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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

१४८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| द्योतकोऽयमुच्छब्दः प्राणगुणाभि-धायकः, तस्मादुत्प्राणः। वागेव गीथाशब्दविशेषत्वादुद्गीथभक्तेः। गायतेः शब्दार्थत्वात्सा वागेव ! न ह्युद्गीथभक्तेः शब्दव्यतिरेकेण किञ्चिद्रूपमुत्प्रेक्ष्यते । तस्माद्युक्तमवधारणं वागेव गीथेति । उच्च प्राणो गीथा च प्राणतन्त्रा वागित्युभयमेकेन शब्देनाभिधीयते स उद्गीथः ॥ २३ ॥ | यह 'उत्' शब्द प्राणका गुण बतलानेवाला है। अतः प्राण उत् है। वाक् ही गीथा है; क्योंकि उद्गीथभक्ति शब्दविशेष ही है। 'गै' धातुका अर्थ शब्द करना है, अतः गीथा वाक् ही है। उद्गीथ-भक्तिके स्वरूपकी शब्दके सिवा और कोई उत्प्रेक्षा नहीं की जा सकती। अतः वाक् ही गीथा है—ऐसा निश्चय करना उचित ही है। उत् प्राण है और गीथा प्राणतन्त्रा वाक् है, अतः इन दोनोंका एक ही शब्दसे कथन होता है, वह शब्द 'उद्गीथ' है ॥ २२ ॥ |

उक्त अर्थकी पुष्टिके लिये आख्यायिका

तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चैकितानेयो राजानं भक्षयन्नुवाचायं त्यस्य राजा मूर्धानं विपातयताद्यदितोऽयास्य आङ्गिरसोऽन्येनोदगायदिति वाचा च ह्येव स प्राणेन चोदगायदिति ॥ २४ ॥

उस [प्राण] के विषयमें यह आख्यायिका भी है--चैकितानेय ब्रह्मदत्तने यज्ञमें सोम भक्षण करते हुए कहा। "यदि अयास्य और आङ्गिरसनामक मुख्य प्राणने वाक्संयुक्त प्राणसे अतिरिक्त देवताद्वारा उद्गान किया हो तो यह सोम मेरा शिर गिरा दे।" अतः उसने प्राण और वाक्‌के ही द्वारा उद्गान किया था—ऐसा निश्चय होता है ॥ २४ ॥

तद्धापि तत्तत्रैतस्मिन्नुक्तेऽर्थे हाप्याख्यायिकापि श्रूयते ह स्म।'तद्धापि'--उस अर्थात् इस उपर्युक्त विषयमें यह आख्यायिका भी सुनी जाती है--ब्रह्मदत्त नाम-