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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

९१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

Page 932Permalink
९१८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| धावभासमात्रस्वाभाव्याभ्युपगमात्, तद्दर्शिनश्चान्यस्याभावे, अनित्यदुःखशून्यानात्मत्वाद्यनेकरूपकल्पनानुपपत्तिः। न च दाडिमादेशिव विरुद्धानेकांशवत्त्वं विज्ञानस्य, स्वच्छावभासस्वाभाव्याद् ज्ञानस्य। अनित्यदुःखादीनां विज्ञानांशत्वे च सति—अनुभूयमानत्वाद् व्यतिरिक्तविषयत्वप्रसङ्गः।<br><br>अथ अनित्यदुःखाद्यात्मकत्वमेव विज्ञानस्य, तदा तद्वियोगाद् विशुद्धिकल्पनानुपपत्तिः; संयोगिमलवियोगाद्धि विशुद्धिर्भवति, यथा आदर्शप्रभृतीनाम्; न तु स्वाभाविकेन धर्मेण कस्यचिद् वियोगो दृष्टः; न ह्यग्नेः स्वाभाविकेन प्रकाशेन औष्ण्येन वा वियोगो | स्वरूप माननेपर यदि उसके साक्षी किसी अन्य पदार्थकी सत्ता नहीं मानी जायगी तो उसमें अनित्यत्व, दुःखत्व, शून्यत्व और अनात्मत्व आदि अनेकों कल्पनाओंकी उपपत्ति नहीं हो सकेगी। अनार आदिके समान विज्ञान बहुत-से विरुद्ध अंशोंसे युक्त हो—ऐसी बात भी है नहीं, क्योंकि विज्ञान तो स्वच्छ प्रकाशस्वरूप है। यदि अनित्य दुःखादिको विज्ञानका अंश माना जाय तो अनुभूत होनेवाले होनेके कारण उन्हें किसी दूसरेका विषय माननेका प्रसङ्ग होगा।<sup>१</sup><br><br>और यदि विज्ञानको अनित्य दुःखादिरूप ही माना जाय तो उनकी निवृत्तिद्वारा उसकी विशुद्धिकी कल्पना करनी सम्भव नहीं है, क्योंकि विशुद्धि तो लगे हुए मलको दूर करनेसे ही होती है, जैसे कि दर्पणादिकी; किंतु अपने स्वाभाविक धर्मसे किसीका भी वियोग होता नहीं देखा जाता; अग्निका अपने स्वाभाविक प्रकाश अथवा उष्णतासे वियोग |


१. क्योंकि विज्ञान ही अनुभव करनेवाला और अनित्यत्वादि विज्ञानके अंश ही उसके अनुभवके विषय हों—यह सम्भव नहीं है। कारण प्रमेय और प्रमाणका अंशांशिभाव अथवा धर्म-धर्मिभाव किसी भी प्रकार नहीं हो सकता, वे अवश्य पृथक्-पृथक् ही होने चाहिये।