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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

२२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

Page 228Permalink
२२२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
न, अर्थप्राप्तत्वात्। यदैवात्मप्रतिपादकवाक्यश्रवणाद् आत्मविषयं विज्ञानमुत्पद्यते, तदैव तदुत्पद्यमानं तद्विषयं मिथ्याज्ञानं निवर्तयदेवोत्पद्यते। आत्मविषयमिथ्याज्ञाननिवृत्तौ च तत्प्रभवाः स्मृतयो न भवन्ति स्वाभाविक्योऽनात्मवस्तुभेदविषयाः।सिद्धान्ती—नहीं, वह तो अर्थतः प्राप्त है। जिस समय भी आत्मप्रतिपादक वाक्यके श्रवणसे आत्मविषयक ज्ञान उत्पन्न होता है उसी समय वह उत्पन्न होनेवाला ज्ञान आत्मविषयक मिथ्या ज्ञानकी निवृत्ति करता हुआ ही उत्पन्न होता है; तथा आत्मविषयक मिथ्या ज्ञानकी निवृत्ति हो जानेपर तज्जनित अनात्मवस्तुभेदविषयक स्वाभाविकी स्मृतियाँ भी नहीं होतीं।
अनर्थत्वावगतेश्च, आत्मावगतौ हि सत्यामन्यद्वस्त्वनर्थत्वेनावगम्यते, अनित्यदुःखाशुद्ध्यादिबहुदोषवत्त्वाद् आत्मवस्तुनश्च तद्विलक्षणत्वात्। तस्मादनात्मविज्ञानस्मृतीनाम् आत्मावगतेरभावप्राप्तिः। पारिशेष्यादात्मैकत्वविज्ञानस्मृतिसन्ततेरर्थत एव भावान्न विधेयत्वम्, शोकमोहभयायासादिदुःखदोषनिवर्तकत्वाच्च तत्स्मृतेः। विपरीतज्ञानप्रभवो हि शोकमोहादिदोषः। तथा चइसके सिवा अनात्मवस्तुविषयक स्मृतियाँ अनर्थकारिणी हैं—ऐसा बोध हो जानेसे भी उनकी आवृत्ति नहीं होती। आत्मज्ञान हो जानेपर अन्य वस्तुएँ अनर्थरूपसे ज्ञात होती हैं, क्योंकि वे अनित्यता, दुःख एवं अशुद्धि आदि अनेकों दोषोंसे युक्त हैं और आत्मवस्तु उनसे भिन्न स्वभावकी है। अतः आत्मज्ञान होनेपर अनात्मविज्ञानजनित स्मृतियोंका अभाव प्राप्त होता है। अन्ततोगत्वा आत्मैकत्वविज्ञानसम्बन्धी स्मृतिका प्रवाह अर्थतः प्राप्त होनेके कारण विधिका विषय नहीं है, क्योंकि आत्मस्मृति तो शोक, मोह, भय, श्रम आदि बहुत-से दुःख और दोषोंकी निवृत्ति करनेवाली है। शोकमोहादि दोष तो विपरीत ज्ञानसे ही होनेवाला है। इस विषयमें "उस