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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१२७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६

१२७०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ६

| भोक्ष्यमाणस्य भुक्तवतश्च यदाचमनं तत्रापो वासः प्राणस्येति दर्शनमात्रं विधीयते, अप्राप्तत्वादिन्यतः ॥ १४ ॥ | ही क्रिया है। अतः भोजन करनेवाले और भोजन कर चुकनेवालेका जो आचमन है, उसमें 'जल प्राणका वस्त्र है' ऐसी दृष्टिमात्रका विधान किया जाता है, क्योंकि किसी अन्य प्रमाणसे इसकी प्राप्ति नहीं होती ॥ १४ ॥ |

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये प्रथमं प्राणसंवादब्राह्मणम् ॥१॥


द्वितीय ब्राह्मण

| [प्रकरण-सम्बन्धः] श्वेतकेतुर्ह वा आरुणेय इत्यस्य सम्बन्धः—खिलाधिकारोऽयम्, तत्र यदनुक्तं तदुच्यते। सप्तमाध्यायान्ते ज्ञानकर्मसमुच्चयकारिणाऽग्नेर्मार्गयाचनं कृतम्—अग्ने नय सुपथेति। तत्रानेकेषां पथां सद्भावो मन्त्रेण सामर्थ्यात् प्रदर्शितः; सुपथेति विशेषणात्। पन्थानश्च कृतविपाकप्रतिपत्तिमार्गाः। वक्ष्यति च—यत् कृत्वेत्यादि। | 'श्वेतकेतुर्ह वा आरुणेयः' इत्यादि इस ब्राह्मणका सम्बन्ध इस प्रकार है। यह खिलप्रकरण है। इसमें पहले जो नहीं कहा गया, वह बतलाया जाता है। सप्तम (उपनिषद्के पञ्चम) अध्यायके अन्तमें ज्ञानकर्मसमुच्चयकारी पुरुषके द्वारा 'अग्ने नय सुपथा'—इत्यादि मन्त्रद्वारा अग्निसे देवयान मार्गकी याचना की गयी है। वहाँ उस मन्त्रद्वारा सामर्थ्यसे अनेक मार्गोंकी सत्ता प्रदर्शित होती है; क्योंकि उसमें 'सुपथा' ऐसा विशेषण दिया गया है। और 'पथ' किये हुए कर्मोंके फलभोगके मार्गोंका नाम है। यह बात श्रुति 'यत् कृत्वा'<sup>१</sup> इत्यादि मन्त्रसे कहेगी भी। |


१. इसी ब्राह्मणका दूसरा मन्त्र।