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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

७४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

Page 750Permalink
७४०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
प्राण्युपभोगाश्रयाकारपरिणतानि भूतानि संहतानि तान्येव पञ्चेति बहुवचनभाञ्जि।उपभोगके आश्रय (शरीर) के आकारमें परिणत हुए परस्परसंहत वे ही पाँच भूत हैं, इसलिये वे बहुवचनके भागी हैं।
कस्मिन्नु खलु ब्रह्मलोका ओताश्च प्रोताश्चेति—स होवाच याज्ञवल्क्यो हे गार्गि मातिप्राक्षीः स्वं प्रश्नम्, न्यायप्रकारमतीत्य आगमेन प्रष्टव्यां देवतामनुमानेन मा प्राक्षीरित्यर्थः; पृच्छन्त्याश्च मा ते तव मूर्धा शिरो व्यपप्तद् विस्पष्टं पतेत्; देवतायाः स्वप्रश्न आगमविषयः; तं प्रश्नविषयमतिक्रान्तो गार्ग्याः प्रश्नः; आनुमानिकत्वात् स यस्या देवतायाः प्रश्नः सातिप्रश्न्या, नातिप्रश्न्यानातिप्रश्न्या, स्वप्रश्नविषयैव, केवलागमगम्येत्यर्थः; तामनतिप्रश्न्यां वै देवतामतिपृच्छसि। अतो गार्गि मातिप्राक्षीः,[गार्गी—] 'अच्छा तो, वे ब्रह्मलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' इसपर उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे गार्गि! तू अपने प्रश्नको अतिप्रश्न न कर, अर्थात् न्यायोचित प्रकारको छोड़कर आचार्यपरम्पराद्वारा पूछनेयोग्य शास्त्रगम्य देवताको अनुमानसे मत पूछ। इस प्रकार पूछनेसे तेरा मूर्द्धा—मस्तक व्यपतित—विस्पष्टतया पतित न हो जाय!' यह देवताका स्वप्रश्न शास्त्रका विषय है; गार्गीका प्रश्न आनुमानिक होनेके कारण उस प्रश्नविषयका अतिक्रमण कर गया है; यह प्रश्न जिस देवताके विषयमें है, वह अतिप्रश्न्या हो रही है; किंतु वह नातिप्रश्न्या—अतिप्रश्न करनेके अयोग्य अर्थात् अपने प्रश्नकी ही विषय है; तात्पर्य यह है कि 'वह केवल आचार्योपदेशसे शास्त्रद्वारा ही जानी जा सकती है, उस अनतिप्रश्न्या देवताके विषयमें तू अतिप्रश्न करती है। अतः हे गार्गि! यदि तुझे मरनेकी इच्छा न हो तो