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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५३

Page 1369Permalink

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५३


वीत सर्वमायुरियादिति माँ सौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्रीयातामीश्वरौ जनयितवा औक्षेण वार्षभेण वा ॥ १८ ॥

जो चाहता हो कि मेरा पुत्र प्रख्यात पण्डित, विद्वानोंकी सभामें निर्भय प्रवेश करनेवाला तथा श्रवणसुखद वाणी बोलनेवाला हो, सम्पूर्ण वेदोंका स्वाध्याय करे और पूरे सौ वर्षोंतक जीवित रहे, वह पुरुष और उसकी पत्नी ओषधियोंका गूदा और चावल पकाकर उसमें घी मिलाकर खायें। इससे वे उक्त योग्यतावाले पुत्रको जन्म देनेमें समर्थ होते हैं। उक्षा अथवा ऋषभ नामक ओषधिके गूदेके साथ खानेका नियम है ॥ १८ ॥

शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
विविधं गीतो विगीतः प्रख्यात इत्यर्थः । समितिङ्गमः सभां गच्छतीति प्रगल्भ इत्यर्थः । पाण्डित्यस्य पृथग्ग्रहणात् । शुश्रूषितां श्रोतुमिष्टां रमणीयां वाचं भाषिता संस्कृताया अर्थवत्या वाचो भाषितेत्यर्थः । <br><br> मांसमिश्रमोदनं मांसौदनम् । <br><br> तन्मांसनियमार्थमाह— <br><br> औक्षेण वा मांसेन । उक्षा सेचनस-नाना प्रकारसे जिसकी महत्ता गायी जाय, वह विगीत कहलाता हे। विगीत अर्थात् प्रख्यात। समितिङ्गम—विद्वानोंकी सभामें जानेवाला निर्भीक या प्रगल्भ। 'समितिङ्गमः' का अर्थ विद्वान् या पण्डित इसलिये नहीं किया गया कि मन्त्रमें पाण्डित्यका पृथक् ग्रहण देखा जाता है। शुश्रूषिता—सुननेमें प्रिय, रमणीयवाणीका वक्ता अर्थात् संस्कारयुक्त सार्थकवाणी बोलनेवाला। <br><br> ओषधि अथवा फलके गूदेको मांस कहते हैं; उससे मिश्रित भातको यहाँ 'मांसोदन' कहा गया है। उस ओषधिके गूदेका नियम करनेके लिये कहते हैं—उक्षाके गूदेके साथ। गर्भाधानमें समर्थ साँडको उक्षा कहते हैं। उसीके समान शक्तिशाली होनेसे ओषधि-विशेषका नाम भी उक्षा* हे,

  • 'उक्षा' शब्दके कोषमें दो प्रकारके अर्थ मिलते हैं। कलकत्तेसे प्रकाशित 'वाचस्पत्य' नामक बृहत् संस्कृताभिधानमें उसे अष्टवर्गान्तर्गत ऋषभ' नामक