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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

९६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

९६८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

मोक्षका स्वरूप प्रदर्शित करनेमें स्त्रीसे मिले हुए पुरुषका दृष्टान्त

इदानीं योऽसौ सर्वात्मभावो मोक्षो विद्याफलं क्रियाकारकफलशून्यम्, स प्रत्यक्षतो निर्दिश्यते, यत्राविद्याकामकर्माणि न सन्ति। तदेतत् प्रस्तुतम्—‘यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति’ इति—अब, यह जो विद्याका फल क्रियाकारक एवं फलसे रहित सर्वात्मभावरूप मोक्ष है, जिसमें कि अविद्या, काम और कर्मका अभाव है, उसका प्रत्यक्षतया निर्देश किया जाता है। 'जिस अवस्थामें सोया हुआ पुरुष किसी भोगकी इच्छा नहीं करता और न कोई स्वप्न देखता है' इस प्रकार जिसका प्रकरण चला था—

तद् वा अस्यैतदतिच्छन्दा अपहतपाप्माभयँ रूपम्। तद् यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरं तद् वा अस्यैतदाप्तकाममात्मकाममकामँ रूपँ शोकान्तरम् ॥ २१ ॥

वह इसका कामरहित, पापरहित और अभयरूप है। व्यवहारमें जिस प्रकार अपनी प्रिया भार्याको आलिङ्गन करनेवाले पुरुषको न कुछ बाहरका ज्ञान रहता है और न भीतरका, इसी प्रकार यह पुरुष प्राज्ञात्मासे आलिङ्गित होनेपर न कुछ बाहरका विषय जानता है और न भीतरका; यह इसका आप्तकाम, आत्मकाम, अकाम और शोकशून्य रूप है ॥ २१ ॥

तदेतद् वा अस्य रूपम्—यः सर्वात्मभावः 'सोऽस्य परमो लोकः' इत्युक्तः—तदतिच्छन्दा अतिच्छन्द-इसका यह रूप, जो कि सर्वात्मभाव एवं 'यह इसका परम लोक है' इस प्रकार कहा गया है, वह अतिच्छन्दा अर्थात् अतिच्छन्द-रूप