर्मोंके सिवा अन्य जितने कर्म हैं, उनके फलोंसे भिन्न कोई और ऐसी वस्तु नहीं है, जो नित्य कर्मोंके फलरूपसे कल्पना किये जानेयोग्य हो; ऐसा तो केवल मोक्ष ही अवशिष्ट रहता है, अतः वेदवेत्ताओंको वही उसका फल इष्ट है; इसलिये उसीकी उसके फलरूपसे कल्पना करनी चाहिये—यदि ऐसा मानें तो ?
न, कर्मफलव्यक्तीनाम् आनन्त्यात्पारिशेष्यन्यायानुपपत्तेः ।सिद्धान्ती—यह ठीक नहीं है, क्योंकि कर्मफलकी व्यक्तियाँ तो अनन्त हैं, इसलिये उनमें पारिशेष्य-न्याय लगाना उचित नहीं है।