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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १८७
Page 293Permalink
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १८७
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| ब्रह्म वा इदमग्र आसीद्यदग्निं सृष्ट्वा अग्निरूपापन्नं ब्रह्म। ब्राह्मणजात्यभिमानाद् ब्रह्मेत्यभिधीयते। वै इदं क्षत्रादिजातं ब्रह्मैवाभिन्नमासीदेकमेव। नासीत्क्षत्रादिभेदः। तद्ब्रह्मैकं क्षत्रादिपरिपालयित्रादिशून्यं सद् न व्यभवत्—न विभूतवत्, कर्मणे नालमासीदित्यर्थः। | आरम्भमें यह ब्रह्म ही था अर्थात् अग्निको रचकर जो अग्निरूपको प्राप्त हुआ, वह ब्रह्म ही था। ब्राह्मणजातिका अभिमान होनेके कारण वह ब्रह्म कहा जाता है। उस समय यह क्षत्रियादि समुदाय भी ब्रह्मसे अभिन्न अर्थात् एकरूप ही था। अर्थात् पहले क्षत्रियादि भेद नहीं था। वह ब्रह्म एक (अकेला)—क्षत्रियादि पालनकर्तासे शून्य होनेके कारण विभूतियुक्त कर्म करनेको समर्थ नहीं हुआ। |
| ततस्तद्ब्रह्म 'ब्राह्मणोऽस्मि ममेत्थं कर्तव्यम्' इति ब्राह्मणजातिनिमित्तं कर्म चिकीर्षु-आत्मनः कर्मकर्तृत्वविभूतये श्रेयो रूपं प्रशस्तरूपम् अत्यसृजत-अतिशयेनासृजत—सृष्टवत्। किं पुनस्तद्यत्सृष्टम्? क्षत्रं क्षत्रियजातिः, तद्व्यक्तिभेदेन प्रदर्शयति—यान्येतानि प्रसिद्धानि लोके देवत्रा देवेषु क्षत्राणीति। | तब उस ब्रह्मने 'मैं ब्राह्मण हूँ, मेरा यह कर्तव्य है' इस विचारसे ब्राह्मणजातिनिमित्तिक कर्म करनेकी इच्छा करके कर्मकर्तृत्वरूप विभूतिके लिये 'श्रेयो रूपमत्यसृजत' अर्थात् प्रशस्त रूपकी रचना की। जिसकी रचना की गयी था वह रूप कौन-सा था ? क्षत्र अर्थात् क्षत्रियजाति। उन्हींको 'यान्येतानि' इत्यादि वाक्यसे श्रुति व्यक्तिभेदसे दिखाती है। अर्थात् लोकमें देवताओंमें जो क्षत्रियरूपसे प्रसिद्ध हैं। जातिवाचक² शब्दोंमें |
१. इस अध्यायके आरम्भमें अग्निरूप प्रजापतिकी उत्पत्ति दिखलायी है और अग्नि ब्राह्मणजातिका उपकारक देव है। इसलिये उसे ब्राह्मणजातिका अभिमान होना स्वाभाविक है।
२. 'जात्याख्यायामेकस्मिन् बहुवचनमन्यतरस्याम्' (पा० सू० १।२।५८)