बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १११ |
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १११ |
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| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| त्रात्मना अत्येष्यन्त्यतिगमिष्यन्ति। इत्येवं विज्ञाय तमूद्गातारमभिद्रुत्याभिगम्य स्वेन आसङ्गलक्षणेन पाप्मनाविध्यंस्ताडितवन्तः संयोजितवन्त इत्यर्थः।<br><br>स यः स पाप्मा प्रजापतेः पूर्वजन्मावस्थस्य वाचि क्षिप्तः स एष प्रत्यक्षीक्रियते। कोऽसौ ? यदेवेदमप्रतिरूपमननुरूपं शास्त्रप्रतिषिद्धं वदति येन प्रयुक्तोऽसभ्यबीभत्सानृताद्यनिच्छन्नपि वदति। अनेन कार्येणाप्रतिरूपवदनेन अनुगम्यमानः प्रजापतेः कार्यभूतासु प्रजासु वाचि वर्तते। स एवाप्रतिरूपवदनेनानुमितः स प्रजापतेर्वाचि गतः पाप्मा, कारणानुविधायि हि कार्यमिति ॥ २ ॥ | अतिगमन—उल्लङ्घन करेंगे। इस प्रकार जानकर उस उद्गाताके पास जाकर उन्होंने अपने अभिनिवेशरूप पापसे उसे विद्ध—ताड़ित अर्थात् संयुक्त कर दिया।<br><br>वह जो पाप पूर्वजन्मावस्थित प्रजापतिकी वाणीमें डाला गया था वही यह प्रत्यक्ष किया जाता है। वह कौन-सा है? यह जो अप्रतिरूप—अननुरूप यानी शास्त्रसे प्रतिषिद्ध भाषण करती है। जिससे प्रेरित होकर ही यह इच्छा न होनेपर भी असभ्यतापूर्ण, बीभत्स और अनृतादि भाषण करती है। इस अननुरूप भाषणरूप कार्यसे अनुगत होता हुआ वह पाप प्रजापतिकी कार्यभूता प्रजाओंकी वाणीमें विद्यमान है। प्रजापतिकी वाणीमें पहुँचा हुआ वही पाप अननुरूप भाषणसे अनुमित होता है, क्योंकि कार्य तो कारणका अनुवर्त्तन करनेवाला होता है ॥ २ ॥ |
प्राण, चक्षु, श्रोत्र और मनका उद्गान तथा उनका पापविद्ध होना
अथ ह प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति। तथेति तेभ्यः प्राण उदगायद्यः प्राणे भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत्कल्याणं
११२ वृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १
जिघ्रति तदात्मने। ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं जिघ्रति स एव स पाप्मा ॥ ३ ॥
फिर उन्होंने प्राणसे कहा, "तुम हमारे लिये उद्गान करो।" तब प्राणने 'तथास्तु' कहकर उनके लिये उद्गान किया। प्राणमें जो भोग है उसे उसने देवताओंके लिये आगान किया और जो कुछ वह शुभ सूँघता है उसे अपने लिये गाया। असुरोंको मालूम हुआ कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे। अतः उन्होंने उनके समीप जाकर उसे पापसे विद्ध कर दिया। यह जो अननुरूप सूँघता है, यही वह पाप है, यही वह पाप है ॥ ३ ॥
अथ ह चक्षुरूचुस्त्वं न उद्गायेति। तथेति तेभ्यश्चक्षुरुद्गायद्यश्चक्षुषि भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत् कल्याणं पश्यति तदात्मने। ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं पश्यति स एव स पाप्मा ॥४॥
फिर उन्होंने चक्षुसे कहा, "तुम हमारे लिये उद्गान करो" तब चक्षुने 'तथास्तु' कहकर उनके लिये उद्गान किया। चक्षुमें जो भोग है उसे उसने देवताओंके लिये आगान किया और जो कुछ वह शुभ दर्शन करता है उसे अपने लिये गाया। असुरोंको मालूम हुआ कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे। अतः उन्होंने उसके पास जाकर उसे पापसे विद्ध कर दिया। यह जो अननुरूप देखता है यही वह पाप है, यही वह पाप है ॥ ४ ॥
अथ ह श्रोत्रमूचुस्त्वं न उद्गायेति। तथेति तेभ्यः श्रोत्रमुद्गायद्यःश्रोत्रे भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत्कल्याणं