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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९३
Page 601Permalink
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९३
| जातिविशेषो मानुषादिः। तत्र मानुषादिजातिविशिष्टा एव सर्वे प्राणिनिकायाः परस्परोपकार्योपकारकभावेन वर्तमाना दृश्यन्ते। अतः— | जातिविशेष मनुष्य आदि है। तहाँ सम्पूर्ण जीवसमुदाय मनुष्यादि जातिविशिष्ट होकर ही परस्पर उपकार्योपकारकभावसे विद्यमान दिखायी देते हैं। अतः— |
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इदं मानुषँ सर्व्वेषां भूतानां मध्वस्य मानुषस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् मानुषे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानुषस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्व्वम् ॥ १३ ॥
यह मनुष्यजाति समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस मनुष्यजातिके मधु हैं। यह जो इस मनुष्यजातिमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म मानुष तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [इस श्रुतिद्वारा बतलाया गया है]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ १३ ॥
| मानुषादिजातिरपि सर्वेषां भूतानां मधु। तत्र मानुषादिजातिरपि बाह्या आध्यात्मिकी चेत्युभयथा निर्देशभाग्भवति। १३। | मनुष्यादि जाति भी समस्त भूतोंका मधु है। वह मनुष्यजाति भी बाह्य और आध्यात्मिक भेदसे दो तरहके निर्देशवाली है ॥ १३ ॥ |
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| यस्तु कार्यकारणसङ्घातो मानुषादिजातिविशिष्टः सः— | जो भी मनुष्यादि जातिविशिष्ट देहेन्द्रियसंधात है वह— |
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अयमात्मा सर्वेषां भूतानां मध्वस्यात्मनः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नात्मनि तेजोमयोऽमृतमयः
बृ० उ० ३८—