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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

| १९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |

१९८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
संस्कृतहिन्दी
इति श्रुतेः। यः स्रष्टा स भावान्तरमनापन्न एव कार्यं सृष्ट्वा पश्चात्प्राविशदिति हि श्रूयते। यथा भुक्त्वा गच्छतीति भुजिगमिक्रिययोः पूर्वापरकालयोरितरेतरविच्छेदोऽविशिष्टश्च कर्ता तद्वदिहापि स्यात्। न तु तत्स्थस्यैव भावान्तरोपजनन एतत्सम्भवति। न च स्थानान्तरेण वियुज्य स्थानान्तरसंयोगलक्षणः प्रवेशो निरवयवस्यापरिच्छिन्नस्य दृष्टः।जो स्रष्टा था उसने भावान्तरको प्राप्त हुए बिना ही कार्यकी रचना कर पीछेसे उसमें प्रवेश किया—ऐसा श्रुतिमें कहा गया है। जिस प्रकार 'भोजन करके जाता है' इस वाक्यमें पूर्वापरकालमें होनेवाली भोजन और गमनक्रियाओंका परस्पर विभेद है और उनका कर्ता अलग-अलग नहीं है, उसी प्रकार यहाँ भी समझना चाहिये। यह उसमें स्थितका ही भावान्तरको प्राप्त होनेपर सम्भव नहीं है। तथा जो निरवयव और अपरिच्छिन्न होता है उसका एक स्थानसे वियुक्त होकर दूसरे स्थानसे संयुक्त होना-रूप प्रवेश नहीं देखा जाता।
सावयव एव प्रवेशश्रवणादिति चेत् ?सिद्धान्ती—उसका प्रवेश सुना गया है, इसलिये यदि वह सावयव ही हो तो?
न; “दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः” (मु० उ० २।१।२) “निष्कलं निष्क्रियम्” (श्वे० उ० ६।१९) इत्यादिश्रुतिभ्यः, सर्वव्यपदेश्यधर्मविशेषप्रतिषेधश्रुतिभ्यश्च।पूर्व०—नहीं; “शरीररूप पुरमें रहनेवाला आत्मा दिव्य और अमूर्त है” “वह निरवयव और निष्क्रिय है” इत्यादि श्रुतियोंसे तथा सब प्रकारके व्यपदेश्य धर्मोंका निषेध करनेवाली श्रुतियोंसे ऐसा सिद्ध नहीं होता।
प्रतिबिम्बप्रवेशवदिति चेत् ?सिद्धान्ती—[दर्पणादिमें] प्रतिबिम्बके प्रवेशके समान उसका प्रवेश हो तो?