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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

Page 649 of 1402

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Page 649

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३९


हुता उज्ज्वलन्ति या हुता अतिनेदन्ते या हुता अधिशेरते किं ताभिर्जयतीति या हुता उज्ज्वलन्ति देवलोकमेव ताभिर्जयति दीप्यत इव हि देवलोको या हुता अतिनेदन्ते पितृलोकमेव ताभिर्जयत्यतीव हि पितृलोको या हुता अधिशेरते मनुष्यलोकमेव ताभिर्जयत्यध इव हि मनुष्यलोकः ॥ ८ ॥

'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'आज इस यज्ञमें यह अध्वर्यु कितनी आहुतियाँ होम करेगा !' [ याज्ञवल्क्य-] 'तीन ।' [ अश्वल- ] 'वे तीन कौन-कौन-सी हैं, [ याज्ञवल्क्य- ] 'जो होम की जानेपर प्रज्वलित होती हैं, जो होम की जानेपर अत्यन्त शब्द करती हैं और जो होम की जानेपर पृथ्वीके ऊपर लीन हो जाती हैं।' [ अश्वल- ] 'इनके द्वारा यजमान किसको जीतता है।' [ याज्ञवल्क्य- ] 'जो होम की जानेपर प्रज्वलित होती हैं; उनसे यजमान देवलोकको ही जीत लेता है; क्योंकि देवलोक मानो देदीप्यमान हो रहा है। जो होम की जानेपर अत्यन्त शब्द करती हैं, उनसे वह पितृलोकको ही जीत लेता है; क्योंकि पितृलोक मानो अत्यन्त शब्द करनेवाला है। जो होम की जानेपर पृथ्वीपर लीन हो जाती हैं, उनसे मनुष्यलोकको ही जीतता है; क्योंकि मनुष्यलोक अधोवर्ती-सा है' ॥ ८ ॥

| याज्ञवल्क्येति होवाचेति पूर्ववत् । कत्ययमद्याध्वर्युरस्मिन् यज्ञ आहुतीर्होष्यतीति, कत्याहुतिप्रकाराः ? तिस्र इति, कतमास्तास्तिस्र इति पूर्ववत् । <br><br> इतर आह—या हुता उज्ज्व- | 'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने पूर्ववत् [ अपने अभिमुख करनेके लिये ] कहा, 'आज यह अध्वर्यु इस यज्ञमें कितनी आहुतियाँ हवन करेगा ?' अर्थात् आहुतियोंके कितने प्रकार हैं ?' [याज्ञवल्क्य-] 'तीन ।' फिर पूर्ववत् पूछता है—'कौन-कौन तीन ?' <br><br> इसपर इतर ( याज्ञवल्क्य ) कहता है—'जो हवन की जानेपर |