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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

| १३२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |

Page 1340Permalink
१३२४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ६

| वापस्थान आज्यस्य जुहोत्येतैर्मन्त्रैर्यावन्तो देवा इत्यादिभिः ॥ १ ॥ | देवाः' इत्यादि मन्त्रोंसे आवापस्थानमें घृतसे हवन करे ॥ १ ॥ |


हवनके मन्त्र

ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति प्राणाय स्वाहा वसिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति वाचे स्वाहा प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति चक्षुषे स्वाहा सम्पदे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति श्रोत्राय स्वाहायतनाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति मनसे स्वाहा प्रजात्यै स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति रेतसे स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति ॥ २ ॥

'ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको (स्रुवामें बचे हुए घृतको) मन्थमें डाल देता है। 'प्राणाय स्वाहा, वसिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'वाचे स्वाहा प्रतिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'चक्षुषे स्वाहा सम्पदे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'श्रोत्राय स्वाहा आयतनाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'मनसे स्वाहा प्रजात्यै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'रेतसे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके संस्रवको मन्थमें डाल देता है ॥ २ ॥

अग्नये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति सोमाय स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे सँस्रवमवनयति भूः स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा