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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१०८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

१०८४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

अभेददर्शी आत्मज्ञकी निर्भयता

यदैतमनुपश्यत्यात्मानं देवमञ्जसा।
ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ॥१५॥

जब भूत और भविष्यके स्वामी इस प्रकाशमान अथवा कर्म-फलदाता आत्माको मनुष्य साक्षात् जान लेता है तो यह उससे अपनी रक्षा करनेकी इच्छा नहीं करता ॥ १५ ॥

यदा पुनरेतमात्मानम्, कथंचित् परमकारुणिकं कांचिदाचार्यं प्राप्य ततो लब्धप्रसादः सन्, अनुपश्चात् पश्यति साक्षात्करोति स्वमात्मानम्, देवं द्योतनवन्तं दातारं वा सर्वप्राणिकर्मफलानां यथाकर्मानुरूपम्, अञ्जसा साक्षात्, ईशानं स्वामिनं भूतभव्यस्य कालत्रयस्येत्येतत्—न ततस्तस्मादीशानाद् देवादात्मानं विशेषेण जुगुप्सते गोपायितुमिच्छति।<br><br>सर्वो हि लोक ईश्वराद् गुप्तिमिच्छति भेददर्शी; अयं त्वेकत्वदर्शी न बिभेति कुतश्चन; अतो न तदा विजुगुप्सते, यदा ईशानं देवमञ्जसा आत्मत्वेन पश्यति। न तदा निन्दति वा कंचित्,किंतु जिस समय मनुष्य किसी प्रकार किसी परम करुणामय आचार्यके पास पहुँचकर उससे प्रसाद पाकर फिर इस आत्माको देख लेता है अर्थात् इस देव—द्योतनवान् अथवा कर्मोंके अनुसार प्राणियोंके सम्पूर्ण कर्मफलोंको देनेवाले तथा भूत-भविष्यत् आदि तीनों कालोंके स्वामी अपने आत्माका साक्षात्कार कर लेता है, उसे अञ्जसा—साक्षात् जान लेता है; तो उस ईशानदेवसे अपनेको विशेषरूपसे सुरक्षित रखनेकी इच्छा नहीं करता।<br><br>भेददर्शी सभी लोग ईश्वरसे अपनी रक्षा चाहते हैं; किंतु यह अभेददर्शी किसीसे नहीं डरता; इसलिये जब यह ईशानदेवको साक्षात् आत्मरूपसे देखता है तो अपनेको सुरक्षित रखनेकी इच्छा नहीं करता अथवा ‘न विजुगुप्सते’—उस समय किसीकी निन्दा नहीं करता, क्योंकि