सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

१६४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| त्वमित्युत्तरार्थं चेति । न हि संसारविषयात्साध्यसाधनादिभेदलक्षणाद् अविरक्तस्य आत्मैकत्वज्ञानविषयेऽधिकारः, अतृषितस्येव पाने । तस्माज्ज्ञानकर्मफलोत्कर्षवर्णनमुत्तरार्थम् । तथा च वक्ष्यति—"तदेतत्पदनीयमस्य" (बृ० उ० १ । ४ । ७) "तदेतत्प्रेयः पुत्रात्" (बृ० उ० १ । ४ । ८) इत्यादि । | विषयका प्रदर्शन करनेके लिये भी यह कथन है। जिस प्रकार तृषाहीनकी जल पीनेमें प्रवृत्ति नहीं होती उसी प्रकार जो साध्यसाधनादि भेदरूप सांसारिक विषयसे विरक्त नहीं है उसका आत्माके एकत्वज्ञानरूप विषयमें अधिकार नहीं है। अतः ज्ञान और कर्मके फलोत्कर्षका वर्णन आगेके विषय (ब्रह्मविद्या) के लिये है। ऐसा ही श्रुति कहेगी भी— "यह इसका प्राप्तव्य है", "यह पुत्रसे अधिक प्रिय है" इत्यादि। |

प्रजापतिके अहंनामा होनेका कारण और उसकी इस प्रकार उपासना करनेका फल

आत्मैवेदमग्र आसीत्पुरुषविधः सोऽनुवीक्ष्य नान्यदात्मनोऽपश्यत्सोऽहमस्मीत्यग्रे व्याहरत्ततोऽहंनामाभवत्तस्मादप्येतर्ह्यामन्त्रितोऽहमयमित्येवाग्र उक्त्वाथान्यन्नाम प्रब्रूते यदस्य भवति स यत्पूर्वोऽस्मात्सर्वस्मात्सर्वान्पाप्मन औषत्तस्मात्पुरुष ओषति ह वै स तं योऽस्मात्पूर्वो बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥

पहले यह पुरुषाकार आत्मा ही था। उसने आलोचना करनेपर अपनेसे भिन्न और कोई न देखा। उसने आरम्भमें 'अहमस्मि'¹ ऐसा कहा, इसलिये वह 'अहम्' नामवाला हुआ। इसीसे अब भी पुकारे जानेपर पहले 'अयमहम्'² ऐसा ही कहकर उसके पश्चात् अपना जो दूसरा नाम


१. मैं हूँ। २. यह मैं हूँ।