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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

११२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४]

११२६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४]

| यति, अवगमयति संख्यास्वरूपं केवलम्, न तु संख्याया रेखात्मत्वमेव, यथा च—अकारादीन्यक्षराणि विजिग्राहयिषुः पत्रमषीरेखादिसंयोगोपायमास्थाय वर्णानां सतत्त्वमावेदयति, न पत्रमष्याद्यात्मतामक्षराणां ग्राहयति—तथा चेहोत्पत्त्याद्यनेकोपायमास्थायैकं ब्रह्मतत्त्वमावेदितम्, पुनस्तत्कल्पितोपायजनितविशेषपरिशोधनार्थं नेति नेतीति तत्त्वोपसंहारः कृतः। तदुपसंहृतं पुनः परिशुद्धं केवलमेव सफलं ज्ञानमन्तेऽस्यां कण्डिकायामिति ॥ २५ ॥ | तथा उन रेखाओंके द्वारा केवल संख्याके स्वरूपका ज्ञान कराते हैं, किंतु वास्तवमें संख्या रेखारूप ही नहीं है। तथा जिस प्रकार अकारादि अक्षरोंको ग्रहण करानेकी इच्छावाला पुरुष कागज, स्याही और रेखाओंके संयोगरूप उपायका आश्रय लेकर वर्णोंका स्वरूप समझा देता है, कागज-स्याही आदि ही अक्षरोंके स्वरूप हैं—ऐसा नहीं समझाता, उसी प्रकार यहाँ उत्पत्ति आदि अनेकों उपायोंका अवलम्बन कर एक ब्रह्मतत्त्वका ही बोध कराया गया है। फिर उस कल्पित उपायसे पैदा हुए विशेषका निरास करनेके लिये 'नेति नेति' ऐसा कहकर तत्त्वका उपसंहार किया है। फिर अन्तमें वह उपसंहृत, परिशुद्ध, केवल ज्ञान ही अपने फलके सहित इस कण्डिकामें बतलाया गया है ॥ २५ ॥ |


इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये
चतुर्थं शारीरकब्राह्मणम् ॥ ४ ॥