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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

७१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

Page 724Permalink
७१४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| यथा रज्जुशुक्तिकागगनादयः सर्परजतमलिना भवन्ति पराध्यारोपितधर्मविशिष्टाः, स्वतः केवला एव रज्जुशुक्तिकागगनादयः; न चैवं विरुद्धधर्मसमवायित्वे पदार्थानां कश्चन विरोधः। | चुकी है; जिस प्रकार कि रज्जु, शुक्ति और आकाश आदि दूसरोंके आरोपित किये धर्मोंसे युक्त होकर सर्प, रजत और मलिन प्रतीत होते हैं, किंतु वे स्वयं शुद्ध रज्जु, शुक्ति और आकाशादि ही हैं; इस प्रकार पदार्थोंके विरुद्ध धर्म-समवायी होनेमें कोई विरोध भी नहीं है। |
| नामरूपोपाध्यस्तित्वे—<br>“एकमेवाद्वितीयम्” (छा० उ० ६।२।१) “नेह नानास्ति किञ्चन” (बृ०उ० ४।४।१९ इति श्रुतयो विरुध्येरन्निति चेत् ? | शङ्का—किंतु नाम-रूप उपाधिकी सत्ता स्वीकार करनेपर तो “एक ही अद्वितीय ब्रह्म है”, “यहाँ नाना कुछ नहीं है” इन श्रुतियोंसे विरोध होगा—ऐसा कहें तो ? |
| न, सलिलफेनदृष्टान्तेन परिहृतत्वात्, मृदादिदृष्टान्तैश्च; यदा तु परमार्थदृष्ट्या परमात्मतत्त्वाच्छ्रुत्यनुसारिभिरन्यत्वेन निरूप्यमाणे नामरूपे मृदादिविकारवद् वस्त्वन्तरे तत्त्वतो न स्तः— सलिलफेनघटादिविकारवदेव, तदा तदपेक्ष्य “एकमेवाद्वितीयम्” “नेह नानास्ति किञ्चन” इत्यादिपरमार्थदर्शनगोचरत्वं प्रतिपद्यते। यदा तु स्वाभा- | समाधान—नहीं, इस शङ्काका तो जल और फेनके दृष्टान्तसे तथा मृत्तिकादिके दृष्टान्तसे परिहार किया जा चुका है, जिस समय श्रुतिका अनुसरण करनेवाले पुरुषोंद्वारा अन्यरूपसे निरूपण किये जानेवाले नाम और रूप परमार्थदृष्टिसे मृत्तिकादिके विकार तथा जल-फेन और घटादिके विकारके समान ही परमात्मतत्त्वसे वस्तुतः कोई भिन्न पदार्थ नहीं रहते, तब उसकी दृष्टिकी अपेक्षासे ही “एक ही अद्वितीय है” “यहाँ नाना कुछ नहीं है” इस परमार्थदृष्टिका बोध होता है। किंतु जिस समय |